आचार्य रविषेण की जैन रामायण
कथा
जैन परम्परा में राम पद्म नाम से आठवें बलभद्र हैं, और उनका चरित्र गौतम गणधर राजा श्रेणिक के प्रश्नों के उत्तर में सुनाते हैं। यहाँ यह कथा बारह खंडों में पढ़िए, पहले वंशों और रावण के उदय से लेकर लंका के युद्ध, सीता की अग्नि-परीक्षा और राम के निर्वाण तक।

खंड 1 पर्व 1 से 5
उद्गम: लोक और वंशों की उत्पत्ति
राजा श्रेणिक गौतम गणधर से राम की सच्ची कथा पूछते हैं। उत्तर लोक की रचना, कुलकरों और ऋषभदेव से आरम्भ होकर चार महावंशों, इक्ष्वाकु, सोम, विद्याधर और हरि, की उत्पत्ति तक पहुँचता है।
मुख्य बिंदु
- पर्व 1: पीठबंध: मंगलाचरण और कथा की रूपरेखा
पीठबंध: मंगलाचरण और कथा की रूपरेखा
जिनेन्द्रों को नमस्कार से आरम्भ होकर ग्रंथ आठवें बलभद्र राम (पद्म) का चरित्र राजा श्रेणिक के प्रश्न पर गौतम गणधर के उत्तर के रूप में प्रस्तुत करता है।
- पर्व 2: लोकस्थिति महाधिकार
लोकस्थिति महाधिकार
विपुलाचल पर्वत पर महावीर का समवशरण आता है, और उनका उपदेश सुनकर राजा श्रेणिक राम की सच्ची कथा जानने का संकल्प करते हैं।
- पर्व 3: विद्याधर लोक का वर्णन
विद्याधर लोक का वर्णन
गौतम स्वामी लोक और कालचक्र का वर्णन करते हैं; ऋषभदेव कर्मभूमि की व्यवस्था कर दीक्षा लेते हैं, और नमि-विनमि को विद्याधरों का लोक प्राप्त होता है।
- पर्व 4: भगवान ऋषभदेव का आहार-निमित्त विहार वर्णन
भगवान ऋषभदेव का आहार-निमित्त विहार वर्णन
एक वर्ष से अधिक निराहार विहार के बाद हस्तिनापुर में राजा श्रेयांस ऋषभदेव को इक्षुरस का प्रथम आहार देते हैं।
- पर्व 5: वंशोत्पत्ति महाधिकार
वंशोत्पत्ति महाधिकार
गौतम स्वामी चार महावंशों का वर्णन करते हैं, और अजितनाथ के समवशरण में राक्षसों के इन्द्र मेघवाहन को राक्षस द्वीप और लंका देते हैं, जिससे रावण के वंश की नींव पड़ती है।

खंड 2 पर्व 6 से 14
राक्षस, वानर और रावण का उदय
लंका और किष्किंधा के विद्याधर वंश आकार लेते हैं, रत्नश्रवा और केकसी के यहाँ रावण का जन्म होता है, वह हजारों विद्याएँ सिद्ध कर विद्याधर लोक को जीतता है, और कैलाश पर बाली मुनि उसका मान भंग करते हैं।
मुख्य बिंदु
- पर्व 6: वानरवंशियों की उत्पत्ति
वानरवंशियों की उत्पत्ति
विद्याधर राजकुमार श्रीकंठ वानरद्वीप में किष्कुपुर बसाते हैं और उनके वंशज वानर-चिह्न अपनाकर वानरवंशी कहलाते हैं।
- पर्व 7: रावण का जन्म और विद्या साधनादि का निर्देश
रावण का जन्म और विद्या साधनादि का निर्देश
रत्नश्रवा और केकसी के पुत्र रावण का जन्म होता है और वह यक्ष के घोर उपसर्गों से अडिग रहकर भीम वन में हज़ारों विद्याएँ सिद्ध करता है।
- पर्व 8: दशानन के कुटुंबादि का परिचय और वैभव का दिग्दर्शन
दशानन के कुटुंबादि का परिचय और वैभव का दिग्दर्शन
रावण मंदोदरी से विवाह करता है, वैश्रवण को हराकर पुष्पक विमान पाता है, वानर राजाओं को यम के कृत्रिम नरक से छुड़ाता है और लंका में प्रवेश करता है।
- पर्व 9: बाली मुनि का निरूपण
बाली मुनि का निरूपण
जिनेन्द्र के सिवा किसी को नमस्कार न करने की प्रतिज्ञा निभाते हुए बाली मुनि बने, कैलाश उठाते रावण को अंगूठे से दबाया और मोक्ष पाया।
- पर्व 10: राजा सुग्रीव और रानी सुतारा का वृत्तांत
राजा सुग्रीव और रानी सुतारा का वृत्तांत
सुग्रीव का सुतारा से विवाह हुआ, और रावण द्वारा पकड़े गए माहिष्मती-नरेश सहस्ररश्मि ने छूटकर दीक्षा ली, जिसके बाद उनके मित्र अनरण्य भी मुनि बने।
- पर्व 11: राजा मरुत के यज्ञ का विनाश और रावण की दिग्विजय का निरूपण
राजा मरुत के यज्ञ का विनाश और रावण की दिग्विजय का निरूपण
रावण ने नारद को छुड़ाकर राजा मरुत के पशुयज्ञ का विध्वंस किया, उस हिंसक यज्ञ का जिसकी शुरुआत राजा वसु के झूठ से हुई थी।
- पर्व 12: इन्द्र नामक विद्याधर के पराभव का कथन
इन्द्र नामक विद्याधर के पराभव का कथन
रावण ने युक्ति से नलकूबर का नगर जीता, सुदर्शन चक्ररत्न पाया और महायुद्ध में विद्याधरों के राजा इन्द्र को बंदी बना लिया।
- पर्व 13: विद्याधर इन्द्र का निर्वाण गमन
विद्याधर इन्द्र का निर्वाण गमन
पिता सहस्रार की विनती पर छोड़े गए अपमानित इन्द्र ने चारण मुनि से अपने पूर्वभव सुनकर जिनदीक्षा ली और निर्वाण प्राप्त किया।
- पर्व 14: अनंतवीर्य केवली के धर्मोपदेश का वर्णन
अनंतवीर्य केवली के धर्मोपदेश का वर्णन
सुमेरु से लौटते हुए रावण ने अनंतवीर्य केवली का धर्मोपदेश सुना और नियम लिया कि किसी परस्त्री को उसकी इच्छा के बिना बलपूर्वक ग्रहण नहीं करेगा।
इस खंड के पर्व
- पर्व 6 वानरवंशियों की उत्पत्ति
- पर्व 7 रावण का जन्म और विद्या साधनादि का निर्देश
- पर्व 8 दशानन के कुटुंबादि का परिचय और वैभव का दिग्दर्शन
- पर्व 9 बाली मुनि का निरूपण
- पर्व 10 राजा सुग्रीव और रानी सुतारा का वृत्तांत
- पर्व 11 राजा मरुत के यज्ञ का विनाश और रावण की दिग्विजय का निरूपण
- पर्व 12 इन्द्र नामक विद्याधर के पराभव का कथन
- पर्व 13 विद्याधर इन्द्र का निर्वाण गमन
- पर्व 14 अनंतवीर्य केवली के धर्मोपदेश का वर्णन

खंड 3 पर्व 15 से 19
अंजना और हनुमान का जन्म
राजकुमारी अंजना का विवाह पवनंजय से होता है, पर वह बाईस वर्ष तक उपेक्षित रहती है। गर्भावस्था में घर से निकाली गई अंजना पर्वत की गुफा में हनुमान को जन्म देती है, जो अद्वितीय वीर और कामदेव बनते हैं।
मुख्य बिंदु
- पर्व 15: अंजनासुंदरी और पवनंजय कुमार के विवाह का वर्णन
अंजनासुंदरी और पवनंजय कुमार के विवाह का वर्णन
दासी के मुख से प्रतिद्वंद्वी वर की प्रशंसा सुनकर पवनंजय अंजना से रूठ गया और केवल उसे त्यागने के लिए उससे विवाह किया।
- पर्व 16: अंजना और पवनंजय कुमार का मिलन
अंजना और पवनंजय कुमार का मिलन
युद्ध के मार्ग में पति से बिछुड़ी चकवी का दुख देखकर पवनंजय बाईस वर्ष की उपेक्षा के बाद गुप्त रूप से अंजना के पास लौटता है।
- पर्व 17: अंजना के गर्भ प्रकट होना और सास द्वारा घर से निकालना
अंजना के गर्भ प्रकट होना और सास द्वारा घर से निकालना
सास और पिता द्वारा निकाली गई अंजना वन की गुफा में हनुमान को जन्म देती है और उसके मामा प्रतिसूर्य उसे आश्रय देते हैं।
- पर्व 18: पवनंजय का युद्ध से प्रत्यागमन और अंजना का अन्वेषण
पवनंजय का युद्ध से प्रत्यागमन और अंजना का अन्वेषण
युद्ध से विजयी लौटे पवनंजय अंजना को घर से निकाली गई पाकर उसके बिना प्राण त्यागने का निश्चय करते हैं, और अंत में अंजना तथा पुत्र हनुमान से मिलते हैं।
- पर्व 19: हनुमान का युद्ध में जाकर विजय प्राप्त कर अनेक कन्याओं से विवाह करना
हनुमान का युद्ध में जाकर विजय प्राप्त कर अनेक कन्याओं से विवाह करना
युवा हनुमान वरुण के सौ पुत्रों को बाँधकर रावण को वरुण पर विजय दिलाते हैं, फिर राज्य पाते हैं और हजार राजकन्याओं से विवाह करते हैं।
इस खंड के पर्व
- पर्व 15 अंजनासुंदरी और पवनंजय कुमार के विवाह का वर्णन
- पर्व 16 अंजना और पवनंजय कुमार का मिलन
- पर्व 17 अंजना के गर्भ प्रकट होना और सास द्वारा घर से निकालना
- पर्व 18 पवनंजय का युद्ध से प्रत्यागमन और अंजना का अन्वेषण
- पर्व 19 हनुमान का युद्ध में जाकर विजय प्राप्त कर अनेक कन्याओं से विवाह करना

खंड 4 पर्व 20 से 29
रघुकुल: जन्म और विवाह
त्रेसठ शलाका पुरुषों का वर्णन, इक्ष्वाकु वंश का दशरथ तक विस्तार, कैकेयी का वरदान और राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न का जन्म होता है। मिथिला में सीता और उनके जुड़वाँ भाई भामंडल जन्म लेते हैं, और स्वयंवर में राम सीता को प्राप्त करते हैं।
मुख्य बिंदु
- पर्व 20: त्रेसठ शलाका पुरुषों के पूर्वभव आदि का वर्णन
त्रेसठ शलाका पुरुषों के पूर्वभव आदि का वर्णन
गौतम स्वामी इस युग के त्रेसठ शलाका पुरुषों का वर्णन करते हैं, जिनमें राम आठवें बलभद्र, लक्ष्मण आठवें नारायण और रावण आठवें प्रतिनारायण हैं।
- पर्व 21: श्रीरामचन्द्र के वंश का वर्णन
श्रीरामचन्द्र के वंश का वर्णन
गौतम स्वामी हरि से मुनिसुव्रतनाथ होते हुए जनक तक हरिवंश का, और वज्रबाहु तथा कीर्तिधर से शिशु सुकौशल तक इक्ष्वाकुवंश का वर्णन करते हैं।
- पर्व 22: सुकौशल का दीक्षा लेना और भयंकर उपसर्ग सहकर इष्ट की प्राप्ति करना
सुकौशल का दीक्षा लेना और भयंकर उपसर्ग सहकर इष्ट की प्राप्ति करना
सुकौशल अपने पिता कीर्तिधर मुनि से दीक्षा लेते हैं और पूर्वजन्म की माता, सिंहनी द्वारा शरीर विदारे जाने पर केवलज्ञान पाकर मोक्ष जाते हैं।
- पर्व 23: रावण को दशरथ के पुत्र और जनक की पुत्री से मरण की शंका और उसका निराकरण
रावण को दशरथ के पुत्र और जनक की पुत्री से मरण की शंका और उसका निराकरण
नारद से विभीषण के षड्यंत्र की सूचना पाकर दशरथ और जनक वेश बदलकर निकल जाते हैं, और विभीषण उनके सजीव जैसे पुतलों का सिर कटवा देता है।
- पर्व 24: दशरथ और कैकेयी का विवाह
दशरथ और कैकेयी का विवाह
स्वयंवर में कैकेयी द्वारा वरे गए, भ्रमण करते दशरथ उसे सारथी बनाकर विरोधी राजाओं को परास्त करते हैं और उसे एक वर देते हैं।
- पर्व 25: राम-लक्ष्मण आदि चारों भाइयों का जन्म और विद्याभ्यास
राम-लक्ष्मण आदि चारों भाइयों का जन्म और विद्याभ्यास
रानी अपराजिता से राम, सुमित्रा से लक्ष्मण, कैकेयी से भरत और सुप्रभा से शत्रुघ्न का जन्म होता है और चारों राजकुमार शस्त्र व शास्त्र विद्या में निपुण होते हैं।
- पर्व 26: राजा जनक के भामंडल और सीता की उत्पत्ति
राजा जनक के भामंडल और सीता की उत्पत्ति
पूर्वभव के बैर से एक देव रानी विदेहा के नवजात पुत्र, सीता के जुड़वाँ भाई, को हर ले जाता है और रथनूपुर में विद्याधर चन्द्रगति उसे भामंडल नाम से पालता है।
- पर्व 27: राम-लक्ष्मण द्वारा म्लेच्छ राजा की पराजय
राम-लक्ष्मण द्वारा म्लेच्छ राजा की पराजय
म्लेच्छ राजा आतरंगतम जब जनक के देश को उजाड़ने लगता है, तब किशोर राम-लक्ष्मण उसकी सेना को खदेड़ देते हैं और जनक सीता को राम को देने का निश्चय करते हैं।
- पर्व 28: सीता का स्वयंवर और राम के साथ विवाह
सीता का स्वयंवर और राम के साथ विवाह
स्वयंवर में राम देवरक्षित वज्रावर्त धनुष चढ़ाकर सीता को पाते हैं, लक्ष्मण सागरावर्त धनुष चढ़ाते हैं और भरत का विवाह कनक की पुत्री लोकसुंदरी से होता है।
- पर्व 29: राजा दशरथ का धर्म-श्रवण
राजा दशरथ का धर्म-श्रवण
वृद्ध खोजे के मुख से बुढ़ापे का वर्णन सुनकर राजा दशरथ का मन वैराग्य की ओर मुड़ता है और वे सर्वभूतहित मुनि से धर्म-श्रवण करते हैं।
इस खंड के पर्व
- पर्व 20 त्रेसठ शलाका पुरुषों के पूर्वभव आदि का वर्णन
- पर्व 21 श्रीरामचन्द्र के वंश का वर्णन
- पर्व 22 सुकौशल का दीक्षा लेना और भयंकर उपसर्ग सहकर इष्ट की प्राप्ति करना
- पर्व 23 रावण को दशरथ के पुत्र और जनक की पुत्री से मरण की शंका और उसका निराकरण
- पर्व 24 दशरथ और कैकेयी का विवाह
- पर्व 25 राम-लक्ष्मण आदि चारों भाइयों का जन्म और विद्याभ्यास
- पर्व 26 राजा जनक के भामंडल और सीता की उत्पत्ति
- पर्व 27 राम-लक्ष्मण द्वारा म्लेच्छ राजा की पराजय
- पर्व 28 सीता का स्वयंवर और राम के साथ विवाह
- पर्व 29 राजा दशरथ का धर्म-श्रवण

खंड 5 पर्व 30 से 43
वनवास
दशरथ संसार त्यागते हैं, कैकेयी के कहने पर भरत का राज्याभिषेक होता है और राम, सीता, लक्ष्मण अयोध्या छोड़ते हैं। यात्रा में वे धर्मात्माओं की रक्षा करते हैं, मित्र बनाते हैं, लक्ष्मण को अनेक कन्याएँ मिलती हैं, जटायु पक्षी से भेंट होती है और वे दंडकवन में निवास करते हैं।
मुख्य बिंदु
- पर्व 30: भामंडल का मिलन
भामंडल का मिलन
पूर्वजन्म का स्मरण होने पर भामंडल जान लेता है कि सीता उसकी सगी जुड़वाँ बहन है; चन्द्रगति दीक्षा लेते हैं और भामंडल अपने माता-पिता जनक और विदेहा से मिलता है।
- पर्व 31: राजा दशरथ का पूर्वभव सुनकर संसार से विरक्त होना
राजा दशरथ का पूर्वभव सुनकर संसार से विरक्त होना
मुनि सर्वभूतहित से अपने पूर्वभव सुनकर दशरथ ने दीक्षा का निश्चय किया; कैकेयी ने वर माँगकर भरत के लिए राज्य पाया और राम घर छोड़कर चल पड़े।
- पर्व 32: राम-लक्ष्मण का वन-गमन और भरत का राज्याभिषेक
राम-लक्ष्मण का वन-गमन और भरत का राज्याभिषेक
राम, लक्ष्मण और सीता आधी रात को नगर से निकल गए; दशरथ मुनि बने और वन में स्वयं राम ने भरत का राज्याभिषेक किया।
- पर्व 33: वज्रकर्ण व्रत कथानक
वज्रकर्ण व्रत कथानक
जिनेंद्रदेव, निर्ग्रंथ मुनि और जिनवाणी के सिवा किसी को नमस्कार न करने का व्रत लेने वाले वज्रकर्ण को लक्ष्मण ने अकेले राजा सिंहोदर को हराकर बचाया।
- पर्व 34: बालिखिल्य का कथानक
बालिखिल्य का कथानक
राजकुमार के वेश में नलकूवर पर राज्य करती कल्याणमाला ने अपना भेद खोला, और राम-लक्ष्मण ने म्लेच्छों के स्वामी रौद्रभूत से उसके पिता बालिखिल्य को छुड़ाया।
- पर्व 35: कपिल ब्राह्मण का कथानक
कपिल ब्राह्मण का कथानक
कपिल ब्राह्मण ने वनवासियों को अपनी कुटिया से निकाला, फिर यक्ष द्वारा बसाई रामपुरी में उनके दर्शन किए, जैनधर्म अपनाया और अंत में मुनि बना।
- पर्व 36: लक्ष्मण को वनमाला की प्राप्ति
लक्ष्मण को वनमाला की प्राप्ति
लक्ष्मण के प्रेम में फाँसी लगाने जा रही विजयपुर की राजकुमारी वनमाला को लक्ष्मण ने बचाया, और उसके पिता पृथ्वीधर ने हर्ष से तीनों का स्वागत किया।
- पर्व 37: अतिवीर्य का भरत के साथ युद्ध-आरंभ और राम-लक्ष्मण से पराजित होकर दीक्षा ग्रहण करना
अतिवीर्य का भरत के साथ युद्ध-आरंभ और राम-लक्ष्मण से पराजित होकर दीक्षा ग्रहण करना
नर्तकियों का वेश धरकर राम-लक्ष्मण ने भरत पर चढ़ाई करने वाले अतिवीर्य को पकड़ लिया; पराजित अतिवीर्य राज्य त्यागकर मुनि बन गया।
- पर्व 38: लक्ष्मण को जितपद्मा की प्राप्ति
लक्ष्मण को जितपद्मा की प्राप्ति
क्षेमांजलि नगर में लक्ष्मण ने राजा शत्रुदमन द्वारा चलाई गई पाँचों शक्तियाँ झेल लीं और अभिमानी राजकुमारी जितपद्मा को प्राप्त किया।
- पर्व 39: देशभूषण-कुलभूषण मुनि का कथानक
देशभूषण-कुलभूषण मुनि का कथानक
वंशगिरि पर राम-लक्ष्मण ने देशभूषण और कुलभूषण मुनियों पर उपसर्ग करने वाले अग्निप्रभ असुर को भगाया, और दोनों मुनियों को तत्काल केवलज्ञान प्राप्त हुआ।
- पर्व 40: रामगिरि पर श्रीरामचन्द्र का पदार्पण
रामगिरि पर श्रीरामचन्द्र का पदार्पण
राम ने वंशगिरि को हज़ारों जिनमंदिरों से सुशोभित किया, जिससे वह पर्वत रामगिरि नाम से प्रसिद्ध हुआ, और फिर वे दंडकवन की ओर चल पड़े।
- पर्व 41: जटायु पक्षी का व्याख्यान
जटायु पक्षी का व्याख्यान
पूर्वभव में मुनियों की हत्या करने वाला राजा दंडक, जो अब गिद्ध था, दो चारण मुनियों के चरणों में रूपांतरित होकर व्रतधारी जटायु बना।
- पर्व 42: श्रीराम का दंडकवन में निवास
श्रीराम का दंडकवन में निवास
हाथियों से जुते रथ में दंडकवन में विहार करते हुए राम वहाँ नगर बसाने का विचार करते हैं, पर वर्षाऋतु आ जाने से वन में ही वर्षाकाल बिताते हैं।
- पर्व 43: रावण के भानजे शंबूक की सूर्यहास खड्ग साधना और लक्ष्मण के हाथ से मरण
रावण के भानजे शंबूक की सूर्यहास खड्ग साधना और लक्ष्मण के हाथ से मरण
रावण के भानजे शंबूक ने बारह वर्ष की साधना से जो सूर्यहास खड्ग सिद्ध किया था, उसे लक्ष्मण ने ले लिया और उसकी धार परखते हुए अनजाने में शंबूक को मार डाला।
इस खंड के पर्व
- पर्व 30 भामंडल का मिलन
- पर्व 31 राजा दशरथ का पूर्वभव सुनकर संसार से विरक्त होना
- पर्व 32 राम-लक्ष्मण का वन-गमन और भरत का राज्याभिषेक
- पर्व 33 वज्रकर्ण व्रत कथानक
- पर्व 34 बालिखिल्य का कथानक
- पर्व 35 कपिल ब्राह्मण का कथानक
- पर्व 36 लक्ष्मण को वनमाला की प्राप्ति
- पर्व 37 अतिवीर्य का भरत के साथ युद्ध-आरंभ और राम-लक्ष्मण से पराजित होकर दीक्षा ग्रहण करना
- पर्व 38 लक्ष्मण को जितपद्मा की प्राप्ति
- पर्व 39 देशभूषण-कुलभूषण मुनि का कथानक
- पर्व 40 रामगिरि पर श्रीरामचन्द्र का पदार्पण
- पर्व 41 जटायु पक्षी का व्याख्यान
- पर्व 42 श्रीराम का दंडकवन में निवास
- पर्व 43 रावण के भानजे शंबूक की सूर्यहास खड्ग साधना और लक्ष्मण के हाथ से मरण

खंड 6 पर्व 44 से 53
सीता हरण और हनुमान का दौत्य
रावण सीता को हरकर लंका ले जाता है। मायावी सुग्रीव के वध के बाद राम की सुग्रीव से मित्रता होती है, लक्ष्मण कोटिशिला उठाते हैं, और हनुमान लंका जाकर सीता से मिलते हैं तथा लंका में उथल-पुथल मचा देते हैं।
मुख्य बिंदु
- पर्व 44: रावण द्वारा सीता का हरण और राम का विलाप
रावण द्वारा सीता का हरण और राम का विलाप
लक्ष्मण के खरदूषण से युद्ध करते समय झूठा सिंहनाद करके रावण राम को दूर हटाता है, सीता का हरण करता है और जटायु को गिरा देता है, और राम व्याकुल होकर सीता को खोजते हैं।
- पर्व 45: राम के सीता-वियोग जनित दुःख का वर्णन
राम के सीता-वियोग जनित दुःख का वर्णन
विराधित की सहायता से लक्ष्मण खरदूषण को मारते हैं, और सीता को न पाकर शोकाकुल राम पाताल लंका में जाकर रहते हैं।
- पर्व 46: लंका के मायामयी कोट का वर्णन
लंका के मायामयी कोट का वर्णन
लंका में सीता रावण, मंदोदरी और रावण की भयानक माया को ठुकरा देती हैं, जबकि विभीषण की मंत्रणा से नगर के चारों ओर मायामयी कोट बनाया जाता है।
- पर्व 47: साहसगति के वध का वर्णन
साहसगति के वध का वर्णन
राम ने दुखी सुग्रीव को मित्र बनाया, और उनके दर्शन मात्र से नकली सुग्रीव की विद्या भाग जाने पर उन्होंने युद्ध में साहसगति का वध किया।
- पर्व 48: लक्ष्मण का कोटिशिला उठाकर नारायण होने की परीक्षा करना
लक्ष्मण का कोटिशिला उठाकर नारायण होने की परीक्षा करना
सुग्रीव की खोज से रत्नजटी द्वारा सीता का समाचार मिलता है, और लक्ष्मण वह कोटिशिला उठाते हैं जिसे उठाने वाले से रावण की मृत्यु बताई गई थी।
- पर्व 49: हनुमान का लंका को प्रस्थान
हनुमान का लंका को प्रस्थान
सुग्रीव पर राम के उपकार से प्रसन्न हनुमान किष्किंधापुर में राम से मिलते हैं और उनकी मुद्रिका लेकर लंका को प्रस्थान करते हैं।
- पर्व 50: हनुमान का अपने नाना राजा महेन्द्र के साथ युद्ध और मिलन
हनुमान का अपने नाना राजा महेन्द्र के साथ युद्ध और मिलन
हनुमान ने अंजना को शरण न देने वाले अपने नाना महेंद्र को युद्ध में हराया, फिर उनसे मेल कर उन्हें राम की सेवा में भेजा।
- पर्व 51: श्रीराम को गंधर्व कन्याओं की प्राप्ति
श्रीराम को गंधर्व कन्याओं की प्राप्ति
हनुमान ने ध्यानस्थ दो मुनियों के चारों ओर लगी वन की आग बुझाई और राजा गंधर्व की तीन पुत्रियों की रक्षा की, जिनका विवाह फिर राम से हुआ।
- पर्व 52: हनुमान को लंकासुंदरी का लाभ
हनुमान को लंकासुंदरी का लाभ
हनुमान ने लंका का मायामयी कोट तोड़कर उसके रक्षक वज्रमुख को मारा, जिसकी पुत्री लंकासुंदरी उनसे लड़ी, फिर उन पर मोहित होकर उनकी पत्नी बनी।
- पर्व 53: हनुमान का लंका में जाकर सीता से भेंट कर लंका को नष्ट-भ्रष्ट करना
हनुमान का लंका में जाकर सीता से भेंट कर लंका को नष्ट-भ्रष्ट करना
हनुमान ने सीता को राम की मुद्रिका दी, उन्हें भोजन के लिए मनाया, उनका चूड़ामणि लिया, और फिर रावण की जंजीरें तोड़कर लंका को तहस-नहस कर दिया।
इस खंड के पर्व
- पर्व 44 रावण द्वारा सीता का हरण और राम का विलाप
- पर्व 45 राम के सीता-वियोग जनित दुःख का वर्णन
- पर्व 46 लंका के मायामयी कोट का वर्णन
- पर्व 47 साहसगति के वध का वर्णन
- पर्व 48 लक्ष्मण का कोटिशिला उठाकर नारायण होने की परीक्षा करना
- पर्व 49 हनुमान का लंका को प्रस्थान
- पर्व 50 हनुमान का अपने नाना राजा महेन्द्र के साथ युद्ध और मिलन
- पर्व 51 श्रीराम को गंधर्व कन्याओं की प्राप्ति
- पर्व 52 हनुमान को लंकासुंदरी का लाभ
- पर्व 53 हनुमान का लंका में जाकर सीता से भेंट कर लंका को नष्ट-भ्रष्ट करना

खंड 7 पर्व 54 से 76
लंका का युद्ध
विभीषण राम के पक्ष में आते हैं, सेनाएँ टकराती हैं, रावण की शक्ति से लक्ष्मण मूर्च्छित होते हैं और विशल्या उन्हें स्वस्थ करती है, रावण बहुरूपिणी विद्या सिद्ध करता है, और अंत में उसका अपना चक्र लक्ष्मण के हाथ में आकर युद्ध समाप्त करता है।
मुख्य बिंदु
- पर्व 54: राम-लक्ष्मण का लंका को प्रस्थान
राम-लक्ष्मण का लंका को प्रस्थान
हनुमान का समाचार सुनकर और सीता का चूड़ामणि पाकर राम-लक्ष्मण विद्याधरों की सेनाओं के साथ लंका की ओर चलकर हंसद्वीप में डेरा डालते हैं।
- पर्व 55: राम-लक्ष्मण को विभीषण का समागम
राम-लक्ष्मण को विभीषण का समागम
सीता को लौटाने की सलाह देने पर रावण के क्रोध और धमकी का सामना कर विभीषण तीस अक्षौहिणी सेना सहित लंका छोड़कर राम की शरण आता है।
- पर्व 56: राम और रावण की सेना का प्रमाण वर्णन
राम और रावण की सेना का प्रमाण वर्णन
गौतम स्वामी अक्षौहिणी का प्रमाण बताते हैं, और दोनों पक्षों के लोग रावण की चार हजार और राम की दो हजार अक्षौहिणी सेना के बल पर चर्चा करते हैं।
- पर्व 57: रावण का युद्ध के लिये सदल-बल प्रयाण
रावण का युद्ध के लिये सदल-बल प्रयाण
पत्नियों से विदा लेकर लंका के योद्धा हस्त-प्रहस्त के पीछे युद्ध को निकलते हैं, और अपशकुनों के बावजूद रावण पुष्पक विमान में चल पड़ता है।
- पर्व 58: युद्ध में हस्त-प्रहस्त के मरण का वर्णन
युद्ध में हस्त-प्रहस्त के मरण का वर्णन
पहली बड़ी मुठभेड़ में वानरवंशी वीर नल और नील रावण के सेनापति हस्त और प्रहस्त को मार डालते हैं और राक्षस सेना शिथिल पड़ जाती है।
- पर्व 59: हस्त-प्रहस्त और नल-नील के पूर्वभव का वर्णन
हस्त-प्रहस्त और नल-नील के पूर्वभव का वर्णन
गौतम स्वामी बताते हैं कि नल-नील ने हस्त-प्रहस्त को इसलिए मारा क्योंकि पूर्वभव में उन दोनों ने इनकी हत्या की थी।
- पर्व 60: राम-लक्ष्मण को अनेक विद्याओं का लाभ
राम-लक्ष्मण को अनेक विद्याओं का लाभ
इंद्रजीत और मेघवाहन द्वारा सुग्रीव और भामंडल को नागपाश में बाँधने पर राम गरुड़ेंद्र का वर याद करते हैं, और दोनों भाइयों को दिव्य विद्याएँ और शस्त्र मिलते हैं।
- पर्व 61: सुग्रीव-भामंडल का नागपाश के बंधन से मुक्त होना
सुग्रीव-भामंडल का नागपाश के बंधन से मुक्त होना
राम-लक्ष्मण के सिंहवाहन और गरुड़वाहन पर रणभूमि में आते ही सुग्रीव और भामंडल का नागपाश का बंधन टूट जाता है।
- पर्व 62: लक्ष्मण को रावण की शक्ति का लगना और मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिरना
लक्ष्मण को रावण की शक्ति का लगना और मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिरना
रावण नागेन्द्र की दी हुई अमोघ शक्ति चलाता है और वक्षस्थल पर उसकी चोट खाकर लक्ष्मण मूर्च्छित होकर रणभूमि में गिर पड़ते हैं।
- पर्व 63: लक्ष्मण के मूर्च्छित होने पर राम का विलाप
लक्ष्मण के मूर्च्छित होने पर राम का विलाप
लक्ष्मण को मूर्च्छित देख राम स्वयं मूर्च्छित होकर विलाप करते हैं और भाई के साथ अग्नि में प्रवेश का निश्चय करते हैं, तब बुद्धिमान जाम्बूनद उन्हें रोकते हैं।
- पर्व 64: शक्ति के निवारण का उपाय और विशल्या के पूर्वभव
शक्ति के निवारण का उपाय और विशल्या के पूर्वभव
चन्द्रप्रतिम विद्याधर बताता है कि पूर्वभव के तप से पवित्र राजकुमारी विशल्या का स्नान-जल ही लक्ष्मण की शक्ति दूर कर सकता है।
- पर्व 65: राम के कटक में विशल्या का आगमन और लक्ष्मण का शक्ति रहित होना
राम के कटक में विशल्या का आगमन और लक्ष्मण का शक्ति रहित होना
एक ही रात में अयोध्या से लाई गई विशल्या के कटक में प्रवेश करते ही शक्ति लक्ष्मण के शरीर से निकल भागती है, और लक्ष्मण उठकर उससे विवाह करते हैं।
- पर्व 66: रावण के द्वारा राम के पास दूत भेजना
रावण के द्वारा राम के पास दूत भेजना
रावण का दूत सीता और बंदियों के बदले राम को आधी लंका और सारी पृथ्वी देने का प्रस्ताव रखता है, पर राम सीता को छोड़ना स्वीकार नहीं करते।
- पर्व 67: बहुरूपिणी विद्या साधन के लिये रावण द्वारा शांतिनाथ मंदिर में पूजा का आयोजन
बहुरूपिणी विद्या साधन के लिये रावण द्वारा शांतिनाथ मंदिर में पूजा का आयोजन
बंदी भाई-पुत्रों और क्षत्रिय-स्वाभिमान के द्वंद्व में फँसा रावण बहुरूपिणी विद्या सिद्ध करने का निश्चय कर शांतिनाथ मंदिर में पूजा का आदेश देता है।
- पर्व 68: लंका में अष्टाह्निका महोत्सव के समय सिद्धचक्र व्रत की आराधना
लंका में अष्टाह्निका महोत्सव के समय सिद्धचक्र व्रत की आराधना
आठ दिन के अष्टाह्निका पर्व में योद्धा युद्ध रोक देते हैं और लंका के लोग सिद्धचक्र व्रत के साथ जिनेन्द्र भगवान की भव्य पूजा करते हैं।
- पर्व 69: रावण का अष्टाह्निका पर्व में लोगों को व्रत-नियम धारण करने का आदेश
रावण का अष्टाह्निका पर्व में लोगों को व्रत-नियम धारण करने का आदेश
शांतिनाथ मंदिर में विद्या-साधना आरंभ करने से पहले रावण मंदोदरी के द्वारा घोषणा करवाता है कि सारी लंका व्रत-नियम पाले, पूजा करे और किसी प्रकार का कलह न करे।
- पर्व 70: रावण की विद्या-साधना और वानरवंशी कुमारों द्वारा लंका में उपद्रव
रावण की विद्या-साधना और वानरवंशी कुमारों द्वारा लंका में उपद्रव
रावण बहुरूपिणी विद्या की साधना में बैठा है, तब वानरवंशी कुमार लंका में उपद्रव मचाते हैं, जिन्हें यक्षेन्द्र पूर्णभद्र और मणिभद्र खदेड़ देते हैं।
- पर्व 71: रावण को बहुरूपिणी विद्या का सिद्ध होना
रावण को बहुरूपिणी विद्या का सिद्ध होना
अंगद रावण की आँखों के सामने उसकी रानियों का अपमान करता है, पर रावण ध्यान से नहीं डिगता और बहुरूपिणी विद्या सिद्ध होकर उसके सामने प्रकट होती है।
- पर्व 72: रावण का युद्ध के लिये पुनः संकल्प
रावण का युद्ध के लिये पुनः संकल्प
सीता के पति-प्रेम से द्रवित होकर रावण क्षण भर पछताता है, पर अभिमान जीत जाता है और वह राम-लक्ष्मण को जीवित पकड़ने तथा उनके साथियों को कुचलने का संकल्प करता है।
- पर्व 73: मंदोदरी का युद्ध के लिये मना करना और रावण का हठ न छोड़ना
मंदोदरी का युद्ध के लिये मना करना और रावण का हठ न छोड़ना
मंदोदरी रावण से सीता को छोड़ने की विनती करती है और चेताती है कि वह प्रतिनारायण है जिसका पतन निश्चित है, पर रावण नहीं मानता और युद्ध के लिए निकल पड़ता है।
- पर्व 74: रावण का राम-लक्ष्मण के साथ युद्ध
रावण का राम-लक्ष्मण के साथ युद्ध
रावण हजार हाथियों से खिंचे रथ पर युद्ध में आता है, और घोर संग्राम के बाद लक्ष्मण दिव्य बाणों के द्वंद्व में उसका सामना करते हैं।
- पर्व 75: रावण का लक्ष्मण पर चक्र चलाना और चक्र का लक्ष्मण की प्रदक्षिणा कर उनके हाथ में आना
रावण का लक्ष्मण पर चक्र चलाना और चक्र का लक्ष्मण की प्रदक्षिणा कर उनके हाथ में आना
रावण लक्ष्मण पर चक्ररत्न चलाता है, पर चक्र लक्ष्मण की तीन प्रदक्षिणा देकर उनके हाथ में ठहर जाता है, जिससे वे नारायण के रूप में प्रकट होते हैं।
- पर्व 76: राम-लक्ष्मण के साथ रावण का महायुद्ध और रावण का वध
राम-लक्ष्मण के साथ रावण का महायुद्ध और रावण का वध
लक्ष्मण का अंतिम संधि-प्रस्ताव ठुकराने पर लक्ष्मण द्वारा चलाया गया चक्र रावण का वक्षस्थल चीर देता है और रावण मरकर भूमि पर गिर पड़ता है।
इस खंड के पर्व
- पर्व 54 राम-लक्ष्मण का लंका को प्रस्थान
- पर्व 55 राम-लक्ष्मण को विभीषण का समागम
- पर्व 56 राम और रावण की सेना का प्रमाण वर्णन
- पर्व 57 रावण का युद्ध के लिये सदल-बल प्रयाण
- पर्व 58 युद्ध में हस्त-प्रहस्त के मरण का वर्णन
- पर्व 59 हस्त-प्रहस्त और नल-नील के पूर्वभव का वर्णन
- पर्व 60 राम-लक्ष्मण को अनेक विद्याओं का लाभ
- पर्व 61 सुग्रीव-भामंडल का नागपाश के बंधन से मुक्त होना
- पर्व 62 लक्ष्मण को रावण की शक्ति का लगना और मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिरना
- पर्व 63 लक्ष्मण के मूर्च्छित होने पर राम का विलाप
- पर्व 64 शक्ति के निवारण का उपाय और विशल्या के पूर्वभव
- पर्व 65 राम के कटक में विशल्या का आगमन और लक्ष्मण का शक्ति रहित होना
- पर्व 66 रावण के द्वारा राम के पास दूत भेजना
- पर्व 67 बहुरूपिणी विद्या साधन के लिये रावण द्वारा शांतिनाथ मंदिर में पूजा का आयोजन
- पर्व 68 लंका में अष्टाह्निका महोत्सव के समय सिद्धचक्र व्रत की आराधना
- पर्व 69 रावण का अष्टाह्निका पर्व में लोगों को व्रत-नियम धारण करने का आदेश
- पर्व 70 रावण की विद्या-साधना और वानरवंशी कुमारों द्वारा लंका में उपद्रव
- पर्व 71 रावण को बहुरूपिणी विद्या का सिद्ध होना
- पर्व 72 रावण का युद्ध के लिये पुनः संकल्प
- पर्व 73 मंदोदरी का युद्ध के लिये मना करना और रावण का हठ न छोड़ना
- पर्व 74 रावण का राम-लक्ष्मण के साथ युद्ध
- पर्व 75 रावण का लक्ष्मण पर चक्र चलाना और चक्र का लक्ष्मण की प्रदक्षिणा कर उनके हाथ में आना
- पर्व 76 राम-लक्ष्मण के साथ रावण का महायुद्ध और रावण का वध

खंड 8 पर्व 77 से 88
विजय और अयोध्या वापसी
रावण का परिवार शोक करता है और अनेक दीक्षा लेते हैं, राम-सीता का मिलन होता है और भाई विजयी होकर अयोध्या लौटते हैं। भरत और कैकेयी संसार त्यागते हैं, और राम-लक्ष्मण का राज्याभिषेक होता है।
मुख्य बिंदु
- पर्व 77: विभीषण और रानियों का रावण के लिए विलाप
विभीषण और रानियों का रावण के लिए विलाप
विभीषण और रावण की अठारह हजार रानियाँ उसके शरीर पर विलाप करती हैं, जब तक राम और भामंडल राजा अरिदमन की कथा सुनाकर उन्हें सांत्वना नहीं देते।
- पर्व 78: इन्द्रजीत, मेघनाद और मंदोदरी की दीक्षा
इन्द्रजीत, मेघनाद और मंदोदरी की दीक्षा
राम सम्मान के साथ रावण का दाह संस्कार कर बंदी राजकुमारों को मुक्त करते हैं, और लंका में अनंतवीर्य मुनि को केवलज्ञान होने पर रावण का परिवार संसार त्याग देता है।
- पर्व 79: राम और सीता का मिलन
राम और सीता का मिलन
राम-लक्ष्मण वैभव के साथ लंका में प्रवेश करते हैं, और पुष्पप्रकीर्णक पर्वत के उद्यान में राम का सीता से मिलन होता है, जबकि देव उसके शील की प्रशंसा करते हैं।
- पर्व 80: लंका में छह वर्ष और मय मुनि का चरित्र
लंका में छह वर्ष और मय मुनि का चरित्र
राम रावण के महल में शांतिनाथ की पूजा करते हैं, विभीषण विजेताओं का सत्कार करते हैं, दोनों भाई छह वर्ष लंका में सुख से रहते हैं, और मय मुनि की ऋद्धि अनेक पूर्वभवों का रहस्य खोलती है।
- पर्व 81: कौशल्या का शोक और नारद का संदेश
कौशल्या का शोक और नारद का संदेश
नारद पुत्रों के वियोग में तड़पती कौशल्या को देखकर उनका दुख लंका पहुँचाते हैं, और राम-लक्ष्मण लौटने का निश्चय करते हैं जबकि विद्याधर सोलह दिन में अयोध्या को नया रूप देते हैं।
- पर्व 82: राम-लक्ष्मण का अयोध्या आगमन
राम-लक्ष्मण का अयोध्या आगमन
पुष्पक विमान से सुमेरु पर्वत और वनवास के स्थानों के ऊपर से उड़ते हुए राम-लक्ष्मण घर लौटते हैं, भरत उनका स्वागत करते हैं, और हर्षित अयोध्या में प्रवेश कर वे चारों माताओं से मिलते हैं।
- पर्व 83: राम का वैभव, भरत का वैराग्य और त्रैलोक्यमंडन हाथी
राम का वैभव, भरत का वैराग्य और त्रैलोक्यमंडन हाथी
राम के राज्य के अपार वैभव के बीच भरत केवल वैराग्य चाहते हैं, और जब उन्मत्त त्रैलोक्यमंडन हाथी उनकी ओर दौड़ता है, तो पूर्वभव का स्मरण कर शांत हो जाता है।
- पर्व 84: त्रैलोक्यमंडन हाथी का मौन
त्रैलोक्यमंडन हाथी का मौन
भरत को देखकर शांत हुआ रावण का प्रबल पट्ट हाथी अयोध्या लाया जाता है, फिर चार दिन तक भोजन, जल और निद्रा छोड़कर निश्चल खड़ा रहता है।
- पर्व 85: भरत और हाथी के पूर्वभव
भरत और हाथी के पूर्वभव
केवली देशभूषण और कुलभूषण बताते हैं कि भरत और हाथी ऋषभदेव के युग से राजा, भाई, पशु, पिता-पुत्र और देव के रूप में अनेक जन्मों में साथ रहे हैं।
- पर्व 86: भरत और कैकेयी की दीक्षा
भरत और कैकेयी की दीक्षा
केवली द्वारा बताए पूर्वभवों से प्रभावित होकर भरत एक हजार से अधिक राजाओं के साथ दिगंबर मुनि बनते हैं, और कैकेयी तीन सौ रानियों के साथ आर्यिका बनती हैं।
- पर्व 87: हाथी का स्वर्गगमन और भरत मुनि का निर्वाण
हाथी का स्वर्गगमन और भरत मुनि का निर्वाण
त्रैलोक्यमंडन लंबे उपवासों के साथ श्रावक के व्रत पालकर सल्लेखना से छठे स्वर्ग में लौटता है, जबकि भरत मुनि विहार करते हुए सब परीषह जीतकर मोक्ष पाते हैं।
- पर्व 88: राम-लक्ष्मण का राज्याभिषेक
राम-लक्ष्मण का राज्याभिषेक
भरत के चले जाने के शोक के बाद राम-लक्ष्मण का एक ही सिंहासन पर साथ-साथ अभिषेक होता है, सीता और विशल्या का अभिषेक होता है, और सहयोगियों को उनके राज्य मिलते हैं।
इस खंड के पर्व
- पर्व 77 विभीषण और रानियों का रावण के लिए विलाप
- पर्व 78 इन्द्रजीत, मेघनाद और मंदोदरी की दीक्षा
- पर्व 79 राम और सीता का मिलन
- पर्व 80 लंका में छह वर्ष और मय मुनि का चरित्र
- पर्व 81 कौशल्या का शोक और नारद का संदेश
- पर्व 82 राम-लक्ष्मण का अयोध्या आगमन
- पर्व 83 राम का वैभव, भरत का वैराग्य और त्रैलोक्यमंडन हाथी
- पर्व 84 त्रैलोक्यमंडन हाथी का मौन
- पर्व 85 भरत और हाथी के पूर्वभव
- पर्व 86 भरत और कैकेयी की दीक्षा
- पर्व 87 हाथी का स्वर्गगमन और भरत मुनि का निर्वाण
- पर्व 88 राम-लक्ष्मण का राज्याभिषेक

खंड 9 पर्व 89 से 99
राज्य, मथुरा और सीता का परित्याग
शत्रुघ्न मथुरा जीतते हैं और सप्तर्षि वहाँ की विपत्ति दूर करते हैं। राम का राज्य फलता-फूलता है, पर सीता के विषय में लोकापवाद के कारण राम उन्हें वन भिजवा देते हैं, जहाँ राजा वज्रजंघ उन्हें अपना संरक्षण देते हैं।
मुख्य बिंदु
- पर्व 89: शत्रुघ्न की मथुरा विजय और राजा मधु का वैराग्य
शत्रुघ्न की मथुरा विजय और राजा मधु का वैराग्य
शत्रुघ्न मथुरा ही माँगते हैं, जब राजा मधु त्रिशूल के बिना उपवन में क्रीड़ा कर रहा होता है तब रात में नगर ले लेते हैं, और लवणार्णव के मरने पर मधु हाथी की पीठ पर ही भावमुनि बन जाते हैं।
- पर्व 90: मथुरा के लोगों पर चमरेन्द्रकृत उपसर्ग
मथुरा के लोगों पर चमरेन्द्रकृत उपसर्ग
मित्र मधु की मृत्यु से क्रुद्ध असुरकुमारों के इन्द्र चमरेन्द्र मथुरा में घोर महामारी फैलाते हैं, और शत्रुघ्न अयोध्या लौट आते हैं, पर उनका मन मथुरा में ही लगा रहता है।
- पर्व 91: शत्रुघ्न के पूर्वभव और मथुरा से अति अनुराग
शत्रुघ्न के पूर्वभव और मथुरा से अति अनुराग
गौतम स्वामी बताते हैं कि शत्रुघ्न का मथुरा-प्रेम उस नगर में बीते अनेक पूर्वभवों से है, विशेषकर राजकुमार अचल के भव से, जिसके पैर का काँटा निकालने वाला मित्र अप आगे सेनापति कृतांतवक्त्र हुआ।
- पर्व 92: सप्तर्षियों के प्रभाव से मथुरा का उपसर्ग दूर होना
सप्तर्षियों के प्रभाव से मथुरा का उपसर्ग दूर होना
सात चारण ऋषि मथुरा के वन में चातुर्मास करते हैं और उनके तप से चमरेन्द्र की फैलाई मरी दूर हो जाती है; उनका अनादर करने वाला सेठ पश्चाताप करता है, और उनके उपदेश से शत्रुघ्न नगर को जिनप्रतिमाओं से भर देते हैं।
- पर्व 93: राम को श्रीदामा और लक्ष्मण को मनोरमा की प्राप्ति
राम को श्रीदामा और लक्ष्मण को मनोरमा की प्राप्ति
मनोरमा के लिए लक्ष्मण का नाम सुझाने पर उसके अभिमानी भाइयों द्वारा निकाले गए नारद लक्ष्मण को उसका चित्रपट दिखाते हैं, और रत्नपुर में शीघ्र युद्ध के बाद राम का श्रीदामा से और लक्ष्मण का मनोरमा से विवाह होता है।
- पर्व 94: राम-लक्ष्मण के वैभव और परिवार का वर्णन
राम-लक्ष्मण के वैभव और परिवार का वर्णन
विजयार्ध की दक्षिण श्रेणी के विद्याधरों को वश में कर लक्ष्मण सात रत्नों सहित नारायण के रूप में राम के साथ राज्य करते हैं, और गौतम स्वामी उनकी रानियों तथा लक्ष्मण के ढाई सौ पुत्रों का वर्णन करते हैं।
- पर्व 95: सीता का गर्भ धारण और जिनपूजा का दोहला
सीता का गर्भ धारण और जिनपूजा का दोहला
सीता स्वप्न में दो अष्टापदों को मुख में प्रवेश करते देखती हैं और राम जुड़वाँ पुत्रों का फल बताते हैं; जब उन्हें सब चैत्यालयों में जिनपूजा का दोहला होता है, तो राम सारे देश में उत्सव कराते हैं और उन्हें महेन्द्र उद्यान में पूजा के लिए ले जाते हैं।
- पर्व 96: सीता का लोकापवाद और राम की चिंता
सीता का लोकापवाद और राम की चिंता
सीता की दाहिनी आँख अपशकुन से फड़कती है, और नगर के मुखिया राम से कहते हैं कि सारे राज्य में चर्चा है कि उन्होंने रावण के घर रही रानी को वापस रख लिया, और राम सीता के प्रेम और अपयश के भय के बीच फँस जाते हैं।
- पर्व 97: लोकापवाद के भय से सीता का परित्याग और वन में विलाप
लोकापवाद के भय से सीता का परित्याग और वन में विलाप
लक्ष्मण की विनतियों को ठुकराकर राम गर्भवती सीता को तीर्थदर्शन के बहाने गंगा पार के वन में अकेली छुड़वा देते हैं, जहाँ वे मूर्च्छित होती हैं, राम के लिए निःस्वार्थ संदेश भेजती हैं और अपने पूर्वकर्मों पर विलाप करती हैं, तभी राजा वज्रजंघ की सेना उनका रुदन सुनती है।
- पर्व 98: वन में वज्रजंघ का आगमन और सीता को आश्वासन
वन में वज्रजंघ का आगमन और सीता को आश्वासन
हाथी पकड़कर लौटते पुंडरीकपुर के राजा वज्रजंघ रोती हुई सीता को पाते हैं, उनकी कथा सुनते हैं, जिनवाणी के उपदेश से ढाढ़स बँधाते हैं और उन्हें अपनी धर्म-बहन बना लेते हैं।
- पर्व 99: सीता का पुंडरीकपुर जाना और राम का सीता-शोक
सीता का पुंडरीकपुर जाना और राम का सीता-शोक
सीता सम्मानपूर्वक पुंडरीकपुर पहुँचकर वज्रजंघ की बहन के रूप में धर्मपूर्वक रहती हैं, जबकि अयोध्या में कृतांतवक्त्र उनका संदेश सुनाता है और पश्चाताप से भरे राम शोक से मूर्च्छित हो जाते हैं, जब तक लक्ष्मण उन्हें धैर्य नहीं बँधाते।
इस खंड के पर्व
- पर्व 89 शत्रुघ्न की मथुरा विजय और राजा मधु का वैराग्य
- पर्व 90 मथुरा के लोगों पर चमरेन्द्रकृत उपसर्ग
- पर्व 91 शत्रुघ्न के पूर्वभव और मथुरा से अति अनुराग
- पर्व 92 सप्तर्षियों के प्रभाव से मथुरा का उपसर्ग दूर होना
- पर्व 93 राम को श्रीदामा और लक्ष्मण को मनोरमा की प्राप्ति
- पर्व 94 राम-लक्ष्मण के वैभव और परिवार का वर्णन
- पर्व 95 सीता का गर्भ धारण और जिनपूजा का दोहला
- पर्व 96 सीता का लोकापवाद और राम की चिंता
- पर्व 97 लोकापवाद के भय से सीता का परित्याग और वन में विलाप
- पर्व 98 वन में वज्रजंघ का आगमन और सीता को आश्वासन
- पर्व 99 सीता का पुंडरीकपुर जाना और राम का सीता-शोक

खंड 10 पर्व 100 से 108
लवण-अंकुश और अग्नि-परीक्षा
सीता के जुड़वाँ पुत्र दिग्विजयी बनते हैं और पहचान से पहले अपने ही पिता और चाचा से युद्ध करते हैं। सीता अग्नि में प्रवेश करती हैं, जो उनके शील के प्रभाव से कमल-सरोवर बन जाती है, और सबके पूर्वभव प्रकट होते हैं।
मुख्य बिंदु
- पर्व 100: लवण और अंकुश का जन्म और बाल्यकाल
लवण और अंकुश का जन्म और बाल्यकाल
पुंडरीकपुर में सीता जुड़वाँ पुत्रों अनंगलवण और मदनांकुश को जन्म देती हैं, जिन्हें क्षुल्लक सिद्धार्थ सब कलाएँ और शस्त्र सिखाते हैं और वे अद्वितीय राजकुमार बनते हैं।
- पर्व 101: लवण और अंकुश का दिग्विजय
लवण और अंकुश का दिग्विजय
राजा पृथु द्वारा अज्ञात कुल के कहे जाने पर जुड़वाँ भाई उसकी सेना को खदेड़ते हैं, अंकुश के लिए कनकमाला को प्राप्त करते हैं और फिर अनगिनत देशों के राजाओं को वश में करते हैं।
- पर्व 102: लवण-अंकुश का अयोध्या पर अभियान
लवण-अंकुश का अयोध्या पर अभियान
नारद और माता से यह जानकर कि उनके पिता कौन हैं और सीता को क्यों छोड़ा गया, जुड़वाँ भाई अयोध्या पर चढ़ाई करते हैं और रण में राम-लक्ष्मण से भिड़ते हैं।
- पर्व 103: राम-लक्ष्मण से लवण-अंकुश का मिलन
राम-लक्ष्मण से लवण-अंकुश का मिलन
जब लक्ष्मण का चक्र भी अंकुश के पास जाकर निष्प्रभ लौट आता है, तब सिद्धार्थ प्रकट करते हैं कि ये दोनों वीर सीता के पुत्र हैं, और पिता-पुत्रों का आनंदमय मिलन होता है।
- पर्व 104: अग्नि-परीक्षा का आदेश और सकलभूषण केवली के दर्शन को देवों का आगमन
अग्नि-परीक्षा का आदेश और सकलभूषण केवली के दर्शन को देवों का आगमन
सब देशों के लोगों के सामने लौटी सीता कोई भी शपथ लेने को तैयार होती हैं और राम उन्हें प्रज्वलित अग्निकुंड में प्रवेश का आदेश देते हैं, जबकि उसी रात सकलभूषण मुनि को केवलज्ञान होता है और देव अयोध्या की ओर उतर आते हैं।
- पर्व 105: अग्नि का सरोवर बनना और राम का केवली के मुख से धर्मश्रवण
अग्नि का सरोवर बनना और राम का केवली के मुख से धर्मश्रवण
सीता के शील के प्रभाव से धधकता अग्निकुंड कमलों से भरा सरोवर बन जाता है; फिर वे आर्यिका दीक्षा लेती हैं और राम सकलभूषण केवली से धर्मोपदेश सुनते हैं।
- पर्व 106: राम, लक्ष्मण, सीता, रावण और उनके साथियों के पूर्वभव
राम, लक्ष्मण, सीता, रावण और उनके साथियों के पूर्वभव
विभीषण के पूछने पर सकलभूषण केवली उन अनेक जन्मों का वृत्तांत सुनाते हैं जिन्होंने राम, लक्ष्मण, सीता, रावण और उनके साथियों को एक-दूसरे से बाँधा, और सीता-हरण, युद्ध तथा अपवाद की जड़ें प्रकट करते हैं।
- पर्व 107: कृतांतवक्त्र सेनापति का वैराग्य
कृतांतवक्त्र सेनापति का वैराग्य
केवली का उपदेश सुनकर राम के सेनापति कृतांतवक्त्र मुनिदीक्षा लेते हैं, और आर्यिका सीता को शोकपूर्वक निहारकर राम पुत्रों सहित अयोध्या लौटते हैं।
- पर्व 108: लवण-अंकुश के पूर्वभव
लवण-अंकुश के पूर्वभव
गौतम स्वामी श्रेणिक को बताते हैं कि लवण और अंकुश पूर्वभव में काकंदी के राजकुमार प्रियंकर और हितंकर थे, और उस भव की उनकी माता ही आगे उनका गुरु क्षुल्लक सिद्धार्थ बनी।
इस खंड के पर्व
- पर्व 100 लवण और अंकुश का जन्म और बाल्यकाल
- पर्व 101 लवण और अंकुश का दिग्विजय
- पर्व 102 लवण-अंकुश का अयोध्या पर अभियान
- पर्व 103 राम-लक्ष्मण से लवण-अंकुश का मिलन
- पर्व 104 अग्नि-परीक्षा का आदेश और सकलभूषण केवली के दर्शन को देवों का आगमन
- पर्व 105 अग्नि का सरोवर बनना और राम का केवली के मुख से धर्मश्रवण
- पर्व 106 राम, लक्ष्मण, सीता, रावण और उनके साथियों के पूर्वभव
- पर्व 107 कृतांतवक्त्र सेनापति का वैराग्य
- पर्व 108 लवण-अंकुश के पूर्वभव

खंड 11 पर्व 109 से 118
महान वैराग्य
सीता आर्यिका बनकर स्वर्ग जाती हैं, लक्ष्मण के पुत्र और हनुमान संसार त्यागते हैं, और जब दो देव भाइयों के प्रेम की परीक्षा लेते हैं तो लक्ष्मण शोक से प्राण त्याग देते हैं। राम भाई के शरीर को लिए फिरते हैं, जब तक देव उन्हें प्रबोधित नहीं करते।
मुख्य बिंदु
- पर्व 109: सीता का उग्र तप और राजा मधु का वैराग्य
सीता का उग्र तप और राजा मधु का वैराग्य
बासठ वर्ष के उग्र तप के बाद आर्यिका सीता समाधिमरण कर अच्युत स्वर्ग में प्रतीन्द्र होती हैं, और गौतम स्वामी बताते हैं कि वहाँ का इन्द्र पूर्व में अयोध्या का राजा मधु था।
- पर्व 110: लक्ष्मण के आठों कुमारों का वैराग्य
लक्ष्मण के आठों कुमारों का वैराग्य
स्वयंवर में दो राजकुमारियों के लवण और अंकुश को वरने पर लक्ष्मण के आठ प्रमुख कुमार अपने क्रुद्ध भाइयों को शांत करते हैं, संसार से विरक्त होकर दीक्षा लेते हैं और अंततः निर्वाण पाते हैं।
- पर्व 111: भामंडल का बिजली गिरने से मरण
भामंडल का बिजली गिरने से मरण
कुछ दिन और भोग भोगने के बहाने वैराग्य को टालते रहने वाले भामंडल पर सोते समय बिजली गिरती है और उनकी मृत्यु हो जाती है।
- पर्व 112: हनुमान का संसार, देह और भोगों से विरक्त होना
हनुमान का संसार, देह और भोगों से विरक्त होना
सुमेरु पर्वत के अकृत्रिम जिनमंदिरों की वंदना से लौटते हुए हनुमान रात के आकाश में एक तारा टूटता देखते हैं और राज्य, रानियों और भोगों को छोड़ जिनेन्द्रों के मार्ग पर चलने का निश्चय करते हैं।
- पर्व 113: कामदेव हनुमान की दीक्षा और निर्वाण
कामदेव हनुमान की दीक्षा और निर्वाण
हनुमान पुत्र को राज्य देकर साढ़े सात सौ राजाओं के साथ आकाशगामी धर्मरत्न मुनि से दीक्षा लेते हैं और उग्र तप करके तुंगीगिरि से निर्वाण पाते हैं।
- पर्व 114: इन्द्र का देवों को उपदेश और राम के स्नेह की चर्चा
इन्द्र का देवों को उपदेश और राम के स्नेह की चर्चा
स्वर्ग की सभा में सौधर्म इन्द्र जिनभक्ति का उपदेश देते हैं और कहते हैं कि ज्ञानी होकर भी राम संसार नहीं छोड़ पाते, क्योंकि लक्ष्मण के प्रति उनका स्नेह सबसे बड़ा बंधन है।
- पर्व 115: लक्ष्मण का मरण और लवण-अंकुश का वैराग्य
लक्ष्मण का मरण और लवण-अंकुश का वैराग्य
दो देव राम की मृत्यु का झूठा समाचार देकर भाइयों के प्रेम की परीक्षा लेते हैं, लक्ष्मण उसी क्षण शोक से प्राण त्याग देते हैं, और लवण-अंकुश संसार छोड़ देते हैं।
- पर्व 116: लक्ष्मण के वियोग में राम का विलाप
लक्ष्मण के वियोग में राम का विलाप
लक्ष्मण की मृत्यु को न मानते हुए राम दिन-रात भाई का शरीर लिए फिरते हैं और उसे जगाने की विनती करते हुए विलाप करते हैं।
- पर्व 117: शोक-संतप्त राम को विभीषण का संबोधन
शोक-संतप्त राम को विभीषण का संबोधन
विद्याधर राजा अयोध्या में एकत्र होते हैं, और विभीषण मृत्यु की अनिवार्यता का उपदेश देकर राम से लक्ष्मण का शरीर छोड़ने का आग्रह करते हैं, पर राम उसे नहीं छोड़ पाते।
- पर्व 118: देवों के संबोधन से राम का प्रबोध और लक्ष्मण का दाह संस्कार
देवों के संबोधन से राम का प्रबोध और लक्ष्मण का दाह संस्कार
कृतांतवक्त्र और जटायु के जीव स्वर्ग से आकर राम के शत्रुओं को भगाते हैं और उन्हें मोह से जगाते हैं, तब राम अंततः लक्ष्मण का दाह संस्कार कर संसार छोड़ने का निश्चय करते हैं।
इस खंड के पर्व
- पर्व 109 सीता का उग्र तप और राजा मधु का वैराग्य
- पर्व 110 लक्ष्मण के आठों कुमारों का वैराग्य
- पर्व 111 भामंडल का बिजली गिरने से मरण
- पर्व 112 हनुमान का संसार, देह और भोगों से विरक्त होना
- पर्व 113 कामदेव हनुमान की दीक्षा और निर्वाण
- पर्व 114 इन्द्र का देवों को उपदेश और राम के स्नेह की चर्चा
- पर्व 115 लक्ष्मण का मरण और लवण-अंकुश का वैराग्य
- पर्व 116 लक्ष्मण के वियोग में राम का विलाप
- पर्व 117 शोक-संतप्त राम को विभीषण का संबोधन
- पर्व 118 देवों के संबोधन से राम का प्रबोध और लक्ष्मण का दाह संस्कार

खंड 12 पर्व 119 से 123
राम का निर्वाण
राम सुव्रत मुनि से दीक्षा लेते हैं, उग्र तप करते हैं, स्वर्ग से आए सीता के जीव के उपसर्ग को सहते हैं, केवलज्ञान और अंततः मोक्ष प्राप्त करते हैं, जबकि सीता का जीव लक्ष्मण और रावण को प्रबोधित करने नरक जाता है।
मुख्य बिंदु
- पर्व 119: श्रीराम का सुव्रत मुनि से दीक्षा लेना
श्रीराम का सुव्रत मुनि से दीक्षा लेना
राम अपने पौत्र को राज्य देकर सोलह हजार से अधिक राजाओं के साथ सुव्रत मुनि से दीक्षा लेते हैं और राग से अछूते रहकर अकेले मुनि रूप में विहार करते हैं।
- पर्व 120: मुनि राम का आहार के लिए नगर में आना और अंतराय से वन लौटना
मुनि राम का आहार के लिए नगर में आना और अंतराय से वन लौटना
मुनि राम आहार के लिए नंदस्थली आते हैं, पर जब राजा के सामंत उन्हें महल ले जाने के लिए प्रजा को रोक देते हैं, तो वे इसे अंतराय मानकर बिना आहार लिए वन लौट जाते हैं।
- पर्व 121: मुनि राम का वन में निरंतराय आहार
मुनि राम का वन में निरंतराय आहार
केवल वन में आहार लेने की प्रतिज्ञा निभाते हुए राम को वन के सरोवर के किनारे राजा प्रतिनंदी और रानी प्रभवा आहार देते हैं, और देव पंचाश्चर्य बरसाते हैं।
- पर्व 122: सीता के जीव का उपसर्ग और राम को केवलज्ञान
सीता के जीव का उपसर्ग और राम को केवलज्ञान
कोटिशिला पर ध्यानस्थ राम स्वर्ग से उन्हें मोहित करने आए सीता के जीव की माया से अडिग रहते हैं और केवलज्ञान प्राप्त करते हैं।
- पर्व 123: सीता के जीव द्वारा लक्ष्मण और रावण को संबोधन; राम का निर्वाण
सीता के जीव द्वारा लक्ष्मण और रावण को संबोधन; राम का निर्वाण
सीता का जीव, जो अब देव है, तीसरे नरक में जाकर लक्ष्मण, रावण और शंबूक को संबोधता है, केवली राम से सबके भविष्य सुनता है, और राम आयु पूर्ण कर सिद्ध होते हैं।
इस खंड के पर्व
- पर्व 119 श्रीराम का सुव्रत मुनि से दीक्षा लेना
- पर्व 120 मुनि राम का आहार के लिए नगर में आना और अंतराय से वन लौटना
- पर्व 121 मुनि राम का वन में निरंतराय आहार
- पर्व 122 सीता के जीव का उपसर्ग और राम को केवलज्ञान
- पर्व 123 सीता के जीव द्वारा लक्ष्मण और रावण को संबोधन; राम का निर्वाण
पद्मपुराण में और गहरे उतरिए
हर पर्व को उसके पात्रों और स्थानों सहित बिंदुवार पढ़िए, या वंशवृक्ष में देखिए कि राम, रावण, सुग्रीव और हनुमान के कुल आपस में कैसे जुड़े हैं।