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पर्व 71

रावण को बहुरूपिणी विद्या का सिद्ध होना

अंगद रावण की आँखों के सामने उसकी रानियों का अपमान करता है, पर रावण ध्यान से नहीं डिगता और बहुरूपिणी विद्या सिद्ध होकर उसके सामने प्रकट होती है।

कथा खंड लंका का युद्ध

सारांश

सुग्रीव का पुत्र अंगद ठाठ-बाट से लंका में प्रवेश करता है और रावण के महल के भ्रम भरे रत्नमय भवनों में भटकते हुए शांतिनाथ मंदिर तक पहुँचता है। भगवान की वंदना कर वह रावण का उपहास करता है, उसकी माला छीनता है और रानियों को सताता है, मंदोदरी को चोटी पकड़कर खींच लाता है, पर मंदोदरी के विलाप के बावजूद रावण अचल रहता है। उसी समय बहुरूपिणी विद्या प्रकट होकर सेवा का वचन देती है, रावण साधना पूर्ण करता है, और अंगद मंदोदरी को छोड़कर आकाशमार्ग से राम के पास लौट आता है।

क्या हुआ

8 बिंदु

  1. पूर्णभद्र और मणिभद्र को शांत देख सुग्रीव का पुत्र अंगद किहकंध नाम के हाथी पर चढ़कर, सुंदर वस्त्र और स्वर्ण-आभूषण पहने, चारों ओर पयादों, वीणा-बाँसुरी आदि बाजों और आगे होते नृत्य के साथ लंका में ऐसे प्रवेश करता है जैसे स्वर्ग में देव प्रवेश करे। लंका की स्त्रियाँ आपस में कहती हैं कि यह अंगद रावण के राजभवन की ओर जा रहा है, न जाने क्या करेगा।

  2. महल में वानरवंशी मणियों के चौक को सरोवर समझ बैठते हैं, रत्नमय द्वार पर अंजनगिरि समान नीलमणि के हाथियों और सिंह-चिह्नों को देख डर जाते हैं, तब अंगद समझाता है कि ये बनावटी हैं; स्फटिक के महलों को आकाश समझकर वे जन्मांध की तरह भटकते हैं। इन्द्रनीलमणि की दीवारों के अंधकार में सिर टकराकर मूर्च्छित हो जाते हैं, स्फटिक की दीवारों से घुटने और ललाट फूटते हैं, और रत्नों से बनी स्त्री-मूर्ति को सच्ची स्त्री समझकर उससे मार्ग पूछते हैं।

  3. स्फटिक की दीवार बीच में होने से शांतिनाथ मंदिर का दिखता शिखर भी पहुँच से बाहर रहता है; वे सोने की छड़ी लिए रत्नमय द्वारपाल की मूर्ति से मार्ग पूछते हैं और उसे मारने पर अपनी ही उँगलियाँ तोड़ बैठते हैं। अंत में इन्द्रनीलमणि के द्वार पर एक बोलता हुआ मनुष्य मिलता है, जिसके बाल पकड़कर वे उसे आगे चलाते हैं और मंदिर पहुँचकर जय-जयकार कर पुष्पांजलि चढ़ाते हैं, चकित होकर कि यह मंदिर चक्रवर्ती के राजभवन के जिनमंदिर जैसा है।

  4. वाहन और सेना को बाहर छोड़ अंगद भीतर जाकर भगवान की तीन प्रदक्षिणा देता है, स्तोत्र पढ़कर अष्टांग नमस्कार करता है और दीवारों पर सोलह स्वप्नों आदि के चित्र देख हर्षित होकर फिर वंदना करता है। फिर वह शांतिनाथ भगवान के सामने पद्मासन में बैठे रावण को देखता है, मानो सूर्य के सम्मुख राहु बैठा हो; जैसे भरत जिनदीक्षा चाहते थे, वैसे रावण विद्या चाहता है।

  5. अंगद कहता है, ‘हे रावण! यह क्या पाखंड रचा है? धिक्कार है तुझे, तू पापी है, विषयों के लिए विद्या-साधन की शुभ क्रिया करता है; मैं तुझे ऐसा करूँ जैसा मृत्यु भी न करे।’ वह रावण की धोती खींच लेता है, उसके सामने रानियों को कटु वचन कहकर मारता है, सामने रखे पुष्प उठा लेता है, और हाथ की स्फटिक-माला छीनकर मोती बिखेर देता है, फिर माला बनाकर हाथ में देता है, फिर छीन लेता है, गले में डाल देता है और फिर मस्तक पर रख देता है।

  6. कुमार रनिवास में उपद्रव करते हैं: किसी के कंठ में कपड़े की रस्सी बाँधते हैं, किसी को खंभे से बाँधकर फिर छोड़ देते हैं, किसी को पकड़कर बेच आने को कहते हैं तो साथी हँसकर कहता है कि पाँच दीनार में बेच आया, किसी के कानों में बिछिया और बालों में करधनी पहनाते हैं, मुकुट चरणों में बाँधते हैं, स्त्रियों को परस्पर केशों से बाँधते हैं और सिर पर बोलते मोर बैठाते हैं। अंगद क्रोध से कहता है, ‘हे अधम राक्षस! तूने कपट से महासती सीता का हरण किया, अब हम तेरे देखते तेरी सब रानियों को हर ले जाते हैं,’ और मंदोदरी को चोटी पकड़कर ऐसे खींच लाता है जैसे सिंह मृगी को पकड़े, और कहता है कि यह सुग्रीव पर चँवर ढोरने वाली दासी होगी।

  7. रोती हुई मंदोदरी कभी रावण के पैर और कभी हाथ पकड़कर कहती है, ‘हे नाथ! मेरी रक्षा करो, क्या आप रावण हो या कुछ और हो गए? निर्ग्रंथ मुनि के समान वीतरागी बनकर काठ या चित्र की तरह सुमेरु समान अचल बैठे हो; जैसे राम सीता का चिंतन करते हैं वैसे तुम विद्या का चिंतन करते हो; धिक्कार है आपके बल को जो इस पापी का मस्तक खड्ग से नहीं काटते।’ उसी समय बहुरूपिणी विद्या दसों दिशाओं में प्रकाश करती, जय-जयकार करती रावण के समीप प्रकट होती है और कहती है कि चक्रवर्ती और अर्धचक्रवर्ती को छोड़ जो कोई आपकी आज्ञा से विमुख हो उसे मैं वश करूँगी, देवों को भी वश करूँगी, विद्याधर तो मेरे सामने तृण समान हैं, पर हम जैसी विद्याओं की परंपरा है कि चक्रवर्ती पर हमारा बल नहीं चलता।

  8. विद्या के वचन सुनकर रावण साधना पूर्ण करता है और शांतिनाथ भगवान की प्रदक्षिणा देकर नमस्कार करता है; उसी समय सूर्य समान तेजस्वी अंगद मंदोदरी को छोड़कर आकाशमार्ग से राम के समीप लौट आता है। पर्व का उपदेश है कि जिनागम के मंत्रों में श्रद्धा और दृढ़ता हो तो सभी कार्य सफल होते हैं।