पर्व 1
पीठबंध: मंगलाचरण और कथा की रूपरेखा
जिनेन्द्रों को नमस्कार से आरम्भ होकर ग्रंथ आठवें बलभद्र राम (पद्म) का चरित्र राजा श्रेणिक के प्रश्न पर गौतम गणधर के उत्तर के रूप में प्रस्तुत करता है।
आचार्य रविषेण की जैन रामायण
आचार्य रविषेण ने पद्म अर्थात राम का जीवन 123 पर्वों में कहा है। यहाँ हर पर्व का सारांश, उसके मुख्य प्रसंग, उसमें आने वाले पात्र और वे स्थान दिए गए हैं जहाँ कथा घटित होती है।

खंड 1 पर्व 1 से 5
राजा श्रेणिक गौतम गणधर से राम की सच्ची कथा पूछते हैं। उत्तर लोक की रचना, कुलकरों और ऋषभदेव से आरम्भ होकर चार महावंशों, इक्ष्वाकु, सोम, विद्याधर और हरि, की उत्पत्ति तक पहुँचता है।
कथा पढ़ें: उद्गम: लोक और वंशों की उत्पत्तिपर्व 1
जिनेन्द्रों को नमस्कार से आरम्भ होकर ग्रंथ आठवें बलभद्र राम (पद्म) का चरित्र राजा श्रेणिक के प्रश्न पर गौतम गणधर के उत्तर के रूप में प्रस्तुत करता है।
पर्व 2
विपुलाचल पर्वत पर महावीर का समवशरण आता है, और उनका उपदेश सुनकर राजा श्रेणिक राम की सच्ची कथा जानने का संकल्प करते हैं।
पर्व 3
गौतम स्वामी लोक और कालचक्र का वर्णन करते हैं; ऋषभदेव कर्मभूमि की व्यवस्था कर दीक्षा लेते हैं, और नमि-विनमि को विद्याधरों का लोक प्राप्त होता है।
पर्व 4
एक वर्ष से अधिक निराहार विहार के बाद हस्तिनापुर में राजा श्रेयांस ऋषभदेव को इक्षुरस का प्रथम आहार देते हैं।
पर्व 5
गौतम स्वामी चार महावंशों का वर्णन करते हैं, और अजितनाथ के समवशरण में राक्षसों के इन्द्र मेघवाहन को राक्षस द्वीप और लंका देते हैं, जिससे रावण के वंश की नींव पड़ती है।

खंड 2 पर्व 6 से 14
लंका और किष्किंधा के विद्याधर वंश आकार लेते हैं, रत्नश्रवा और केकसी के यहाँ रावण का जन्म होता है, वह हजारों विद्याएँ सिद्ध कर विद्याधर लोक को जीतता है, और कैलाश पर बाली मुनि उसका मान भंग करते हैं।
कथा पढ़ें: राक्षस, वानर और रावण का उदयपर्व 6
विद्याधर राजकुमार श्रीकंठ वानरद्वीप में किष्कुपुर बसाते हैं और उनके वंशज वानर-चिह्न अपनाकर वानरवंशी कहलाते हैं।
पर्व 7
रत्नश्रवा और केकसी के पुत्र रावण का जन्म होता है और वह यक्ष के घोर उपसर्गों से अडिग रहकर भीम वन में हज़ारों विद्याएँ सिद्ध करता है।
पर्व 8
रावण मंदोदरी से विवाह करता है, वैश्रवण को हराकर पुष्पक विमान पाता है, वानर राजाओं को यम के कृत्रिम नरक से छुड़ाता है और लंका में प्रवेश करता है।
पर्व 9
जिनेन्द्र के सिवा किसी को नमस्कार न करने की प्रतिज्ञा निभाते हुए बाली मुनि बने, कैलाश उठाते रावण को अंगूठे से दबाया और मोक्ष पाया।
पर्व 10
सुग्रीव का सुतारा से विवाह हुआ, और रावण द्वारा पकड़े गए माहिष्मती-नरेश सहस्ररश्मि ने छूटकर दीक्षा ली, जिसके बाद उनके मित्र अनरण्य भी मुनि बने।
पर्व 11
रावण ने नारद को छुड़ाकर राजा मरुत के पशुयज्ञ का विध्वंस किया, उस हिंसक यज्ञ का जिसकी शुरुआत राजा वसु के झूठ से हुई थी।
पर्व 12
रावण ने युक्ति से नलकूबर का नगर जीता, सुदर्शन चक्ररत्न पाया और महायुद्ध में विद्याधरों के राजा इन्द्र को बंदी बना लिया।
पर्व 13
पिता सहस्रार की विनती पर छोड़े गए अपमानित इन्द्र ने चारण मुनि से अपने पूर्वभव सुनकर जिनदीक्षा ली और निर्वाण प्राप्त किया।
पर्व 14
सुमेरु से लौटते हुए रावण ने अनंतवीर्य केवली का धर्मोपदेश सुना और नियम लिया कि किसी परस्त्री को उसकी इच्छा के बिना बलपूर्वक ग्रहण नहीं करेगा।

खंड 3 पर्व 15 से 19
राजकुमारी अंजना का विवाह पवनंजय से होता है, पर वह बाईस वर्ष तक उपेक्षित रहती है। गर्भावस्था में घर से निकाली गई अंजना पर्वत की गुफा में हनुमान को जन्म देती है, जो अद्वितीय वीर और कामदेव बनते हैं।
कथा पढ़ें: अंजना और हनुमान का जन्मपर्व 15
दासी के मुख से प्रतिद्वंद्वी वर की प्रशंसा सुनकर पवनंजय अंजना से रूठ गया और केवल उसे त्यागने के लिए उससे विवाह किया।
पर्व 16
युद्ध के मार्ग में पति से बिछुड़ी चकवी का दुख देखकर पवनंजय बाईस वर्ष की उपेक्षा के बाद गुप्त रूप से अंजना के पास लौटता है।
पर्व 17
सास और पिता द्वारा निकाली गई अंजना वन की गुफा में हनुमान को जन्म देती है और उसके मामा प्रतिसूर्य उसे आश्रय देते हैं।
पर्व 18
युद्ध से विजयी लौटे पवनंजय अंजना को घर से निकाली गई पाकर उसके बिना प्राण त्यागने का निश्चय करते हैं, और अंत में अंजना तथा पुत्र हनुमान से मिलते हैं।
पर्व 19
युवा हनुमान वरुण के सौ पुत्रों को बाँधकर रावण को वरुण पर विजय दिलाते हैं, फिर राज्य पाते हैं और हजार राजकन्याओं से विवाह करते हैं।

खंड 4 पर्व 20 से 29
त्रेसठ शलाका पुरुषों का वर्णन, इक्ष्वाकु वंश का दशरथ तक विस्तार, कैकेयी का वरदान और राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न का जन्म होता है। मिथिला में सीता और उनके जुड़वाँ भाई भामंडल जन्म लेते हैं, और स्वयंवर में राम सीता को प्राप्त करते हैं।
कथा पढ़ें: रघुकुल: जन्म और विवाहपर्व 20
गौतम स्वामी इस युग के त्रेसठ शलाका पुरुषों का वर्णन करते हैं, जिनमें राम आठवें बलभद्र, लक्ष्मण आठवें नारायण और रावण आठवें प्रतिनारायण हैं।
पर्व 21
गौतम स्वामी हरि से मुनिसुव्रतनाथ होते हुए जनक तक हरिवंश का, और वज्रबाहु तथा कीर्तिधर से शिशु सुकौशल तक इक्ष्वाकुवंश का वर्णन करते हैं।
पर्व 22
सुकौशल अपने पिता कीर्तिधर मुनि से दीक्षा लेते हैं और पूर्वजन्म की माता, सिंहनी द्वारा शरीर विदारे जाने पर केवलज्ञान पाकर मोक्ष जाते हैं।
पर्व 23
नारद से विभीषण के षड्यंत्र की सूचना पाकर दशरथ और जनक वेश बदलकर निकल जाते हैं, और विभीषण उनके सजीव जैसे पुतलों का सिर कटवा देता है।
पर्व 24
स्वयंवर में कैकेयी द्वारा वरे गए, भ्रमण करते दशरथ उसे सारथी बनाकर विरोधी राजाओं को परास्त करते हैं और उसे एक वर देते हैं।
पर्व 25
रानी अपराजिता से राम, सुमित्रा से लक्ष्मण, कैकेयी से भरत और सुप्रभा से शत्रुघ्न का जन्म होता है और चारों राजकुमार शस्त्र व शास्त्र विद्या में निपुण होते हैं।
पर्व 26
पूर्वभव के बैर से एक देव रानी विदेहा के नवजात पुत्र, सीता के जुड़वाँ भाई, को हर ले जाता है और रथनूपुर में विद्याधर चन्द्रगति उसे भामंडल नाम से पालता है।
पर्व 27
म्लेच्छ राजा आतरंगतम जब जनक के देश को उजाड़ने लगता है, तब किशोर राम-लक्ष्मण उसकी सेना को खदेड़ देते हैं और जनक सीता को राम को देने का निश्चय करते हैं।
पर्व 28
स्वयंवर में राम देवरक्षित वज्रावर्त धनुष चढ़ाकर सीता को पाते हैं, लक्ष्मण सागरावर्त धनुष चढ़ाते हैं और भरत का विवाह कनक की पुत्री लोकसुंदरी से होता है।
पर्व 29
वृद्ध खोजे के मुख से बुढ़ापे का वर्णन सुनकर राजा दशरथ का मन वैराग्य की ओर मुड़ता है और वे सर्वभूतहित मुनि से धर्म-श्रवण करते हैं।

खंड 5 पर्व 30 से 43
दशरथ संसार त्यागते हैं, कैकेयी के कहने पर भरत का राज्याभिषेक होता है और राम, सीता, लक्ष्मण अयोध्या छोड़ते हैं। यात्रा में वे धर्मात्माओं की रक्षा करते हैं, मित्र बनाते हैं, लक्ष्मण को अनेक कन्याएँ मिलती हैं, जटायु पक्षी से भेंट होती है और वे दंडकवन में निवास करते हैं।
कथा पढ़ें: वनवासपर्व 30
पूर्वजन्म का स्मरण होने पर भामंडल जान लेता है कि सीता उसकी सगी जुड़वाँ बहन है; चन्द्रगति दीक्षा लेते हैं और भामंडल अपने माता-पिता जनक और विदेहा से मिलता है।
पर्व 31
मुनि सर्वभूतहित से अपने पूर्वभव सुनकर दशरथ ने दीक्षा का निश्चय किया; कैकेयी ने वर माँगकर भरत के लिए राज्य पाया और राम घर छोड़कर चल पड़े।
पर्व 32
राम, लक्ष्मण और सीता आधी रात को नगर से निकल गए; दशरथ मुनि बने और वन में स्वयं राम ने भरत का राज्याभिषेक किया।
पर्व 33
जिनेंद्रदेव, निर्ग्रंथ मुनि और जिनवाणी के सिवा किसी को नमस्कार न करने का व्रत लेने वाले वज्रकर्ण को लक्ष्मण ने अकेले राजा सिंहोदर को हराकर बचाया।
पर्व 34
राजकुमार के वेश में नलकूवर पर राज्य करती कल्याणमाला ने अपना भेद खोला, और राम-लक्ष्मण ने म्लेच्छों के स्वामी रौद्रभूत से उसके पिता बालिखिल्य को छुड़ाया।
पर्व 35
कपिल ब्राह्मण ने वनवासियों को अपनी कुटिया से निकाला, फिर यक्ष द्वारा बसाई रामपुरी में उनके दर्शन किए, जैनधर्म अपनाया और अंत में मुनि बना।
पर्व 36
लक्ष्मण के प्रेम में फाँसी लगाने जा रही विजयपुर की राजकुमारी वनमाला को लक्ष्मण ने बचाया, और उसके पिता पृथ्वीधर ने हर्ष से तीनों का स्वागत किया।
पर्व 37
नर्तकियों का वेश धरकर राम-लक्ष्मण ने भरत पर चढ़ाई करने वाले अतिवीर्य को पकड़ लिया; पराजित अतिवीर्य राज्य त्यागकर मुनि बन गया।
पर्व 38
क्षेमांजलि नगर में लक्ष्मण ने राजा शत्रुदमन द्वारा चलाई गई पाँचों शक्तियाँ झेल लीं और अभिमानी राजकुमारी जितपद्मा को प्राप्त किया।
पर्व 39
वंशगिरि पर राम-लक्ष्मण ने देशभूषण और कुलभूषण मुनियों पर उपसर्ग करने वाले अग्निप्रभ असुर को भगाया, और दोनों मुनियों को तत्काल केवलज्ञान प्राप्त हुआ।
पर्व 40
राम ने वंशगिरि को हज़ारों जिनमंदिरों से सुशोभित किया, जिससे वह पर्वत रामगिरि नाम से प्रसिद्ध हुआ, और फिर वे दंडकवन की ओर चल पड़े।
पर्व 41
पूर्वभव में मुनियों की हत्या करने वाला राजा दंडक, जो अब गिद्ध था, दो चारण मुनियों के चरणों में रूपांतरित होकर व्रतधारी जटायु बना।
पर्व 42
हाथियों से जुते रथ में दंडकवन में विहार करते हुए राम वहाँ नगर बसाने का विचार करते हैं, पर वर्षाऋतु आ जाने से वन में ही वर्षाकाल बिताते हैं।
पर्व 43
रावण के भानजे शंबूक ने बारह वर्ष की साधना से जो सूर्यहास खड्ग सिद्ध किया था, उसे लक्ष्मण ने ले लिया और उसकी धार परखते हुए अनजाने में शंबूक को मार डाला।

खंड 6 पर्व 44 से 53
रावण सीता को हरकर लंका ले जाता है। मायावी सुग्रीव के वध के बाद राम की सुग्रीव से मित्रता होती है, लक्ष्मण कोटिशिला उठाते हैं, और हनुमान लंका जाकर सीता से मिलते हैं तथा लंका में उथल-पुथल मचा देते हैं।
कथा पढ़ें: सीता हरण और हनुमान का दौत्यपर्व 44
लक्ष्मण के खरदूषण से युद्ध करते समय झूठा सिंहनाद करके रावण राम को दूर हटाता है, सीता का हरण करता है और जटायु को गिरा देता है, और राम व्याकुल होकर सीता को खोजते हैं।
पर्व 45
विराधित की सहायता से लक्ष्मण खरदूषण को मारते हैं, और सीता को न पाकर शोकाकुल राम पाताल लंका में जाकर रहते हैं।
पर्व 46
लंका में सीता रावण, मंदोदरी और रावण की भयानक माया को ठुकरा देती हैं, जबकि विभीषण की मंत्रणा से नगर के चारों ओर मायामयी कोट बनाया जाता है।
पर्व 47
राम ने दुखी सुग्रीव को मित्र बनाया, और उनके दर्शन मात्र से नकली सुग्रीव की विद्या भाग जाने पर उन्होंने युद्ध में साहसगति का वध किया।
पर्व 48
सुग्रीव की खोज से रत्नजटी द्वारा सीता का समाचार मिलता है, और लक्ष्मण वह कोटिशिला उठाते हैं जिसे उठाने वाले से रावण की मृत्यु बताई गई थी।
पर्व 49
सुग्रीव पर राम के उपकार से प्रसन्न हनुमान किष्किंधापुर में राम से मिलते हैं और उनकी मुद्रिका लेकर लंका को प्रस्थान करते हैं।
पर्व 50
हनुमान ने अंजना को शरण न देने वाले अपने नाना महेंद्र को युद्ध में हराया, फिर उनसे मेल कर उन्हें राम की सेवा में भेजा।
पर्व 51
हनुमान ने ध्यानस्थ दो मुनियों के चारों ओर लगी वन की आग बुझाई और राजा गंधर्व की तीन पुत्रियों की रक्षा की, जिनका विवाह फिर राम से हुआ।
पर्व 52
हनुमान ने लंका का मायामयी कोट तोड़कर उसके रक्षक वज्रमुख को मारा, जिसकी पुत्री लंकासुंदरी उनसे लड़ी, फिर उन पर मोहित होकर उनकी पत्नी बनी।
पर्व 53
हनुमान ने सीता को राम की मुद्रिका दी, उन्हें भोजन के लिए मनाया, उनका चूड़ामणि लिया, और फिर रावण की जंजीरें तोड़कर लंका को तहस-नहस कर दिया।

खंड 7 पर्व 54 से 76
विभीषण राम के पक्ष में आते हैं, सेनाएँ टकराती हैं, रावण की शक्ति से लक्ष्मण मूर्च्छित होते हैं और विशल्या उन्हें स्वस्थ करती है, रावण बहुरूपिणी विद्या सिद्ध करता है, और अंत में उसका अपना चक्र लक्ष्मण के हाथ में आकर युद्ध समाप्त करता है।
कथा पढ़ें: लंका का युद्धपर्व 54
हनुमान का समाचार सुनकर और सीता का चूड़ामणि पाकर राम-लक्ष्मण विद्याधरों की सेनाओं के साथ लंका की ओर चलकर हंसद्वीप में डेरा डालते हैं।
पर्व 55
सीता को लौटाने की सलाह देने पर रावण के क्रोध और धमकी का सामना कर विभीषण तीस अक्षौहिणी सेना सहित लंका छोड़कर राम की शरण आता है।
पर्व 56
गौतम स्वामी अक्षौहिणी का प्रमाण बताते हैं, और दोनों पक्षों के लोग रावण की चार हजार और राम की दो हजार अक्षौहिणी सेना के बल पर चर्चा करते हैं।
पर्व 57
पत्नियों से विदा लेकर लंका के योद्धा हस्त-प्रहस्त के पीछे युद्ध को निकलते हैं, और अपशकुनों के बावजूद रावण पुष्पक विमान में चल पड़ता है।
पर्व 58
पहली बड़ी मुठभेड़ में वानरवंशी वीर नल और नील रावण के सेनापति हस्त और प्रहस्त को मार डालते हैं और राक्षस सेना शिथिल पड़ जाती है।
पर्व 59
गौतम स्वामी बताते हैं कि नल-नील ने हस्त-प्रहस्त को इसलिए मारा क्योंकि पूर्वभव में उन दोनों ने इनकी हत्या की थी।
पर्व 60
इंद्रजीत और मेघवाहन द्वारा सुग्रीव और भामंडल को नागपाश में बाँधने पर राम गरुड़ेंद्र का वर याद करते हैं, और दोनों भाइयों को दिव्य विद्याएँ और शस्त्र मिलते हैं।
पर्व 61
राम-लक्ष्मण के सिंहवाहन और गरुड़वाहन पर रणभूमि में आते ही सुग्रीव और भामंडल का नागपाश का बंधन टूट जाता है।
पर्व 62
रावण नागेन्द्र की दी हुई अमोघ शक्ति चलाता है और वक्षस्थल पर उसकी चोट खाकर लक्ष्मण मूर्च्छित होकर रणभूमि में गिर पड़ते हैं।
पर्व 63
लक्ष्मण को मूर्च्छित देख राम स्वयं मूर्च्छित होकर विलाप करते हैं और भाई के साथ अग्नि में प्रवेश का निश्चय करते हैं, तब बुद्धिमान जाम्बूनद उन्हें रोकते हैं।
पर्व 64
चन्द्रप्रतिम विद्याधर बताता है कि पूर्वभव के तप से पवित्र राजकुमारी विशल्या का स्नान-जल ही लक्ष्मण की शक्ति दूर कर सकता है।
पर्व 65
एक ही रात में अयोध्या से लाई गई विशल्या के कटक में प्रवेश करते ही शक्ति लक्ष्मण के शरीर से निकल भागती है, और लक्ष्मण उठकर उससे विवाह करते हैं।
पर्व 66
रावण का दूत सीता और बंदियों के बदले राम को आधी लंका और सारी पृथ्वी देने का प्रस्ताव रखता है, पर राम सीता को छोड़ना स्वीकार नहीं करते।
पर्व 67
बंदी भाई-पुत्रों और क्षत्रिय-स्वाभिमान के द्वंद्व में फँसा रावण बहुरूपिणी विद्या सिद्ध करने का निश्चय कर शांतिनाथ मंदिर में पूजा का आदेश देता है।
पर्व 68
आठ दिन के अष्टाह्निका पर्व में योद्धा युद्ध रोक देते हैं और लंका के लोग सिद्धचक्र व्रत के साथ जिनेन्द्र भगवान की भव्य पूजा करते हैं।
पर्व 69
शांतिनाथ मंदिर में विद्या-साधना आरंभ करने से पहले रावण मंदोदरी के द्वारा घोषणा करवाता है कि सारी लंका व्रत-नियम पाले, पूजा करे और किसी प्रकार का कलह न करे।
पर्व 70
रावण बहुरूपिणी विद्या की साधना में बैठा है, तब वानरवंशी कुमार लंका में उपद्रव मचाते हैं, जिन्हें यक्षेन्द्र पूर्णभद्र और मणिभद्र खदेड़ देते हैं।
पर्व 71
अंगद रावण की आँखों के सामने उसकी रानियों का अपमान करता है, पर रावण ध्यान से नहीं डिगता और बहुरूपिणी विद्या सिद्ध होकर उसके सामने प्रकट होती है।
पर्व 72
सीता के पति-प्रेम से द्रवित होकर रावण क्षण भर पछताता है, पर अभिमान जीत जाता है और वह राम-लक्ष्मण को जीवित पकड़ने तथा उनके साथियों को कुचलने का संकल्प करता है।
पर्व 73
मंदोदरी रावण से सीता को छोड़ने की विनती करती है और चेताती है कि वह प्रतिनारायण है जिसका पतन निश्चित है, पर रावण नहीं मानता और युद्ध के लिए निकल पड़ता है।
पर्व 74
रावण हजार हाथियों से खिंचे रथ पर युद्ध में आता है, और घोर संग्राम के बाद लक्ष्मण दिव्य बाणों के द्वंद्व में उसका सामना करते हैं।
पर्व 75
रावण लक्ष्मण पर चक्ररत्न चलाता है, पर चक्र लक्ष्मण की तीन प्रदक्षिणा देकर उनके हाथ में ठहर जाता है, जिससे वे नारायण के रूप में प्रकट होते हैं।
पर्व 76
लक्ष्मण का अंतिम संधि-प्रस्ताव ठुकराने पर लक्ष्मण द्वारा चलाया गया चक्र रावण का वक्षस्थल चीर देता है और रावण मरकर भूमि पर गिर पड़ता है।

खंड 8 पर्व 77 से 88
रावण का परिवार शोक करता है और अनेक दीक्षा लेते हैं, राम-सीता का मिलन होता है और भाई विजयी होकर अयोध्या लौटते हैं। भरत और कैकेयी संसार त्यागते हैं, और राम-लक्ष्मण का राज्याभिषेक होता है।
कथा पढ़ें: विजय और अयोध्या वापसीपर्व 77
विभीषण और रावण की अठारह हजार रानियाँ उसके शरीर पर विलाप करती हैं, जब तक राम और भामंडल राजा अरिदमन की कथा सुनाकर उन्हें सांत्वना नहीं देते।
पर्व 78
राम सम्मान के साथ रावण का दाह संस्कार कर बंदी राजकुमारों को मुक्त करते हैं, और लंका में अनंतवीर्य मुनि को केवलज्ञान होने पर रावण का परिवार संसार त्याग देता है।
पर्व 79
राम-लक्ष्मण वैभव के साथ लंका में प्रवेश करते हैं, और पुष्पप्रकीर्णक पर्वत के उद्यान में राम का सीता से मिलन होता है, जबकि देव उसके शील की प्रशंसा करते हैं।
पर्व 80
राम रावण के महल में शांतिनाथ की पूजा करते हैं, विभीषण विजेताओं का सत्कार करते हैं, दोनों भाई छह वर्ष लंका में सुख से रहते हैं, और मय मुनि की ऋद्धि अनेक पूर्वभवों का रहस्य खोलती है।
पर्व 81
नारद पुत्रों के वियोग में तड़पती कौशल्या को देखकर उनका दुख लंका पहुँचाते हैं, और राम-लक्ष्मण लौटने का निश्चय करते हैं जबकि विद्याधर सोलह दिन में अयोध्या को नया रूप देते हैं।
पर्व 82
पुष्पक विमान से सुमेरु पर्वत और वनवास के स्थानों के ऊपर से उड़ते हुए राम-लक्ष्मण घर लौटते हैं, भरत उनका स्वागत करते हैं, और हर्षित अयोध्या में प्रवेश कर वे चारों माताओं से मिलते हैं।
पर्व 83
राम के राज्य के अपार वैभव के बीच भरत केवल वैराग्य चाहते हैं, और जब उन्मत्त त्रैलोक्यमंडन हाथी उनकी ओर दौड़ता है, तो पूर्वभव का स्मरण कर शांत हो जाता है।
पर्व 84
भरत को देखकर शांत हुआ रावण का प्रबल पट्ट हाथी अयोध्या लाया जाता है, फिर चार दिन तक भोजन, जल और निद्रा छोड़कर निश्चल खड़ा रहता है।
पर्व 85
केवली देशभूषण और कुलभूषण बताते हैं कि भरत और हाथी ऋषभदेव के युग से राजा, भाई, पशु, पिता-पुत्र और देव के रूप में अनेक जन्मों में साथ रहे हैं।
पर्व 86
केवली द्वारा बताए पूर्वभवों से प्रभावित होकर भरत एक हजार से अधिक राजाओं के साथ दिगंबर मुनि बनते हैं, और कैकेयी तीन सौ रानियों के साथ आर्यिका बनती हैं।
पर्व 87
त्रैलोक्यमंडन लंबे उपवासों के साथ श्रावक के व्रत पालकर सल्लेखना से छठे स्वर्ग में लौटता है, जबकि भरत मुनि विहार करते हुए सब परीषह जीतकर मोक्ष पाते हैं।
पर्व 88
भरत के चले जाने के शोक के बाद राम-लक्ष्मण का एक ही सिंहासन पर साथ-साथ अभिषेक होता है, सीता और विशल्या का अभिषेक होता है, और सहयोगियों को उनके राज्य मिलते हैं।

खंड 9 पर्व 89 से 99
शत्रुघ्न मथुरा जीतते हैं और सप्तर्षि वहाँ की विपत्ति दूर करते हैं। राम का राज्य फलता-फूलता है, पर सीता के विषय में लोकापवाद के कारण राम उन्हें वन भिजवा देते हैं, जहाँ राजा वज्रजंघ उन्हें अपना संरक्षण देते हैं।
कथा पढ़ें: राज्य, मथुरा और सीता का परित्यागपर्व 89
शत्रुघ्न मथुरा ही माँगते हैं, जब राजा मधु त्रिशूल के बिना उपवन में क्रीड़ा कर रहा होता है तब रात में नगर ले लेते हैं, और लवणार्णव के मरने पर मधु हाथी की पीठ पर ही भावमुनि बन जाते हैं।
पर्व 90
मित्र मधु की मृत्यु से क्रुद्ध असुरकुमारों के इन्द्र चमरेन्द्र मथुरा में घोर महामारी फैलाते हैं, और शत्रुघ्न अयोध्या लौट आते हैं, पर उनका मन मथुरा में ही लगा रहता है।
पर्व 91
गौतम स्वामी बताते हैं कि शत्रुघ्न का मथुरा-प्रेम उस नगर में बीते अनेक पूर्वभवों से है, विशेषकर राजकुमार अचल के भव से, जिसके पैर का काँटा निकालने वाला मित्र अप आगे सेनापति कृतांतवक्त्र हुआ।
पर्व 92
सात चारण ऋषि मथुरा के वन में चातुर्मास करते हैं और उनके तप से चमरेन्द्र की फैलाई मरी दूर हो जाती है; उनका अनादर करने वाला सेठ पश्चाताप करता है, और उनके उपदेश से शत्रुघ्न नगर को जिनप्रतिमाओं से भर देते हैं।
पर्व 93
मनोरमा के लिए लक्ष्मण का नाम सुझाने पर उसके अभिमानी भाइयों द्वारा निकाले गए नारद लक्ष्मण को उसका चित्रपट दिखाते हैं, और रत्नपुर में शीघ्र युद्ध के बाद राम का श्रीदामा से और लक्ष्मण का मनोरमा से विवाह होता है।
पर्व 94
विजयार्ध की दक्षिण श्रेणी के विद्याधरों को वश में कर लक्ष्मण सात रत्नों सहित नारायण के रूप में राम के साथ राज्य करते हैं, और गौतम स्वामी उनकी रानियों तथा लक्ष्मण के ढाई सौ पुत्रों का वर्णन करते हैं।
पर्व 95
सीता स्वप्न में दो अष्टापदों को मुख में प्रवेश करते देखती हैं और राम जुड़वाँ पुत्रों का फल बताते हैं; जब उन्हें सब चैत्यालयों में जिनपूजा का दोहला होता है, तो राम सारे देश में उत्सव कराते हैं और उन्हें महेन्द्र उद्यान में पूजा के लिए ले जाते हैं।
पर्व 96
सीता की दाहिनी आँख अपशकुन से फड़कती है, और नगर के मुखिया राम से कहते हैं कि सारे राज्य में चर्चा है कि उन्होंने रावण के घर रही रानी को वापस रख लिया, और राम सीता के प्रेम और अपयश के भय के बीच फँस जाते हैं।
पर्व 97
लक्ष्मण की विनतियों को ठुकराकर राम गर्भवती सीता को तीर्थदर्शन के बहाने गंगा पार के वन में अकेली छुड़वा देते हैं, जहाँ वे मूर्च्छित होती हैं, राम के लिए निःस्वार्थ संदेश भेजती हैं और अपने पूर्वकर्मों पर विलाप करती हैं, तभी राजा वज्रजंघ की सेना उनका रुदन सुनती है।
पर्व 98
हाथी पकड़कर लौटते पुंडरीकपुर के राजा वज्रजंघ रोती हुई सीता को पाते हैं, उनकी कथा सुनते हैं, जिनवाणी के उपदेश से ढाढ़स बँधाते हैं और उन्हें अपनी धर्म-बहन बना लेते हैं।
पर्व 99
सीता सम्मानपूर्वक पुंडरीकपुर पहुँचकर वज्रजंघ की बहन के रूप में धर्मपूर्वक रहती हैं, जबकि अयोध्या में कृतांतवक्त्र उनका संदेश सुनाता है और पश्चाताप से भरे राम शोक से मूर्च्छित हो जाते हैं, जब तक लक्ष्मण उन्हें धैर्य नहीं बँधाते।

खंड 10 पर्व 100 से 108
सीता के जुड़वाँ पुत्र दिग्विजयी बनते हैं और पहचान से पहले अपने ही पिता और चाचा से युद्ध करते हैं। सीता अग्नि में प्रवेश करती हैं, जो उनके शील के प्रभाव से कमल-सरोवर बन जाती है, और सबके पूर्वभव प्रकट होते हैं।
कथा पढ़ें: लवण-अंकुश और अग्नि-परीक्षापर्व 100
पुंडरीकपुर में सीता जुड़वाँ पुत्रों अनंगलवण और मदनांकुश को जन्म देती हैं, जिन्हें क्षुल्लक सिद्धार्थ सब कलाएँ और शस्त्र सिखाते हैं और वे अद्वितीय राजकुमार बनते हैं।
पर्व 101
राजा पृथु द्वारा अज्ञात कुल के कहे जाने पर जुड़वाँ भाई उसकी सेना को खदेड़ते हैं, अंकुश के लिए कनकमाला को प्राप्त करते हैं और फिर अनगिनत देशों के राजाओं को वश में करते हैं।
पर्व 102
नारद और माता से यह जानकर कि उनके पिता कौन हैं और सीता को क्यों छोड़ा गया, जुड़वाँ भाई अयोध्या पर चढ़ाई करते हैं और रण में राम-लक्ष्मण से भिड़ते हैं।
पर्व 103
जब लक्ष्मण का चक्र भी अंकुश के पास जाकर निष्प्रभ लौट आता है, तब सिद्धार्थ प्रकट करते हैं कि ये दोनों वीर सीता के पुत्र हैं, और पिता-पुत्रों का आनंदमय मिलन होता है।
पर्व 104
सब देशों के लोगों के सामने लौटी सीता कोई भी शपथ लेने को तैयार होती हैं और राम उन्हें प्रज्वलित अग्निकुंड में प्रवेश का आदेश देते हैं, जबकि उसी रात सकलभूषण मुनि को केवलज्ञान होता है और देव अयोध्या की ओर उतर आते हैं।
पर्व 105
सीता के शील के प्रभाव से धधकता अग्निकुंड कमलों से भरा सरोवर बन जाता है; फिर वे आर्यिका दीक्षा लेती हैं और राम सकलभूषण केवली से धर्मोपदेश सुनते हैं।
पर्व 106
विभीषण के पूछने पर सकलभूषण केवली उन अनेक जन्मों का वृत्तांत सुनाते हैं जिन्होंने राम, लक्ष्मण, सीता, रावण और उनके साथियों को एक-दूसरे से बाँधा, और सीता-हरण, युद्ध तथा अपवाद की जड़ें प्रकट करते हैं।
पर्व 107
केवली का उपदेश सुनकर राम के सेनापति कृतांतवक्त्र मुनिदीक्षा लेते हैं, और आर्यिका सीता को शोकपूर्वक निहारकर राम पुत्रों सहित अयोध्या लौटते हैं।
पर्व 108
गौतम स्वामी श्रेणिक को बताते हैं कि लवण और अंकुश पूर्वभव में काकंदी के राजकुमार प्रियंकर और हितंकर थे, और उस भव की उनकी माता ही आगे उनका गुरु क्षुल्लक सिद्धार्थ बनी।

खंड 11 पर्व 109 से 118
सीता आर्यिका बनकर स्वर्ग जाती हैं, लक्ष्मण के पुत्र और हनुमान संसार त्यागते हैं, और जब दो देव भाइयों के प्रेम की परीक्षा लेते हैं तो लक्ष्मण शोक से प्राण त्याग देते हैं। राम भाई के शरीर को लिए फिरते हैं, जब तक देव उन्हें प्रबोधित नहीं करते।
कथा पढ़ें: महान वैराग्यपर्व 109
बासठ वर्ष के उग्र तप के बाद आर्यिका सीता समाधिमरण कर अच्युत स्वर्ग में प्रतीन्द्र होती हैं, और गौतम स्वामी बताते हैं कि वहाँ का इन्द्र पूर्व में अयोध्या का राजा मधु था।
पर्व 110
स्वयंवर में दो राजकुमारियों के लवण और अंकुश को वरने पर लक्ष्मण के आठ प्रमुख कुमार अपने क्रुद्ध भाइयों को शांत करते हैं, संसार से विरक्त होकर दीक्षा लेते हैं और अंततः निर्वाण पाते हैं।
पर्व 111
कुछ दिन और भोग भोगने के बहाने वैराग्य को टालते रहने वाले भामंडल पर सोते समय बिजली गिरती है और उनकी मृत्यु हो जाती है।
पर्व 112
सुमेरु पर्वत के अकृत्रिम जिनमंदिरों की वंदना से लौटते हुए हनुमान रात के आकाश में एक तारा टूटता देखते हैं और राज्य, रानियों और भोगों को छोड़ जिनेन्द्रों के मार्ग पर चलने का निश्चय करते हैं।
पर्व 113
हनुमान पुत्र को राज्य देकर साढ़े सात सौ राजाओं के साथ आकाशगामी धर्मरत्न मुनि से दीक्षा लेते हैं और उग्र तप करके तुंगीगिरि से निर्वाण पाते हैं।
पर्व 114
स्वर्ग की सभा में सौधर्म इन्द्र जिनभक्ति का उपदेश देते हैं और कहते हैं कि ज्ञानी होकर भी राम संसार नहीं छोड़ पाते, क्योंकि लक्ष्मण के प्रति उनका स्नेह सबसे बड़ा बंधन है।
पर्व 115
दो देव राम की मृत्यु का झूठा समाचार देकर भाइयों के प्रेम की परीक्षा लेते हैं, लक्ष्मण उसी क्षण शोक से प्राण त्याग देते हैं, और लवण-अंकुश संसार छोड़ देते हैं।
पर्व 116
लक्ष्मण की मृत्यु को न मानते हुए राम दिन-रात भाई का शरीर लिए फिरते हैं और उसे जगाने की विनती करते हुए विलाप करते हैं।
पर्व 117
विद्याधर राजा अयोध्या में एकत्र होते हैं, और विभीषण मृत्यु की अनिवार्यता का उपदेश देकर राम से लक्ष्मण का शरीर छोड़ने का आग्रह करते हैं, पर राम उसे नहीं छोड़ पाते।
पर्व 118
कृतांतवक्त्र और जटायु के जीव स्वर्ग से आकर राम के शत्रुओं को भगाते हैं और उन्हें मोह से जगाते हैं, तब राम अंततः लक्ष्मण का दाह संस्कार कर संसार छोड़ने का निश्चय करते हैं।

खंड 12 पर्व 119 से 123
राम सुव्रत मुनि से दीक्षा लेते हैं, उग्र तप करते हैं, स्वर्ग से आए सीता के जीव के उपसर्ग को सहते हैं, केवलज्ञान और अंततः मोक्ष प्राप्त करते हैं, जबकि सीता का जीव लक्ष्मण और रावण को प्रबोधित करने नरक जाता है।
कथा पढ़ें: राम का निर्वाणपर्व 119
राम अपने पौत्र को राज्य देकर सोलह हजार से अधिक राजाओं के साथ सुव्रत मुनि से दीक्षा लेते हैं और राग से अछूते रहकर अकेले मुनि रूप में विहार करते हैं।
पर्व 120
मुनि राम आहार के लिए नंदस्थली आते हैं, पर जब राजा के सामंत उन्हें महल ले जाने के लिए प्रजा को रोक देते हैं, तो वे इसे अंतराय मानकर बिना आहार लिए वन लौट जाते हैं।
पर्व 121
केवल वन में आहार लेने की प्रतिज्ञा निभाते हुए राम को वन के सरोवर के किनारे राजा प्रतिनंदी और रानी प्रभवा आहार देते हैं, और देव पंचाश्चर्य बरसाते हैं।
पर्व 122
कोटिशिला पर ध्यानस्थ राम स्वर्ग से उन्हें मोहित करने आए सीता के जीव की माया से अडिग रहते हैं और केवलज्ञान प्राप्त करते हैं।
पर्व 123
सीता का जीव, जो अब देव है, तीसरे नरक में जाकर लक्ष्मण, रावण और शंबूक को संबोधता है, केवली राम से सबके भविष्य सुनता है, और राम आयु पूर्ण कर सिद्ध होते हैं।