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पर्व 28

सीता का स्वयंवर और राम के साथ विवाह

स्वयंवर में राम देवरक्षित वज्रावर्त धनुष चढ़ाकर सीता को पाते हैं, लक्ष्मण सागरावर्त धनुष चढ़ाते हैं और भरत का विवाह कनक की पुत्री लोकसुंदरी से होता है।

कथा खंड रघुकुल: जन्म और विवाह

सारांश

सीता के महल से भगाए गए नारद रुष्ट होकर भामंडल को सीता का चित्रपट दिखाते हैं, और कामातुर भामंडल के लोग मायामयी अश्व द्वारा जनक को रथनूपुर ले जाते हैं, जहाँ राजा चन्द्रगति सीता को माँगते हैं। जनक जब राम को दिया वचन तोड़ने से मना करते हैं, तो विद्याधर शर्त रखते हैं कि राम देवरक्षित वज्रावर्त धनुष चढ़ाएँ, अन्यथा सीता को बलपूर्वक ले जाया जाएगा। मिथिला के स्वयंवर में सब राजकुमार डरकर पीछे हट जाते हैं, पर राम वज्रावर्त चढ़ाकर सीता को पाते हैं, लक्ष्मण सागरावर्त चढ़ाकर अठारह विद्याधर कन्याएँ पाते हैं, और कैकेयी की सलाह से भरत का विवाह कनक की पुत्री लोकसुंदरी से होता है।

क्या हुआ

15 बिंदु

  1. राम के पराक्रम की कथा किए बिना एक क्षण भी न रहने वाले नारद ने सुना कि जनक ने जानकी राम को देने का विचार किया है, तो सीता को देखने की इच्छा से वे उसके महल में आए; दर्पण में मुख देखती सीता ने पीछे से नारद की जटा देखी तो डरकर ‘हे माता! यह कौन है?’ कहती हुई महल के भीतर चली गई। नारद भी पीछे जाने लगे तो द्वारपालों ने रोका और झगड़ा हुआ; कोलाहल सुनकर खड्ग और धनुषधारी सामंत ‘पकड़ो, पकड़ो’ कहते दौड़े, तब नारद डरकर आकाश मार्ग से कैलाश पर्वत पर जा पहुँचे।

  2. काँपते और पसीना पोंछते नारद ने क्रोध से सोचा कि मैं तो सरल भाव से राम के अनुराग के कारण सीता को देखने गया था, पर मृत्यु जैसी दशा से बड़ी कठिनाई से बचा; अब वह पापिनी जहाँ जाएगी, वहीं उसे कष्ट में डालूँगा। ऐसा विचारकर वे शीघ्र विजयार्ध की दक्षिण श्रेणी के रथनूपुर नगर गए, सीता का साक्षात जैसा चित्रपट बनाया और उपवन में अनेक राजकुमारों के साथ क्रीड़ा करने आए चन्द्रगति विद्याधर के पुत्र भामंडल के पास डालकर छिप गए।

  3. यह न जानते हुए कि यह उसकी अपनी बहन का चित्र है, भामंडल मोहित हो गया; लज्जा, शास्त्र और ज्ञान सब भूल गया, लंबी साँसें लेने लगा, होंठ सूख गए, शरीर शिथिल हो गया, रात-दिन नींद न आई, सुगंध, पुष्प और सुंदर आहार विष जैसे लगने लगे, और वह भूत लगे व्यक्ति की तरह कभी मौन रहता, कभी हँसता, कभी व्यर्थ बातें करता। बुद्धिमानों ने समझ लिया कि किसी ने किसी कन्या का चित्रपट बनाकर इसके पास डाला है, और कदाचित यह काम नारद का ही हो।

  4. फिर राजा जनक ने सेवक से तेज घोड़ा लाने को कहा, तो सेवक मायामयी अश्व ले आए; राजा के चढ़ते ही वह उन्हें आकाश में ले उड़ा और सारा परिवार और पुरजन रोते हुए नगर लौट आए; मन के वेग से अनेक नदी, पर्वत और देश लाँघकर वह जनक को रथनूपुर ले गया, जहाँ नगर के पास एक वृक्ष की डाली पकड़कर जनक लटक गए और अश्व नगर में चला गया। दाहिने हाथ में खड्ग लिए सिंह के समान निर्भय जनक सोने के कोट और रत्नमयी तोरणों वाले द्वार से होकर एक सुंदर उपवन में पहुँचे, जहाँ मोतियों की झालरों और स्वर्णमय हजारों मानस्तंभों से शोभित जिनमंदिर में स्वर्ण वर्ण, पद्मासन, अष्ट प्रातिहार्यों से युक्त जिनराज के दर्शन कर वे भक्ति से मूर्च्छित हो गए और फिर सचेत होकर स्तुति करने लगे।

  5. अश्व का रूप धरने वाले चपलवेग विद्याधर ने अपना रूप प्रकट कर राजा चन्द्रगति को नमस्कार किया और बताया कि मैं राजा जनक को ले आया हूँ, वे मनोज्ञ वन के चैत्यालय में बैठे हैं; परम हर्षित चन्द्रगति थोड़े-से लोगों और पूजा सामग्री के साथ आए, उनके विद्याधर मायामयी सिंहों, हाथियों, घोड़ों और हंसों पर सवार थे, और यह सेना देखकर व बाजों की ध्वनि सुनकर कुछ भयभीत जनक भगवान के सिंहासन के नीचे बैठ गए। चन्द्रगति ने विधिपूर्वक पूजा कर वीणा बजाते हुए जिनेन्द्र के गुण गाए और सबसे ऋषभदेव भगवान को मन-वचन-काय से नमस्कार करने का आग्रह किया; तब जनक बाहर निकले, दोनों राजा प्रेम से मिले और एक आसन पर बैठे, और चन्द्रगति ने कहा कि आपकी पुत्री सीता के शुभ लक्षणों के बारे में मैंने बहुत सुना है, उसका विवाह मेरे पुत्र भामंडल से कीजिए।

  6. जनक ने कहा कि मैंने अपनी पुत्री राजा दशरथ के बड़े पुत्र श्रीराम को देने का निश्चय कर लिया है, और बताया कि जब देवों से भी दुर्जय अर्धबर्बर देश के म्लेच्छ मेरे देश को पीड़ा देने लगे, तब राम ने आकर इन्द्र जैसे पराक्रमी छोटे भाई लक्ष्मण सहित मेरी और मेरे भाई की सहायता की; इस उपकार का बदला न चुका पाने की चिंता में मुझे नींद नहीं आती थी, और पुत्री को राम को देने का निश्चय करके ही मैं चिंता के समुद्र से निकला। यह सुनकर चन्द्रगति के विद्याधर बोले कि तुम्हारी बुद्धि ठीक नहीं, भूमिगोचरी विद्या रहित, सदा दुखी और पशुओं के समान हैं, रंक म्लेच्छों को जीतने में क्या बड़ाई है, इसलिए तुम विद्याधरों के इन्द्र राजा चन्द्रगति से संबंध करो।

  7. जनक ने उत्तर दिया कि क्षीरसागर बहुत बड़ा है पर प्यास नहीं बुझाता, जबकि मीठे जल की छोटी बावड़ी प्यास बुझाती है, छोटा दीपक भी अंधकार में वस्तुएँ दिखाता है, और जो पराक्रम अनेक मदोन्मत्त हाथी नहीं कर सकते, वह अकेला सिंह-शावक कर देता है; तीर्थंकर, चक्रवर्ती, बलभद्र और नारायण भूमिगोचरियों में ही जन्म लेते हैं, पंचकल्याणक भी उन्हीं के होते हैं, और आकाश में तो कौवे भी उड़ते हैं। उन्होंने बताया कि ऋषभदेव के इक्ष्वाकु वंश में षट्खंड पृथ्वी के अनेक राजा हुए, उसी वंश में पराक्रमी राजा अनरण्य हुए, जिनकी रानी सुमंगला के पुत्र दशरथ हैं, जिनकी चार पटरानियाँ और पाँच सौ अन्य रानियाँ हैं, और जिनके बड़े पुत्र पद्म नाम से भी प्रसिद्ध राम तथा छोटे पुत्र लक्ष्मण हैं।

  8. विद्याधरों ने एकांत में विचार कर कहा कि हमें राम-लक्ष्मण के बल पर विश्वास नहीं; हमारे पास वज्रावर्त और सागरावर्त नामक दो धनुष हैं जिनकी देव सेवा करते हैं, यदि राम वज्रावर्त धनुष चढ़ा दें तो तुम्हारी पुत्री से विवाह करें, नहीं तो हम कन्या को बलपूर्वक यहाँ ले आएँगे और तुम देखते रह जाओगे; विवश जनक ने यह बात स्वीकार कर ली। फिर भगवान की पूजा-स्तुति कर विद्याधर गदा, हल आदि रत्नों सहित धनुष लेकर जनक के साथ मिथिलापुरी आए और नगर के बाहर आयुधशाला बनाकर बड़े गर्व से ठहरे, तथा राजा चन्द्रगति रथनूपुर लौट गए।

  9. थोड़ा-सा भोजन कर उत्साहहीन जनक सेज पर लेटे लंबी साँसें लेते रहे; रानी विदेहा ने पूछा कि आपने किस स्वर्ग की देवांगना को देखा है जिसके अनुराग में ऐसी दशा हुई, तब राजा ने सारा वृत्तांत सुनाकर कहा कि उन धनुषों की ज्वालाएँ दसों दिशाओं में फैलती हैं, मायामयी सर्प फुफकारते हैं, वे बिना चढ़ाए ही भयानक शब्द करते हैं, इन्द्र भी उन्हें नहीं चढ़ा सकता, और धनुष चढ़ाने में केवल बीस दिन शेष हैं। यह सुनकर विदेहा को पुत्र-हरण का भूला दुख भी याद आ गया और वह विलाप करने लगी कि पहले पुत्र हरा गया और अब पुत्री हरी जाएगी; तब जनक ने समझाया कि पूर्व कर्मों के उदय के अनुसार ही फल मिलता है, अब शुभ कर्म का उदय है, सब मंगल होगा।

  10. जनक ने नगर के बाहर धनुषशाला के पास स्वयंवर मंडप रचाकर सब राजकुमारों को पत्र भेजे; अयोध्या में भी दूत भेजे गए और राम आदि चारों भाई माता-पिता सहित आए, और परम सुंदरी सीता बड़े-बड़े सामंतों की रक्षा में सात सौ कन्याओं के बीच महल के ऊपर ठहरी। सोने की छड़ी लिए एक बहुश्रुत, महापंडित खोजा ऊँचे स्वर से सीता को प्रत्येक राजकुमार दिखाता गया: ये दशरथ के पुत्र कमललोचन श्रीराम, ये उनके छोटे भाई लक्ष्मण, ये महाबाहु भरत और ये सबसे छोटे शत्रुघ्न; फिर हरिवाहन, चित्ररथ, हरमुख, श्रीसंजय, भानु, जय, सुप्रभ, मंदिर, बुध, विशाल, श्रीधर, वीर, बंधु, भद्रबल, मयूरकुमार आदि राजकुमार, और संकाशपुर, सुरपुर, रुद्रपुर, नंदनपुर, कुंदपुर, मगध देश और कांपिल्य नगर के राजा, जो इक्ष्वाकु, नाग, उग्र, सोम और हरि आदि वंशों के थे; और कहा कि इनमें से जो वज्रावर्त धनुष चढ़ाए, उसके गले में वरमाला डालना।

  11. जनक ने सब राजकुमारों को क्रम-क्रम से धनुष की ओर भेजा, जिसके चारों ओर बिजली जैसी ज्वालाएँ निकलती थीं और मायामयी सर्प भयंकर फुफकार करते थे; कोई कानों पर हाथ रखकर भागा, कोई दूर खड़ा काँपता रहा और उसकी आँखें बंद हो गईं, कोई ज्वर से व्याकुल होकर गिर पड़ा, कोई मूर्च्छित हुआ, कोई नागों की साँस से सूखे पत्ते की तरह उड़ता फिरा, किसी ने कहा कि जीवित घर पहुँचे तो महादान करेंगे और सब जीवों को अभयदान देंगे, किसी ने कहा कि रूपवती कन्या के लिए प्राण तो नहीं देंगे, कोई इसे किसी मायावी विद्याधर की करतूत बताने लगा, और कुछ भाग्यशालियों ने रानियों से ही प्रयोजन छोड़कर शीलव्रत धारण कर लिया।

  12. तब श्रीराम मदमस्त हाथी जैसी मनोहर चाल से धनुष के निकट आए; उनके प्रभाव से धनुष ज्वालारहित होकर देवोपनीत रत्न की तरह सौम्य हो गया, जैसे गुरु के निकट शिष्य शांत हो जाता है; राम ने उसे हाथ में लेकर चढ़ाया और खींचा, तो मेघ-गर्जन जैसा प्रचंड शब्द हुआ, पृथ्वी काँप उठी, मोर नाचने लगे, आकाश में देवों ने ‘धन्य-धन्य’ कहकर पुष्पवर्षा की, और लोगों को भयभीत देख दयालु राम ने प्रत्यंचा उतार दी। सीता ने देखते ही मन रूपी माला तो पहले ही राम के गले में डाल दी थी, अब लोकाचार के लिए रत्नमाला पहनाई और लज्जा से मुख झुकाए राम के निकट ऐसे खड़ी हुई जैसे जैनधर्म के निकट जीवदया।

  13. फिर लक्ष्मण ने समुद्र-गर्जन जैसे शब्द वाला दूसरा धनुष सागरावर्त चढ़ाकर खींचा; पृथ्वी काँपी, देवों ने जय-जयकार कर पुष्पवर्षा की, और बाण पर दृष्टि डालते ही लोगों को डरा देख उन्होंने प्रत्यंचा उतार दी और महाविनय से राम के पास आ गए। लक्ष्मण का पराक्रम देखकर चन्द्रगति के भेजे हुए चन्द्रवर्धन विद्याधर ने अति प्रसन्न होकर विद्याधरों की अठारह राजकन्याओं का विवाह लक्ष्मण से करा दिया; दोनों भाई धनुष लेकर पिता के पास आए, सीता भी आई, और सब विद्याधर चन्द्रवर्धन के साथ रथनूपुर लौट गए और राजा चन्द्रगति को सारा वृत्तांत सुनाया, जिसे सुनकर वे चिंतित हुए।

  14. स्वयंवर में आए भरत ने सोचा कि मेरा और राम-लक्ष्मण का कुल एक है, पिता एक है, फिर भी उनके जैसा अद्भुत पराक्रम और पुण्य मेरा नहीं, और साक्षात लक्ष्मी जैसी यह सीता राम जैसे पुण्याधिकारी की ही रानी होने योग्य है; सब कलाओं में प्रवीण भरत की माता कैकेयी ने उनका मन जानकर पति के कान में कहा कि भरत उदास दिखते हैं, ऐसा कुछ कीजिए कि वे विरक्त न हो जाएँ, जनक के भाई कनक और उनकी रानी सुप्रभा की पुत्री लोकसुंदरी के लिए फिर स्वयंवर रचाइए ताकि वह भरत के गले में वरमाला डाले। दशरथ के कहने पर कनक ने राजाओं को फिर बुलाया, और कनक जैसी प्रभा वाली लोकसुंदरी ने, जिसने देखते ही मन से भरत को वर लिया था, रत्नपुष्पों की माला भरत के गले में डाली, जैसे सुभद्रा ने भरत चक्रवर्ती को माला पहनाई थी, और बाकी राजा उदास होकर अपने-अपने स्थान लौट गए।

  15. गौतम स्वामी ने कहा, हे श्रेणिक, कर्मों की विचित्र गति देखो कि भरत जैसे विरक्त मन वाले भी राजकन्या पर मोहित हुए। ध्वजा-तोरणों से सजी, सुगंध और शंख-बाजों के नाद से भरी मिथिलापुरी में राम-सीता और भरत-लोकसुंदरी के विवाह का महोत्सव हुआ और गरीबों को धन बाँटा गया; दशरथ और जनक-कनक दोनों भाइयों से सम्मान पाकर राजा अपने-अपने स्थान गए, और दशरथ के चारों पुत्र सीता और लोकसुंदरी के साथ बड़े उत्सव से अयोध्या आए, जहाँ जितनी उनकी स्तुति होती, वे उतने ही विनम्र होते, और वे आनंद से अपने-अपने महलों में रहने लगे।