पर्व 27
राम-लक्ष्मण द्वारा म्लेच्छ राजा की पराजय
म्लेच्छ राजा आतरंगतम जब जनक के देश को उजाड़ने लगता है, तब किशोर राम-लक्ष्मण उसकी सेना को खदेड़ देते हैं और जनक सीता को राम को देने का निश्चय करते हैं।
कथा खंड रघुकुल: जन्म और विवाहसारांश
राजा श्रेणिक के पूछने पर कि जनक ने सीता के लिए राम को क्यों चुना, गौतम स्वामी बताते हैं कि अर्धबर्बर देश के मयूरमाल नगर के म्लेच्छ राजा आतरंगतम ने अनेक देश उजाड़कर जनक के राज्य पर आक्रमण किया। दशरथ स्वयं जाने को तैयार हुए, पर किशोर राम ने उन्हें मनाकर स्वयं जाने की आज्ञा ली और लक्ष्मण सहित जनक और उनके भाई कनक की रक्षा कर म्लेच्छ सेना को क्षण भर में खदेड़ दिया। राम का यह माहात्म्य देखकर जनक ने अपनी पुत्री सीता उन्हें देने का निश्चय किया।
क्या हुआ
6 बिंदु
राजा श्रेणिक ने पूछा कि जनक ने राम का ऐसा क्या माहात्म्य देखा जो सीता उन्हें देने का विचार किया, तब गौतम गणधर ने बताया कि विजयार्ध (वैताढ्य) पर्वत के दक्षिण और कैलाश पर्वत के उत्तर में बसे अनेक अंतर-देशों में असंयमी, निर्दयी म्लेच्छों से भरा अर्धबर्बर देश है, जिसके काल-नगरी जैसे भयानक मयूरमाल नगर में आतरंगतम नामक म्लेच्छ राज्य करता था। वह दुष्टों का नायक सब म्लेच्छों की बड़ी सेना लेकर अनेक देश उजाड़ता हुआ टिड्डी दल की तरह राजा जनक के देश पर टूट पड़ा।
जनक ने शीघ्र दूत भेजकर दशरथ को लिखा कि भीलों का परचक्र आया है, जो अनेक आर्य देशों को विध्वस्त कर गाय आदि जीवों का भक्षण करता है और प्रजा को एक वर्ण करना चाहता है; हम युद्ध करें, गढ़ में शरण लें, या कालिंदीभागा नदी, विपुलाचल या कुंजगिरि की ओर जाएँ? यह राज्य और पृथ्वी आपकी ही है; प्रजा की रक्षा से ही साधुओं और श्रावकों का पूजा, व्रत, दान, शील और सामायिक रूप धर्म बचता है और रक्षक राजा को प्रजा के पुण्य का छठा भाग मिलता है, इसलिए आप जो आज्ञा देंगे वही हम करेंगे।
दशरथ ने स्वयं जाने की तैयारी की और राम को राज्य देने का विचार किया; राज्याभिषेक की तैयारी देखकर राम ने कारण पूछा और कहा कि ऐसे रंकों पर आप इतना परिश्रम क्यों करें, चूहों के उपद्रव पर हाथी क्रोध नहीं करता और रुई जलाने में अग्नि को श्रम नहीं लगता, इसलिए युद्ध के लिए हमें आज्ञा दें। दशरथ ने उन्हें हृदय से लगाकर कहा कि तुम बालक हो, कोमल शरीर से उन दुष्टों को कैसे जीतोगे, तब राम ने उत्तर दिया कि तुरंत जली अग्नि की लौ भी भयंकर वन को भस्म कर देती है और उगता बाल सूर्य घोर अंधकार मिटा देता है; यह सुनकर राजा रोमांचित भी हुए और उनकी आँखें भी भर आईं, और उन्होंने सोचा कि प्रजा की रक्षा के लिए प्राण देने को उद्यत रहना क्षत्रियों की रीति है और आयु पूरी हुए बिना मरण नहीं होता।
पिता के चरणों में नमस्कार कर राम-लक्ष्मण चतुरंग सेना सहित रथों में बैठकर जनक की सहायता को चले; उनके पहुँचने से पहले ही जनक और उनके भाई कनक शत्रु सेना को दो योजन दूर जानकर युद्ध को निकल पड़े, कनक म्लेच्छों से दब गए, और भाई की सहायता को आए जनक को भी बर्बर देश के म्लेच्छ बाणों से दबाते रहे, यहाँ तक कि उनका कवच टूट गया। उसी समय कवच पहने, धनुष चढ़ाए, सिंह-चिह्न की ध्वजा और उज्ज्वल छत्र वाले राम आ पहुँचे, जिन्हें देखकर शत्रु सेना ऐसे काँप उठी जैसे पूर्णिमा के चन्द्रमा को देखकर अंधकार भागता है; उन्होंने जनक को धीरज बँधाया और मदमस्त हाथी जैसे केलों के वन को रौंदता है, वैसे शत्रु सेना का नाश कर जनक और कनक दोनों भाइयों की रक्षा की।
लक्ष्मण ने मेघ की तरह बाणों की वर्षा की; तीक्ष्ण चक्र, शक्ति, कुठार और करोत से अनेक म्लेच्छ मारे गए, जो लाल वस्त्र और काले-नीले कवच पहने, कौड़ी जैसे दाँत वाले थे और जिनकी ध्वजाओं पर सूअर, भैंसे और बाघ के चिह्न थे, और हजारों मस्तक कटकर गिरे। तब उनका स्वामी आतरंगतम सेना को धीरज बँधाकर स्वयं लक्ष्मण के सामने आया और भयंकर युद्ध कर उन्हें रथरहित कर दिया; राम पवन वेग से रथ दौड़ाकर आए, लक्ष्मण को दूसरे रथ पर चढ़ाया और बाण, तोमर तथा चक्र से शत्रु की अपार सेना को ऐसे भस्म किया जैसे अग्नि वन को।
निमिष मात्र में म्लेच्छों की सेना छत्र, चँवर, ध्वजा और धनुष छोड़कर दसों दिशाओं में भाग गई; अपार सेना लेकर आया आतरंगतम केवल दस घुड़सवारों के साथ भागा और बाकी म्लेच्छ सह्याचल और विंध्याचल के वनों में छिप गए, जहाँ राम ने यह कहकर उन्हें मारने से रोका कि युद्ध से भागते कायरों को मारने से क्या लाभ, और राम के भय से उन्होंने पशुहिंसा छोड़कर वन के फलों का आहार अपनाया। जनक को प्रसन्न कर दोनों भाई अयोध्या लौटे, और राम का माहात्म्य देखकर जनक ने अपनी पुत्री सीता उन्हें देने का निश्चय किया, क्योंकि शलाका पुरुष राम ने पूर्वभव में ऐसा महापुण्य कमाया था कि शत्रु बिना पुरुषार्थ के ही वश हो जाते थे।