पर्व 26
राजा जनक के भामंडल और सीता की उत्पत्ति
पूर्वभव के बैर से एक देव रानी विदेहा के नवजात पुत्र, सीता के जुड़वाँ भाई, को हर ले जाता है और रथनूपुर में विद्याधर चन्द्रगति उसे भामंडल नाम से पालता है।
कथा खंड रघुकुल: जन्म और विवाहसारांश
गौतम स्वामी राजा श्रेणिक को जनक के जुड़वाँ बच्चों के जन्म के पीछे की कर्म-कथा सुनाते हैं। पूर्वभव में ब्राह्मण पिंगल राजकुमारी चित्तोत्सवा को भगा ले गया, पर विदग्धपुर के राजा कुंडलमंडित ने उसे छीन लिया; पिंगल मुनि होकर देव बना, जबकि अनरण्य के सेनापति से पराजित कुंडलमंडित थोड़े व्रत लेकर, मरकर रानी विदेहा के गर्भ में आया, और उसी गर्भ में सीता बनने वाला जीव भी आया। देव नवजात पुत्र को हर ले जाता है पर दया कर छोड़ देता है, रथनूपुर में विद्याधर चन्द्रगति उसे प्रभामंडल नाम से पालता है, और मिथिला में बढ़ती सीता के रूप-गुण देखकर जनक उसे राम के ही योग्य मानते हैं।
क्या हुआ
13 बिंदु
गौतम स्वामी ने राजा श्रेणिक से कहा कि जब राजा जनक की रानी विदेहा गर्भवती हुई, तब एक देव के मन में अभिलाषा हुई कि बालक होते ही उसे हर ले जाऊँ, और श्रेणिक ने इसका कारण पूछा। कारण पूर्वभव में था: चक्रपुर नगर में राजा चक्रध्वज और रानी मनस्विनी की पुत्री चित्तोत्सवा जिस पाठशाला में पढ़ती थी, उसी में राजपुरोहित धूम्रकेश और उसकी पत्नी स्वाहा का पुत्र पिंगल भी पढ़ता था; दोनों का मन आपस में लग गया, इसलिए किसी को विद्या प्राप्त नहीं हुई।
पिंगल चित्तोत्सवा को हरकर दूर विदग्धपुर ले गया, जहाँ वह नगर के बाहर बिना किवाड़ की कुटिया बनाकर रहा और लकड़ी-घास बेचकर बड़ी कठिनाई से दोनों का पेट भरता रहा। वहाँ के राजा कुंडलमंडित, जो राजा प्रकाशसिंह और रानी प्रवरावली का पुत्र था, चित्तोत्सवा को देखकर कामदेव के पाँचों बाणों से घायल हो गया और रात में दूती भेजकर उसे राजमहल में बुलवा लिया तथा उसके साथ भोग भोगने लगा।
लकड़ियों का बोझ लेकर लौटे पिंगल ने चित्तोत्सवा को न पाकर विलाप किया और राजा से फरियाद की; कपटी राजा ने मंत्री को बुलाकर झूठमूठ खोज का आदेश दिया, और एक सेवक ने आँख के इशारे के साथ झूठ कहा कि मैंने उसे पोदनपुर के मार्ग में किसी के साथ जाते देखा है, वह आर्यिकाओं के पास तप करने को तैयार है। पिंगल ने पोदनपुर के चैत्यालयों और उपवनों में सब जगह खोजा पर वह न मिली, और विदग्धपुर लौटने पर राजा की आज्ञा से क्रूर लोगों ने उसे गालियाँ देते हुए लाठी, डंडों और पत्थरों से मारकर भगा दिया।
दुखी होकर भटकते हुए उसने एक नगर के बाहर वन में आर्यगुप्ति महाचार्य के दर्शन किए, धर्मोपदेश सुनकर वैराग्य पाया, जिनशासन की शरण ली और परिग्रह छोड़कर दिगंबर दीक्षा धारण की। नदी, पर्वत, श्मशान और वनों में रहते हुए उसने वर्षा, शीत पवन और ग्रीष्म की तपती किरणों को बिना व्याकुल हुए सहा; जिनवचन रूपी जल से वियोग की अग्नि शांत हुई और तप से उसका शरीर अधजले वृक्ष जैसा हो गया।
उधर कुंडलमंडित अपने गढ़ के बल पर दशरथ के पिता, अयोध्या के राजा अनरण्य के देश को सताता रहा, उसने कई देश उजाड़े और अनेक सामंतों को मारा, जिससे अनरण्य रात-दिन चिंता में रहने लगे। तब सेनापति बालचन्द्र चतुरंग सेना लेकर गया और चित्तोत्सवा में आसक्त, राजकाज भूले कुंडलमंडित को खेल-खेल में हिरण की तरह बाँधकर अनरण्य के पास ले आया, उसके राज्य पर अनरण्य का अधिकार स्थापित किया और राजा से बहुत पुरस्कार पाया।
हाथी, घोड़े, रथ, पैदल सब नष्ट होने पर केवल शरीर लेकर पैदल भटकते, पश्चाताप करते कुंडलमंडित ने मुनियों के आश्रय में जाकर आचार्य से पूछा कि आहार, भय, मैथुन और परिग्रह इन चार संज्ञाओं में लीन, मुनि बनने में असमर्थ गृहस्थ धर्म का साधन कैसे करे। गुरु ने कहा कि धर्म दयामय है, गुरु के पास आलोचना करने से जीव पापों से छूटते हैं, और मांस का त्याग करो, क्योंकि जगत के सब जीव पूर्वजन्मों में किसी न किसी रूप में अपने बंधु रहे हैं, इसलिए मांसभक्षी अपने ही परिवार का भक्षण करता है, और उसका नित्य स्नान, मुंडन, दान, पूजा और उपवास भी उसे नरक से नहीं बचा सकते।
उन्होंने बताया कि कषायसहित पंचाग्नि तप करने वाले मिथ्यादृष्टि तापस नीच भवनवासी और व्यंतर देवों में जन्म लेते हैं, जिनके निवास रत्नप्रभा पृथ्वी के खर भाग और पंक भाग में हैं; उसके अब्बहुल भाग में पहला नरक है, उसके नीचे छह नरक और हैं, ये सातों नरक छह राजू में हैं, और सातवें नरक के नीचे एक राजू में केवल निगोद जीव हैं, जिनसे तीनों लोक भरे हैं। नरक में नारकियों को पल भर भी विश्राम नहीं: उन्हें दुर्गंधित खारे जल वाली वैतरणी नदी में डाला जाता है, शाल्मली वृक्षों के तलवार जैसे पत्ते उन्हें काटते हैं, असुरकुमार देव भी उन्हें दुख दिलाते हैं और सँडासी से मुँह फाड़कर पिघला ताँबा पिलाया जाता है, इसलिए मद्य, मांस और मधु का सेवन नहीं करना चाहिए।
कुंडलमंडित के पूछने पर मुनि ने कहा कि दृढ़ता से श्रावक के व्रत पालने वाले सम्यग्दृष्टि स्वर्ग और मोक्ष के पात्र होते हैं, मद्य-मांस-मधु के त्यागी भी कुगति से बचते हैं, अहिंसा व्रत से म्लेच्छ और चांडाल भी दयावान होकर देव और मनुष्य पर्याय पाते हैं, और अणुव्रतधारी सम्यग्दृष्टि देवों में महा इन्द्र होकर फिर मनुष्य बन, मुनि होकर मोक्ष पाता है। अणुव्रत धारण करने में असमर्थ होते हुए भी कुंडलमंडित ने गुरु को नमस्कार कर मद्य, मांस और मधु का त्याग किया और सम्यग्दर्शन प्राप्त किया, फिर इस आशा से दक्षिण दिशा की ओर चला कि मेरा पराक्रमी मामा मेरी सहायता करेगा और मैं फिर राजा बनकर शत्रुओं को जीतूँगा।
मार्ग में रोग की तीव्र वेदना से वह सम्यक्त्व से रहित हो गया और मिथ्यात्व सहित मरकर राजा जनक की रानी विदेहा के गर्भ में आया; उसी समय वेदवती का जीव, जो कभी चित्तोत्सवा थी, वह भी मरकर विदेहा के गर्भ में आई और तप के प्रभाव से सीता हुई। मुनिव्रत पालकर भवनवासी देव बने पिंगल ने अवधिज्ञान से यह सब जाना; पराधीन स्त्री चित्तोत्सवा को निर्दोष किंतु कुंडलमंडित को परम शत्रु मानकर उसने सोचा कि गर्भ में मारूँ तो निर्दोष रानी मर जाएगी, इसलिए जन्म होने पर उसे दुख दूँगा।
समय आने पर रानी विदेहा ने पुत्र और पुत्री के युगल को जन्म दिया; देव पुत्र को हर ले गया और पहले क्रोध में सोचा कि इसे शिला पर पटककर मार दूँ, फिर स्वयं को धिक्कारा कि बालहत्या के समान कोई पाप नहीं, और पूर्वभव में मुनि होकर किसी जीव की विराधना न करने से ही मैंने यह विभूति पाई है। दया से भरकर उसने बालक को आभूषण और कानों में दैदीप्यमान कुंडल पहनाए और पर्णलघ्वी विद्या के बल से आकाश से पृथ्वी पर सुख के स्थान में धीरे से छोड़ दिया तथा अपने स्थान को चला गया।
रात्रि में चन्द्रगति विद्याधर ने आभूषणों की ज्योति से प्रकाशमान बालक को आकाश से गिरते देखा, पहले उसे तारा टूटना या बिजली समझा, फिर हर्ष से उठाकर सेज पर सोई अपनी रानी पुष्पवती की जाँघों के बीच रख दिया और कहा, ‘उठो रानी, तुम्हारे पुत्र हुआ है’; बाँझ रानी ने पूछा कि आप हँसी क्यों करते हैं और पृथ्वी पर न मिलने वाले ऐसे कुंडल कहाँ से आए, तो राजा ने सच बताकर कहा कि यह किसी बड़े कुल का है, अपने गर्भ का पुत्र भी कभी शत्रु हो जाता है, इसलिए प्रसूतिगृह में जाकर कहो कि रानी के गुप्त गर्भ था। प्रातःकाल रथनूपुर में ऐसा जन्मोत्सव हुआ कि सारा नगर चकित रह गया; रत्नों के कुंडलों की किरणों से मंडित होने के कारण माता-पिता ने उसका नाम प्रभामंडल (भामंडल) रखा और उसे धाय को सौंपा, और वह अंतःपुर की सब स्त्रियों का दुलारा बन गया।
मिथिलापुरी में पुत्र के हरे जाने पर रानी विदेहा ऊँचे स्वर से विलाप करने लगी और सोचा कि मैंने पूर्वभव में किसी के बालक का वियोग कराया होगा; राजा जनक ने धीरज बँधाया कि तेरा पुत्र जीवित है, किसी ने हरा है, और अपने परम मित्र राजा दशरथ को पत्र लिखा; दोनों राजाओं ने पृथ्वी पर बालक को बहुत ढूँढा पर कहीं न पाकर बड़े कष्ट से शोक को दबाया।
प्रभामंडल के शोक को भुलाती, बालक्रीड़ा से सारे परिवार को आनंदित करती जानकी रानियों की गोद में बढ़ने लगी; पृथ्वी के समान क्षमा धारण करने के कारण वह जगत में सीता कहलाई; कमल जैसे नेत्र, मधुर वाणी, चन्द्रमा को जीतने वाला मुख और इन्द्रनील मणि जैसे श्याम केशों वाली वह सात सौ कन्याओं के बीच क्रीड़ा करती थी, और इन्द्राणी शची या चक्रवर्ती की पटरानी सुभद्रा भी उसकी शोभा के अंश मात्र की बराबरी न कर पातीं। उसके रूप, गुण और विनय को देखकर राजा जनक ने विचार किया कि जैसे रति कामदेव के ही योग्य है, वैसे यह कन्या राजा दशरथ के बड़े पुत्र राम के ही योग्य है।