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पर्व 29

राजा दशरथ का धर्म-श्रवण

वृद्ध खोजे के मुख से बुढ़ापे का वर्णन सुनकर राजा दशरथ का मन वैराग्य की ओर मुड़ता है और वे सर्वभूतहित मुनि से धर्म-श्रवण करते हैं।

कथा खंड रघुकुल: जन्म और विवाह

सारांश

अष्टाह्निका पर्व में राजा दशरथ द्वारा रानियों को भेजा गंधोदक वृद्ध खोजे के कारण रानी सुप्रभा तक देर से पहुँचता है, और अपमानित रानी विष मँगा लेती है, तब राजा उसे मनाते हैं। वृद्ध खोजे के मुख से बुढ़ापे की दशा सुनकर दशरथ शरीर और भोगों की नश्वरता पर विचार करते हैं और वंश की परंपरा के अनुसार समय आने पर वैराग्य लेने का निश्चय करते हैं। फिर सर्वभूतहित मुनि वर्षायोग के लिए अयोध्या के पास आते हैं और राजा उनसे जिनधर्म का विस्तृत उपदेश सुनते हैं।

क्या हुआ

7 बिंदु

  1. आषाढ़ शुक्ल अष्टमी से अष्टाह्निका पर्व में अयोध्या में महान उत्सव हुआ; राजा दशरथ की सब रानियाँ, पुत्र, बंधु-परिवार और नगर के लोग जिनपूजा के लिए पंचवर्ण रत्नों के चूर्ण से मंडल बनाने, रत्नों की मालाएँ गूँथने, इलायची-कपूर आदि से जल सुगंधित करने, सुगंधित जल से भूमि शुद्ध करने, जिनमंदिरों के द्वार दैदीप्यमान वस्त्रों से और दीवारें अनेक धातुओं के रंगों से सजाने में लगे। राजा दशरथ ने महाविभूति से भगवान का अभिषेक कराया, आठ दिन के उपवास किए और अष्टद्रव्य, सहज पुष्पों तथा स्वर्ण-रत्नों के पुष्पों से अरहंत देव की महापूजा की, जैसे नंदीश्वर द्वीप में देवों सहित इन्द्र जिनेन्द्र की पूजा करता है।

  2. राजा ने चारों पटरानियों के पास गंधोदक भेजा; तीन रानियों के पास तो तरुण दासियाँ शीघ्र पहुँच गईं और उन्होंने पापों को दूर करने वाला जिनगंधोदक मस्तक और नेत्रों पर लगाया, पर रानी सुप्रभा के पास वृद्ध खोजा ले जा रहा था, इसलिए वह देर से पहुँचा। अपमान से जलती सुप्रभा ने सोचा कि राजा का क्या दोष, मैंने पूर्व में पुण्य नहीं किया, अब मरण ही शरण है; उसने विशाख नाम के भंडारी से चुपके से विष मँगाया, जो पहले शंकित हुआ पर किसी औषधि के लिए मँगाया होगा सोचकर लेने चला गया, और रानी उदास मन से वस्त्र ओढ़कर सेज पर लेट गई।

  3. तीन रानियों के बीच सुप्रभा को न देखकर, उस पर विशेष प्रेम रखने वाले राजा दशरथ उसके महल में आए, उसी समय विष लाने वाला भी आकर बोला ‘रानीजी, यह विष लीजिए’; राजा ने उसके हाथ से विष ले लिया, रानी की सेज पर बैठ गए, और जब रानी सेज से उतरकर नीचे बैठी तो आग्रह से उसे सेज पर बैठाकर समझाया कि सब वस्तुओं में जीवन प्रिय है और सब दुखों में मरण सबसे बड़ा दुख है, तुम जिनेन्द्र का सिद्धांत जानती हो कि विष या शस्त्र से मरने वाले दुर्गति पाते हैं, ऐसे क्रोध को धिक्कार है। सुप्रभा ने कहा कि मुझे आप पर क्रोध नहीं, पर आपने सब रानियों के पास गंधोदक भेजा और मेरे पास नहीं; उसी समय वृद्ध खोजा गंधोदक लेकर आया और तीनों रानियों ने भी आकर समझाया कि हमारे पास तो दासी लाई और आपके पास वृद्ध खोजा, पति का प्रेम आप पर कम नहीं है, तब सुप्रभा ने प्रसन्न होकर गंधोदक नेत्रों और मस्तक पर लगाया।

  4. राजा ने खोजे पर क्रोध कर पूछा कि इतनी देर क्यों लगाई, तब वह डरकर हाथ जोड़, सिर झुकाकर बोला कि जवानी में मेरे हाथ हाथी की सूँड जैसे थे और मैं ऊँची-नीची भूमि राजहंस की तरह लाँघ जाता था, पर अब लाठी के सहारे भी बड़ी कठिनाई से चलता हूँ; मेरी पीठ खिंचे धनुष जैसी टेढ़ी हो गई है, बाल हड्डी जैसे सफेद हो गए हैं, दाँत गिर गए हैं, इन्द्रियाँ नाममात्र रह गई हैं, पैर कहीं रखता हूँ और पड़ता कहीं है, और सारी पृथ्वी आँखों को अंधकार जैसी दिखती है। आपके पिता के समय से बहुत वर्षों से राज्य की सेवा करता आया हूँ, इसलिए अब छोड़ नहीं सकता; मुझे मृत्यु का उतना भय नहीं जितना आपकी सेवा में चूक का है, इसलिए मेरा शरीर बुढ़ापे के अधीन जानकर क्रोध न करें, कृपा ही करें।

  5. खोजे के ये वचन सुनकर राजा दशरथ बाएँ हाथ पर गाल टिकाकर चिंतन करने लगे कि यह शरीर पानी के बुलबुले के समान असार और क्षणभंगुर है, यौवन दोपहर के सूर्य जैसा तेजस्वी होकर भी संध्या के प्रकाश जैसा अनित्य है, और भोग महाठग हैं, जो देखने में ही मनोज्ञ हैं, फल में अति कटु हैं और इन्द्रधनुष की तरह नश्वर हैं, इसलिए श्रेष्ठ पुरुष उन्हें विष समान जानकर छोड़ते और तप करते हैं। उन्होंने सोचा कि मैंने पृथ्वी का बहुत पालन किया, मनचाहे भोग भोगे, मेरे पुत्र भी महापराक्रमी हैं, और हमारे वंश की यही परंपरा है कि पुत्र को राजलक्ष्मी देकर वैराग्य धारण कर वन में तप करने जाते हैं; ऐसा सोचकर भोगों से उदास होकर भी वे कुछ दिन घर में रहे, क्योंकि गौतम स्वामी कहते हैं कि जिसे जो वस्तु जिस समय, जिस क्षेत्र में मिलनी होती है, वह उसी समय, उसी क्षेत्र में मिलती है।

  6. तब सब जीवों का हित करने वाले, मनःपर्ययज्ञान के धारी सर्वभूतहित नामक महाआचार्य संघ सहित विहार करते हुए सरयू नदी के किनारे आए; आचार्य की आज्ञा से मुनि गहन वनों, पर्वतों की गुफाओं, वन के चैत्यालयों और वृक्षों के कोटरों में ठहरे, और आचार्य स्वयं महेन्द्रोदय नामक वन में नाग वृक्षों के नीचे एक शिला पर, जहाँ विकलत्रय जीवों का संचार और स्त्री, नपुंसक, बालक, ग्रामीण और पशुओं का संसर्ग नहीं था, वर्षाकाल पूर्ण करने के लिए योग धारण कर ठहरे। वर्षा ऋतु में चारण मुनि और भूमिगोचरी मुनि खड्ग की धार जैसे कठिन व्रत और अनेक नियम पालते हैं।

  7. प्रातःकाल बाजों की ध्वनि से जागकर राजा दशरथ ने प्रातःक्रिया और जिनपूजा की, फिर भद्र जाति की हथिनी पर बैठकर जगह-जगह मुनियों और जिनमंदिरों को नमस्कार करते हुए महेन्द्रोदय वन गए, क्योंकि जब भी कोई मुनि अयोध्या के समीप आते, राजा उनके दर्शन को अवश्य जाते थे; हाथी से उतरकर उन्होंने नमस्कार किया और आचार्य के मुख से चारों अनुयोगों की चर्चा, भूत, भविष्य और वर्तमान के महापुरुषों के चरित्र, लोक-अलोक, छह द्रव्य, छह काय के जीव, छह लेश्याएँ, छह काल, कुलकरों की उत्पत्ति, क्षत्रिय आदि वंशों का वर्णन, सात तत्त्व, नौ पदार्थ और पंचास्तिकाय का स्वरूप सुना। धर्मानुराग से भरे राजा नगर लौटे, मंत्रियों को जिनधर्म के गुणों की कथा सुनाकर महल में गए और अनुपम रानियों के साथ पुण्य का फल भोगते रहे; पर्व के अंत में ग्रंथ कहता है कि भोग नाशवान और दुखदायी हैं, उन्हें छोड़कर योग धारण करना ही मानव जीवन की सार्थकता है।