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पर्व 122

सीता के जीव का उपसर्ग और राम को केवलज्ञान

कोटिशिला पर ध्यानस्थ राम स्वर्ग से उन्हें मोहित करने आए सीता के जीव की माया से अडिग रहते हैं और केवलज्ञान प्राप्त करते हैं।

कथा खंड राम का निर्वाण

सारांश

अद्वितीय तप करते राम, जिनके पास वन्य पशु भी शांत होकर बैठते हैं, कोटिशिला पर ध्यान में लीन होते हैं। सीता का जीव, अच्युत स्वर्ग का प्रतीन्द्र स्वयंप्रभ, राम को स्वर्ग में अपना साथी बनाने की आशा से वन में वसंत की माया रचता है, सीता के रूप में आकर उनसे लौट आने की विनती करता है और नाचती दिव्य कन्याओं से उन्हें घेर देता है। राम सुमेरु की तरह अडिग रहते हैं, शुक्लध्यान की श्रेणियों पर चढ़ते हैं और माघ शुक्ल द्वादशी की पिछली रात्रि में केवलज्ञान पाते हैं। देव उत्सव मनाते हैं, राम की दिव्यध्वनि खिरती है, और सीता का जीव उनकी पूजा कर क्षमा माँगता है।

क्या हुआ

9 बिंदु

  1. गौतम स्वामी श्रेणिक से कहते हैं कि जिनके राग-द्वेष शांत हो गए हैं, वे आत्माराम महामुनि राम ऐसा महातप करते हैं जो और किसी से न बन सके। महाभयंकर वनों में विहार करते, पाँच महाव्रत, पाँच समिति और तीन गुप्ति का पालन करते, शास्त्रों के ज्ञाता और जितेन्द्रिय राम को अनेक ऋद्धियाँ प्रकट होती हैं पर उन्हें उनकी खबर नहीं, वे बाईस परीषहों को जीतते हैं, और उनके तप के प्रभाव से सिंह, व्याघ्र, मृग आदि वन्य पशु जातिगत बैर भूलकर उनके दर्शन और धर्मोपदेश के लिए शांत होकर पास आ बैठते हैं।

  2. निर्मल शिला पर पद्मासन से बैठकर या सुमेरु के समान अचल कायोत्सर्ग मुद्रा में राम ऐसे आत्मध्यान में प्रवेश करते हैं जैसे सूर्य मेघमाला में प्रवेश करे; विहार करते समय वे ईर्या समिति से चार हाथ भूमि देखकर जीवों की रक्षा करते चलते हैं। देव-देवांगनाओं से पूज्य वे ऐसा तप करते हैं जो पंचम काल में किसी के चिंतन में भी नहीं आ सकता।

  3. एक दिन विहार करते हुए राम उस कोटिशिला पर आते हैं जिसे लक्ष्मण ने णमोकार मंत्र जपकर उठाया था, और कर्मों के नाश तथा क्षपकश्रेणी पर चढ़ने के लक्ष्य से उस पर ध्यान में बैठ जाते हैं, ऐसे लीन होकर कि बाहर के वातावरण की ओर उनका कोई उपयोग नहीं रहता।

  4. उधर अच्युत स्वर्ग के प्रतीन्द्र स्वयंप्रभ देव, जो सीता का जीव हैं, अवधिज्ञान से राम के साथ अपना परम स्नेह, अपने अनेक भव, राम का मुनि होना और कोटिशिला पर ध्यान में बैठना जान लेते हैं। उन्हें याद आता है कि पिछले भव में वे राम की महारानी सीता थे और जंबूद्वीप में अयोध्या आदि तीन खंड के राजा राम मनुष्य लोक में उनके पति थे; कि उन्होंने तप-व्रत के प्रभाव से सोलहवें स्वर्ग में इन्द्रपद पाया, प्राणों से प्यारे भाई लक्ष्मण परलोक चले गए, और जिन राम ने राज्य अवस्था में शस्त्रों से बाहरी शत्रु जीते थे, वे अब मुनि बनकर मन, इन्द्रियों और शुक्लध्यान से कर्म-शत्रुओं को जीत रहे हैं।

  5. वे सोचते हैं कि मेरी देवमाया से मुनिराज का मन थोड़ा मोहित हो जाए, तो वे शुद्धोपयोग से च्युत होकर शुभोपयोग में आएँगे और समाधिपूर्वक मरण कर हमारे अच्युत स्वर्ग में आएँगे। तब हम दोनों में महाप्रेम होगा, हम पाँचों मेरु और नंदीश्वर द्वीप आदि के चैत्यालयों की यात्रा करेंगे, बाईस सागर तक साथ रहेंगे और मिलकर लक्ष्मण को देखने चलेंगे।

  6. जहाँ राम मुनि ध्यानारूढ़ हैं वहाँ आकर प्रतीन्द्र वन में वसंत ऋतु की माया फैलाते हैं: नाना प्रकार के फूल खिलते हैं, सुगंधित वायु बहती है, कोयल, मैना और तोते मधुर स्वर में बोलते हैं, कर्णिकार वृक्षों के फूलों से वन ऐसा पीला-स्वर्णिम हो जाता है मानो वसंत राजा पीले वस्त्र पहनकर क्रीड़ा कर रहा हो, और मौलश्री के फूल बरसते हैं। जानकी का रूप धरकर प्रतीन्द्र मुनिराज के पास आते हैं, और वह मायावी सीता कहती है कि हे नाथ, वियोग की लहरों से भरे प्रेम-सागर में मैं डूब रही हूँ, मुझे थाम लीजिए, और मोह के उदय से कभी दाएँ, कभी बाएँ घूमती है, पर मुनिराज अकंप और अचल रहते हैं।

  7. मायावी सीता आगे कहती है कि मैंने बिना विचारे, आपकी आज्ञा के बिना, विद्याधरों की रानियों के बहकावे में दीक्षा ले ली, जबकि यह दीक्षा तो अति वृद्धों के योग्य है, कहाँ यह यौवन और कहाँ यह कठिन तप, कोमल फूल दावानल की ज्वाला कैसे सहे; अब मेरा मन आपमें लगा है, और हजारों विद्याधर राजकन्याएँ, जो मुझे आगे करके साथ लाई हैं, मेरे आश्रय से बलदेव से विवाह करना चाहती हैं। प्रतीन्द्र की विक्रिया से अमूल्य आभूषण पहने हजारों दिव्य कन्याएँ राजहंसिनी-सी चलती हुई आती हैं, कोयल से भी मधुर स्वर में गीत गाती, वीणा-बाँसुरी बजाती, मंद मुस्कान के साथ मुनि के चारों ओर नाचती हैं, रक्षा की प्रार्थना करती हैं, माधवी लता के फूलों की ओर हाथ उठाकर अपना शरीर दिखाती हैं, रासलीला करती हैं और जलक्रीड़ा करती हैं।

  8. जैसे पवन से सुमेरु नहीं हिलता, वैसे ही राम मुनिराज का मन चलायमान नहीं होता; आत्मस्वरूप के अनुभवी राम क्षपकश्रेणी पर चढ़कर शुक्लध्यान के प्रथम पाये में प्रवेश करते हैं, और उनकी अत्यंत निर्मलता के आगे प्रतीन्द्र की माया का कोई जोर नहीं चलता। पृथक्त्ववितर्क नामक प्रथम शुक्लध्यान की एकाग्रता से वे मोहकर्म का नाश कर बारहवें गुणस्थान में चढ़ते हैं, वहाँ एकत्ववितर्क नामक दूसरे शुक्लध्यान से ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अंतराय कर्म का नाश करते हैं, और माघ शुक्ल द्वादशी की पिछली रात्रि में केवलज्ञान प्राप्त करते हैं, जिसके दर्पण में लोक-अलोक के सब द्रव्य अपनी सब पर्यायों सहित झलकने लगते हैं।

  9. इन्द्रादि देवों के आसन काँपते हैं, और केवलज्ञान कल्याणक की पूजा के लिए सब इन्द्र चारों निकायों के देवों के साथ महाविभूति सहित मध्यलोक में आते हैं; चारण मुनि, चारों प्रकार के देव, मनुष्य, तिर्यंच और सौ इन्द्र घातिया कर्मों के नाशक अरहंत परमेष्ठी को प्रणाम करते हैं, जो छत्र, चँवर, सिंहासन और भामंडल से सुशोभित सयोगकेवली होकर देवों द्वारा रची गंधकुटी में विराजते हैं। आठवें बलभद्र भगवान राम की दिव्यध्वनि खिरने लगती है और श्रोता बार-बार स्तुति करते हैं; सीता का जीव स्वयंप्रभ प्रतीन्द्र केवली भगवान की पूजा कर, तीन प्रदक्षिणा देकर बार-बार क्षमा माँगता है कि मैंने अज्ञानवश राग से जो दोष किए उन्हें क्षमा करें, और गंधकुटी रूपी बाहरी तथा अनंत चतुष्टय रूपी भीतरी लक्ष्मी से युक्त केवली राम देवों के साथ वहाँ से विहार करते हैं।