पर्व 121
मुनि राम का वन में निरंतराय आहार
केवल वन में आहार लेने की प्रतिज्ञा निभाते हुए राम को वन के सरोवर के किनारे राजा प्रतिनंदी और रानी प्रभवा आहार देते हैं, और देव पंचाश्चर्य बरसाते हैं।
कथा खंड राम का निर्वाणसारांश
राम प्रतिज्ञा लेते हैं कि आहार तभी लेंगे जब वन में ही कोई दे। दुष्ट घोड़े द्वारा दूर ले जाए गए राजा प्रतिनंदी को उनकी रानी प्रभवा वन के एक सरोवर के किनारे पाती है, और जब वे वहाँ भोजन की तैयारी करते हैं तभी राम आहार के लिए आते हैं। राजा-रानी नवधा भक्ति से उनका पड़गाहन कर निरंतराय आहार देते हैं, देव पंचाश्चर्य करते हैं, और राम के प्रभाव से उनका भोजन अक्षय हो जाता है। प्रतिनंदी श्रावक के व्रत लेते हैं और राम फिर एकांत तप में लीन हो जाते हैं।
क्या हुआ
6 बिंदु
मुनियों में श्रेष्ठ राम फिर पाँच उपवास का नियम लेते हैं और कांतारचर्या की प्रतिज्ञा करते हैं कि नगर में आहार के लिए नहीं जाएँगे, वन में ही कोई श्रावक शुद्ध आहार देगा तो लेंगे। उधर राजा प्रतिनंदी को एक दुष्ट घोड़ा लेकर भाग जाता है और लोगों की दृष्टि से बहुत दूर ले जाता है, तब अत्यंत चिंतित पटरानी प्रभवा तेज घोड़े पर बैठकर अनेक सुभटों के साथ राजा के पीछे चलती है।
राजा को ले भागा घोड़ा वन में एक सरोवर के कीचड़ में फँस जाता है और आगे नहीं जा पाता, तब तक रानी भी वहाँ पहुँच जाती है। रानी प्रेम से कहती है कि महाराज, यदि यह अश्व आपको हरकर यहाँ न लाता तो यह नंदनवन-सा वन और मानसरोवर-सा सरोवर कहाँ देखने को मिलता; राजा कहते हैं कि यह वन-यात्रा तुम्हारे आने से सफल हुई, और सामंतों तथा सखियों के साथ जलक्रीड़ा करने के बाद दोनों सरोवर के किनारे भोजन की तैयारी करते हैं।
उसी समय कांतारचर्या करते महामुनि राम आहार के लिए उधर आते हैं। साधु के आहार की विधि में प्रवीण राजा प्रसन्न होकर रानी सहित सामने जाते हैं, नमस्कार कर पड़गाहन करते हैं, ‘हे भगवन, अत्र तिष्ठ तिष्ठ, आहार-जल शुद्ध है’, प्रासुक जल से मुनिराज के चरण पखारते हैं, और नवधा भक्ति तथा सात गुणों सहित स्वर्णपात्र से शुद्ध भोजन मुनिराज के कोमल करपात्र में देते हैं।
मुनिराज का निरंतराय आहार होता है और हर्षित देव पंचाश्चर्य करते हैं: पाँच रंग के रत्नों की वर्षा, कल्पवृक्षों के सुगंधित पुष्पों की वर्षा, शीतल मंद सुगंधित पवन, दुंदुभिनाद, और आकाश में ‘जय जय, धन्य यह दान, धन्य यह पात्र, धन्य यह दाता, धन्य यह विधि’ की ध्वनि। राम अक्षीण महाऋद्धि के धारी हैं, इसलिए उस दिन रसोई का भोजन अक्षय हो जाता है।
ग्रंथ नवधा भक्ति गिनाता है: पड़गाहन, उच्चासन, पाद-प्रक्षालन और गंधोदक मस्तक पर लगाना, पूजा, नमस्कार, मन शुद्धि, वचन शुद्धि, काय शुद्धि, और यह कहना कि आहार-जल शुद्ध है, ग्रहण कीजिए। दाता के सात गुण हैं: श्रद्धा, भक्ति, शक्ति, निर्लोभता, दया, क्षमा और विज्ञान।
इस मुनिदान से राजा प्रतिनंदी देवों द्वारा पूजित होते हैं, सम्यक्त्व सहित निर्मल भावों से श्रावक के व्रत धारण करते हैं और पृथ्वी पर उनका यश फैल जाता है, जबकि रत्नों की वर्षा से सब दिशाएँ प्रकाशित होती हैं और लोगों की दरिद्रता दूर होती है। रानी सहित विनय से नमन करते हुए राजा अपना मनुष्य जन्म सफल मानते हैं, और महायोगी राम तप के लिए एकांत स्थानों में रहते हुए बारह प्रकार का तप करते हैं, परीषह सहते हैं और ध्यान की एकाग्रता से कर्मों की निर्जरा में लगे रहते हैं।