पर्व 120
मुनि राम का आहार के लिए नगर में आना और अंतराय से वन लौटना
मुनि राम आहार के लिए नंदस्थली आते हैं, पर जब राजा के सामंत उन्हें महल ले जाने के लिए प्रजा को रोक देते हैं, तो वे इसे अंतराय मानकर बिना आहार लिए वन लौट जाते हैं।
कथा खंड राम का निर्वाणसारांश
पाँच उपवास के बाद मुनि राम आहार के लिए नंदस्थली नगर में आते हैं, और उनके तेज से अभिभूत नगरवासी भोजन तैयार करने और पड़गाहन करने को दौड़ पड़ते हैं। उत्साह इतना बढ़ता है कि कोलाहल में हाथी और घोड़े बंधन तोड़कर भाग खड़े होते हैं। भक्त पर विवेकहीन राजा अपने सामंतों को भेजता है कि राम को महल ले आएँ और प्रजा को आहार देने से रोक दें, और राम इसे अंतराय मानकर बिना आहार लिए वन लौट जाते हैं। पर्व अंत में बताता है कि मुनि किस विधि से आहार ग्रहण करते हैं और सही विधि से आहार दान का क्या पुण्य है।
क्या हुआ
7 बिंदु
गौतम स्वामी श्रेणिक से कहते हैं कि महाऋषि राम के अनेक गुणों का वर्णन इन्द्र भी नहीं कर सकते। पाँच उपवास की प्रतिज्ञा पूरी करके वे ईर्या समिति से आहारचर्या के लिए नंदस्थली नगर में आते हैं; उगते सूर्य-से दीप्तिमान, मानो चलता हुआ पर्वत, स्फटिक-सा निर्मल हृदय, मानो धर्म ही मूर्तिमान हो और तीनों लोकों का आनंद एकत्र होकर राम की मूर्ति बन गया हो।
मोहित होकर नगरवासी आपस में कहते हैं कि ऐसा अनुपम, अद्भुत रूप जगत में कभी नहीं देखा: धन्य है यह धैर्य, पराक्रम, रूप, कांति, शांति, निर्मलता और निर्ममता। जीवों की रक्षा के लिए चार हाथ भूमि देखते हुए, भुजाएँ लटकाए, शांत मुद्रा में जैन यति चले आ रहे हैं, और लोग सोचते हैं कि किसका ऐसा महाभाग्य होगा जिसके घर ये आहार लेंगे; वे पहचानते हैं कि ये इन्द्र समान, रघुकुल के तिलक, शील के पर्वत पुरुषोत्तम रामचन्द्र हैं, जिनके दर्शन से नेत्र सफल और मन निर्मल होता है।
नगर में पड़गाहन की सुंदर ध्वनि गूँज उठती है, गली-गली स्त्री-पुरुषों से भर जाती है, और लोग घरों में पवित्र प्रासुक शुद्ध भोजन बनाकर, पवित्र वस्त्र पहन, जल से भरा मंगल कलश हाथ में लिए द्वार पर खड़े होकर नमस्कार करते हुए कहते हैं, ‘हे स्वामी, अत्र तिष्ठ तिष्ठ, आहार-जल शुद्ध है।’ लोग जयकार करते हैं कि हे मुनीन्द्र, जयवंत हों, आपके तप की वृद्धि हो, और घर-घर में स्वर्णपात्रों में दूध, दही, ईख का रस, दाल-भात, खीर, पुए, पापड़ी, मिश्री, मोदक, इलायची, मेवे, शीतल जल, पूड़ी और श्रीखंड तैयार करने की होड़ लग जाती है।
हर्ष से भरे लोग अपने बालकों तक को नहीं देखते, मार्गों में दौड़ते हुए एक-दूसरे के धक्के से गिरते हैं, और इस कोलाहल से हाथी बंधन तोड़कर नगर में दौड़ने लगते हैं, जिनके कपोलों से झरते मद से मार्गों में जल-सा प्रवाह बहने लगता है, जबकि हाथियों के भय से घोड़े चारा छोड़, बंधन तोड़कर हिनहिनाते हुए भागते हैं और लोग व्याकुल हो जाते हैं।
कोलाहल सुनकर दान में तत्पर राजा राजभवन के ऊपर खड़े होकर दूर से मुनिराज का रूप देखता है और मोहित हो जाता है; उसे मुनिभक्ति में विशेष राग है पर विवेक नहीं, इसलिए वह अनेक सामंतों को आज्ञा देता है कि दिगंबर मुनिराज पधारे हैं, जाकर प्रणाम करो और भक्ति-विनय से विनती कर उन्हें आहार के लिए ले आओ। वे मूर्ख सामंत मुनि के चरणों में गिरकर कहते हैं कि प्रभो, राजा के घर भोजन कीजिए, वहाँ महापवित्र स्वादिष्ट भोजन है, साधारण लोगों के घर का रूखा-सूखा नीरस भोजन आपके योग्य नहीं, और नगरवासियों को यह कहकर रोक देते हैं कि तुम आहार देना क्या जानो, तुम्हारे घर साधु के योग्य भोजन कहाँ मिलेगा।
यह सुनकर महामुनि इसे अंतराय जानकर बिना आहार लिए नगर से निकलकर वन चले जाते हैं, जिससे सब लोग व्याकुल हो जाते हैं। जिन-आज्ञा के प्रतिपालक, आचारांग सूत्र के अनुसार आचरण करने वाले वे महापुरुष वन में कायोत्सर्ग से बैठकर चिद्रूप ध्यान में मग्न हो जाते हैं।
ग्रंथ समझाता है कि नवधा भक्ति के बिना साधु की आहारचर्या नहीं होती, साधु छियालीस दोषों को टालकर, अंतराय रहित, बिना याचना के निर्दोष आहार ही लेते हैं, और साधु का आहार रत्नत्रय की साधना के लिए होता है, शरीर की पुष्टि के लिए नहीं। विनय आदि सात गुणों से युक्त श्रावक जो द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की शुद्धता के साथ अपने हाथों से ऐसे तपस्वियों और चतुर्विध संघ को आहार दान देता है, वह अतिशय पुण्य और सूर्य समान यश पाता है।