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पर्व 119

श्रीराम का सुव्रत मुनि से दीक्षा लेना

राम अपने पौत्र को राज्य देकर सोलह हजार से अधिक राजाओं के साथ सुव्रत मुनि से दीक्षा लेते हैं और राग से अछूते रहकर अकेले मुनि रूप में विहार करते हैं।

कथा खंड राम का निर्वाण

सारांश

राम अनंगलवण के पुत्र को राज्य देते हैं, और विभीषण तथा सुग्रीव अपने राज्य सुभूषण और अंगद को सौंप देते हैं। आकाशगामी सुव्रत मुनि के पधारने का समाचार मिलते ही राम उनके पास जाते हैं, आभूषण और वस्त्र उतारकर केशलोंच करते हैं और दिगंबर मुनि बन जाते हैं, जबकि देव पंचाश्चर्य की वृष्टि करते हैं। शत्रुघ्न, विभीषण, सुग्रीव और सोलह हजार से कुछ अधिक राजा उनके साथ दीक्षा लेते हैं, और सत्ताईस हजार रानियाँ श्रीमती आर्यिका के पास आर्यिका बनती हैं। पर्वतों और वनों में अकेले विहार करते हुए राम को अवधिज्ञान होता है और वे बिना किसी राग के लक्ष्मण के पूर्वभव देखते हैं।

क्या हुआ

9 बिंदु

  1. शत्रुघ्न के वैराग्य भरे वचन सुनकर और उन्हें राज्य तथा परिवार से सचमुच विरक्त जानकर राम क्षण भर विचार करते हैं और अनंगलवण के पुत्र को राज्य देते हैं, जो पिता के समान गुणों की खान है, प्रजा का अनुरागी है और राम की तरह पृथ्वी पर आज्ञा चलाता है। विभीषण लंका का राज्य अपने पुत्र सुभूषण को और सुग्रीव अपना राज्य अंगद को देकर विरक्त होते हैं, और राम के ये सब मित्र उनके साथ भवसागर पार करने को तैयार होते हैं।

  2. दशरथ के पुत्र राम भरत चक्रवर्ती की तरह राज्य का बोझ उतार देते हैं; वे विषय-सुखों को विष मिले भोजन और सारी विभूति को कुलटा स्त्री के समान जानते हैं। सौ इन्द्रों से पूज्य श्री मुनिसुव्रतनाथ भगवान के बताए मार्ग को हृदय में धारण कर, जन्म-मरण के भय से काँपते और क्रोधादि भावों से रहित होकर वे बादलों से मुक्त सूर्य की तरह दमकते हैं।

  3. उसी समय अर्हद्दास सेठ आते हैं, और जब राम उनसे चतुर्विध संघ का कुशल-मंगल पूछते हैं, तो वे कहते हैं कि आपके कष्ट से मुनियों का मन भी दुखी हुआ। यह बात हो ही रही होती है कि समाचार आता है कि मुनिसुव्रतनाथ के वंश में उत्पन्न, महाव्रतधारी, काम-क्रोध के नाशक, चारण ऋद्धिधारी श्री सुव्रत स्वामी पधारे हैं; यह सुनकर रोमांचित राम अनेक विद्याधर और भूमिगोचरी राजाओं के साथ उनके पास जाते हैं, जैसे पहले बलभद्र विजय मुनि बनने स्वर्णकुंभ स्वामी के पास गए थे।

  4. राम मुनिराज की प्रदक्षिणा देकर हाथ जोड़, सिर झुकाकर नमस्कार करते हैं, उनके दर्शन से मानो अमृत के सागर में डूब जाते हैं, और परम श्रद्धा, भक्ति, विनय और वैराग्य के साथ जिनदीक्षा की विनती करते हैं कि हे योगीश्वरों के इन्द्र, मैं संसार के प्रपंच से विरक्त हूँ, आपकी शरण लेकर आपके प्रसाद से योगियों के मार्ग पर चलना चाहता हूँ। मुनिराज कहते हैं कि हे नरेन्द्र, आप इसके योग्य ही हैं; इस संसार में कोई सार पदार्थ नहीं, जिनराज का यह मार्ग अनादिसिद्ध, बाधारहित और अविनाशी सुख देने वाला है, और आप जैसे बुद्धिमान ही इसे धारण करते हैं।

  5. जैसे सूर्य सुमेरु की प्रदक्षिणा करे, वैसे मुनिराज की प्रदक्षिणा कर राम कर्मों के नाश के लिए कमर कसते हैं, आशा के बंधन तोड़ते हैं, स्नेह का पिंजरा जलाते हैं, हार, कुंडल, केयूर, करधनी और भुजबंध उतारकर तत्काल वस्त्रों का भी ऐसे त्याग करते हैं जैसे जीव शरीर छोड़ता है, और अपने कोमल हाथों से केशलोंच करते हैं। पाँच महाव्रत और पाँच समितियाँ धारण कर वे तीन गुप्ति रूपी गढ़ में पद्मासन से विराजते हैं; सात भयों से रहित, छहकाय के जीवों के मित्र, आठ कर्मों के शत्रु, नौ कोटि से ब्रह्मचर्य के पालक, दस धर्मों के धारी और श्रीवत्स लक्षण से सुशोभित वक्ष वाले राम महामुनि बन जाते हैं।

  6. देव पंचाश्चर्य की वृष्टि करते हैं, दुंदुभि बजती है, और कृतांतवक्त्र तथा जटायु के जीव दोनों देव परम उत्सव मनाते हैं। राम को ऐसी महाविभूति और महारत्न छोड़कर मुनि बनते देख राजा आश्चर्य करते हैं कि हमारे घर में कौन-सा परिग्रह है जिसके लोभ में हम घर में रहें, व्रतों के बिना इतने दिन हमने व्यर्थ खो दिए; भाई शत्रुघ्न महामुनि बनते हैं, और विभीषण, सुग्रीव, नल, नील, विराधित आदि अनेक राजा मुनि बनते हैं, विद्याधर राजा सब विद्याएँ त्यागकर ब्रह्मविद्या पाते हैं, और कई मुनियों को चारण ऋद्धि प्रकट होती है।

  7. इस प्रकार राम के साथ सोलह हजार से कुछ अधिक राजा मुनिदीक्षा लेते हैं, और सत्ताईस हजार रानियाँ श्रीमती आर्यिका के पास आर्यिका दीक्षा धारण करती हैं। फिर गुरु की आज्ञा लेकर महामुनि राम सब विकल्प छोड़कर अकेले विहार करते हैं और जिनकल्पी होकर पर्वतों पर, गुफाओं में और क्रूर जीवों से भरे विषम वनों में ध्यान करते हैं।

  8. उन्हें अवधिज्ञान प्राप्त होता है, जिससे वे परमाणु तक जगत के सब मूर्त पदार्थ देखने लगते हैं, और लक्ष्मण के तथा अपने अनेक भवों को जान लेते हैं, फिर भी उनके मन में ममता रूपी राग नहीं जागता। दीक्षा से पहले के जीवन में ग्रंथ तीन सौ वर्ष मंडलीक पद, चालीस वर्ष दिग्विजय और ग्यारह हजार पाँच सौ साठ वर्ष तीन खंड का राज्य गिनाता है; लक्ष्मण की मृत्यु इसी प्रकार होनी थी, उसमें देवों का दोष नहीं था, वह तो राम के वैराग्य के उदय का निमित्त मात्र थी।

  9. व्रत और शील के पर्वत-से धैर्यवान, शुक्ल लेश्या सहित, गुणों के सागर राम मोक्ष लक्ष्मी में तत्पर होकर शुद्धोपयोग के मार्ग में लीन रहते हैं। गौतम स्वामी श्रेणिक आदि सब श्रोताओं से कहते हैं कि जैसे राम जिनमार्ग में लगे वैसे तुम भी लगो; जो साधु त्रिशूल, धनुष, चिमटे आदि रखते हैं और कुलिंग धारण करते हैं, वे पत्थर की नाव के समान हैं जिनसे मोक्ष नहीं मिलता, और परिग्रह रहित, किसी से याचना न करने वाले निर्ग्रंथ मुनि ही पूज्य हैं। वे कहते हैं कि राम के वैराग्य का वर्णन शुभ भावों से पढ़ने-सुनने से संसार के सब कष्ट मिटते हैं, शांति मिलती है और क्रम से अनंत सुख प्राप्त होता है।