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पर्व 118

देवों के संबोधन से राम का प्रबोध और लक्ष्मण का दाह संस्कार

कृतांतवक्त्र और जटायु के जीव स्वर्ग से आकर राम के शत्रुओं को भगाते हैं और उन्हें मोह से जगाते हैं, तब राम अंततः लक्ष्मण का दाह संस्कार कर संसार छोड़ने का निश्चय करते हैं।

कथा खंड महान वैराग्य

सारांश

राम लक्ष्मण का दाह संस्कार करने से मना कर देते हैं और महीनों तक भाई के शरीर को उठाए फिरते, नहलाते, सजाते और भोजन कराने का प्रयत्न करते हैं। उनके मोह की बात सुनकर इन्द्रजीत का पुत्र वज्रमाली और सुंद का पुत्र बदला लेने अयोध्या पर चढ़ आते हैं, पर अब चौथे स्वर्ग में देव बने कृतांतवक्त्र और जटायु के जीव माया से उन्हें भगा देते हैं और आक्रमणकारी मुनि बन जाते हैं। फिर दोनों देव सूखे पेड़ को सींचकर, मरे बैलों से हल चलाकर और स्वयं एक शव उठाकर राम को उनकी भूल दिखाते हैं। मोह से मुक्त होकर राम सरयू के तट पर लक्ष्मण का दाह संस्कार करते हैं और मुनि बनने का निश्चय करते हैं, और शत्रुघ्न भी राज्य ठुकराकर उनके साथ चलने को तैयार होते हैं।

क्या हुआ

13 बिंदु

  1. सुग्रीव आदि राजा राम से विनती करते हैं कि अब वासुदेव के शरीर का दाह संस्कार कीजिए, पर ये शब्द राम को अत्यंत अनिष्ट लगते हैं और वे क्रोध से कहते हैं कि तुम अपने माता, पिता, पुत्र, पौत्र सबका दाह करो, मेरे भाई का क्यों; तुम पापियों के बंधु मरें, मेरा भाई क्यों मरे। ‘उठो लक्ष्मण, इन दुष्टों को छोड़ कहीं और चलें’ कहकर वे भाई को कंधे पर रख चल पड़ते हैं, किसी का विश्वास नहीं करते, और विभीषण, सुग्रीव आदि अनेक राजा पीछे-पीछे चलते हैं; जैसे बालक हाथ के विषफल को नहीं छोड़ता, वैसे ही राम लक्ष्मण का शरीर नहीं छोड़ते।

  2. ‘स्नान का समय हो गया’ कहकर राम लक्ष्मण के मृत शरीर को स्नान के सिंहासन पर बिठाते हैं, मणि-स्वर्ण के कलशों से नहलाते हैं, मुकुट आदि सब आभूषण पहनाते हैं, और सेवकों से रत्न-स्वर्ण के पात्रों में दाल, भात, फुलके और अनेक व्यंजन लाने को कहते हैं ताकि भाई का शरीर पुष्ट हो। वे अपने हाथों से लक्ष्मण के मुख में ग्रास देते हैं, पर वह ग्रहण नहीं होता, जैसे अभव्य जीव जिनेन्द्र का उपदेश ग्रहण नहीं करता; राम कहते हैं कि मुझसे क्रोध है तो रहे, पर आहार से क्या क्रोध, भोजन नहीं तो दूध ही पी लो, पर शरीर कुछ नहीं लेता।

  3. गौतम स्वामी श्रेणिक से कहते हैं कि ज्ञानवान, विद्वान, विवेकी राम स्नेह के कारण मृत भाई की वैसे ही सेवा करते हैं जैसे जीवित की: वीणा-बाँसुरी पर गीत बजवाते हैं, कभी चंदन, कभी तेल-फुलेल और इत्र लगाते हैं, कभी हाथों में उठाते, कभी हृदय से लगाते, कभी मुख पर हाथ फेरते और पूछते हैं कि क्या किसी निद्रा देवी ने तुम्हें घेर लिया है। स्नेह रूपी ग्रह से ग्रसित बलदेव ऐसी अनेक चेष्टाएँ करते हैं, और मृत होकर भी लक्ष्मण राम का साथ नहीं छोड़ते।

  4. गाँव-गाँव, नगर-नगर में यह बात फैल जाती है कि तीन खंड के अधिपति नारायण लक्ष्मण मर गए, लवण-अंकुश मुनि बन गए और राम मोह से अज्ञानी हो रहे हैं। तब शंबूक के भाई सुंद का पुत्र इन्द्रजीत के पुत्र वज्रमाली के पास जाकर उसे उकसाता है: लक्ष्मण ने मेरे ताऊ शंबूक और दादा खरदूषण को मारा, हमारा पाताल लंका का राज्य लेकर विराधित को दिया, वानरवंशी शिरोमणि सुग्रीव स्वामीद्रोही होकर राम से मिला, राम ने समुद्र पार कर राक्षस द्वीप उजाड़ा, और दोनों भाइयों ने सिंहवाहिनी और गरुड़वाहिनी विद्याएँ पाकर इन्द्रजीत और कुंभकर्ण को बंदी बनाया तथा चक्ररत्न से हमारे स्वामी रावण को मारा।

  5. वह कहता है कि अब कालचक्र से लक्ष्मण मरा है, लक्ष्मण के बल पर उन्मत्त वानरवंशी निर्बल हो गए हैं, और हल-मूसल के धारक, पृथ्वी पर अद्वितीय योद्धा राम ग्यारह पक्ष बीतकर बारहवाँ पक्ष लगने तक भाई के मोह में पागल होकर उसका मृत शरीर लिए घूम रहे हैं, इसलिए बैर का बदला लेने का यही समय है। रणभेरी बजवाकर सुंद का पुत्र और वज्रमाली भारी सेना के साथ अयोध्या की ओर बढ़ते हैं, यह सोचकर कि पहले सुग्रीव को मारकर या पकड़कर उसका देश लेंगे, फिर राम से लड़ेंगे।

  6. यह समाचार सुनकर सब विद्याधर और राम के आज्ञाकारी तीन खंड के राजा-प्रजा अयोध्या में ऐसे इकट्ठे होते हैं जैसे लवण-अंकुश के आने पर हुए थे, और राम लक्ष्मण को कंधे पर लिए, हाथ में धनुष-बाण सँभाले, विद्याधरों के साथ बाहर निकलते हैं। उधर चौथे स्वर्ग में दो देवों के आसन काँपते हैं: कृतांतवक्त्र का जीव, जो वहाँ स्वामी देव है, और जटायु पक्षी का जीव, जो उसका आज्ञाकारी देव है। जटायु का जीव क्रोधित है, क्योंकि जिन राम ने उसे पुत्र की तरह पाला और मरते समय णमोकार मंत्र सुनाया, वे भाई के शोक में दुखी हैं और शत्रु सेना उनसे लड़ने आई है।

  7. अवधिज्ञान से सब जानकर कृतांतवक्त्र का जीव कहता है कि पूर्वभव में राम मेरे स्वामी थे, मैं उनका सेनापति कृतांतवक्त्र था, उन्होंने मुझे भाई-पुत्रों से भी अधिक प्यार दिया और मैंने वचन दिया था कि संकट आने पर आपके पास आऊँगा। दोनों देव विमान में बैठकर अयोध्या आते हैं; जटायु का जीव कामदेव का रूप धरकर शत्रुओं को मोहित करता है और ऐसी माया दिखाता है कि अयोध्या के चारों ओर दुर्गम पहाड़ हैं, आकाश छूते कोट हैं और देव-विद्याधरों से भरी अपार नगरी है, जिससे डरी हुई सेना को भागने का मार्ग भी नहीं दिखता, तब वह उन्हें दक्षिण की ओर भागने का मार्ग दिखा देता है।

  8. शत्रु सेना प्राणों की आशा छोड़कर भाग निकलती है, और इन्द्रजीत का पुत्र यह सोचकर लज्जित होता है कि राजा विभीषण को क्या उत्तर देंगे और लोगों को क्या मुँह दिखाएँगे; तब वज्रमाली, सुंद के पुत्र और अन्य विद्याधरों के साथ रतिवेग मुनिराज के निकट मुनि बन जाता है। जटायु का जीव उन साधुओं के दर्शन कर अपना सब वृत्तांत सुनाता है, क्षमा माँगता है और अयोध्या लौट आता है।

  9. भाई के शोक में बालक जैसी चेष्टाएँ करते राम को प्रबोधित करने के लिए दोनों देव उनके सामने अनेक व्यर्थ काम करते हैं: कृतांतवक्त्र का जीव सूखे वृक्ष को सींचता है और घी के लिए जल बिलोता है, जबकि जटायु का जीव मरे बैलों की जोड़ी से हल चलाता है, शिला पर बीज बोता है और तेल के लिए बालू को घानी में पेलता है। जब राम उन्हें महामूर्ख कहते हैं, तो वे पूछते हैं कि आप भाई का मृत शरीर लिए फिरते हैं, उससे क्या होगा; यह सुनकर राम लक्ष्मण को हृदय से लगाकर क्रोध से कहते हैं कि मेरे भाई, तीन खंड के स्वामी नारायण के लिए अमंगल वचन क्यों कहते हो।

  10. जब राम कृतांतवक्त्र के जीव से विवाद कर रहे होते हैं, तभी जटायु का जीव एक मरे मनुष्य का कलेवर लेकर सामने आता है, और राम के पूछने पर कि मरे मनुष्य को कंधे पर लिए क्यों फिरते हो, देव कहते हैं कि आप महाप्रवीण होकर भी प्राणरहित लक्ष्मण का शरीर क्यों लिए फिरते हैं। आप दूसरों के अणुमात्र दोष देखते हैं और अपने मेरु जैसे दोष नहीं देखते; समान को समान से प्रीति होती है, हम व्यर्थ काम करने वाले उन्मत्तों की ध्वजा लिए फिरते हैं और आपको सबसे बड़ा उन्मत्त देखकर आपके पास आए हैं। यह सुनकर आठवें बलभद्र राम मोह से रहित होते हैं, शास्त्रों और गुरुओं के वचन याद कर प्रबोध पाते हैं, और बादलों से निकले सूर्य की तरह तथा शरद के निर्मल आकाश की तरह उनका मन शोक के कीचड़ से मुक्त हो जाता है।

  11. राम ऐसे प्रसन्न होते हैं जैसे रात के अंधकार में मार्ग भूला पथिक सूर्योदय पर मार्ग पाकर, भूखा मनचाहा भोजन पाकर, प्यासा सरोवर देखकर, रोगी औषधि पाकर या बंदी जेल से छूटकर प्रसन्न होता है, और अपने को संसार के अंधकूप से निकला जानकर सोचते हैं कि मैंने नया जन्म पाया। वे विचारते हैं कि ओस की बूँद-सा यह मनुष्य जीवन अति चंचल है, चारों गतियों में भटककर बड़े कष्ट से मिली यह मनुष्य गति मैंने व्यर्थ खो दी; किसके भाई, किसके पुत्र, किसका परिवार, किसका धन, किसकी स्त्री, इस जीव के अनेक परिवार हो चुके, दुर्लभ तो केवल ज्ञान है।

  12. फिर दोनों देव अपनी माया हटाकर स्वर्ग की आश्चर्यजनक विभूति दिखाते हैं: शीतल, मंद, सुगंधित पवन चलती है, आकाश देव-विमानों से भर जाता है, देवांगनाएँ नृत्य करती हैं और वीणा-बाँसुरी बजती हैं। जब वे पूछते हैं कि इतने दिन राज्य करके आपने क्या सुख पाया, तो राम कहते हैं कि राज्य में कहाँ सुख है, जो इसे छोड़कर मुनि बने वे ही सुखी हैं; और राम के पूछने पर जटायु का जीव बताता है कि मैं वही गृद्ध पक्षी था, आपके मुनियों को आहार देते समय गुरु के उपदेश से संयम लिया, आपने पुत्र की तरह पाला, सीता-हरण के दिन रावण से लड़कर मरणासन्न हुआ तो आपने णमोकार मंत्र सुनाया, जिसके प्रभाव से चौथे स्वर्ग में देव हुआ, और स्वर्ग के भोगों में मोहित होने से अब तक नहीं आ सका।

  13. कृतांतवक्त्र का जीव कहता है कि हे नाथ, मैं आपका सेनापति कृतांतवक्त्र था, आपने मुझे पुत्र और भाई के समान माना, और मेरे वैराग्य के समय आपने आज्ञा दी थी कि देव हो जाओ तो संकट में आकर हमारी रक्षा करना। राम चौथे स्वर्ग के इन महाऋद्धिधारी देवों को अपना परम मित्र कहते हैं और शोक से मुक्त होकर सरयू नदी के तट पर लक्ष्मण के शरीर का दाह संस्कार करते हैं। फिर वे शत्रुघ्न से कहते हैं कि मैं मुनिव्रत धारण कर सिद्धपद पाना चाहता हूँ, तुम पृथ्वी का राज्य कर प्रजा का पालन करो, पर शत्रुघ्न उत्तर देते हैं कि मैं भोगों का अभिलाषी नहीं, जिसे राग हो वह राज्य करे, मैं आपके साथ जिनराज के व्रत धारण करूँगा, क्योंकि काम-भोग, मित्र, परिवार और बंधुओं से कोई तृप्त नहीं हुआ।