पर्व 117
शोक-संतप्त राम को विभीषण का संबोधन
विद्याधर राजा अयोध्या में एकत्र होते हैं, और विभीषण मृत्यु की अनिवार्यता का उपदेश देकर राम से लक्ष्मण का शरीर छोड़ने का आग्रह करते हैं, पर राम उसे नहीं छोड़ पाते।
कथा खंड महान वैराग्यसारांश
विभीषण, विराधित, सुग्रीव और अन्य विद्याधर अधिपति शीघ्र अयोध्या आकर शोकाकुल राम से धीरे से शोक छोड़ने की विनती करते हैं। फिर विभीषण मृत्यु पर लंबा उपदेश देते हैं: जो जन्मा है वह अवश्य मरेगा, इन्द्र और तीर्थंकर भी शरीर छोड़ते हैं, जीव के अनगिनत संबंधी हो चुके हैं, उसका सच्चा शत्रु या मित्र उसके अपने विकार और गुण ही हैं, और केवल मोह ही उसे दूसरों से चिपकाए रखता है। वे राम से लक्ष्मण का शरीर छोड़ने को कहते हैं, पर मोहकर्म और भाई के प्रेम में बँधे राम उसे नहीं छोड़ते।
क्या हुआ
7 बिंदु
लक्ष्मण की मृत्यु का समाचार सुनकर विभीषण अपने पुत्रों सहित, विराधित पूरे परिवार सहित, और सुग्रीव आदि विद्याधरों के अधिपति अपनी रानियों सहित शीघ्र अयोध्या आते हैं। आँखों में आँसू भरे, हाथ जोड़े, सिर झुकाए वे राम को प्रणाम कर भूमि पर बैठते हैं, और क्षण भर बाद मंद वाणी से विनती करते हैं कि यह शोक बड़ा दुर्निवार है, फिर भी आप जिनवाणी के ज्ञाता हैं और संसार का स्वरूप जानते हैं, इसलिए शोक छोड़ दें; फिर सब चुप हो जाते हैं।
फिर सब बातों में प्रवीण विभीषण राम को याद दिलाते हैं कि अनादिकाल की रीति है कि जिसने जन्म लिया वह अवश्य मरेगा: मरण जन्म का साथी है, किसी के टाले नहीं टलता, और सब बातों का उपाय है पर मृत्यु का कोई उपाय नहीं। रोने से मरे हुए न जीवित होते हैं न बात करते हैं, स्त्री-पुरुष के संयोग से बना यह शरीर पानी के बुलबुले की तरह नष्ट हो जाता है, और सागरों की आयु वाले, किसी के मारे न मरने वाले अहमिन्द्र, इन्द्र और लोकपाल भी आयु पूरी होने पर स्वर्ग से च्युत होते हैं, तो मनुष्यों की क्या बात।
वे कहते हैं कि प्राणी अपने परिवार की चिंता करता है, मानो वह स्वयं अजर-अमर हो; यदि केवल इसी की मृत्यु आई होती और हम अमर रहते तो रोना उचित था, पर जब सबकी यही दशा है तो रोना क्यों। केवल सिद्ध भगवान के शरीर नहीं, इसलिए उनका मरण नहीं; काल वज्रदंड लेकर सिर पर खड़ा है और संसारी जीव निर्भय बैठे हैं, इन्द्र, धरणेन्द्र और चक्रवर्ती भी मरते हैं, पाताल, भूतल और स्वर्ग में कोई स्थान मृत्यु से खाली नहीं, और छठे काल के अंत में भरतक्षेत्र में प्रलय होगी जिसमें पहाड़ भी नष्ट हो जाएँगे।
वज्रवृषभनाराच संहनन और समचतुरस्र संस्थान के धारी, देवों और मनुष्यों से पूज्य, किसी से न जीते जाने वाले तीर्थंकरों का शरीर भी अनित्य है, वे भी शरीर छोड़कर सिद्धलोक में निजभाव में रहते हैं, तो दूसरों का शरीर नित्य कैसे होगा। देव, मनुष्य, तिर्यंच और नारकियों के शरीर केले के वृक्ष के समान असार हैं; जीव शरीर का यत्न करता है और काल प्राण हर लेता है, जैसे गरुड़ बिल से सर्प को ले जाता है, लोग ‘हाय भाई, हाय पुत्र, हाय मित्र’ कहकर रोते हैं जबकि काल रूपी सर्प सबको निगल जाता है, और ‘यह कर रहा हूँ, यह किया, यह करूँगा’ सोचते-सोचते अज्ञानी टूटे जहाज की तरह डूब जाता है।
विभीषण आगे कहते हैं कि मरने वाले के साथ कोई नहीं जा सकता, यदि जा सकता तो इष्ट-वियोग कभी न होता, और इस जीव के संसार में समुद्र की बालू के कणों से भी अधिक नाते-रिश्ते हो चुके हैं। निश्चय से देखें तो जीव का न कोई शत्रु है न मित्र; शत्रु तो राग-द्वेष हैं और मित्र ज्ञान-दर्शन; जिन्हें अपना जानकर प्यार किया वे भी शत्रु बने, दुर्जन जिस माता का दूध पीकर पले उसे भी मार देते हैं, और जो पहले स्वामी बनकर बार-बार नमस्कार करवाता था, वही दास बनकर लातें खाता है।
मोह की ऐसी शक्ति है कि जीव अपने आपको नहीं जानता और दूसरों को अपना मानता है, और कनक-कामिनी को ऐसे ग्रहण करता है जैसे कोई हाथ से काले नाग को पकड़े। लोकाकाश में ऐसा कोई स्थान नहीं जहाँ इसने जन्म-मरण न किया हो; इसने सागरों तक नरक के दुख भोगे, सूअर-कुत्ते आदि होकर अनंत जन्मों में इतना मल खाया जो हजारों विंध्याचल पर्वतों के ढेर से भी अधिक है, क्रोध के वश दूसरों को अनगिनत बार मारा और उनसे मारा गया, और अनंत काल निगोद में जन्म-मरण किया, इसलिए मोह रूपी पिशाच के वश अज्ञानी मूर्ख ही थोड़े से विषय-सुख के लिए ऐसे महादुख सहता है।
अंत में विद्याधरों के सूर्य विभीषण राम से कहते हैं कि हे प्रभु, नारायण लक्ष्मण का यह मृत शरीर अब छोड़ देने योग्य है, अति शोक करना उचित नहीं और इस कलेवर को हृदय से लगाए रखना भी उचित नहीं। पर महाविवेकी और ज्ञानवान होते हुए भी राम कर्म के योग से मोह के वश हैं और बलभद्र-नारायण के राग के कारण लक्ष्मण का शरीर नहीं छोड़ते; जैसे विनयवान शिष्य गुरु की आज्ञा नहीं छोड़ता और सूर्य का उदय अंधकार नष्ट किए बिना नहीं रहता, वैसे ही मोहकर्म रागी जीव को राग से दूर नहीं होने देता।