पर्व 10
राजा सुग्रीव और रानी सुतारा का वृत्तांत
सुग्रीव का सुतारा से विवाह हुआ, और रावण द्वारा पकड़े गए माहिष्मती-नरेश सहस्ररश्मि ने छूटकर दीक्षा ली, जिसके बाद उनके मित्र अनरण्य भी मुनि बने।
कथा खंड राक्षस, वानर और रावण का उदयसारांश
ज्योतिपुर की सुतारा को सुग्रीव और साहसगति दोनों चाहते थे; मुनि की भविष्यवाणी से उसका विवाह सुग्रीव से हुआ और ठुकराया गया साहसगति रूप बदलने वाली विद्या सिद्ध करने हिमवंत पर्वत पर चला गया। इन्द्र पर चढ़ाई के लिए खरदूषण और अनेक विद्याधर राजाओं को साथ लेकर रावण नर्मदा तट पर पहुँचा, जहाँ राजा सहस्ररश्मि की जलक्रीड़ा से उसकी पूजा में विघ्न हुआ। रावण ने उसे बंदी बनाया, पर उसके पिता शतबाहु मुनि के कहने पर छोड़ दिया; सहस्ररश्मि ने दीक्षा ली और उनके मित्र अयोध्या के राजा अनरण्य भी मुनि बने।
क्या हुआ
11 बिंदु
गौतम स्वामी ने राजा श्रेणिक को सुग्रीव और रानी सुतारा का वृत्तांत सुनाया। ज्योतिपुर के राजा अग्निशिखा की पुत्री सुतारा रूप और गुणों में साक्षात् लक्ष्मी जैसी थी; उसे सुग्रीव भी बार-बार माँगते थे और राजा चक्रांक व रानी अनुमति का दुष्ट पुत्र साहसगति भी, जो उसे देखते ही काम से पागल-सा हो गया था।
दुविधा में पड़े अग्निशिखा ने महाज्ञानी मुनिचन्द्र से पूछा, जिन्होंने बताया कि साहसगति अल्पायु है और सुग्रीव दीर्घायु; इसलिए सुतारा का विवाह सुग्रीव से हुआ और उनके अंग और अंगद दो पुत्र हुए। निर्लज्ज साहसगति ने फिर भी सुतारा की आशा नहीं छोड़ी और रूप बदलने वाली शेमुषी नामक विद्या सिद्ध करने हिमवंत पर्वत की अत्यंत विषम गुफा में जा बैठा।
रावण ने दिग्विजय के लिए प्रस्थान किया और सब विद्याधर स्वामियों तथा अंतरद्वीपों के निवासियों को वश में करके, आज्ञा मनवाकर उन्हें उनके देशों का राज्य लौटा दिया; वह नम्रता मात्र से प्रसन्न होता और बड़े राजाओं से पुत्रवत् प्रेम करता। राक्षसवंश और कपिवंश के सब प्रचंड राजा वश में हुए, और संध्याकार, सुवेल, हेमापूर्ण, सुयोधन, हंसद्वीप, वारिहल्ल आदि द्वीपों के राजा भेंट लेकर मिले।
रथनूपुर के राजा इन्द्र को जीतने चले रावण ने पाताल लंका के पास विश्राम किया; रात में चन्द्रनखा के जगाने पर बहनोई खरदूषण ने बाहर आकर रत्नों के अर्घ्य से रावण की पूजा की और मनचाहा रूप धारण करने वाले चौदह हजार विद्याधर दिखाए, तब रावण ने उसे अपना सेनापति बनाया। हिडंब, हैहिडिंब, विकट, त्रिजट, हेमाकूट, सुजर, टंक, किष्किंधाधिपति सुग्रीव, त्रिपुर, मलय, हेमपाल, कोल, वसुंदर आदि अनेक राजा आ मिले और सेना एक हजार अक्षौहिणी से भी अधिक होकर दिन-दिन बढ़ने लगी।
छत्र-चँवर से सुशोभित, पुष्पक विमान पर आरूढ़ रावण इन्द्रजीत, मेघनाद, कुंभकर्ण, विभीषण, खरदूषण, निकुंभ, कुंभ आदि प्रसिद्ध योद्धाओं के साथ चला; विंध्याचल के पास सेना ने विद्या से बनाए महलों में रात बिताई और प्रातः रावण नर्मदा तट पर पहुँचा, जिसकी कहीं तेज, कहीं मंद और कहीं कुंडलाकार धारा देखकर उसका मन प्रसन्न हुआ।
पृथ्वी के सूर्य समान माहिष्मती नगरी का राजा सहस्ररश्मि हजारों स्त्रियों के साथ नर्मदा में जलक्रीड़ा कर रहा था, जिनके चंदन, केशर, पान और अंजन से जल कहीं सफेद, कहीं सुनहरा, कहीं लाल और कहीं श्याम हो गया। प्रवाह की ओर ठहरे रावण स्नान कर नदी किनारे बालू के चबूतरे पर, वैडूर्य मणि के दंडों और मोतियों की झालर वाले चँदोवे के नीचे अर्हंत भगवान की पूजा कर रहे थे कि सहस्ररश्मि के जलयंत्रों से आए तेज प्रवाह ने पूजा में विघ्न डाल दिया।
रावण प्रतिमा जी को लेकर खड़े हो गए और सेवकों से सुना कि कोई महाक्रीड़ावंत पुरुष, जिसके लिए सेना केवल शोभा मात्र है, सुंदर स्त्रियों के साथ जलक्रीड़ा कर रहा है; तब क्रोधित होकर उन्होंने राजाओं को दुष्ट सहस्ररश्मि को पकड़ लाने की आज्ञा दी और स्वयं रत्न-सुवर्ण के पुष्पों से पूजा करने लगे। युद्ध छिड़ने पर आकाश में देवों की वाणी हुई कि विद्याबल से रहित, मायायुद्ध न जानने वाले थोड़े-से भूमिगोचरियों से बहुत-से विद्याधरों का लड़ना घोर अनीति है, और सज्जन विद्याधरों ने लज्जित होकर युद्ध छोड़ दिया।
मुकुट और कवच धारण कर रथ पर चढ़े सहस्ररश्मि ने रावण की सेना को एक योजन पीछे हटा दिया। तब रावण त्रैलोक्यमंडन हाथी पर चढ़ा और बाणवर्षा से उसे रथविहीन कर दिया; हाथी पर चढ़कर लड़ते सहस्ररश्मि ने रावण का कवच भेद दिया और हँसकर कहा कि पहले किसी गुरु से धनुर्विद्या सीख, तब लड़; क्रोधित रावण ने उसके सिर पर भाला मारा और मूर्च्छा से सचेत होते ही उछलकर उसे जीवित पकड़ लिया और बाँधकर अपने डेरे ले आया।
अगले प्रातः सहस्ररश्मि के पिता शतबाहु, जो जंघाचारण ऋद्धि के धारी मुनि हो गए थे, रावण के पास आए; रावण ने भूमि पर मस्तक लगाकर नमस्कार किया और उन्हें काष्ठ के सिंहासन पर विराजमान किया। रावण को शलाका पुरुष जानकर मुनि ने सहस्ररश्मि को छोड़ने को कहा; रावण ने बताया कि रथनूपुर के इन्द्र ने मेरे बाबा राजा माली को मारा था, जल के वेग से मेरी पूजा में विघ्न हुआ, और मैं पहले मानी भूमिगोचरियों को और फिर विद्याधरों को वैसे ही वश करना चाहता हूँ जैसे सीढ़ियाँ चढ़कर मंदिर में जाते हैं; इन्द्रजीत के समर्थन पर उसने मारीच मंत्री से सहस्ररश्मि को छुड़वा दिया।
रावण ने सहस्ररश्मि का बहुत सत्कार कर कहा कि जैसे हम तीन भाई हैं वैसे चौथे तुम हो, तुम्हारी सहायता से मैं इन्द्र को जीतूँगा और रानी मंदोदरी की छोटी बहन स्वयंप्रभा से तुम्हारा विवाह कराऊँगा। पर सहस्ररश्मि ने इन्द्रधनुष-से क्षणभंगुर राज्य और विषयों को धिक्कारा; रावण ने कहा कि मुनिव्रत वृद्धों को शोभा देता है, तो उसने उत्तर दिया कि काल बालक, युवा और वृद्ध सबको खा जाता है, और पुत्र को राज्य देकर, रावण से क्षमा माँगकर पिता के निकट जिनदीक्षा ले ली।
सहस्ररश्मि ने अपने परम मित्र अयोध्या के राजा अनरण्य को वैराग्य का समाचार भेजा, क्योंकि दोनों में वचन था कि जो पहले दीक्षा लेगा वह दूसरे को खबर करेगा। अनरण्य ने आँसू भरकर शोक किया, फिर कहा कि रावण ने शत्रु का वेश बनाकर भी परम मित्र का काम किया जो ऐश्वर्य के पिंजरे से राजा को निकाला, सहस्ररश्मि धन्य है जो रावण रूपी जहाज पाकर संसार-समुद्र तिरेगा; और छोटे पुत्र को राज्य देकर बड़े पुत्र सहित मुनि बन गए।