पर्व 9
बाली मुनि का निरूपण
जिनेन्द्र के सिवा किसी को नमस्कार न करने की प्रतिज्ञा निभाते हुए बाली मुनि बने, कैलाश उठाते रावण को अंगूठे से दबाया और मोक्ष पाया।
कथा खंड राक्षस, वानर और रावण का उदयसारांश
सूर्यरज के पुत्र बाली किष्किंधपुर में राज्य करते थे; इसी बीच खरदूषण ने रावण की बहन चन्द्रनखा का हरण किया और मंदोदरी के समझाने पर रावण ने उसे बहनोई मान लिया। रावण ने बाली से प्रणाम करने को कहा, तो सच्चे देव, शास्त्र और गुरु के सिवा किसी को नमन न करने की प्रतिज्ञा वाले बाली ने सुग्रीव को राज्य देकर दिगंबरी दीक्षा ले ली। बाद में ध्यानस्थ मुनि के ऊपर से विमान न निकल सका और रावण ने कैलाश को उखाड़ना चाहा, तब बाली मुनि ने जिनमंदिरों की रक्षा के लिए अंगूठे से पर्वत दबा दिया। रोने के कारण ‘रावण’ कहलाए दशानन ने पश्चाताप कर जिनेन्द्र की पूजा की और धरणेन्द्र से अमोघविजया शक्ति पाई, और बाली मुनि केवलज्ञान पाकर मोक्ष पधारे।
क्या हुआ
15 बिंदु
किष्किंधपुर के वानरवंशी राजा सूर्यरज और रानी चन्द्रमालिनी के पुत्र बाली उपकारी, शीलवान, विद्वान, दयालु, सम्यग्दृष्टि और सब विद्याओं में पारंगत थे, जो तीनों समय भक्तिपूर्वक जम्बूद्वीप के सभी चैत्यालयों की वंदना करके आते थे। बाली के छोटे भाई सुग्रीव धीर, नीतिवान और विनयी थे और उनकी बहन श्रीप्रभा अनुपम रूपवती थी; सूर्यरज के छोटे भाई ऋक्षरज और रानी हरिकांता के पुत्र नल और नील हुए।
पुत्रों को युवा देखकर सूर्यरज ने विषयों को विषमिश्रित अन्न के समान जाना और बाली को राज्य तथा सुग्रीव को युवराज पद देकर विहतमोह मुनि के शिष्य बनकर दीक्षा ली। वानरवंशियों के मुकुट बाली सैकड़ों रानियों में प्रमुख महापतिव्रता ध्रुवा के साथ राज्य करने लगे और सब विद्याधर राजा उनकी आज्ञा मानते थे।
राजा मेघप्रभ का पुत्र खरदूषण रावण की बहन चन्द्रनखा पर मोहित था। जब रावण राजा प्रवर और रानी आवली की पुत्री तनूदरी के लिए गए थे, तब लंका को रावण से सूनी देखकर वह मायाचार से चन्द्रनखा को हर ले गया; कुंभकर्ण और विभीषण ने यह सोचकर सेना को रोक दिया कि वह न पकड़ा जा सकेगा, न मारने योग्य है।
रावण अकेले तलवार लेकर चल पड़े, पर मंदोदरी ने समझाया कि कन्याएँ दूसरों को देने के लिए ही होती हैं, खरदूषण चौदह हजार विद्याधरों का स्वामी और हजारों विद्याओं का धारक है, हरण के बाद चन्द्रनखा किसी और को नहीं दी जा सकती और उसे मारने से बहन विधवा होगी। रावण ने उसे क्षमा कर दिया, और सूर्यरज के बाद पाताल लंका में राज्य करने वाले चन्द्रोदर विद्याधर को निकालकर खरदूषण चन्द्रनखा सहित वहीं रहने लगा।
चन्द्रोदर की मृत्यु के बाद उसकी गर्भवती पत्नी अनुराधा ने भयानक वन में मणिकांत पर्वत पर पुत्र को जन्म दिया; गर्भ में आते ही माता-पिता को शत्रुओं से विराधना और निष्कासन मिला, इसलिए उसका नाम विराधित रखा गया। राज्यहीन विराधित का कहीं आदर नहीं होता था, इसलिए वह खरदूषण से युद्ध का चिंतन करता हुआ षट्कुलाचलों, सुमेरु आदि पर्वतों और अनेक देशों में भ्रमण करता और योद्धाओं के युद्ध देखता रहता था।
बाली रावण की आज्ञा नहीं मानते थे, अतः रावण ने दूत भेजकर कहलाया कि मैंने तुम्हारे पिता सूर्यरज के शत्रु यम को निकालकर किष्किंधपुर का राज्य दिया, अब शीघ्र आकर प्रणाम करो और अपनी बहन श्रीप्रभा का विवाह मुझसे कराओ। बाली को और सब बातें स्वीकार थीं, पर प्रणाम नहीं, क्योंकि उनकी प्रतिज्ञा थी कि सच्चे देव, शास्त्र और गुरु के सिवा किसी को नमस्कार नहीं करूँगा।
दूत ने कठोर वचन कहे कि या तो अंजुली जोड़ो या सेना जोड़ो, या सेवक बनकर चँवर ढोरो या भागकर दसों दिशाओं में भटको। बाली का व्याघ्रविलंबी नामक सुभट दूत को मारने के लिए खड्ग उठाने लगा, पर बाली ने रोका कि यह तो अपने स्वामी के कहे वचन ही कहता है; दूत से सब सुनकर रावण बड़ी सेना के साथ किष्किंधपुर पर चढ़ आए।
बाली ने मंत्रियों से कहा कि मैं रावण को सेना सहित बाएँ हाथ की हथेली से क्षण भर में चूर कर सकता हूँ, पर क्षणभंगुर भोगों के लिए न जीवों का घात करूँगा, न अपनी प्रतिज्ञा तोड़ूँगा। सुग्रीव से कहा कि रावण को नमस्कार करो या न करो, बहन दो या न दो, मुझे कोई प्रयोजन नहीं; उन्हें राज्य देकर बाली ने गगनचन्द्र मुनि से दिगंबरी दीक्षा ली, और सुग्रीव ने बहन श्रीप्रभा का विवाह रावण से कराकर उसकी आज्ञा में किष्किंधपुर का राज्य किया।
रावण ने पृथ्वी की सब रूपवती विद्याधर कन्याओं से बलपूर्वक विवाह किया। नित्यालोक नगर के राजा नित्यालोक और रानी श्रीदेवी की पुत्री रत्नावली से विवाह करके लौटते समय कैलाश पर्वत के ऊपर उनका पुष्पक विमान रुक गया; मारीच मंत्री ने बताया कि यहाँ कोई मुनि ग्रीष्म ऋतु में सूर्य के सम्मुख शिला पर आतापन योग धारण किए खड़े हैं और हठ से ऊपर से जाने पर विमान के खंड-खंड हो जाएँगे।
रावण ने नीचे उतरकर बाली मुनि को कायोत्सर्ग मुद्रा में निश्चल खड़े देखा, हाथी की सूँड़ जैसी भुजाएँ लटकाए और चंदन के वृक्ष की तरह शरीर पर सर्प लिपटाए। पूर्व बैर याद कर उसने मुनि पर अभिमान से विमान रोकने का आरोप लगाया और विद्याओं के बल से विकराल महारूप बनाकर धरती भेदी तथा पर्वत के नीचे घुसकर कैलाश को उखाड़कर समुद्र में फेंकने का यत्न किया; जीव-जंतु कोलाहल करने लगे, झरने टूट पड़े, वृक्ष फट गए और अप्सराएँ आकाश में उड़ गईं।
क्रोधरहित बाली मुनि ने विचारा कि भरत चक्रवर्ती द्वारा बनवाए गए ऊँचे रत्नमय चैत्यालय नष्ट न हों और यहाँ के जीवों को बाधा न हो, अतः उन्होंने पैर का अंगूठा हल्का-सा दबाया। भार से दबकर रावण का विद्या से बना रूप नष्ट हो गया, नेत्रों से रक्त बहने लगा, मुकुट टूट गया, घुटने और जाँघें छिल गईं और वह दीन होकर रोने लगा; रोने के कारण ही अब तक दशानन कहलाने वाला वह पृथ्वी पर रावण कहलाया।
रानियाँ विलाप करने लगीं; मंत्री और सेनापति पहले युद्ध को तैयार हुए, फिर मुनि का अतिशय जानकर सबने आयुध डाल दिए। मुनि की कायबल ऋद्धि के प्रभाव से देवदुंदुभि बजने लगी, कल्पवृक्षों के फूलों की वर्षा हुई और आकाश में देव-देवांगनाएँ नृत्य करने लगीं; तब परम दयालु मुनि ने अंगूठा ढीला कर दिया।
रावण ने बाहर निकलकर मुनि को नमस्कार कर क्षमा माँगी और स्तुति की कि आपने घर में ही जिनेन्द्र, मुनीन्द्र और जिनागम के सिवा किसी को नमस्कार न करने की जो प्रतिज्ञा की थी, यह उसी श्रद्धा का फल है; आप सुमेरु हैं और मैं सरसों, आपने मरते हुए को प्राणदान दिया। तीन प्रदक्षिणा देकर उसने चन्द्रहास खड्ग पृथ्वी पर रखा और रानियों सहित पास के जिनमंदिरों में पूजा की; अपनी भुजा से नसरूपी तार निकालकर वीणा की तरह बजाते हुए उसने ऋषभ से मुनिसुव्रत तक के तीर्थंकरों, आगे होने वाले नमि, नेमि, पार्श्वनाथ और वर्धमान, भूत और भविष्य की चौबीसियों तथा सब साधुओं और सिद्धों की स्तुति गाई।
रावण की स्तुति से धरणेन्द्र का आसन काँपा; अवधिज्ञान से जानकर नागराज पाताल से कैलाश आए, जिनपूजा की और रावण से मनचाहा वर माँगने को कहा। रावण ने कहा कि जिनवंदना से बढ़कर क्या माँगूँ, और धरणेन्द्र ने भी माना कि जिनभक्ति ही मुक्ति तक देती है, फिर भी अपना आना व्यर्थ न हो इसलिए अग्निज्वालाओं से मंडित अमोघविजया शक्ति (विद्या) दी, जो विपत्ति में शत्रु का नाश और रावण की रक्षा करेगी और जिससे देव भी डरते हैं; किसी से कुछ लेना लघुता लगने पर भी रावण ने उनकी आज्ञा का मान रखकर उसे ग्रहण किया।
रावण एक मास कैलाश पर रहकर चैत्यालयों की पूजा और बाली मुनि की स्तुति करके लौटा और जाना कि जो इन्द्रियों को जीतते हैं उन्हें मैं नहीं जीत सकता, इसलिए राजाओं को साधुओं की सेवा ही करनी चाहिए। बाली मुनि ने मन के क्षोभ से उत्पन्न दोष के लिए गुरुओं से प्रायश्चित लिया, जैसे विष्णुकुमार मुनि ने मुनियों की रक्षा के लिए बलि का पराभव कर प्रायश्चित लिया था, और फिर महासंवर तथा निर्जरा से केवलज्ञान पाकर अष्टकर्मों से रहित हो मोक्ष पधारे।