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पर्व 8

दशानन के कुटुंबादि का परिचय और वैभव का दिग्दर्शन

रावण मंदोदरी से विवाह करता है, वैश्रवण को हराकर पुष्पक विमान पाता है, वानर राजाओं को यम के कृत्रिम नरक से छुड़ाता है और लंका में प्रवेश करता है।

कथा खंड राक्षस, वानर और रावण का उदय

सारांश

दैत्यों के अधिपति मय अपनी पुत्री मंदोदरी रावण को देते हैं, रावण छह हज़ार राजकन्याओं से भी विवाह करता है, कुंभकर्ण और विभीषण के विवाह होते हैं और मंदोदरी इन्द्रजीत तथा मेघनाद को जन्म देती है। रावण अपने मौसेरे भाई वैश्रवण को हराता है, जो दीक्षा लेकर मोक्ष पाते हैं, पुष्पक विमान लेता है, सुमाली से हरिषेण चक्रवर्ती की कथा सुनता है और त्रैलोक्यमंडन हाथी को वश करता है। फिर वह इन्द्र के लोकपाल यम को हराकर सूर्यरज और ऋक्षरज को यम के कृत्रिम नरक से छुड़ाता है, उन्हें उनके नगर लौटाता है और वैभव सहित लंका में प्रवेश करता है।

क्या हुआ

22 बिंदु

  1. दक्षिण श्रेणी के असुरसंगीत नगर में विद्याधर राजा मय राज्य करते थे; जैसे रावण के योद्धा राक्षस और इन्द्र-कुल के योद्धा देव कहलाते थे, वैसे ही मय के बड़े योद्धा दैत्य कहलाते थे। रानी हेमवती से जन्मी सुंदर पुत्री मंदोदरी के विवाह की चिंता में उन्होंने रानी और मंत्रियों से विचार किया; किसी ने इन्द्र का नाम लिया, पर मय ने रावण को चुना जिसे थोड़े ही दिनों में सब विद्याएँ सिद्ध हुई थीं, और मारीच आदि सब मंत्रियों ने यह स्वीकार किया।

  2. शुभ मुहूर्त देखकर मय मंदोदरी और मारीच को साथ लेकर भीम वन पहुँचे, जहाँ रावण दो उपवास कर चंद्रहास खड्ग सिद्ध करके सुमेरु के चैत्यालयों की वंदना को गए थे। स्वयंप्रभ नगर के पास एक ऊँचे महल की सातवीं मंजिल पर उन्हें रावण की बहन चंद्रनखा मिली, जो भगवान चंद्रप्रभ के चैत्यालय में रहकर खड्ग की रक्षा कर रही थी; उसने उन्हें संबंधी जानकर आदर से बिठाया।

  3. तभी रावण आकाश मार्ग से आए; मय के मंत्री मारीच, वज्रमध्य, वज्रसेन, उग्र, नक्र, शुक्र आदि ने उनके अनुपम रूप की प्रशंसा कर मय का परिचय दैत्यों के अधिपति के रूप में दिया, और जिनेन्द्र-पूजा के बाद रावण की दृष्टि मंदोदरी पर पड़ी। रावण सोचने लगे कि यह श्री, ह्री, धृति, कीर्ति, बुद्धि, लक्ष्मी या सरस्वती में से कौन है, इससे विवाह न हो तो जीवन तृणवत् वृथा है; उनका अभिप्राय जानकर मय ने मंदोदरी को पास बुलाकर कहा कि आप ही इसके पति हैं, और उसी दिन उसी समय विवाह हो गया।

  4. रावण की हज़ारों रानियों में मंदोदरी पटरानी हुई, जो पति की आज्ञाकारिणी थी, और मय पुत्री का विवाह कर निश्चिंत पर वियोग के शोक सहित घर लौटे। रावण इन्द्र-इन्द्राणी के समान सुमेरु के नंदन वन आदि में रमे और विद्याबल से अनेक रूप धरकर अनेक रानियों के महलों में क्रीड़ा करते: कभी सूर्य-से तपते, कभी चाँदनी-से शीतल, कभी पवन से तेज अश्व बनते, क्षण में अदृश्य, क्षण में सूक्ष्म, क्षण में स्थूल हो जाते।

  5. मेघवर पर्वत पर रावण ने अर्जुन आदि वृक्षों की छाया वाली निर्मल बावड़ी में क्रीड़ा करती छह हज़ार राजकन्याएँ देखीं; वे उनके साथ जलक्रीड़ा करने लगे और सब कन्याएँ उन पर मोहित हो गईं। उनमें मुख्य थीं राजा सुरसुंदर और रानी सर्वश्री की पुत्री पद्मावती, राजा बुध और रानी मनोवेगा की पुत्री अशोकलता, तथा राजा कनक और रानी संध्या की पुत्री विद्युत्प्रभा; रावण ने इनसे गंधर्व विवाह किया।

  6. कन्याओं के साथ आए खोजों और सहेलियों से समाचार पाकर उनके पिताओं ने सामंत भेजे, जिन्हें अकेले रावण ने क्षणमात्र में जीत लिया; वे काँपते हुए राजा सुरसुंदर के पास जाकर बोले कि रथनूपुर का इन्द्र भी रत्नश्रवा के पुत्र रावण के बराबर नहीं, तब सुरसुंदर बुध और कनक सहित बड़ी सेना लेकर आए। डरी हुई कन्याओं ने रावण से पास के जिनमंदिर में छिप जाने को कहा, तो रावण बोले कि बहुत से कौए मिलकर भी गरुड़ को नहीं जीत सकते, और उनके पिता, भाइयों और कुटुंब की रक्षा का वचन दिया।

  7. रंकों को मारने से क्या, यह सोचकर रावण ने तामस शस्त्रों से राजाओं को मूर्छित कर नागपाश से बाँध लिया, फिर कन्याओं की विनती पर छोड़ दिया और उन्हें परम संबंधी कहकर सम्मान दिया; रावण के शौर्य और विनय से प्रसन्न राजाओं ने विधिपूर्वक अपनी पुत्रियों का पाणिग्रहण कराया और तीन दिन महोत्सव रहा, फिर रावण स्वयंप्रभ नगर लौटे जहाँ कुंभकर्ण और विभीषण उनकी अगवानी को आए।

  8. धर्मध्यान में प्रवीण, महायोद्धा और कला-गुणों में निपुण कुंभकर्ण (भानुकर्ण) ने कुंभपुर के राजा मंदोदर और रानी स्वरूपा की पुत्री तडिन्माला से विवाह किया। गौतम स्वामी कहते हैं कि अन्य मत वाले कहते हैं कि कुंभकर्ण मांस-रुधिर खाते और छह महीने सोते थे, पर उनका आहार अति पवित्र था, वे पहले मुनियों और आर्यिकाओं को आहार देकर तथा दुखी-भूखे जीवों को भोजन कराकर कुटुंब सहित भोजन करते, मांस नहीं खाते और आधी रात के पिछले भाग में ही सोते थे; चरमशरीरी पुरुषों पर झूठा दोष लगाना महापाप है।

  9. विभीषण ने दक्षिण श्रेणी के ज्योतिप्रभ नगर के राजा विशुद्धकमल, जो मय के बड़े मित्र थे, और रानी नंदनमाला की लक्ष्मी से भी सुंदर पुत्री राजीवसरसी से विवाह किया। मंदोदरी के माता-पिता उसे गर्भावस्था में अपने घर ले आए, जहाँ इन्द्रजीत का जन्म हुआ, जिसका नाम सारी पृथ्वी पर प्रसिद्ध हुआ; वह नाना के घर दूज के चंद्रमा-सा बढ़ा, फिर रावण ने पुत्र सहित मंदोदरी को बुला लिया, और दूसरे गर्भ में भी नाना के घर मेघनाद का जन्म हुआ; दोनों पुत्र पृथ्वी का भार उठाने योग्य सुंदर युवा हुए।

  10. वैश्रवण जिन हज़ारों नगरों में राज्य करता था, वहाँ से कुंभकर्ण इन्द्र और वैश्रवण का जो माल होता उसे छीनकर स्वयंप्रभ नगर ले आते। तब वैश्रवण का दूत सुमाली के पास आकर बोला कि आप ज्ञानी और कुलीन होकर भी अपने पोतों को क्यों नहीं रोकते; क्या माली के मरने से आपके कुल का भला हुआ था, क्या आप इन्द्र का प्रताप भूल गए जो साँप के मुँह में मेंढक-से खेलते हो; ये पोते चोर हैं, इन्हें मुझे सौंप दो, नहीं तो सारा कुटुंब बेड़ियों में बँधा नरक जैसे गड्ढे में गिरेगा; कठिनाई से पाताल लंका से निकले हो, क्या फिर वहीं जाना चाहते हो।

  11. दूत के कठोर वचन सुनकर रावण क्रोध से भर उठे और बोले कि कौन है वैश्रवण और कौन है इन्द्र, जो हमारी कुल-परंपरा से चली आई लंका को दबाए बैठे हैं; सेवकों से इन्द्र कहलवाने से कोई इन्द्र नहीं हो जाता; और उन्होंने म्यान से तलवार निकाल ली। तब न्यायवेत्ता विभीषण ने विनय से कहा कि यह पराया नौकर है, तोते की तरह वही बोलता है जो उसका स्वामी बुलवाता है, और दीनों को मारने से अपकीर्ति होती है; इस प्रकार उन्होंने रावण का क्रोध शांत कर दूत को बचाया और सभा के लोगों ने उसे बाहर निकाल दिया।

  12. दूत से सब सुनकर वैश्रवण यक्षों के साथ, क्योंकि उसके वंश के विद्याधर यक्ष कहलाते थे, युद्ध को निकला और रावण कुंभकर्ण आदि भाइयों सहित पहले ही बाहर आ गए; गुंज नामक पर्वत पर दोनों सेनाओं का संग्राम हुआ। बहुत से राक्षस, कपिवंशी और यक्ष मारे गए; यक्षों के आगे बढ़ने पर रावण स्वयं सफेद छत्र और इन्द्रधनुष-से रंगीन कवच के साथ रण में आए और जैसे सिंह हाथियों को विदारता है वैसे शत्रु-सेना को नष्ट किया; कोई मनुष्य, रथ, अश्व या विमान उनके बाणों से न बचा।

  13. रावण को रण में देखकर वैश्रवण को भाईपने का स्नेह आया और वह वैसे ही पछताया जैसे बाहुबली भरत से युद्ध कर पछताए थे; उसने कहा कि मैं तुम्हारी बड़ी मौसी का पुत्र हूँ, क्षणभंगुर राजलक्ष्मी के लिए पाप मत करो, पर रावण ने कहा कि यह धर्मश्रवण का समय नहीं, तू तलवार के मार्ग में आ या चरणों में गिर, और यदि तू धनपाल है तो हमारा भंडारी बन। रावण ने बड़े होने के नाते पहला प्रहार वैश्रवण को करने दिया, उसके बाण काटकर बाणों का मंडप बना दिया, और जब वैश्रवण ने अर्धचंद्र बाण से उनका धनुष छेदकर उन्हें रथहीन किया तो वे मेघनाद रथ पर चढ़े, उल्कापात समान वज्रदंडों से उसका कवच चूर कर हृदय पर भिंडिमाल मारी; वैश्रवण मूर्छित हुआ और उसके लोग उसे यक्षपुर ले गए।

  14. वैद्यों के उपचार से स्वस्थ होकर वैश्रवण ने विचार किया कि जैसे पुष्परहित वृक्ष, सींग टूटा बैल और कमल बिना सरोवर शोभा नहीं पाते, वैसे ही शूरवीरता बिना उसकी शोभा नहीं; सुख-दुख का मूल कारण कर्म है, दूसरे प्राणी निमित्त मात्र हैं; केकसी का पुत्र रावण उसके कल्याण का कारण हुआ जिसने उसे गृहस्थी की फाँसी से छुड़ाया, और संग्राम का कारण कुंभकर्ण उसके ज्ञान का निमित्त बना। यह सोचकर उसने दिगंबर दीक्षा धारण की और परम तप की आराधना कर मोक्ष पाया।

  15. कुल का अपमान धोकर रावण सुखी हुए और भाइयों ने उन्हें राक्षसवंश का शिखर माना; उन्होंने किसी का कुछ नहीं लिया, केवल वैश्रवण का रत्नमालाओं और मोतियों की झालरों से युक्त पुष्पक विमान ग्रहण किया, और विद्यामय अनेक विमान होते हुए भी विशेष अनुराग से उसमें पिता रत्नश्रवा, माता केकसी, सेनापति, भाइयों और पुत्रों सहित बैठे तथा उसके मध्य के महाकमलवन में मंदोदरी आदि रानियों सहित विराजे। भाई कुंभकर्ण हाथी पर और विभीषण रथ पर पीछे चले, और मय अपने भाइयों तथा मारीच, अंबर, वज्रोदर, सारण, सुनय, शुक आदि मंत्रियों सहित साथ चले; इस प्रकार पृथ्वी पर विहार करते हुए रावण ने समस्त दक्षिण दिशा वश में की।

  16. बिना सरोवर के पर्वत-शिखर पर निश्चल कमलवन-सा देखकर रावण ने दादा सुमाली से पूछा; सुमाली ने नमः सिद्धेभ्यः कहकर बताया कि ये हरिषेण चक्रवर्ती के बनवाए पद्मराग मणि के चैत्यालय हैं जिन पर ध्वजाएँ फहरा रही हैं, और उनकी कथा सुनाई। कांपिल्य नगर के राजा सिंहध्वज की श्रेष्ठ रानी और हरिषेण की माता वप्रा हर अष्टाह्निका में जिन-रथयात्रा कराती थीं, पर उनकी सौत महालक्ष्मी ने कहा कि पहले उसका ब्रह्मरथ निकलेगा, तब वप्रा ने प्रतिज्ञा की कि वीतराग भगवान का रथ पहले निकले तभी वे आहार लेंगी।

  17. माता के आँसू न देख सकने और पिता से कुछ न कह सकने के कारण हरिषेण वन चले गए; वहाँ शतमन्यु तापस के आश्रम में उन्हें मदनावली मिली, जो राजा कालकल्प के आक्रमण के समय चंपा नगरी के राजा जनमेजय की माता नागमती के साथ सुरंग से निकलकर आई थी; मुनि ने कहा था कि वह चक्रवर्ती का स्त्रीरत्न होगी, पर तापसों ने अपकीर्ति के भय से हरिषेण को निकाल दिया। उसके विरह में भटकते हुए वे सिंधुनंदन नगर पहुँचे, जहाँ मदमत्त हाथी से स्त्रियों को बचाने के लिए वे उछलकर उसके दाँतों पर पैर रख कुंभस्थल पर चढ़े और उसे वश में किया, और प्रसन्न राजा ने अपनी सौ कन्याएँ उनसे ब्याहीं।

  18. सूर्योदय नगर के विद्याधर राजा शक्रधनु और रानी धारा की पुत्री जयचंद्रा ने उनका चित्र देखकर अन्य किसी से विवाह न करने का प्रण किया था; उसकी सखी वेगवती रात में हरिषेण को आकाश मार्ग से वहाँ ले गई और उनका विवाह हुआ; कन्या के मामा के पुत्र गंगाधर और महीधर भूमिगोचरी से विवाह पर क्रुद्ध होकर लड़ने आए, पर हरिषेण ने उन्हें भगा दिया और उसी समय चक्ररत्न प्रकट होने से वे दसवें चक्रवर्ती हुए। फिर उन्होंने मदनावली से विवाह किया, बत्तीस हज़ार मुकुटबद्ध राजाओं सहित कांपिल्य लौटकर माता को प्रणाम किया, अष्टाह्निका में भगवान का रथ प्रभावना सहित पहले निकाला, अनेक रत्न-स्वर्णमय चैत्यालय बनवाए और अंत में मुनि बनकर मोक्ष पाया।

  19. सम्मेदशिखर के समीप डेरा डाले रावण ने प्रातः मेघ-गर्जना-सी ध्वनि सुनी, जिससे सेना डरी, हाथी बंधन तोड़कर भागे और घोड़े हिनहिनाए; सेनापति प्रहस्त ने देखकर बताया कि यह पर्वताकार मदोन्मत्त हाथी है, जिसे इन्द्र भी न पकड़ सका। रावण ने पुष्पक से उसे देखा, उतरकर शंख बजाया, झपटते हाथी की ओर अपने उत्तरासन की गेंद फेंकी, उछलकर उसके कुंभस्थल पर मुक्का मारा, दोनों दाँतों के बीच से निकलकर उसकी पीठ पर जा बैठे और हाथी विनयी शिष्य-सा खड़ा हो गया; आकाश से पुष्पवृष्टि हुई, रावण ने उसका नाम त्रैलोक्यमंडन रखा और सम्मेदशिखर की यात्रा की।

  20. अगले दिन घायल विद्याधर शाखाबली, जिसकी माता सुश्रोणी थी और जो ऋक्षरज का प्यारा सेवक था, रोता हुआ आया और बताया कि आज दसवाँ दिन है, रावण के बल के भरोसे सूर्यरज और ऋक्षरज अपना किष्किंधपुर लेने अलंकारोदय (पाताल लंका) से निकले थे। इन्द्र के दिक्पाल यम ने ऋक्षरज को पकड़ लिया और सूर्यरज को घायल किया, फिर नरक नाम का बंदीगृह बनाकर उसमें वैतरणी नदी आदि की रचना की और दोनों भाइयों सहित सब बंदियों को उसमें डाल दिया।

  21. रावण तुरंत चले, किष्किंधपुर के दक्षिण में यम द्वारा खोदकर बनाए कृत्रिम नरक के रखवालों को मार भगाया, सूर्यरज, ऋक्षरज आदि सब प्राणियों को दुखसागर से निकाला और वह नरक नष्ट कर दिया; विभीषण ने बाणों से यम की सेना को भगाया, और रावण ने यम के सारथी को गिराकर एक बाण से यम को भी रथ से गिरा दिया। यम दक्षिण दिशा का दिक्पालपना छोड़कर कुटुंब सहित रथनूपुर भागा और इन्द्र से बोला कि सुमाली का पोता दशानन पहले वैश्रवण को जीत चुका है, जो मुनि बन गया, अब उसने मुझे भी जीत लिया; यम का जमाई इन्द्र युद्ध को उद्यत हुआ पर मंत्रियों ने रोका, तब उसने यम को दिलासा देकर असुरसंगीत नगर का राज्य दिया, और ऐश्वर्य के मद में दोनों मानभंग का दुख भूल गए।

  22. रावण ने किष्किंधपुर सूर्यरज को और किष्कुपुर ऋक्षरज को दिया, और उनके प्रभाव से वानरवंशी सुख से रहे; फिर वे दिग्विजय को निकले और बड़े-बड़े राजा प्रतिदिन आकर मिलते गए। पुष्पक विमान से त्रिकूटाचल पहुँचकर उन्होंने सब राक्षसों को वस्त्राभूषण दिए और रत्नों के कोट, गहरी खाई तथा स्फटिक, पद्मराग और मरकत मणि के महलों वाली लंका में वाद्यों और जयघोष के बीच प्रवेश किया; अजितनाथ भगवान के समय से उनके घर के शुभचिंतक लंकावासी अर्घ्य, फल, पुष्प और रत्न लेकर मिले, और अंत में गौतम स्वामी उपदेश देते हैं कि पुण्य से यश और संपदा मिलती है तथा पाँचों इंद्रियों के विषय जीव के महाशत्रु हैं।