पर्व 50
हनुमान का अपने नाना राजा महेन्द्र के साथ युद्ध और मिलन
हनुमान ने अंजना को शरण न देने वाले अपने नाना महेंद्र को युद्ध में हराया, फिर उनसे मेल कर उन्हें राम की सेवा में भेजा।
कथा खंड सीता हरण और हनुमान का दौत्यसारांश
लंका की ओर जाते हुए हनुमान ने अपने नाना महेंद्र का पर्वत-शिखर पर बसा नगर देखा, जिन्होंने दुख के समय अपनी पुत्री अंजना को शरण नहीं दी थी, और उनका मान नष्ट करने का निश्चय किया। उन्होंने पहले अपने मामा प्रसन्नकीर्ति को, जिसे रथनूपुर का इंद्र भी नहीं जीत सका था, और फिर स्वयं महेंद्र को हराकर पकड़ लिया, तब महेंद्र ने उनकी प्रशंसा कर उन्हें हृदय से लगाया और हनुमान ने क्षमा माँगी। हनुमान लंका की ओर बढ़ गए, और महेंद्र रानी तथा प्रसन्नकीर्ति सहित अंजना से मिलकर हर्षित हुए, फिर किष्किंधापुर गए जहाँ राम ने उनका बहुत आदर किया।
क्या हुआ
5 बिंदु
भाई भामंडल के सीता को लेने जाने के समान लंका की ओर जाते हुए हनुमान ने पर्वत के शिखर पर बसा राजा महेंद्र का नगर देखा और याद किया कि इन्हीं नाना ने दुख के समय अपनी पुत्री अंजना को शरण नहीं दी, जिससे वह वन-वन भटकी, अमितगति मुनिराज ने उसे अमृत समान वचनों से शांति दी और गुफा में, जहाँ कोई बंधु-परिवार नहीं था, मेरा जन्म हुआ। यह क्षत्रियों का धर्म नहीं, यह सोचकर उन्होंने उनका मान-गर्व नष्ट करने के लिए रण के नगाड़े, ढोल और शंख बजवाए।
राजा महेंद्र छत्र सहित रथ पर चढ़कर धनुष चढ़ाए हनुमान पर आए, पर हनुमान ने उनका रथ तोड़ दिया और धनुष छेद दिया, और जब वे दूसरा धनुष लेने गए तो रथ के घोड़े छुड़ा दिए, जिससे महेंद्र रथ के पास ही भटकते रह गए। फिर महेंद्र का पुत्र, हनुमान का मामा प्रसन्नकीर्ति विमान में बैठकर आया, पर जैसे मुनि को काम का कोई बाण नहीं लगता वैसे उसका एक भी शस्त्र हनुमान को नहीं लगा; हनुमान ने विद्याबल से उसके सब शस्त्र नष्ट कर उसे ऐसे पकड़ लिया जैसे गरुड़ सर्प को पकड़ता है।
पुत्र को पकड़ा देख महाक्रोधित महेंद्र, जैसे साहसगति राम पर आया था, वैसे हनुमान पर आए, और नाना-नाती एक-दूसरे को धिक्कारते हुए करौत, कुठार, खड्ग, फरसे, मुद्गर, गदा तथा शाल और वट के वृक्षों से लड़े, पर हनुमान ने विद्या के प्रभाव से सब नष्ट कर दिए। अंत में हनुमान अपने रथ से उछलकर महेंद्र के रथ में कूदे, हाथी की सूँड के समान उन्हें पकड़ लिया और अपने रथ में ले आए, और चारों ओर जय-जयकार हुआ।
महेंद्र ने प्रशंसा की कि विजयार्ध के विद्याधरों में महिमावान मेरे पुत्र प्रसन्नकीर्ति को आज तक किसी ने नहीं जीता था, रथनूपुर का राजा इंद्र भी नहीं, उसे तूने जीता और पकड़ा; तूने हमारा सारा कुल प्रकाशित किया है और तू चरमशरीरी है, अवश्य योगीश्वर होगा। स्नेह से आँखों में आँसू भरकर नाना ने उनका मस्तक चूमा और हृदय से लगाया, हनुमान ने हाथ जोड़कर बालबुद्धि से हुए अविनय की क्षमा माँगी, राम के किष्किंधापुर आने और अपने लंका जाने का वृत्तांत कहा, और नाना से किष्किंधापुर जाकर राम की सेवा करने को कहा।
हनुमान आकाशमार्ग से लंका की ओर चले, और राजा महेंद्र रानी तथा पुत्र प्रसन्नकीर्ति सहित राजकुमारी अंजना के पास गए, जहाँ अंजना का माता, पिता और भाई से मिलन हुआ और सबको महाहर्ष हुआ। फिर महेंद्र किष्किंधापुर आए, जहाँ सुग्रीव और विराधित आदि उन्हें आगे जाकर राम के पास लाए और राम बहुत आदर से मिले; ग्रंथ कहता है कि जिन्होंने पूर्वजन्म में दान, व्रत, तप आदि महापुण्य किया है, उन राम जैसे महापुरुषों की देव, विद्याधर और भूमिगोचरी सब सेवा करते हैं।