पर्व 49
हनुमान का लंका को प्रस्थान
सुग्रीव पर राम के उपकार से प्रसन्न हनुमान किष्किंधापुर में राम से मिलते हैं और उनकी मुद्रिका लेकर लंका को प्रस्थान करते हैं।
कथा खंड सीता हरण और हनुमान का दौत्यसारांश
दूत श्रीभूत हनुमान के श्रीपुर नगर पहुँचा, जहाँ खरदूषण की मृत्यु का समाचार सुनकर हनुमान की रानी, खरदूषण की पुत्री अनंगकुसुमा शोक में डूब गई, जबकि सुग्रीव की पुत्री रानी पद्मरागा पिता का दुख दूर होने से हर्षित हुई। राम ने साहसगति से सुग्रीव को छुड़ाया, यह सुनकर हनुमान का क्रोध कृतज्ञता में बदल गया और वे किष्किंधापुर आए, जहाँ राम के दर्शन से अभिभूत होकर उन्होंने रावण को समझाकर सीता को लाने का वचन दिया। राम ने सीता के लिए संदेश और विश्वास के लिए अपनी मुद्रिका दी तथा उनका चूड़ामणि लाने को कहा, और हनुमान महाविभूति के साथ लंका की ओर चल पड़े।
क्या हुआ
6 बिंदु
दूत श्रीभूत आकाशमार्ग से अनेक जिनभवनों और इंद्र के महल जैसे राजमंदिर से शोभित श्रीपुर नगर पहुँचा, जहाँ मर्यादा नाम की द्वारपालिका उसे हनुमान की रानी, खरदूषण की पुत्री और रावण की भानजी अनंगकुसुमा के पास ले गई; दंडकवन में राम-लक्ष्मण का आना, शंबूक का मरण और बड़े योद्धाओं सहित खरदूषण का मरण सुनकर वह मूर्छित हो गई और फिर विलाप करने लगी, हाय पिता! हाय भाई! भयानक वन में भूमिगोचरियों ने तुम्हें कैसे मारा? सखियों के बड़ी कठिनाई से समझाने पर जिनमार्ग में प्रवीण उसने संसार का स्वरूप जानकर पिता के मरण की लौकिक क्रियाएँ कीं।
खरदूषण की मृत्यु से हनुमान की भौंहें तन गईं और मुख तथा नेत्र लाल हो गए, पर जब दूत ने बताया कि साहसगति सुग्रीव का रूप बनाकर आया था और राम को देखते ही अतिशय से उसकी वैताली विद्या भाग गई तथा राम ने उसे महायुद्ध में मारा, तो हनुमान का मुखकमल खिल गया और वे बोले कि श्रीराम ने अपयश रूपी गहरे कुएँ में डूबे सुवर्ण-कलश समान सुग्रीव के गोत्र को गुण रूपी हाथों से बाहर निकाला है। हनुमान की दूसरी रानी, सुग्रीव की पुत्री पद्मरागा ने हर्षित होकर दान-पूजा आदि शुभ कार्य किए, और इस प्रकार एक ही घर में अनंगकुसुमा को शोक और पद्मरागा को हर्ष हुआ।
दोनों रानियों को समझाकर हनुमान महाऋद्धि और अनेक राजाओं सहित चले, उनके रत्नमय विमान की किरणों से सूर्य की प्रभा मंद पड़ गई, और उनके बाजों की ध्वनि सुनकर कपिवंशी मेघ-गर्जना सुनते मोरों की तरह हर्षित हुए; सुग्रीव ने नगर को ध्वजाओं और रत्नों के तोरणों से सजाया, उनका आदर किया और राम का सारा वृत्तांत कहा। दूर से राम को देखकर, जिनके लंबे, काले, घुँघराले केश, कमल नयन, समचतुरस्र संस्थान और वज्रवृषभनाराच संहनन था, पर जो सीता के वियोग में शची रहित इंद्र के समान व्याकुल थे, इंद्र को भी देख चुके हनुमान का हृदय परम आनंद से झुक गया, और राम ने उठकर उन्हें हृदय से लगाया।
राम की सभा में सुमित्रा के पुत्र, श्याम शरीर पर पीतांबर धारे, बिजली सहित मेघ के समान लक्ष्मण, सुग्रीव, विराधित, सुग्रीव के दोनों पुत्र अंगज और अंगद, नल, नील और सैकड़ों राजा बैठे थे, और हनुमान ने राम की प्रत्यक्ष स्तुति की कि जिनके पिता दशरथ, माता कौशल्या, भाई लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और साले भामंडल हैं, उन आपने सीता के स्वयंवर में हजारों देवों से रक्षित वज्रावर्त धनुष चढ़ाया, पिता के वचन के लिए राज्य छोड़ा और कपिवंशियों का कलंक दूर किया। कृतघ्न पापियों में महापापी होता है, इसलिए अपना शरीर आपके कार्य को अर्पित है, मैं लंकापति को समझाकर आपकी रानी ले आऊँगा; जाम्बूनद मंत्री ने कहा, हे वत्स वायुपुत्र, तू ही हम सबका सहारा है, सावधानी से लंका जाना और किसी से विरोध न करना।
एकांत में राम ने हनुमान से सीता के लिए संदेश कहा कि हे महासती! आपके वियोग में मेरा मन एक क्षण भी शांत नहीं, जब तक आप दूसरों के अधीन हैं तब तक हम अपना पुरुषार्थ कुछ नहीं मानते, और आप प्राण न छोड़ना, क्योंकि विवेकी जीव आर्त-रौद्र ध्यान से नहीं मरते, मनुष्य जन्म दुर्लभ है, उसमें जिनधर्म और उससे भी दुर्लभ समाधिमरण है। उन्होंने सीता को विश्वास दिलाने के लिए अपने हाथ की मुद्रिका दी और सीता का महाप्रभावशाली चूड़ामणि लाने को कहा।
राम और लक्ष्मण को प्रणाम कर हनुमान ने सुग्रीव से कहा कि जब तक मैं न लौटूँ आप बहुत सावधानी से यहीं रहना, फिर हंस समान सफेद चमरों, पवन समान घोड़ों, पर्वत समान हाथियों और देवसेना जैसी सेना सहित विमान में आकाश में चले और राम आदि सबने उन्हें जाते देखा। गौतम स्वामी कहते हैं कि बिना कारण उपकार करने वालों की बराबरी इंद्र, चंद्र और कुबेर भी नहीं कर सकते, और उपकार न करने वाले कृतघ्न पापी नरक-निगोद के पात्र होते हैं।