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पर्व 48

लक्ष्मण का कोटिशिला उठाकर नारायण होने की परीक्षा करना

सुग्रीव की खोज से रत्नजटी द्वारा सीता का समाचार मिलता है, और लक्ष्मण वह कोटिशिला उठाते हैं जिसे उठाने वाले से रावण की मृत्यु बताई गई थी।

कथा खंड सीता हरण और हनुमान का दौत्य

सारांश

सीता के ध्यान में डूबे राम सुग्रीव की पुत्रियों की ओर ध्यान नहीं देते, और जब अपना सुख पाकर सुग्रीव प्रतिज्ञा भूल जाता है तो क्रोधित लक्ष्मण उसे याद दिलाते हैं। सुग्रीव की खोज में वह विद्याधर रत्नजटी मिलता है जिसकी विद्याएँ रावण ने छेद दी थीं, और वह बताता है कि रावण सीता को हर ले गया; भयभीत विद्याधर लंका की शक्ति का वर्णन कर राम से हठ छोड़ने को कहते हैं, पर राम-लक्ष्मण दृष्टांतों से उत्तर देते हैं। अनंतवीर्य केवली की यह भविष्यवाणी सुनकर कि जो कोटिशिला उठाएगा उससे रावण की मृत्यु होगी, लक्ष्मण शिला उठाते हैं, और सभा हनुमान को दूत बनाकर लंका भेजने का निश्चय करती है।

क्या हुआ

13 बिंदु

  1. सुग्रीव की पुत्रियों ने वीणा बजाना, गीत गाना आदि अनेक चेष्टाएँ कीं, पर राम मुक्ति का ध्यान करते मुनि की तरह सीता के ध्यान में लीन रहे: वे पास बैठी राजपुत्रियों को ‘हे जनकसुते’ कहकर बुलाते, कौए से पूछते कि देश-देश घूमते तूने जानकी देखी, और हिलती बेलों के पत्तों में उसके वस्त्र, श्वेत, श्याम और लाल कमलों में उसके तीन रंग के नेत्र और लाल कमलों में उसके चरण देखते। उधर सुग्रीव सुतारा के महल में ही रहा और बहुत दिन तक नहीं आया, तो राम यह सोचकर रो पड़े कि सीता शायद मर गई या सुग्रीव राज्य पाकर हमारा दुख भूल गया।

  2. राम की आँखों में आँसू देख लक्ष्मण नंगी तलवार लेकर सीधे सुग्रीव के महल में पहुँचे, उसे ‘विषयलोलुप विद्याधर-वायस’ कहा और बोले कि जहाँ रघुनाथ ने तेरे शत्रु को भेजा वहीं तुझे भेजूँगा; सुग्रीव ने हाथ जोड़कर क्षमा माँगी और उसकी रानियों ने लक्ष्मण को अर्घ देकर आरती की और पति की भिक्षा माँगी। लक्ष्मण ने सुग्रीव को उसकी प्रतिज्ञा वैसे ही याद दिलाई जैसे अयन मुनि ने क्रौंचपुर के राजा यक्ष और रानी राजिलता के पुत्र यक्षदत्त को याद दिलाई थी, जो रात में कुटिया में बैठी एक स्त्री की ओर जा रहा था, जो वास्तव में उसकी माता थी।

  3. मुनि ने बताया कि मृत्तिकावती नगरी के वणिक कणिक के पुत्र बंधुदत्त की पत्नी, लतादत्त की पुत्री मित्रवती को पति के परदेश जाने पर सास-ससुर ने गर्भवती देख दुराचारिणी जानकर निकाल दिया, मार्ग में उसकी दासी उत्पलका साँप के काटने से मर गई, और क्रौंचपुर के उद्यान में जन्मे उसके पुत्र को पिता के दिए रत्नकंबल सहित कुत्ता उठा ले गया, जो निःसंतान रानी राजिलता को दिया गया। तब यक्षदत्त ने खड्ग दिखाकर राजा यक्ष से अपने जन्म का सच्चा वृत्तांत कहलवाया और रत्नकंबल देखा, फिर एक देवपुजारी की धर्म-बहन बनकर दरिद्रता में भी जैनधर्म में लीन अपनी माता से मिला और पिता बंधुदत्त को बुलाकर महा उत्सव के साथ माता-पिता से मिला।

  4. सुग्रीव शीघ्र राम के पास आया, नमस्कार किया और सब विद्याधरों को आज्ञा दी कि जल, थल, आकाश, जंबूद्वीप, लवणसमुद्र, धातकीखंड, कुलाचल पर्वत, वन, सुमेरु और विद्याधरों की नगरियों में, सब दिशाओं में सीता को ढूँढो; सीता के भाई भामंडल को भी समाचार भेजा गया, जो बहन के दुख से महादुखी होकर खोज में लग गया। सुग्रीव स्वयं विमान में बैठकर ज्योतिषचक्र के ऊपर से चला और सब विद्याधरों के नगर देखे।

  5. समुद्र के मध्य कंबुद्वीप में महेंद्र पर्वत पर आकाश से उतरकर सुग्रीव ने वन की धूल से लिपटे रत्नजटी विद्याधर को देखा, जो डरा कि लंकापति ने मुझे मारने को इसे भेजा है, क्योंकि रावण उसकी विद्या पहले ही हर चुका था और वह किसी तरह भामंडल तक पहुँचना चाहता था। धैर्य बँधाने पर रत्नजटी ने सुग्रीव को कपिवंश का तिलक कहा, उसके साथ राम के पास आया और बताया कि मैंने विमान में व्याकुल मृगी की तरह रोती सीता को देखा और कहा कि यह मेरे स्वामी भामंडल की बहन है, इसे छोड़ दे, तब युद्ध में इंद्र को पकड़ने वाले, कैलाश उठाने वाले, तीन खंड के स्वामी रावण ने क्रोध कर मेरी विद्या छेद दी।

  6. राम ने पूछा कि लंका कितनी दूर है तो विद्याधर भय से नीचा मुख कर चुप हो गए, फिर बताया कि लवणसमुद्र में सात सौ योजन चौड़ा और कुछ अधिक इक्कीस सौ योजन परिधि वाला राक्षसद्वीप है, जिसके मध्य में नौ योजन ऊँचा और पचास योजन विस्तार वाला त्रिकूटाचल पर्वत है, जिसे पहले राक्षसों के इंद्र ने मेघवाहन को दिया था, और उसके शिखर पर तीस योजन विस्तार वाली, कोट और खाई से युक्त लंका नगरी है। वहाँ रावण अपने महाबली और देवों से भी अधिक बुद्धिमान भाई विभीषण, त्रिशूलधारी भाई कुंभकर्ण, प्रसिद्ध पुत्र इंद्रजीत और अनेक सामंतों सहित रहता है, इसलिए यह कथा छोड़कर कोई और बात कीजिए।

  7. लक्ष्मण मेघ की तरह गरजकर बोले कि रावण की यह सब प्रशंसा झूठी है, बलवान होता तो नाम छिपाकर पराई स्त्री चुराकर क्यों ले जाता, और राम ने कहा कि कठिन तो सीता का पता लगना था, अब सीता को लाना ही हमारा एकमात्र विचार है। वृद्ध विद्याधरों ने अनेक विद्याधर राजकन्याओं का पति बनने को कहा, तो राम बोले कि शची के समान सुंदर स्त्री से भी हमें प्रयोजन नहीं, हमसे प्रेम है तो शीघ्र सीता दिखाओ।

  8. जाम्बूनद ने हठ छोड़ने के लिए क्षुद्र की कथा कही: वेणातट गाँव में सर्वरुचि और गुणपूर्णा के पुत्र विनयदत्त को उसकी पत्नी पर आसक्त कुमित्र विशालभूत ने छल से वन में वृक्ष पर बाँध दिया, और क्षुद्र नामक राहगीर ने उसे छुड़ाया तथा उसका परम मित्र बना। जब क्षुद्र का पत्तों का बना खिलौना-मोर हवा से उड़कर राजपुत्र के घर जा गिरा, तो उसने विनयदत्त के दिए रत्नों के या सच्चे मोर लेने से मना कर वही मोर माँगा; जाम्बूनद ने कहा कि वह तो मूढ़ था, आप पुरुषोत्तम होकर ऐसा हठ क्यों करते हैं।

  9. लक्ष्मण ने उत्तर में कुसुमपुर के आत्मश्रेय की कथा कही, जो प्रभव और यमुना का सबसे छोटा पुत्र था और धनपाल, बंधुपाल, गृहपाल, पशुपाल, क्षेत्रपाल नामक कमाऊ बड़े भाइयों के कठोर वचन सहता था, जब पृथुस्थान के राजकुमार भानुकुमार ने उसे सब रोगों को नष्ट करने वाला मंत्रमय लोहे का कड़ा दिया; उससे उसने साँप से डसी रानी को विषरहित कर बहुत धन पाया, और जब गोह वह कड़ा शिलाओं से ढके बिल में ले गई तो उसने वृक्ष उखाड़कर बिल चूर किया और नीचे बहुत धन पाया। लक्ष्मण बोले कि राम आत्मश्रेय हैं, सीता कड़ा, लंका बिल और रावण गोह, इसलिए हे विद्याधरो, निर्भय हो जाओ।

  10. तब विद्याधरों ने बताया कि रावण ने अनंतवीर्य केवली को नमस्कार कर अपनी मृत्यु का कारण पूछा था, तो सर्वज्ञ ने कहा था कि जो कोटिशिला को उठाएगा उससे तेरी मृत्यु होगी; यह सुनकर लक्ष्मण तुरंत चल पड़े और जाम्बूनद, सुग्रीव, विराधित, अर्कमाली, नल, नील आदि राम-लक्ष्मण को विमान में बैठाकर अँधेरी रात में शिला के पास पहुँचे। चारों दिशाओं में सामंतों को रखवाली पर रखकर उन्होंने सुर, असुर और मनुष्यों से पूज्य उस शिला की सुगंधित पुष्पों से पूजा की, तीन प्रदक्षिणा दीं और एक सौ साठ विदेह, पाँच भरत और पाँच ऐरावत, इन एक सौ सत्तर आर्यखंडों के अनंत सिद्धों तथा इस शिला से सिद्ध हुए महापुरुषों की स्तुति की।

  11. कमर बाँधकर, णमोकार मंत्र जपते हुए, जब सुग्रीव आदि वानरवंशी जय-जयकार कर स्तोत्र पढ़ रहे थे, लक्ष्मण ने सिद्धों का ध्यान कर बाजूबंदों से शोभित भुजाओं से कोटिशिला को घुटनों तक उठा लिया; आकाश में देवों ने जय-जयकार किया और सुग्रीव आदि आश्चर्यचकित हुए। फिर सबने सम्मेदशिखर, कैलाश पर्वत और भरतक्षेत्र के सब तीर्थों की वंदना की और संध्या समय किष्किंधापुर लौट आए।

  12. अगले प्रातः विद्याधरों ने माना कि जिसने निर्वाणशिला उठाई वह निश्चय ही रावण को मारेगा; किसी ने कहा कि रावण ने भी कैलाश उठाया था, तो दूसरे ने कहा कि वह विद्या के बल से उठाया था, और कुछ ने कहा कि तीन खंड के स्वामी महाबली तारक और मेरु भी संग्राम में मारे गए, इसलिए मित्रता ही श्रेष्ठ है। राम ने ढील छोड़कर तुरंत लंका चलने को कहा, तो जाम्बूनद आदि मंत्रियों ने विनती की कि युद्ध से अनेक प्राणियों का नाश होगा, इसलिए कोई चतुर दूत भेजा जाए, क्योंकि रावण का पापरहित, श्रावक-व्रतधारी भाई विभीषण उसे समझाएगा और अपकीर्ति से लज्जित होकर रावण सीता को लौटा देगा।

  13. महोदधि विद्याधर ने बताया कि लंका के चारों ओर मायामयी यंत्रों का कोट है, जिसमें आकाश या पृथ्वी के मार्ग से कोई प्रवेश नहीं कर सकता, इसलिए महाविद्याओं के धारी, रावण के परम मित्र, पवनंजय के पुत्र श्रीशैल (हनुमान) को बुलाओ; सबने यह बात मानी और श्रीभूत नामक दूत को तुरंत हनुमान के पास भेजा। गौतम स्वामी श्रेणिक से कहते हैं कि जो होनहार है वह उदयकाल में सूर्य के उदय की तरह होकर ही रहता है, फिर भी पुण्य के पुरुषार्थ से संकट, कष्ट और शत्रु दूर होते हैं।