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पर्व 47

साहसगति के वध का वर्णन

राम ने दुखी सुग्रीव को मित्र बनाया, और उनके दर्शन मात्र से नकली सुग्रीव की विद्या भाग जाने पर उन्होंने युद्ध में साहसगति का वध किया।

कथा खंड सीता हरण और हनुमान का दौत्य

सारांश

सुतारा रानी को पाने के लिए विद्या से सुग्रीव का रूप बनाकर आए साहसगति विद्याधर के कारण किष्किंधा दो भागों में बँट गई है और हनुमान भी दोनों सुग्रीवों में भेद नहीं कर पाते। खरदूषण के मारे जाने पर सच्चा सुग्रीव विराधित के माध्यम से राम की शरण आता है; जिनमंदिर में दोनों परम मित्र बनते हैं और सुग्रीव सात दिन में सीता का समाचार लाने की प्रतिज्ञा करता है। राम को देखते ही नकली सुग्रीव की वैताली विद्या निकल जाती है, राम बाणों से साहसगति को मार डालते हैं, सुग्रीव को सुतारा और राज्य वापस मिलता है, और उसकी तेरह पुत्रियों का विवाह राम से होता है।

क्या हुआ

7 बिंदु

  1. सुतारा रानी के वियोग से दुखी सच्चा सुग्रीव भटकता हुआ खरदूषण के मरे सामंतों से भरी रणभूमि में पहुँचा और जाना कि जो महाबली उसका दुख दूर कर सकता था, वह खरदूषण मारा गया। उसने सोचा कि कामांध रावण की शरण जाने पर वह दोनों का समान रूप देखकर मुझे ही, या दोनों को मारकर रानी को ले जाएगा, इसलिए खरदूषण को मारने वाले की शरण लूँ, क्योंकि दुखी ही दुखी का दुख जानता है; यह सोचकर उसने प्रेम से विराधित के पास दूत भेजा।

  2. इतने बड़े राजा की मित्रता की इच्छा जानकर विराधित प्रसन्न हुआ, और जब सुग्रीव के बाजों की मेघ-गर्जना से पाताल लंका के लोग व्याकुल हुए तब अनुराधा के पुत्र विराधित ने लक्ष्मण को बताया कि किष्किंधापुर के राजा सूर्यरज के दो पुत्र हैं: बड़े बाली ने रावण को नमस्कार नहीं किया और सुग्रीव को राज्य देकर विरक्त हो गए, और छोटे सुग्रीव रानी सुतारा तथा गुणवान पुत्र अंगद सहित निष्कंटक राज्य करते हैं। राम और सुग्रीव स्वर्ण के आँगन में प्रेम से मिले, और सुग्रीव के साथ आए वृद्ध विद्याधरों ने विनती की कि कोई दुष्ट विद्याधर माया से सुग्रीव का रूप बनाकर उनकी रानी सुतारा और राज्य लेना चाहता है।

  3. लक्ष्मण के पूछने पर मुख्य मंत्री जामवंत (जाम्बूनद) ने बताया कि सुतारा के रूप पर मोहित वह पापी सुग्रीव का रूप बनाकर उसके महल में आया, पर महासती सुतारा ने सेवकों से कहा कि यह कोई दुष्ट विद्याधर है, इसका आदर मत करो; तब वह निडर होकर सुग्रीव के सिंहासन पर बैठ गया, और जब सच्चा सुग्रीव लौटा और अपने लोगों को उदास देखा तो दोनों गरजते हुए लड़ने को उठे, जिन्हें श्रीचंद्र आदि मंत्रियों ने रोका। सुतारा ने स्पष्ट कहा कि शरीर, बल और वचन में यह मेरे पति के समान है, पर इसमें महापुरुषों के लक्षण नहीं, जैसे घोड़ा और गधा समान नहीं होते, फिर भी कुछ मंत्रियों ने यह बात मानी और कुछ ने नहीं।

  4. स्त्री के शील की रक्षा आवश्यक मानकर मंत्रियों ने दोनों को रनिवास में आने से रोक दिया; माता के वचन से अंगद सच्चे सुग्रीव के पक्ष में आया और जाम्बूनद भी, सेना सात-सात अक्षौहिणी में बँट गई, नकली सुग्रीव को नगर के दक्षिण और सच्चे को उत्तर में रखा गया, और बाली के पुत्र चंद्ररश्मि ने प्रतिज्ञा की कि जो भी सुतारा के महल में आएगा उसे खड्ग से मारूँगा। सहायता के लिए बुलाए गए हनुमान क्रोध से प्रज्वलित होकर अप्रतिघात विमान में किष्किंधापुर आए, पर दोनों का समान रूप देख यह न जान सके कि किसे मारें, और उदास होकर अपने नगर लौट गए।

  5. राम ने सोचा कि इसका और मेरा दुख समान है, और वचन दिया कि मैं तेरा राज्य और तेरी स्त्री तुझे दिला दूँगा, फिर तुम सीता का पता लगाना; सुग्रीव ने प्रतिज्ञा की कि मेरा कार्य होने के बाद सात दिन में सीता का समाचार न लाऊँ तो अग्नि में प्रवेश करूँगा, और जिनमंदिर में दोनों ने परम मित्रता और परस्पर द्रोह न करने की प्रतिज्ञा की। किष्किंधापुर के बाहर पहले युद्ध में मायावी सुग्रीव ने सच्चे सुग्रीव को गदा मारकर गिरा दिया और नगर लौट गया, और राम ने समझाया कि दोनों का रूप एक-सा होने से हम भेद न जान सके, इसलिए बिना जाने वार नहीं किया कि कहीं मित्र ही न मारा जाए।

  6. राम ने मायावी सुग्रीव को फिर युद्ध के लिए बुलाया तो लक्ष्मण ने सच्चे सुग्रीव को पकड़ रखा, और श्रीराम को देखते ही नकली सुग्रीव के शरीर से वैताली विद्या साँप की केंचुली की तरह निकल गई और इंद्रनील पर्वत के समान साहसगति विद्याधर प्रकट हो गया। जो आधी वानरवंशी सेना उससे मिल गई थी वह अलग हो गई, साहसगति ने सब वानरवंशियों को पवन से उड़ती धूल की तरह दसों दिशाओं में भगा दिया और राम पर बाणों की वर्षा की, पर राम ने क्षुद्र बाणों से उसका बख्तर छेदा, तीक्ष्ण बाणों से उसका शरीर छलनी कर दिया और वह प्राणहीन होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा।

  7. सुग्रीव ने राम-लक्ष्मण की महास्तुति की, सुतारा से उसका मिलन हुआ, और उसने राम को आनंद नामक उद्यान में ठहराया, जहाँ राम-लक्ष्मण ने श्री चंद्रप्रभ भगवान के चैत्यालय में पूजा की और सारी सेना ने डेरा डाला। सुग्रीव की तेरह पुत्रियाँ, चंद्राभा, हृदयावली, हृदयधर्मा, अनुंधरी, श्रीकांता, सुंदरी, सुरवती, चारुश्री, मदनोत्सवा, गुणवती, मनोवाहिनी, पद्मावती और जिनपूजा में तत्पर जिनमती, जिन्होंने जन्म से ही विद्याधरों से विवाह न करने का निश्चय किया था, राम के गुणों पर अनुरक्त हुईं और उनका विवाह राम से हुआ, पर गौतम स्वामी श्रेणिक से कहते हैं कि राम का मन विषयों से विरक्त है और वे कुछ समय गृह में रहकर फिर त्याग करेंगे।