मुख्य सामग्री पर जाएँ

पर्व 46

लंका के मायामयी कोट का वर्णन

लंका में सीता रावण, मंदोदरी और रावण की भयानक माया को ठुकरा देती हैं, जबकि विभीषण की मंत्रणा से नगर के चारों ओर मायामयी कोट बनाया जाता है।

कथा खंड सीता हरण और हनुमान का दौत्य

सारांश

सीता को लंका ले जाते हुए रावण व्यर्थ अनुनय करता है, और सीता प्रतिज्ञा करती हैं कि जब तक राम की कुशल का समाचार नहीं सुनेंगी तब तक अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगी। अनंतवीर्य केवली के समक्ष लिए इस व्रत से बँधा कि न चाहने वाली स्त्री से बलात्कार नहीं करेगा, रावण मंदोदरी और अठारह हज़ार रानियों को सीता को मनाने भेजता है और फिर भयानक माया दिखाता है, पर सीता अडिग रहती हैं और उन्हें प्रमद वन में अशोक वृक्ष के नीचे रखा जाता है। विभीषण और मारीच मंत्री रावण को सीता लौटाने की सलाह देते हैं, और उसके न मानने पर विभीषण की मंत्रणा सीता का पता गुप्त रखने और मायामयी यंत्रों के कोट से लंका को घेरकर उसकी रक्षा करने का निश्चय करती है।

क्या हुआ

12 बिंदु

  1. रावण सीता को लेकर विमान के ऊँचे शिखर पर बैठ धीरे-धीरे आकाशमार्ग से चला, और शोक से रोती सीता का कमल जैसा मुख मुरझाया देख राग से अंधा होकर उसके चारों ओर फिरता हुआ दीन वचन कहने लगा कि हे देवी! काम के बाणों से मैं मरा जा रहा हूँ, तुझे मनुष्य-हत्या का दोष लगेगा, एक बार मेरी ओर देखकर नेत्रों की ज्योति रूपी जल से मुझे स्नान करा, नहीं तो अपने चरण-कमलों से मेरा मस्तक तोड़ दे, हाय! मैं तेरे क्रीड़ावन में अशोक वृक्ष क्यों न हुआ जो स्त्री के पगतल के आघात से खिलता है, और देख, मैं सूर्य के ऊपर आकाश में आया हूँ, मेरु, कुलाचल पर्वतों और समुद्रों सहित पृथ्वी को देख। तब शील की सुमेरु महासती सीता ने परदे के भीतर से अरुचि के शब्द कहे, हे अधम! दूर हट, मेरे शरीर को स्पर्श मत कर और ऐसे पाप के वचन मत बोल, परस्त्री की अभिलाषा से तू महादुःख पाएगा, जैसे राख में दबी अग्नि पर पैर रखने वाला अवश्य जलता है, तू महामोह के कीचड़ में लिपटा है, तुझे धर्म का उपदेश देना वैसा ही व्यर्थ है जैसे अंधे के सामने नृत्य करना।

  2. खरदूषण के युद्ध में गए रावण के हितकारी शुक, हस्त, प्रहस्त आदि खरदूषण के मरने से उदास होकर लंका लौटे, फिर भी रावण किसी की ओर नहीं देखता था और हाथ जोड़ सिर झुकाकर दीन वचनों से सीता को प्रसन्न करना चाहता था, पर सीता उसका एक भी वचन नहीं सुनती थीं; फिर मंत्री आदि और सब दिशाओं के योद्धा आए, लोग जय-जयकार करने लगे, गीत, नृत्य और बाजे हुए और रावण ने इंद्र के समान लंका में प्रवेश किया। सीता ने मन में विचार किया कि ऐसा राजा ही मर्यादा रहित क्रियाएँ करे तो पृथ्वी की रक्षा कौन करेगा, और प्रतिज्ञा की कि जब तक मेरे स्वामी रामचंद्र की कुशल-मंगल की बात नहीं सुनूँगी तब तक मेरे चारों प्रकार के आहार-पानी का त्याग है; रावण सीता को स्वर्ग समान सुंदर देवारण्य नामक उपवन में रखकर अपने राजभवन गया।

  3. उसी समय खरदूषण की मृत्यु के समाचार आए, तब महाशोक से रावण की अठारह हज़ार रानियाँ ऊँचे स्वर से रोने लगीं, और चंद्रनखा रावण की गोद में लोट-पोट होकर विलाप करने लगी कि हाय! मैं अभागिनी मर गई, मेरा पति मर गया, मेरा बेटा मर गया; तब उसका भाई रावण बोला, हे बालिके! रोने से क्या, बिना काल के कोई वज्र से भी नहीं मरता और मृत्यु आने पर सहज ही मर जाता है, कहाँ वह रंक भूमिगोचरी और कहाँ तेरा पति, दैत्यों का अधिपति विद्याधर खरदूषण, यह काल का ही कारण है। जिसने तेरे पति और पुत्र को मारा है उसे मैं मारूँगा, यों बहन को दिलासा देकर उसने कहा कि अब तू भगवान की पूजा-अर्चना कर और श्राविका के व्रत का पालन कर।

  4. बहन को ऐसा कहकर रावण महल में गया और सर्प समान श्वास लेता हुआ सेज पर गिर पड़ा, तब पटरानी मंदोदरी ने आकर पति को व्याकुल देख कहा कि हे नाथ! खरदूषण के मरने से आप चिंतित हैं, यह आपको उचित नहीं, शूरवीर महादुःख आने पर भी विषाद नहीं करते, पहले इंद्र के संग्राम में आपके काका श्रीमाली मरण को प्राप्त हुए और अनेक बंधु रण में मरे, तब भी आपने किसी का शोक नहीं किया, आज इतना आर्तध्यान क्यों? रावण ने उससे वचन लिया कि जैसा मैं कहूँ वैसा करना, और कहा कि हे प्रिये! सीता जैसी रूपवती स्त्री सृष्टि में और कोई नहीं, वह मुझे न चाहे तो मेरा जीवन नहीं, मेरा तीन खंड का राज्य, रूप और बल सब उसे पाने से ही सफल होगा; यह सुनकर मंदोदरी ने हँसकर कहा कि आप प्रार्थना करें और वह न चाहे तो वह मंदभागिनी है, आप हाथी की सूँड जैसी अपनी भुजाओं से बलपूर्वक उसका सेवन क्यों नहीं करते।

  5. रावण ने कहा कि इस सर्वांगसुंदरी का मैं बलात्कार से सेवन नहीं करता, उसका कारण सुन: अनंतवीर्य केवली के सान्निध्य में उन्होंने उपदेश दिया कि संसार में भ्रमण करते जीवों के लिए एक भी नियम-व्रत महाफल देता है और जिसके एक भी व्रत नहीं वह फूटे कलश के समान है, उसमें और पशु में कोई अंतर नहीं, तब वहाँ एक मुनिराज ने कृपा कर मुझसे कहा, हे दशानन! तुम भी कुछ नियम ग्रहण करो, दया धर्म रूपी रत्नद्वीप में आकर नियम रूपी रत्न लिए बिना खाली मत जाओ, और मैंने देव, असुर, विद्याधर और मुनिराज सबकी साक्षी में व्रत लिया कि जो परनारी मुझे नहीं चाहेगी उसे मैं बलात्कार से ग्रहण नहीं करूँगा, यह सोचकर कि मुझ जैसे रूपवान पुरुष को कौन नारी नहीं चाहेगी। राजाओं का यही नियम है कि जो वचन कहें उसका निर्वाह करें, इसलिए मेरा मरण हो उससे पहले सीता को प्रसन्न करो, घर में आग लगने के बाद कुआँ खोदना व्यर्थ है; तब मंदोदरी ने कहा कि आपकी आज्ञा प्रमाण करूँगी, और वह देवारण्य उद्यान में गई और उसकी आज्ञा से रावण की अठारह हज़ार रानियाँ भी गईं।

  6. मंदोदरी ने जाकर सीता से कहा, हे अनुपम सुंदरी! हर्ष के स्थान में क्यों दुखी हो रही हो, जिस स्त्री का पति रावण है वह जगत में धन्य है, सब विद्याधरों के स्वामी, देवों को जीतने वाले, तीन लोक में सुंदर रावण को क्यों नहीं चाहती, निर्जन वन के निवासी, निर्धन, शक्तिहीन भूमिगोचरियों के लिए क्या दुःख करती हो, रावण की प्रार्थना भंग से वह क्रोध करे तो राम-लक्ष्मण उसके क्रोध से जीवित नहीं रह सकते, इसलिए शीघ्र विद्याधरों के ईश्वर रावण को स्वीकार कर देवांगनाओं जैसे सुख भोगो। तब जानकी ने आँखों में आँसू भरकर गद्गद वाणी से कहा, हे नारी! तूने यह सर्वथा विरुद्ध बात कही, तू पतिव्रता कहलाती है तो पतिव्रता के मुख से ऐसे वचन कैसे निकले, यह मेरा शरीर छिद जाए, भिद जाए, खंड-खंड हो जाए, मर जाए, पर मैं अन्य पुरुष को नहीं चाहूँगी, वह रूप में सनत्कुमार या इंद्र के समान हो तो भी मेरे किस काम का, तुम सब अठारह हज़ार रानियाँ इकट्ठी होकर आई हो तो भी मैं तुम्हारा कहना नहीं करूँगी, तुम्हारी जो इच्छा हो वह करो।

  7. उसी समय काम से दुखी रावण ऐसे आया जैसे प्यासा हाथी गंगा के किनारे आए, और मधुर वाणी से आदरपूर्वक बोला, हे देवी! भय मत करो, मैं तुम्हारा भक्त हूँ, मैं तीन लोक का स्वामी, मेरे पास किस वस्तु की कमी है जो तुम मुझे नहीं चाहतीं, और स्पर्श की इच्छा से आगे बढ़ा, तब सीता ने क्रोध से कहा, हे पापी अधम नर! दूर हट, मेरे शरीर को स्पर्श मत कर; रावण ने कहा कि क्रोध और अभिमान छोड़ प्रसन्न हो, इंद्राणी शची समान दिव्य भोगों की स्वामिनी हो, तो सीता बोलीं कि कुशील पुरुष का वैभव मल-मूत्र समान है और शीलवान की दरिद्रता ही आभूषण है, उत्तम वंश में जन्मे लोगों के शील भंग से दोनों लोक बिगड़ते हैं, इसलिए मेरे लिए तो मरण ही शरण है, और तू परस्त्री की अभिलाषा रखता है तो तेरा जीवन ही मरण है। इस प्रकार तिरस्कार किए जाने पर रावण क्रोध से माया दिखाने लगा, अठारह हज़ार रानियाँ वहाँ से चली गईं, रावण की माया के भय से मानो सूर्य अस्त हो गया, और मद झरती मायामयी हथिनियों की भीड़, अग्नि के बरसते स्फुलिंग, जीभ निकालते भयानक सर्प, मुँह फाड़े उछलते महाक्रूर बंदर और अग्नि की ज्वाला जैसी जीभ वाले मायामयी अजगर आए, फिर भी सीता डरकर रावण की शरण में नहीं गईं।

  8. रात्रि पूर्ण हुई, जिनमंदिरों में बाजों की ध्वनि हुई, सूर्योदय हुआ और प्रातःकाल की क्रियाएँ कर विभीषण आदि रावण के भाई खरदूषण के शोक से रावण के पास आकर नीचा मुख कर आँसू डालते भूमि पर बैठे; उस समय परदे के भीतर से सीता के रोने के शब्द सुनकर विभीषण ने पूछा कि यह कौन स्त्री है जो पति से बिछुड़कर रो रही है, हे बहन! तुम कौन हो, तब सीता ने कहा कि मैं राजा जनक की पुत्री, भामंडल की बहन और राम की रानी हूँ, दशरथ मेरे ससुर और लक्ष्मण मेरे देवर हैं, लक्ष्मण खरदूषण से युद्ध करने गए और उनके पीछे मेरे स्वामी भाई की सहायता को गए, तब इस दुष्ट रावण ने मुझे अकेली देखकर हर लिया, मेरे बिना मेरे पति प्राण छोड़ देंगे, इसलिए हे भाई! मुझे शीघ्र मेरे पति के पास भेज दो। ये वचन सुनकर विभीषण ने रावण से विनय से कहा कि हे देव! यह परनारी अग्नि की ज्वाला और आशीविष सर्प के फण के समान भयंकर है, आपने आज्ञा दी थी कि जो उचित हो वह कहना, इसलिए कहता हूँ कि परदारा की यह इच्छा आपकी कीर्ति रूपी लता को भस्म करने वाली और दोनों लोकों का नाश करने वाली है, परदारा-सेवी ऐसे नरक में जाते हैं जैसे लोहे का गर्म गोला जल में डूबता है, इसे शीघ्र पहुँचा दो; पर रावण बोला कि हे भाई! पृथ्वी पर जो सुंदर वस्तु है उसका मैं स्वामी हूँ, सब मेरी ही है, पराई वस्तु कहाँ से आई, और दूसरी बात करने लगा।

  9. फिर महानीतिवान मारीच मंत्री ने कहा कि देखो मोहकर्म की लीला, रावण जैसा विवेकी, सब रीति जानने वाला ऐसा कर्म करता है, ज्ञानी पुरुषों को प्रातः उठकर अपनी कुशल-अकुशल का चिंतन करना चाहिए, पर रावण ने कोई उत्तर नहीं दिया और उठकर त्रिलोकमंडन हाथी पर चढ़कर बरछी, खड्ग, तोमर, चमर, छत्र, ध्वजा आदि लिए आगे चलते योद्धाओं और सब सामंतों सहित उपवन से नगर की ओर चलकर लंका में प्रवेश किया। रावण की चक्रवर्ती जैसी संपदा को तृण से भी हीन जानने वाली, जल में कमल की तरह अलिप्त सीता को प्रमद नाम के वन में अशोक वृक्ष के नीचे रखा गया, जो प्रकीर्णक, जनानंद, सुखसेव्य, समुच्चय, चारणप्रिय, निबोध और प्रमद इन सात अद्भुत वनों में से एक था, जिनसे लंका ऐसे शोभती है जैसे भद्रशाल आदि वनों से सुमेरु, और जहाँ मणि-सुवर्ण की सीढ़ियों वाली, कमलों से युक्त अशोकमालिनी नाम की बावड़ी थी; वहाँ रावण की आज्ञा से अनेक विद्याधरियाँ वस्त्राभूषण, सुगंधित पदार्थ, दिव्य गीत, नृत्य और बाजों से इंद्र से बिछुड़ी इंद्राणी जैसी शोकाकुल सीता को प्रसन्न करना चाहतीं, पर वे उसे प्रसन्न न कर सकीं।

  10. दूतियों ने जाकर रावण से कहा कि हे देव! सीता तो आहार-पानी सब त्यागकर बैठी है, किसी से बात नहीं करती, हमारी ओर देखती भी नहीं, अमृत समान स्वादिष्ट भोजन, दूध आदि रस-व्यंजन सामने रखते हैं पर वह उन्हें देखती और छूती तक नहीं; यह सुनकर रावण महादुखी होकर चिंता के सागर में डूब गया, कभी ज़ोर से श्वास लेता, कभी गाता, बकता, धरती पर गिर पड़ता, हाथी की सूँड की तरह हाथ पृथ्वी पर पटकता, आँसू बहाता, ‘सीता सीता’ कहकर पुकारता, सीता के चित्र बनाता और सेज पर पड़ता-उठता, और सोचता कि मैं किस दशा को प्राप्त हुआ हूँ कि अपना शरीर भी नहीं सँभाल पाता, मैंने गढ़ों और सागर के बीच बैठे बड़े-बड़े विद्याधरों को हज़ारों बार युद्ध में जीता और लोक में प्रसिद्ध इंद्र नाम के विद्याधर को जीता, अब मोह से उन्मत्त होकर प्रमाद के वश विपरीत क्रिया कर रहा हूँ। गौतम स्वामी श्रेणिक से कहते हैं कि रावण तो काम के वश हुआ, पर रावण के राज्य का भार जिस पर था और जिससे बढ़कर रावण का कोई हितैषी नहीं था, उस महाबुद्धिमान, मंत्रणा में निपुण विभीषण ने सब मंत्रियों को इकट्ठा कर पूछा कि राजा की तो यह दशा है, अब हमारा क्या कर्तव्य है।

  11. तब संभिन्नमति मंत्री बोला कि हम क्या कहें, सब काम बिगड़ गया, रावण की दाहिनी भुजा खरदूषण मरा, सियार से सिंह बना विराधित लक्ष्मण की युद्ध में सहायता कर चुका, वानरवंशी ऊपर से कुछ और भीतर से कुछ और हैं, जैसे सर्प ऊपर से कोमल और भीतर विष, और पवन का पुत्र हनुमान, जो खरदूषण की पुत्री अनंगकुसुमा का पति है, उसने सुग्रीव की पुत्री से भी विवाह किया है, इसलिए वह सुग्रीव के पक्ष में अधिक है। यह सुनकर पंचमुख मंत्री बोला कि संग्राम में प्राण छोड़ना शूरवीरों का कार्य है, एक खरदूषण के मरने से रावण का क्या घटा, समुद्र से एक बूँद जाने से क्या कमी होती है, दूसरों की प्रशंसा करना लज्जा की बात है, कहाँ जगत का स्वामी रावण और कहाँ वनवासी भूमिगोचरी, लक्ष्मण के पास सूर्यहास खड्ग आया तो क्या और विराधित आ मिला तो क्या।

  12. तब सहसमति मंत्री ने कहा कि बिना प्रयोजन की बातें क्यों करते हो, स्वामी का हित हो वही करना चाहिए, दूसरा छोटा है और हम बड़े हैं यह विचार बुद्धिमानों का नहीं, समय पाकर अग्नि की एक चिनगारी सारी पृथ्वी जला देती है, जैसे महासेना वाले प्रसिद्ध अश्वग्रीव को छोटे से त्रिपृष्ठ ने रण में मार दिया, इसलिए सब दिशाओं में मायामयी भयानक यंत्र फैलाकर लंका की रक्षा करो, प्रजा को धैर्य बँधाओ, मधुर वाणी और भेंटों से सीता को ऐसे प्रसन्न करो जैसे दूध पिलाकर नागिन को, और वानरवंशी योद्धाओं को नगर के बाहर चौकी पर बैठाओ कि परचक्र का कोई न आ सके और यहाँ की सूचना बाहर न जाए, तब कौन जानेगा कि सीता को किसने हरा और वह कहाँ है; सीता के बिना राम निश्चय ही मर जाएँगे और राम के शोक से लक्ष्मण भी नहीं जिएँगे, तब अपराधी विराधित क्या करेगा, और जिस सुग्रीव के घर में उसका रूप बनाकर एक विद्याधर आ घुसा है, उसे मायामयी यंत्र की रखवाली सौंपो जिससे वह प्रसन्न हो और रावण उसके शत्रु का नाश करे। यह मंत्रणा कर सब हर्ष से अपने घर गए और विभीषण ने मायामयी यंत्रों के कोट से लंका के चारों ओर ऐसी रक्षा की कि ऊपर, नीचे या तिरछे से कोई न आ सके और अनेक विद्याओं से लंका को अगम्य कर दिया; गौतम गणधर कहते हैं, हे श्रेणिक! संसारी जीव लौकिक कार्यों में लीन और व्याकुल रहते हैं, इसलिए भव्यजीव संसार से विरक्त होकर मोक्ष का पुरुषार्थ करें, क्योंकि शुभ क्रियाओं से सुख और अशुभ क्रियाओं से दुःख मिलता है।