पर्व 45
राम के सीता-वियोग जनित दुःख का वर्णन
विराधित की सहायता से लक्ष्मण खरदूषण को मारते हैं, और सीता को न पाकर शोकाकुल राम पाताल लंका में जाकर रहते हैं।
कथा खंड सीता हरण और हनुमान का दौत्यसारांश
चंद्रोदय का पुत्र विराधित विद्याधर पिता के वैर का बदला लेने लक्ष्मण से आ मिलता है, और लक्ष्मण सूर्यहास खड्ग से खरदूषण का सिर काटकर उसका पाताल लंका का राज्य विराधित को देते हैं। लौटकर राम को भूमि पर पड़े और सीता को गायब देख लक्ष्मण उसे वापस लाने का संकल्प करते हैं, विराधित के विद्याधर व्यर्थ खोज करते हैं, और उधर सीता को छुड़ाने का प्रयास करने वाले रत्नजटी विद्याधर की विद्याएँ रावण हर लेता है। खरदूषण के शक्तिशाली मित्रों के बदले की चेतावनी पाकर दोनों भाई सुंद को हराकर अलंकारोदय (पाताल लंका) में प्रवेश करते हैं और खरदूषण के महल में रहते हैं, जहाँ जिनमंदिर में राम को क्षण भर शांति मिलती है।
क्या हुआ
6 बिंदु
लक्ष्मण के युद्ध के समय खरदूषण का शत्रु विराधित विद्याधर अपने मंत्री आदि योद्धाओं सहित शस्त्र लेकर आया और लक्ष्मण को अकेले युद्ध करते देख उन्हें महा नरोत्तम जानकर और इनसे अपने कार्य की सिद्धि समझकर प्रसन्न हुआ; वाहन से उतरकर उसने धरती पर मस्तक लगाकर नमस्कार किया और विनय से कहा कि हे नाथ! मैं आपका भक्त हूँ, और लक्ष्मण ने उसके थोड़े से कहने पर पूरी बात समझकर उसके मस्तक पर हाथ रखकर कहा कि तुम डरो मत, हमारे पीछे खड़े रहो। विराधित ने कहा कि खरदूषण महाशक्तिवान शत्रु है, आप उससे युद्ध करें और सेना के योद्धाओं से मैं लड़ूँगा, फिर दौड़कर शत्रु के कटक पर जाकर घोषणा की कि मैं राजा चंद्रोदय का पुत्र विराधित हूँ, बहुत दिनों से चले आ रहे पिता के वैर का बदला लेने आया हूँ, युद्ध में प्रवीण हो तो खड़े रहो, और दोनों सेनाओं में हाथियों से हाथी, घोड़ों से घोड़े और रथों से रथ भिड़ गए और दसों दिशाएँ बाणों से भर गईं।
लाल नेत्र कर क्रोध से खरदूषण ने लक्ष्मण से कहा कि मेरा पुत्र तेरा शत्रु नहीं था फिर भी तूने उसे मारा, और हे चपल! तूने मेरी स्त्री का कुचमर्दन किया, हे निर्लज्ज परस्त्री-लोलुप! आज तीक्ष्ण बाणों से तेरे प्राणों का नाश करूँगा; तब लक्ष्मण ने कहा, अरे क्षुद्र! बिना मतलब क्यों गरजता है, जहाँ तेरा पुत्र गया वहीं तुझे भेजूँगा, और आकाश में खड़े खरदूषण को रथ रहित कर, उसका धनुष तोड़कर, ध्वजा उड़ाकर प्रभाहीन कर दिया, जिससे वह पुण्य क्षीण हुए देव की तरह पृथ्वी पर गिरा। फिर वह महासुभट खड्ग लेकर लक्ष्मण पर आया, लक्ष्मण सूर्यहास खड्ग लेकर सामने गए, देव पुष्पवृष्टि करते हुए धन्य-धन्य कहने लगे, और महायुद्ध में लक्ष्मण ने सूर्यहास खड्ग से खरदूषण का मस्तक काट दिया और वह निर्जीव होकर स्वर्ग से गिरे देव की तरह पृथ्वी पर गिरा; खरदूषण का सेनापति दूषण विराधित को रथ रहित करने आया तो लक्ष्मण ने बाणों से उसके मर्मस्थल पर घात किया और वह घूमता हुआ भूमि पर गिरा, और लक्ष्मण ने खरदूषण का राज्य, कटक और पाताल लंका पुरी विराधित को दे दी।
प्रसन्न मन से अति स्नेह भरे लक्ष्मण राम के पास आए तो देखा कि राम भूमि पर पड़े हैं और वहाँ सीता नहीं है; लक्ष्मण के पूछने पर राम ने उठकर उन्हें घावरहित देख कुछ हर्षित होकर हृदय से लगाया और कहा कि हे भाई! मैं नहीं जानता जानकी कहाँ गई, कोई हर ले गया या सिंह खा गया, बहुत ढूँढ़ी पर नहीं मिली, तब लक्ष्मण ने दुःख और क्रोध से कहा कि हे देव! सोचने से क्या, निश्चय ही कोई दुष्ट दैत्य उसे हर ले गया है, जहाँ होगी वहाँ से लाएँगे, और निर्मल जल से राम का मुँह धुलाकर अनेक प्रिय वचनों से धैर्य बँधाया। फिर विराधित बड़ी सेना और मंत्रियों सहित आकर सेवा की आज्ञा माँगने लगा, तो लक्ष्मण ने कहा कि हे मित्र! कोई दुराचारी मेरे प्रभु की रानी सीता को हर ले गया है, उसके बिना शोक से राम ने प्राण छोड़े तो मैं भी उनके साथ अग्नि में प्रवेश करूँगा, क्योंकि उनके प्राणों के आधार पर ही मेरे प्राण हैं; यह सुन विराधित दुखी होकर सोचने लगा कि जिन्होंने मेरा शत्रु मारकर मुझे स्थान दिया उनकी यह दशा है, मैं जिस बेल को पकड़ता हूँ वही उखड़ जाती है, और उसने मंत्रियों को जल, थल, आकाश, नगर, वन, पर्वत, गुफा, ग्राम आदि सब जगह सीता को खोजने की आज्ञा दी, और यश के लिए सब विद्याधर दौड़ पड़े।
उधर अर्कजटी का पुत्र रत्नजटी विद्याधर आकाशमार्ग से जा रहा था, उसने ‘हाय राम, हाय लक्ष्मण’ कहकर रोती सीता की आवाज़ सुनी और आकर देखा कि रावण के विमान में सीता विलाप कर रही है, तब उसने क्रोध से कहा, हे पापी दुष्ट रावण! ऐसा अपराध कर तू कहाँ जाएगा, यह भामंडल की बहन और रामदेव की रानी है, मैं भामंडल का सेवक हूँ, हे दुर्बुद्धि! जीना चाहता है तो इसे छोड़ दे। रावण अति क्रोध से युद्ध को उद्यत हुआ, पर सोचा कि कहीं युद्ध से दुखी होकर सीता मर न जाए, यद्यपि यह रंक विद्याधर है फिर भी इसे नहीं मारना, और उस महाबली ने रत्नजटी की विद्या हर ली, जिससे वह आकाश से गिरा और मंत्र के कारण धीरे-धीरे समुद्र के बीच कंबु द्वीप में आ गिरा और आयुकर्म के योग से ऐसे जीवित बचा जैसे समुद्र में जहाज़ टूटने पर व्यापारी बच जाए, फिर कंबु पर्वत पर चढ़कर दिशाएँ देखता रहा और वन के फल खाकर वहीं रहने लगा।
विराधित के सेवक विद्याधर सब दिशाओं में ढूँढ़कर सीता को कहीं न देख उदास मुख लौट आए, तब राम ने दीर्घ श्वास लेकर कहा कि हे विद्याधरो! तुमने हमारे काम के लिए अपनी शक्ति भर बहुत यत्न किया, पर हमारे अशुभ कर्म का उदय है, अब तुम सुख से अपने स्थान जाओ, हाथ से बड़वानल में गिरा रत्न फिर कहाँ मिलता है, हम कुटुंब से छूटकर वन में आए फिर भी असाता कर्म को दया नहीं आई, सीता गई इससे अधिक दुःख क्या होगा, और ऐसा कहकर राम रोने लगे। तब धैर्य बँधाने में निपुण विराधित ने हाथ जोड़कर कहा कि हे देव! इतना विषाद मत करो, थोड़े ही दिनों में आप जनकसुता को देखोगे, धैर्य ही महापुरुषों का आभूषण है, पर ध्यान से सुनिए, विद्याधरों के महाराजा खरदूषण को मारा है जिसका फल आगे कटु होगा, किष्किंधापुर का स्वामी सुग्रीव, इंद्रजीत, कुंभकर्ण, त्रिशिरा, भीम, क्रूरकर्मा, महोदर आदि अनेक महायोद्धा विद्याधर और वैताढ्य पर्वत के अनेक विद्याधर उसके परम मित्र हैं, और जिस पवनंजय के पुत्र हनुमान को देखकर सब सुभट दूर से डरते हैं और देव भी जिसके सामने नहीं आते, वह खरदूषण का जमाई है, इसलिए वह भी उसके मरण पर क्रोध करेगा।
इसलिए विराधित ने प्रार्थना की कि आप इस वन में न रहें, अलंकारोदय नगर अर्थात् पाताल लंका में विराजें, वह नगर महादुर्गम है, वहाँ निश्चल होकर कार्य का उपाय करेंगे और भामंडल को भी सीता के समाचार भिजवाएँगे; तब दोनों भाई चार घोड़ों के रथ पर बैठकर चतुरंग सेना सहित दंडकवन से पाताल लंका को चले, विराधित आगे गया, वहाँ चंद्रनखा का पुत्र सुंद नगर के बाहर लड़ने आया पर युद्ध में हार गया, और वे देवों के नगर समान रत्नमय नगर में प्रवेश कर खरदूषण के महल में ठहरे, पर सीता के बिना राम क्षणमात्र भी विश्राम न पा सके, उन्हें मनोहर नगर भी वन समान लगता था, जैसे सीता के साथ भयंकर वन भी मनोहर नगर समान लगता था। खरदूषण के राजभवन में जिनमंदिर देखकर रघुनाथ ने प्रवेश किया और अरहंत की प्रतिमा की रत्नमय पुष्पों से अर्चा कर एक क्षण सीता का दुःख भूल गए, और जहाँ-जहाँ भगवान के चैत्यालय थे वहाँ-वहाँ दर्शन किए, जबकि सुंद अपनी माता चंद्रनखा के साथ पिता और भाई के शोक से महाशोकाकुल होकर लंका चला गया; ग्रंथ कहता है कि परिग्रह नाशवान और महादुःख का कारण है, और साधुओं के उपदेश से उसकी तृष्णा ऐसे दूर होती है जैसे सूर्योदय से रात्रि का अंधकार।