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पर्व 51

श्रीराम को गंधर्व कन्याओं की प्राप्ति

हनुमान ने ध्यानस्थ दो मुनियों के चारों ओर लगी वन की आग बुझाई और राजा गंधर्व की तीन पुत्रियों की रक्षा की, जिनका विवाह फिर राम से हुआ।

कथा खंड सीता हरण और हनुमान का दौत्य

सारांश

दधिमुख द्वीप के ऊपर से जाते हुए हनुमान ने देखा कि दो चारण मुनि ध्यान में खड़े हैं और चारों ओर वन में आग लगी है, तब उन्होंने समुद्र का जल बरसाकर आग बुझाई। पास में विद्या साध रही तीन कन्याओं, दधिमुख के राजा गंधर्व की पुत्रियों ने बताया कि मुनि ने कहा था कि साहसगति को मारने वाला उनका पति होगा, और ठुकराए गए अंगारक ने ही यह आग लगाई थी। हनुमान से यह जानकर कि साहसगति को मारने वाले राम हैं, गंधर्व ने अपनी पुत्रियाँ किष्किंधापुर लाकर राम को ब्याह दीं, पर राम को सीता के बिना दसों दिशाएँ सूनी ही लगीं।

क्या हुआ

5 बिंदु

  1. मार्ग में हनुमान दधिमुख द्वीप पहुँचे, जिसके दधिमुख नगर में दही के समान सफेद भवन और कमलों से शोभित बावड़ियाँ थीं; नगर से दूर एक भयानक वन में दो चारण मुनि आठ दिन का कायोत्सर्ग लेकर खड़े थे, और वहाँ से चार कोस पर सफेद वस्त्र पहने तीन रूपवान कन्याएँ विधिपूर्वक तप कर रही थीं। वन में आग लगी, पर जीवन-मरण, शत्रु-मित्र और कंचन-पाषाण में समभाव वाले दोनों निर्ग्रंथ मुनि वृक्ष के समान अडिग खड़े रहे, जिन्हें आग में जलते देख हनुमान का हृदय काँप उठा।

  2. वात्सल्य गुण से युक्त और वैयावृत्य में तत्पर हनुमान ने समुद्र का जल लेकर मूसलाधार वर्षा की, जिससे क्षणभर में पृथ्वी जल से भर गई और आग ऐसे बुझ गई जैसे क्षमा से क्रोध; मुनियों का उपसर्ग दूर कर उन्होंने उनकी पूजा की। दावानल से विद्या साधती तीनों कन्याएँ भी व्याकुल थीं, उपद्रव दूर होने पर तीनों को विद्या सिद्ध हुई, और उन्होंने मुनियों को नमस्कार कर हनुमान की जिनेश्वर-भक्ति की स्तुति की।

  3. सबसे बड़ी बहन ने बताया कि हम दधिमुख नगर के राजा गंधर्व की तीन पुत्रियाँ हैं, बड़ी चंद्ररेखा, दूसरी विद्युत्प्रभा और तीसरी तरंगमाला, जिनके लिए विजयार्ध के सब राजकुमार याचना करते थे; अष्टांग निमित्तज्ञानी मुनि ने हमारे पिता से कहा था कि जो रणसंग्राम में साहसगति को मारेगा वही इनका पति होगा, और यद्यपि साहसगति विजयार्ध की उत्तरश्रेणी में रहता था और उसे मारना असंभव लगता था, फिर भी सारे परिवार को मुनि के वचन पर दृढ़ श्रद्धा थी। निरंतर याचना करने वाले दुष्ट अंगारक को पिता ने हमें नहीं दिया, इसलिए वह शत्रु बन गया।

  4. साहसगति को मारने वाले को देखने की इच्छा से हम मनोनुगामिनी विद्या सिद्ध करने इस भयानक वन में आईं, जो सामान्यतः छह वर्ष से कुछ अधिक में सिद्ध होती है, पर उपसर्ग से न डरने के कारण बारह दिन में ही सिद्ध हुई; आज हमारा बारहवाँ और मुनियों का आठवाँ दिन था, जब अंगारक ने हमें देखकर क्रोध से वन में आग लगा दी। उन्होंने कहा कि आप सहायता न करते तो हम जल मरतीं और मुनियों का समाधिमरण होता, तब हनुमान ने कहा कि जिसको श्रद्धा होती है उसे सिद्धि मिलती है, और राम के किष्किंधापुर आने तथा उनकी आज्ञा से अपने लंका जाने का वृत्तांत सुनाया।

  5. वन की आग शांत होने और मुनियों का उपसर्ग दूर होने का समाचार सुनकर राजा गंधर्व हनुमान के पास आए, और उनके मुख से श्रीराम के किष्किंधापुर विराजने की बात सुनकर अपनी पुत्रियों सहित राम के पास आए और महाविभूति से उनका विवाह राम से कराया। पर महाविवेकी राम को सीता के बिना दसों दिशाएँ सूनी और नगर भी गहन वन समान लगता था; ग्रंथ कहता है कि प्राणी पूर्वोपार्जित कर्मों से सुख-दुख भोगते हैं, और जिनधर्म से ही मुक्ति मिलती है।