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पर्व 86

भरत और कैकेयी की दीक्षा

केवली द्वारा बताए पूर्वभवों से प्रभावित होकर भरत एक हजार से अधिक राजाओं के साथ दिगंबर मुनि बनते हैं, और कैकेयी तीन सौ रानियों के साथ आर्यिका बनती हैं।

कथा खंड विजय और अयोध्या वापसी

सारांश

अपने और हाथी के अनेक भवों का वृत्तांत सुनकर भरत देशभूषण केवली से दिगंबर दीक्षा माँगते हैं, अपने हाथों से केशलोंच करते हैं और महाव्रत धारण करते हैं जबकि देव पुष्पवर्षा करते हैं। एक हजार से अधिक राजा उनके साथ दीक्षा लेते हैं, और जो असमर्थ हैं वे श्रावक के व्रत लेते हैं। कैकेयी पुत्र के लिए मूर्च्छित होकर विलाप करती हैं, तब राम, लक्ष्मण और अन्य रानियाँ उन्हें समझाती हैं; फिर संसार का दुख देखकर वे तीन सौ रानियों के साथ पृथ्वीमती आर्यिका के पास आर्यिका बनती हैं, और मुनियों और आर्यिकाओं के संघों से पृथ्वी कमलों से भरे सरोवर की तरह शोभित होती है।

क्या हुआ

5 बिंदु

  1. भरत और हाथी के अनेक भवों का वर्णन सुनकर राम, लक्ष्मण आदि सभी भव्यजीव आश्चर्यचकित होते हैं। भरत उठकर हाथ जोड़ गुरु के चरणों में नमन करते हैं और कहते हैं कि वे अनंतकाल से अनेक योनियों में भटकते हुए थक गए हैं, और मुक्ति का कारण दिगंबरी दीक्षा माँगते हैं।

  2. केवली की आज्ञा से भरत समस्त परिग्रह त्यागकर अपने हाथों से सिर के बालों का केशलोंच करते हैं और महाव्रत धारण कर दिगंबर मुनि बनते हैं, जबकि आकाश में देव धन्य-धन्य कहकर कल्पवृक्षों के पुष्पों की वर्षा करते हैं। उनके स्नेह से एक हजार से अधिक राजा राजऋद्धि छोड़कर जिनदीक्षा लेते हैं, और जो शक्तिहीन हैं वे अणुव्रत धारण कर श्रावक बनते हैं।

  3. पुत्र के वैराग्य का समाचार सुनकर कैकेयी रोती है, मूर्च्छित होकर मृतक समान शिथिल पड़ जाती हैं, चंदन जल से सचेत की जाती हैं, और फिर बछड़े से बिछड़ी गाय की तरह पुकार-पुकार कर रोती हैं कि हे विनयवान, गुणों की खान पुत्र, मुझे शोक-सागर में छोड़कर क्यों जा रहे हो। राम-लक्ष्मण मधुर वचनों से समझाते हैं कि क्या हम आपके पुत्र नहीं, हम आपके आज्ञाकारी किंकर हैं, और कौशल्या, सुमित्रा तथा सुप्रभा भी उन्हें बहुत समझाती हैं।

  4. शोक के बाद कैकेयी को प्रतिबोध होता है: वे अपनी अज्ञानता पर पश्चाताप करती हैं और ऐसा उपाय करने का निश्चय करती हैं कि फिर कभी स्त्री पर्याय न मिले, जिसे वे दुखों का भंडार कहती हैं। एक श्वेत साड़ी धारण कर और सब परिग्रह तथा आरंभ त्यागकर वे परम सम्यक्त्व सहित पृथ्वीमती आर्यिका के पास आर्यिका बनती हैं, और उनके साथ तीन सौ रानियाँ भी आर्यिका दीक्षा लेती हैं।

  5. देशभूषण केवली का उपदेश सुनकर अनेक मुनि और आर्यिकाएँ बनती हैं, और उनके संघों से पृथ्वी कमलों से भरे सरोवर जैसी दिखती है; अनेक नर-नारी श्रावक-श्राविका के रूप में तप, संयम और नियम धारण करते हैं और कुछ भवों के बाद केवलज्ञान की ज्योति से तीनों लोक देखेंगे। पर्व का उपदेश है कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी उससे अलग रहना चाहिए, जैसे जल में कमल या कीचड़ में सोना, क्योंकि सम्यक्त्व सहित तप और संयम ही मानव जीवन के आभूषण हैं।