मुख्य सामग्री पर जाएँ

पर्व 87

हाथी का स्वर्गगमन और भरत मुनि का निर्वाण

त्रैलोक्यमंडन लंबे उपवासों के साथ श्रावक के व्रत पालकर सल्लेखना से छठे स्वर्ग में लौटता है, जबकि भरत मुनि विहार करते हुए सब परीषह जीतकर मोक्ष पाते हैं।

कथा खंड विजय और अयोध्या वापसी

सारांश

केवली के समीप त्रैलोक्यमंडन हाथी सम्यग्दर्शन सहित श्रावक के व्रत लेता है, पंद्रह दिन या महीने भर के उपवास करता है और सूखे पत्तों से या भक्त श्रावकों के दिए शुद्ध अन्न-जल से पारणा करता है। अंत में वह सल्लेखना से चारों आहार त्यागकर छठे स्वर्ग में देव होता है, जहाँ से वह आया था। निर्ग्रंथ, निर्भय और शत्रु-मित्र में समभाव रखने वाले भरत मुनि परीषह सहते हुए विहार करते हैं, अनेक ऋद्धियाँ पाते हैं, शुक्लध्यान से कर्मों का नाश कर केवलज्ञान और फिर सिद्धपद प्राप्त करते हैं।

क्या हुआ

5 बिंदु

  1. प्रशांत मन से त्रैलोक्यमंडन केवली के निकट श्रावक के व्रत धारण करता है और सम्यग्दर्शन तथा शुभ भावों के साथ तप करने लगता है: पंद्रह दिन और महीने भर के उपवास, जिनका पारणा सूखे पत्तों से करता है, और तालाब-सरोवर का जल प्रासुक होने पर ही पीता है। संसार से भयभीत लोगों द्वारा पूज्य वह विशुद्ध परिणामों के साथ पृथ्वी पर विचरता है।

  2. पक्ष या मास के उपवास का पारणा करने जब वह नगर में आता है, तो श्रावक अति भक्ति से उसे शुद्ध अन्न-जल से पारणा कराते हैं। वैराग्य रूपी खूँटे से बंधा और यम-नियम रूपी अंकुश से चलता वह महाहाथी उग्र तप से शरीर कृश करता है, धीरे-धीरे चारों प्रकार के आहार का त्याग करता है, अंत में सल्लेखना धारण कर छठे स्वर्ग में अनेक देवांगनाओं के बीच दिव्य हार-कुंडलों से मंडित देव होता है। वह छठे स्वर्ग से आया था और वहीं गया, और परंपरा से मोक्ष जाएगा।

  3. शरीर की ममता से रहित भरत मुनि जहाँ संध्या होती वहीं बैठ जाते, कहीं अधिक समय नहीं ठहरते; वे पवन समान असंग, पृथ्वी समान क्षमाशील, जल समान निर्मल और कर्मरूपी काष्ठ को भस्म करने वाली अग्नि समान थे। चारों आराधनाओं में लीन, तेरह प्रकार के चारित्र के पालक, सिंह समान निर्भय, समुद्र समान गंभीर, सुमेरु समान निश्चल और यथाजात रूपधारी वे सत्य का कवच पहनकर क्षमा रूपी खड्ग से बाईस परीषहों को जीतते हैं।

  4. शत्रु-मित्र, सुख-दुख, काँच-कंचन, महल-श्मशान को समान जानते हुए वे शास्त्र के अनुसार विहार और आहार करते हैं, और तप के प्रभाव से अनेक महाऋद्धियाँ उत्पन्न होती हैं; पैरों में सुई जैसे काँटे चुभें तो भी खेद नहीं होता, और वे उपसर्ग सहने के लिए शत्रुओं के स्थानों में भी विहार करते हैं। संयम के प्रभाव से शुक्लध्यान उत्पन्न होता है; वे मोह, ज्ञानावरणी, दर्शनावरणी और अंतराय कर्मों का नाश कर लोकालोक प्रकाशक केवलज्ञान पाते हैं, और फिर अघातिया कर्मों का नाश कर सिद्धपद प्राप्त करते हैं, जहाँ से फिर संसार भ्रमण नहीं।

  5. कहा गया है कि कैकेयी के पुत्र भरत का यह चरित्र भक्ति से पढ़ने-सुनने वाला सब कष्टों से रहित होकर यश, बल, कीर्ति, विभूति और आरोग्य सहित स्वर्ग और मोक्ष पाता है, और शीघ्र ही सूर्य से भी अधिक तेजस्वी केवलज्ञान की ज्योति प्राप्त करता है।