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पर्व 88

राम-लक्ष्मण का राज्याभिषेक

भरत के चले जाने के शोक के बाद राम-लक्ष्मण का एक ही सिंहासन पर साथ-साथ अभिषेक होता है, सीता और विशल्या का अभिषेक होता है, और सहयोगियों को उनके राज्य मिलते हैं।

कथा खंड विजय और अयोध्या वापसी

सारांश

सिद्धार्थ, रतिवर्धन, मेघरथ, जाम्बूनद आदि विशुद्ध कुलों के एक हजार से अधिक राजा भरत के साथ संसार त्यागते हैं; कुछ मोक्ष और कुछ उत्तम स्वर्ग पाते हैं। लक्ष्मण विराधित की भुजा का सहारा लेकर भाई के लिए रोते हैं, और राम विष भरे अन्न जैसे राज्य को छोड़ने वाले भरत की प्रशंसा करते हैं। जब राजा राम का अभिषेक करना चाहते हैं, तो राम कहते हैं कि चक्रधारी नारायण लक्ष्मण ही इसके योग्य हैं, और लक्ष्मण राम को ही सच्चा स्वामी बताते हैं, इसलिए दोनों का एक ही सिंहासन पर साथ-साथ अभिषेक होता है। सीता और विशल्या का पटरानी के रूप में अभिषेक होता है, और राम विभीषण को लंका, सुग्रीव को किष्किंधा, हनुमान को श्रीनगर और हनुरुह द्वीप, विराधित को अलकापुरी, नल-नील को किष्कुपुर और भामंडल को रथनूपुर देते हैं।

क्या हुआ

5 बिंदु

  1. भरत के साथ हाथी, घोड़े, रथ, स्वर्ण, रत्न और रणवास छोड़कर मुनि बनने वाले विशुद्ध कुलों के एक हजार से अधिक राजाओं में सिद्धार्थ, रतिवर्धन, मेघरथ, जाम्बूनद, शल्य, शशांक, नंदन, नंद, आनंद, सुमति, सुचंद्र, महाबुद्धि, सूर्य, इन्द्रध्वज, श्रुतिधर, अलंक, शांति, कुंदर, सत्यवान, सुमित्र, धर्ममित्र, पूर्णचंद्र, प्रभाकर, सुदन, शांतिसुख और प्रियधर्मा थे। महातप से कोई मोक्ष गए, कोई अहमिन्द्र हुए और कोई उत्कृष्ट देव।

  2. भरत के गुण याद कर लक्ष्मण अपना राज्य शून्य मानते हैं और विराधित की भुजाओं का सहारा लेकर रोते हैं: गुणों के आभूषण, रघुवंश के तिलक भरत ने यौवन में ही शरीर की ममता छोड़ दी; ऐसा सुकोमल शरीर मुनिधर्म के परीषह कैसे सहेगा। राम कहते हैं कि भरत की महिमा कही नहीं जा सकती, उनका मन कभी विषयों में लीन नहीं हुआ और उन्होंने राज्यलक्ष्मी को विष भरे अन्न की तरह छोड़ा; इन्द्र भी उनका वर्णन नहीं कर सकता। पूरी राजसभा और घर-घर में बहुत समय तक भरत की ही चर्चा होती है, लोग प्रसन्न भी हैं और दुखी भी।

  3. दूसरे दिन विद्याधर और भूमिगोचरी सब राजा राम का वैसा ही अभिषेक करना चाहते हैं जैसा स्वर्ग में इन्द्र का होता है। राम कहते हैं कि लक्ष्मण का अभिषेक करो, जो पृथ्वी के स्तंभ, राजाओं के गुरु और वासुदेव हैं और हर समय मेरे चरणों में नमन करते हैं। वे लक्ष्मण के पास जाते हैं, लक्ष्मण उन्हें लेकर राम के पास आते हैं और प्रणाम कर कहते हैं कि राज्य के स्वामी आप ही हैं, मैं तो आपका आज्ञाकारी अनुचर हूँ; राम कहते हैं कि चक्रधारी नारायण होने से अभिषेक तुम्हारा ही योग्य है, और अंततः दोनों का अभिषेक होता है।

  4. नगाड़ों, मृदंग, वीणा और नृत्य के बीच और याचकों को मनवांछित दान देते हुए दोनों भाइयों को एक ही सिंहासन पर बिठाया जाता है और कमल के पत्तों से ढके, प्रासुक जल से भरे स्वर्ण-रत्न के कलशों से विधिपूर्वक अभिषेक कर अमूल्य आभूषण और नए वस्त्र पहनाए जाते हैं। विद्याधर, भूमिगोचरी और तीनों खंडों के देव हल-मूसलधारी बलभद्र राम और चक्रधारी वासुदेव लक्ष्मण की जय-जयकार करते हैं। फिर विद्याधर हर्ष से राम की पटरानी सीता और लक्ष्मण की पटरानी विशल्या का अभिषेक करते हैं।

  5. फिर राम राज्य बाँटते हैं: विभीषण को लंका, सुग्रीव को किष्किंधापुर, हनुमान को श्रीनगर और हनुरुह द्वीप, विराधित को नागलोक जैसी अलकापुरी, नल-नील को किष्कुपुर, भामंडल को विजयार्ध की दक्षिण श्रेणी का रथनूपुर देकर सब विद्याधरों का अधिपति बनाते हैं, और रत्नजटी को देवोपनीत नगर, तथा अन्य सब राजाओं को यथायोग्य स्थान देते हैं। पर्व का उपदेश है कि महापुरुष पूर्व पुण्य साथ लाते हैं, और पुण्यानुबंधी पुण्य करके स्वर्ग के सुख भोगकर अंत में निर्वाण पाते हैं।