पर्व 38
लक्ष्मण को जितपद्मा की प्राप्ति
क्षेमांजलि नगर में लक्ष्मण ने राजा शत्रुदमन द्वारा चलाई गई पाँचों शक्तियाँ झेल लीं और अभिमानी राजकुमारी जितपद्मा को प्राप्त किया।
कथा खंड वनवाससारांश
अतिवीर्य के दीक्षा लेने के बाद राम उसके पुत्र विजयरथ का राज्याभिषेक करते हैं, जो अपनी बहन रत्नमाला लक्ष्मण को और उसकी बड़ी बहन विजयसुंदरी भरत को देता है, जबकि भरत विनय से अतिवीर्य मुनि के दर्शन करने जाते हैं। वनमाला को दृढ़ वचन देकर तीनों क्षेमांजलि नगर पहुँचते हैं, जहाँ लक्ष्मण सुनते हैं कि राजकुमारी जितपद्मा उसी से विवाह करेगी जो उसके पिता की शक्ति का प्रहार सहकर जीवित रहे। लक्ष्मण पाँचों शक्तियाँ झेलकर जितपद्मा और राजा का सम्मान प्राप्त करते हैं, और कुछ दिन रहकर तीनों आधी रात को चुपचाप आगे चल देते हैं।
क्या हुआ
8 बिंदु
न्याय के ज्ञाता श्रीराम ने अतिवीर्य के पुत्र विजयरथ का अभिषेक कराकर उसे पिता का राज्य दिया; विजयरथ ने अपना सारा वैभव दिखाया तो राम ने उसका धन उसी को लौटा दिया। विजयरथ ने अपनी बहन रत्नमाला लक्ष्मण को देनी चाही, जिसे लक्ष्मण ने स्वीकार किया और साक्षात लक्ष्मी जैसी उसकी सुंदरता देखकर हर्षित हुए; फिर दोनों भाई जिनेंद्र की पूजा कर पृथ्वीधर के नगर विजयपुर लौट आए।
अयोध्या में भरत ने सुना कि नर्तकी द्वारा पकड़े जाने पर अतिवीर्य ने विरक्त होकर जिनदीक्षा ले ली है; जब शत्रुघ्न अतिवीर्य की हँसी करने लगा तो भरत ने उसे रोका कि वह राजा धन्य है जिसने महादुःख देने वाले विषयों को छोड़कर शांत भाव पाया, तप का प्रभाव देखो कि शत्रु भी प्रणाम योग्य गुरु हो जाता है। उसी समय विजयरथ अनेक सामंतों सहित आया और रत्नमाला की बड़ी बहन विजयसुंदरी का विवाह बहुत धन के साथ भरत से कराया, और भरत ने विजयरथ से अति स्नेह किया।
भरत तेज घोड़े पर सवार होकर उस विषम, सिंह आदि क्रूर जीवों से भरे पर्वत पर गए जहाँ अतिवीर्य मुनि शिला पर अकेले जिनकल्पी रूप में ध्यानस्थ थे; घोड़े से उतरकर उन्होंने स्तुति की, अपराध की क्षमा माँगी, तीन प्रदक्षिणा दीं और हज़ारों सुभटों सहित अयोध्या लौट आए। सभा में उन्होंने आश्चर्य किया कि सबके मन को मोहने वाली वे नर्तकियाँ कहाँ गईं जिन्होंने अतिवीर्य के सामने मेरी स्तुति की और राजा को पकड़ा, स्त्रियों में ऐसी शक्ति कहाँ, यह अवश्य जिनशासन के देवों की चेष्टा है; फिर भरत विजयसुंदरी सहित ऐसे सुख भोगने लगे जैसे सुलोचना सहित मेघेश्वर।
जब तीनों विजयपुर से चलने को तैयार हुए तो वनमाला ने आँसू भरकर कहा कि मुझे छोड़कर जाना था तो मरने से क्यों बचाया, और लक्ष्मण ने सौगंध खाई कि यदि शीघ्र तुम्हें लेने न आऊँ तो मुझे सम्यग्दर्शन रहित मिथ्यादृष्टि की गति मिले और साधुओं की निंदा का पाप लगे, हम पिता के वचन पालने को दक्षिण समुद्र के किनारे जा रहे हैं और मलयाचल के निकट कोई उत्तम स्थान बनाकर तुम्हें लेने आएँगे। वे सीता सहित रात में चुपचाप निकल गए, नगर शोक में डूब गया और वनमाला ने अपना मन जिनशासन में लगाया; मार्ग में सबके मन मोहते हुए वे क्षेमांजलि नगर पहुँचे और उसके निकट सघन वन में सौमनस वन के देवों की तरह ठहरे, जहाँ लक्ष्मण ने अनेक व्यंजन और दाख का रस तैयार किया।
राम की आज्ञा लेकर सुंदर माला और पीले वस्त्र पहने लक्ष्मण ऊँचे शिखरों वाले जिनमंदिर देखते हुए नगर में गए और लोगों को कहते सुना कि राजकुमारी जितपद्मा उसी से विवाह करेगी जो राजा के हाथ की शक्ति की चोट खाकर जीवित रहे, और स्वर्ग का राज्य मिले तो भी कोई यह काम नहीं करेगा। पूछने पर पता चला कि वह राजा शत्रुदमन और रानी कनकप्रभा की पुत्री है, जिसने शरीर की शोभा से कमलों को जीता इसलिए जितपद्मा कहलाती है; सब कलाओं में निपुण उस कन्या को पुरुष का नाम भी नहीं सुहाता, उसके पास कोई पुल्लिंग शब्द भी नहीं बोल सकता, और वह कैलाश के शिखर जैसे उज्ज्वल भवनों में सैकड़ों सहेलियों के साथ रहती है।
आश्चर्य और कुछ क्रोध के साथ लक्ष्मण राजमहल के द्वार पर पहुँचे और द्वारपाल के पूछने पर राजा से मिलने की इच्छा बताई; सभा में उन्होंने राजा को प्रणाम नहीं किया और कहा कि मैं राजा भरत का सेवक हूँ, पृथ्वी देखने निकला हूँ, आपकी यह राजपुत्री महादुष्ट मारने वाली गाय है जो सबको दुःख देती है। जब शत्रुदमन ने कहा कि जो मेरी शक्ति सह सके वह जितपद्मा से विवाह करे, तब लक्ष्मण बोले कि तुम्हारी एक शक्ति से मेरा क्या होगा, अपनी पूरी शक्ति से मुझ पर पाँच शक्तियाँ चलाओ; झरोखे में बैठी जितपद्मा लक्ष्मण को देख मोहित हुई और हाथ जोड़कर इशारे से रोकती रही कि शक्ति की चोट मत खाओ, तो लक्ष्मण ने इशारे से उसे निर्भय रहने को कहा।
क्रोध से जलती अग्नि जैसी पहली शक्ति राजा ने चलाई, जिसे लक्ष्मण ने दाहिने हाथ में ऐसे पकड़ा जैसे गरुड़ सर्प को पकड़ता है, दूसरी बाएँ हाथ में, तीसरी और चौथी दोनों काँखों में पकड़ीं, तब वे चार दाँतों वाले हाथी जैसे शोभित हुए, और पाँचवीं दाँतों से ऐसे पकड़ी जैसे मृगराज मृगी को पकड़े; देवों ने पुष्पवृष्टि की, दुंदुभि बजे, और लक्ष्मण ने कहा कि और हो तो और चलाओ। सारी सभा भय से काँप उठी, राजा ने लज्जा से मुँह नीचा कर लिया, और जितपद्मा आकर लक्ष्मण के पास ऐसे खड़ी हुई जैसे इंद्र के पास शची; तब लक्ष्मण ने तुरंत विनय से कहा, हे मामा! हम आपके बालक हैं, हमारा अपराध क्षमा करो, और शत्रुदमन ने हाथी की सूँड जैसी भुजाओं से उन्हें गले लगाकर कहा कि मत्त हाथियों को क्षण में जीतने वाले मुझे आपने जीत लिया, धन्य है आपका पराक्रम और रूप।
बाजों और दान के बीच राजा ने जितपद्मा का पाणिग्रहण करने को कहा, पर लक्ष्मण बोले कि निकट ठहरे मेरे बड़े भाई और भावज की आज्ञा ही करना उचित है, तब राजा दोनों को रथ में बैठाकर परिवार सहित राम के पास गया; सेना का गर्जन सुनकर सीता डरीं कि कोई उपद्रव है, पर मंगलद्रव्य लिए नाचती स्त्रियों को देखकर राम को विश्वास हुआ, और शत्रुदमन राम के चरणों में नमस्कार कर उन्हें अपने महल में ले गया और कुछ दिन भक्ति से सेवा की। फिर आधी रात को तीनों चल दिए, लक्ष्मण ने जितपद्मा को वैसे ही विश्वास दिलाया जैसे वनमाला को दिलाया था, और गौतम स्वामी श्रेणिक से कहते हैं कि पूर्व पुण्य से जहाँ वे जाते वहाँ राजा-प्रजा उनकी सेवा करते और दुर्लभ वस्तुएँ बिना चाहे मिलतीं, फिर भी जब तक मुनिपद का उदय न हो तब तक वे भोगों से विरक्त रहकर देवों समान सुख भोगते।