पर्व 39
देशभूषण-कुलभूषण मुनि का कथानक
वंशगिरि पर राम-लक्ष्मण ने देशभूषण और कुलभूषण मुनियों पर उपसर्ग करने वाले अग्निप्रभ असुर को भगाया, और दोनों मुनियों को तत्काल केवलज्ञान प्राप्त हुआ।
कथा खंड वनवाससारांश
वंशस्थलपुर के निकट रात में होने वाले भयानक शब्दों से नगरवासी भाग जाते हैं, पर राम, लक्ष्मण और सीता पर्वत पर चढ़कर देशभूषण और कुलभूषण मुनियों को ध्यानमग्न पाते हैं, जिन पर एक असुर मायामयी सर्पों और भूत-प्रेतों से उपसर्ग कर रहा है। दोनों भाइयों के धनुष चढ़ाते ही अग्निप्रभ असुर भाग जाता है और मुनियों को केवलज्ञान प्राप्त होता है। केवली भगवान उन पूर्वभवों का वर्णन करते हैं जिनमें वे उदित-मुदित और फिर रत्नरथ-विचित्ररथ थे और उनका शत्रु पहले वसुभूति और फिर अनुधर था, और उनके पूर्वभव के पिता, अब गरुड़ेंद्र महालोचन, संकट में राम की सहायता करने का वचन देते हैं।
क्या हुआ
14 बिंदु
मार्ग में राम मूँगे के रंग जैसी कोंपलों से जानकी के कर्णाभूषण बनाते और बेलों के झूले पर दोनों भाई उसे झुलाते; यों धीरे-धीरे वे वंशस्थलपुर पहुँचे, जिसके निकट वंशधर नाम का पर्वत था जिस पर बाँसों के समूह से मार्ग कठिन था और ऊँचे शिखरों की छाया से मानो सदा संध्या रहती थी, और उन्होंने राजा व प्रजा को नगर छोड़कर भागते देखा। पूछने पर पता चला कि तीन दिन से रात में इन शिखरों पर ऐसी ध्वनि होती है कि पृथ्वी काँपती है, वृक्षों की जड़ें उखड़ जाती हैं, सरोवरों का जल डोल उठता है और लोगों के कान बहरे हो जाते हैं, मानो कोई दुष्ट देव यहाँ क्रीड़ा करता है, इसलिए सब लोग संध्या को पाँच कोस दूर चले जाते हैं और सुबह लौट आते हैं।
सीता ने कहा कि जहाँ ये सब लोग जा रहे हैं वहाँ हम भी चलें, पर दोनों धीर भाइयों ने हँसकर कहा कि तुम बहुत कायर हो, हम तो आज इसी पर्वत पर रहकर देखेंगे कि यह भयानक ध्वनि किसकी है; तब सीता पति के पीछे चली, राम ने कठिन पाषाणों पर उसका हाथ पकड़ा, और राम के पीछे तथा लक्ष्मण के आगे चलती सीता ऐसी लगती थी मानो इंद्रनीलमणि और चंद्रकांतमणि के बीच पुखराज हो। शिखर पर उन्होंने देशभूषण और कुलभूषण नाम के दो मुनियों को भुजाएँ लटकाए कायोत्सर्ग मुद्रा में, नग्न, मोह रहित, शरीर और आत्मा को भिन्न जानते हुए महाध्यान में लीन देखा, और यह सोचते हुए कि संसार के सब कार्य दुःख के कारण हैं, एक धर्म ही सुख का कारण है, नमस्कार कर उनके चरणों के पास बैठ गए।
तभी असुरदेव के आने से महाभयानक शब्द हुआ और मायामयी सर्प, बिच्छू, अजगर आदि दोनों मुनियों के शरीर पर लिपट गए; दोनों भाइयों ने उन्हें हटाया, सीता ने झरनों के जल से मुनियों के चरण धोकर केसर-कपूर युक्त चंदन का लेप किया, लक्ष्मण पास की लताओं के फूल लाए जिनसे पूजा हुई, दोनों भाइयों ने वीणा बजाकर ऐसे भजन गाए कि वन के तिर्यंच भी मोहित हो गए, और भक्ति से भरी सीता ने ऐसा नृत्य किया जैसा सुमेरु पर्वत पर शची करती है। सूर्यास्त होने पर असुर की माया से हड़हड़ हँसते भूत, कुशब्द बोलते राक्षस, मुख से आग की ज्वाला निकालती सियारनियाँ, नाचते कलेवर, अग्नि और रक्त की वर्षा, हड्डियों के आभूषण पहने डाकिनियाँ और त्रिशूलधारी पिशाच आए, शिलाएँ काँपीं और भूकंप हुआ, पर महामुनि शुक्लध्यान में मग्न रहे और उन्हें उपसर्ग का पता भी नहीं चला।
डरी हुई सीता को सब विघ्न हरने वाले मुनियों के चरणों की शरण में बैठाकर राम-लक्ष्मण ने धनुष-बाण हाथ में लिए और मेघ जैसी गर्जना की, और धनुष चढ़ाने के वज्रपात जैसे शब्द से अग्निप्रभ नाम का वह असुर इन्हें बलभद्र और नारायण जानकर भाग गया और उसकी सारी माया नष्ट हो गई। उसी क्षण देशभूषण और कुलभूषण मुनियों को केवलज्ञान प्राप्त हुआ, चारों निकायों के देव, भूमिगोचरी और विद्याधर पूजा करने आए, केवली के निकट रात-दिन का भेद न रहा, और राम ने हाथ जोड़कर पूछा कि असुर ने आप पर उपसर्ग क्यों किया और आप दोनों में इतना स्नेह क्यों है।
केवली भगवान की दिव्यध्वनि हुई कि पद्मिनी नगर में राजा विजयपर्वत और रानी धारिणी थे, और उनका सर्वशास्त्रों में प्रवीण, राजकाज में निपुण दूत अमृतसुर था, जिसकी स्त्री उपभोगा से उदित और मुदित नाम के दो व्यवहारकुशल पुत्र थे। राजा ने अमृतसुर को किसी काम से बाहर भेजा तो वह अपने मित्र वसुभूति के साथ चला, और अमृतसुर की स्त्री पर आसक्त पापी वसुभूति ने रात में खड्ग से उसे मार डाला, नगर लौटकर लोगों से कहा कि मुझे वापस भेज दिया है, और उपभोगा को सब बताया, तो उसने कहा कि मेरे दोनों पुत्रों को भी मार दो, तब हम निश्चिंत होंगे।
यह बात उदित की पत्नी ने सुन ली और उदित से कह दी, क्योंकि वह सास का चरित्र पहले से जानती थी, जो उसे वसुभूति की पत्नी ने बताया था, जो पति के परस्त्री-सेवन से उससे विरक्त थी; उदित ने सावधान होकर मुदित को भी सावधान किया और वसुभूति की तलवार देखकर पिता के मरण का निश्चय होने पर वसुभूति को मार डाला। वह पापी, जो पहले ब्राह्मण था, कुशील और हिंसा के दोष से मरकर म्लेच्छ योनि में चांडाल हुआ।
मुनियों में महातेजस्वी मतिवर्धन आचार्य संघ सहित पद्मिनी नगरी के वसंततिलक उद्यान में आए और आर्यिकाओं की गुरानी अनुधरा आर्यिका भी सब आर्यिकाओं के साथ नगर के पास उपवन में ठहरीं; उद्यान के अधिकारी ने डरते हुए राजा से पूछा कि इन्हें रोकें या नहीं, तो राजा ने कहा मना मत करो, जहाँ साधु विराजें वह स्थान महापवित्र होता है। कायोत्सर्ग और पद्मासन में विराजमान, बेला, तेला, चौला, पाँच, दस उपवास, पक्ष और मास के उपवासों से कृश मुनियों को नमस्कार कर राजा ने पूछा कि आपके शरीर में ऐसी ज्योति है पर भोग नहीं, तब आचार्य ने उपदेश दिया कि जीवन हाथी के कान जैसा चंचल, शरीर केले के थंभ जैसा असार और ऐश्वर्य स्वप्न जैसा है, गर्भ के दुःखों का वर्णन किया, इंद्रियों को धर्म रूपी धन के चोर बताया, और मन रूपी हाथी को ज्ञान रूपी अंकुश से वश कर वैराग्य रूपी खूँटे से बाँधने और लोक के शिखर पर अविनाशी पुर का अखंड राज्य पाने की प्रेरणा दी।
यह उपदेश सुनकर राजा विजयपर्वत राज्य छोड़ मुनि हुए और दूत के दोनों पुत्र उदित-मुदित भी मुनि होकर विहार करने लगे; सम्मेदशिखर की यात्रा को जाते हुए वे मार्ग भूलकर वन में भटक गए, जहाँ वसुभूति का जीव महारौद्र भील होकर उन्हें मारने को तैयार हुआ, पर उदित मुनि ने मुदित से कहा कि भय मत करो, क्षमा धर्म धारण करो, मुदित ने कहा कि देह तो विनश्वर है, यह वसुभूति का जीव है जिसे हमने पिता के वैर से मारा था, और दोनों कायोत्सर्ग में खड़े हो गए। तब भीलों के स्वामी म्लेच्छ राजा ने उसे रोककर दोनों मुनियों को बचाया, क्योंकि केवली ने राम को बताया कि यक्ष नामक गाँव में सुरप और कर्षक दो भाइयों ने एक शिकारी को धन देकर एक पक्षी को छुड़ाया था, वह पक्षी मरकर म्लेच्छों का राजा हुआ और वे भाई उदित-मुदित हुए; जो जीव जिसका भला करता है वह उसका भला ही करता है।
उपसर्ग से छूटकर उदित-मुदित मुनियों ने सम्मेदशिखर और अनेक तीर्थक्षेत्रों की यात्रा की और रत्नत्रय का पालन करते हुए समाधिपूर्वक प्राण छोड़कर स्वर्ग गए; उधर वसुभूति का जीव अनेक कुयोनियों में भ्रमण कर मनुष्य होकर तापसी बना और अज्ञान तप से ज्योतिषी देवों में अग्निकेतु नाम का क्रूर देव हुआ। भरतक्षेत्र के अरिष्टपुर नगर के महाभोगी राजा प्रियव्रत की दो रानियाँ थीं, कनकप्रभा और पद्मावती; उदित-मुदित के जीव स्वर्ग से चयकर पद्मावती के रत्नरथ और विचित्ररथ नाम के पुत्र हुए और वह ज्योतिषी देव चयकर कनकप्रभा का अनुधर नाम का पुत्र हुआ, और राजा प्रियव्रत पुत्र को राज्य देकर जिनमंदिर में छह दिन के उपवास के बाद शरीर छोड़ स्वर्ग गए।
रत्नरथ ने लक्ष्मी समान राजपुत्री श्रीप्रभा से विवाह किया, जिसकी अभिलाषा अनुधर को भी थी, इसलिए पूर्वजन्म के वैर पर नया वैर हुआ; अनुधर रत्नरथ की पृथ्वी उजाड़ने लगा तो रत्नरथ और विचित्ररथ ने उसे युद्ध में जीतकर देश से निकाल दिया, और वह महाक्रोध से जटा-वल्कलधारी तापसी हो गया, विषवृक्ष के समान कषाय रूपी विष से भरा हुआ। रत्नरथ और विचित्ररथ चिरकाल राज्य कर मुनि बने और तप से स्वर्ग में देव हुए, फिर वहाँ से चयकर सिद्धार्थनगर के राजा क्षेमंकर और रानी विमला के देशभूषण और कुलभूषण नाम के महासुंदर पुत्र हुए, जिन्हें राजा ने अनेक देशों में भ्रमण करते आए सागरघोष नामक पंडित के पास पढ़ने रखा, और वे अपने विद्यागुरु के सिवा किसी को न जानते हुए सब विद्याओं और कलाओं में पारंगत हो गए।
केवली ने कहा कि वे देशभूषण-कुलभूषण हम ही हैं; हमने सुना कि पिता ने हमारे विवाह के लिए राजकन्याएँ बुलवाई हैं, और उन्हें देखने परम विभूति सहित निकले तो महल के झरोखे में बैठी अपनी बहन राजकुमारी कमलोत्सवा को, जिसे हम जानते नहीं थे, देखकर दोनों के मन विकारी हुए और दोनों ने सोचा कि मैं इससे विवाह करूँगा और दूसरा करेगा तो उसे मारूँगा, तभी बंदीजनों ने कहा कि रानी विमला सहित राजा क्षेमंकर जयवंत हों, जिनके दोनों पुत्र देवों समान हैं और झरोखे में बैठी कमलोत्सवा उनकी सरस्वती समान बहन है। मोहकर्म की दुष्टता देखकर कि अपनी ही बहन की अभिलाषा हुई, हमें वैराग्य हुआ और माता-पिता के व्याकुल होने पर भी हमने दिगंबर भेष धारण किया, आकाशगामिनी ऋद्धि पाई और तीर्थों की वंदना की, और हमारे पिता राजा क्षेमंकर शोक की अग्नि से तप्त होकर आहार त्याग मरण कर भवनवासी गरुड़कुमार देवों के अधिपति महालोचन नाम के गरुड़ेंद्र हुए, जो इस सभा में बैठे हैं।
वह अनुधर तापसी भ्रमण करता हुआ शिष्यों सहित कौमुदी नगरी पहुँचा, जहाँ राजा सुमुख (पटरानी रतिवती) की मदना नाम की नृत्यकारिणी ने साधुदत्त मुनि से सम्यग्दर्शन ग्रहण किया था; राजा ने तापसी के महातप की प्रशंसा की तो मदना ने कहा कि अज्ञानी का क्या तप, यह पाखंड है, और यह दिखाने के लिए अपनी पुत्री नागदत्ता को सिखाकर उसके आश्रम में भेजा, जिस पर मोहित होकर तापसी रात में उसके साथ उसकी माता के घर याचना करने गया, वहाँ बाँध दिया गया, पूर्व संकेत के अनुसार राजा ने उसे रात में बँधा देखा और प्रातः तिरस्कार कर निकाल दिया। गौतम स्वामी श्रेणिक से कहते हैं कि कामी न देखते, न जानते, न डरते और न लज्जा करते हैं, जैसे अंधा सर्पों से भरे कुएँ में गिरे; वह तापसी अपमानित होकर मरा, अनेक कुयोनियों में भटककर एक दरिद्री के घर जन्मा जिसका पिता माता के कलह से विदेश चला गया, बचपन में भीलों ने उसकी माता सहित देश के लोगों को बंदी बना लिया, और अकेला होकर वह तापसी बना और अज्ञान तप से ज्योतिषी देवों में अग्निप्रभ नाम का देव हुआ।
एक समय अनंतवीर्य केवली से, जो मुनिसुव्रतनाथ भगवान के मोक्ष जाने के बाद केवली हुए थे, एक शिष्य ने पूछा कि आपके समान संसार से तारने वाला दूसरा कौन होगा, तो उन्होंने कहा कि देशभूषण-कुलभूषण मुनि केवली होंगे; यह वचन सुनकर अग्निप्रभ देव ने कुअवधि से हमें इस पर्वत पर ध्यान करते जाना और अनंतवीर्य केवली के वचन मिथ्या करने के मान से तथा पूर्व वैर के कारण उपसर्ग किया, और तुम्हें बलभद्र-नारायण जानकर भय से भाग गया। केवली ने कहा, हे पद्मलोचन राम! तुम चरमशरीरी, तद्भव मोक्षगामी बलभद्र हो और लक्ष्मण नारायण हैं, तुम्हारी सेवा के साथ घातिया कर्मों के क्षय से हमें केवलज्ञान हुआ; प्राणियों के सब वैर पूर्व वैर के अनुबंध से होते हैं, ऐसा जानकर राग-द्वेष छोड़ो।
परम हर्षित गरुड़ेंद्र देव ने केवली को नमस्कार कर रघुवंश को प्रकाशित करने वाले श्रीराम से कहा कि आपने मुनियों की भक्ति की, ये मुनि मेरे पूर्वभव के पुत्र हैं, इसलिए जो माँगो वह मैं देता हूँ; श्रीराम ने एक क्षण विचार कर कहा कि कभी हम पर संकट आए तो हमें याद कर हमारी रक्षा करना, और गरुड़ेंद्र ने वचन दिया कि जब तुम्हारा काम होगा तब मैं तुम्हारे निकट रहूँगा और संकटों में रक्षा करूँगा, तब देवों ने मेघ जैसी ध्वनि वाले बाजे बजाए। मुनियों के पूर्वभव सुनकर कुछ मनुष्य मुनि बने और कुछ ने श्रावक के व्रत लिए, और जगतपूज्य देशभूषण-कुलभूषण केवली नगर, गाँव, पर्वत आदि सब स्थानों में विहार कर धर्म का उपदेश देते रहे।