पर्व 40
रामगिरि पर श्रीरामचन्द्र का पदार्पण
राम ने वंशगिरि को हज़ारों जिनमंदिरों से सुशोभित किया, जिससे वह पर्वत रामगिरि नाम से प्रसिद्ध हुआ, और फिर वे दंडकवन की ओर चल पड़े।
कथा खंड वनवाससारांश
केवली भगवान से यह सुनकर कि श्रीराम चरमशरीरी, तद्भव मोक्षगामी हैं, सब राजा उनकी जय-जयकार करते हैं; राम राजा शूरप्रभ का वंशस्थलपुर चलने का निवेदन अस्वीकार कर वंशगिरि के शिखर पर रहते हैं, जहाँ मंडप बनाए जाते हैं और राजा सब प्रकार की सामग्री लाते हैं। वे पर्वत को हज़ारों जिनमंदिरों से सुशोभित करते हैं और फिर भोगों में दिन व्यर्थ न गँवाने का निश्चय कर कर्णरवा नदी के पास के दंडकवन जाने का विचार करते हैं, जहाँ भरत की आज्ञा का प्रवेश नहीं। राम के बनवाए मंदिरों के कारण वह पर्वत रामगिरि नाम से प्रसिद्ध होता है।
क्या हुआ
5 बिंदु
केवली भगवान की वाणी से श्रीराम को चरमशरीरी, तद्भव मोक्षगामी सुनकर सब राजा जय-जय शब्द कहकर प्रणाम करने लगे, और वंशस्थलपुर का महानिर्मल मन वाला राजा शूरप्रभ राम, लक्ष्मण और सीता की भक्ति करता हुआ महलों की ज्योति से उज्ज्वल अपने नगर में चलने की प्रार्थना करने लगा। राम ने यह नहीं माना और हेमाचल के शिखर जैसे सुंदर वंशगिरि के शिखर पर नलिनीवन में एक बड़ी रमणीक शिला पर हंस की तरह आ बैठे, जहाँ कुंद, मौलसिरी, मालती, अशोक, नागवृक्ष आदि खिले थे, सरोवरों में कमल खिले थे और भूमि पाँच वर्णों के रत्नों से शोभित थी।
राजा की आज्ञा से स्वामी-भक्ति में लीन, मंगलवाणी बोलने वाले सेवकों ने श्रीराम के निवास के लिए चित्रों से सजे, चौड़े-ऊँचे वस्त्रों के मनोहर मंडप बनवाए, जिनमें ध्वजाएँ फहराती थीं, पृथ्वी पर मंगल कलश रखे थे और छत्र, चमर, सिंहासन आदि राजचिह्न उपलब्ध थे; जहाँ-जहाँ रघुनाथ पैर रखते, वहाँ के राजा शय्या, आसन, मणि-सुवर्ण के उपकरण, इलायची, लौंग, मेवा-मिष्ठान, अमूल्य वस्त्राभूषण, सुगंधित भोजन, दही, दूध, घी और तरह-तरह के अनाज लाते। मंडपों में कहीं गीत, नृत्य और बाजे होते, कहीं पुण्य की कथाएँ होतीं, नृत्यकारिणियाँ अप्सराओं जैसा नृत्य करतीं और दान दिया जाता, जिससे कोई याचक खाली हाथ नहीं लौटता था।
वंशगिरि पर्वत पर श्रीरामचंद्र ने जिनेश्वर देव के हज़ारों अद्भुत चैत्यालय बनवाए, जिनके स्तंभ महादृढ़ थे, लंबाई-चौड़ाई-ऊँचाई योग्य थी, झरोखे और तोरण सहित द्वार थे, जो कोट और खाई से मंडित, सुंदर ध्वजाओं से युक्त थे और जहाँ मृदंग, वीणा, बाँसुरी, झाँझ, मंजीरा, शंख, भेरी आदि बाजों के शब्दों से निरंतर महा उत्सव होते थे। उनमें सब लक्षणों से पूर्ण, सब जीवों से पूज्य, पाँच वर्णों के जिनेंद्र भगवान के प्रतिबिंब विराजमान थे।
एक दिन कमललोचन श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा, हे भाई! यहाँ आए बहुत दिन बीत गए, इस पर्वत पर सुख से रहे, जिनचैत्यालय बनवाने से पृथ्वी पर निर्मल यश हुआ और वंशस्थलपुर के राजा ने बहुत सेवा की, पर यहीं रहे तो कार्य की सिद्धि नहीं होगी; ये भोग रोग के समान हैं, फिर भी जब तक संयम का उदय नहीं तब तक बिना यत्न आते रहते हैं, प्राणी जैसे कर्म करता है वैसा फल परभव में भोगता है, और नदी का वेग, आयु के दिन और यौवन जाकर फिर नहीं लौटते। उन्होंने कहा कि कर्णरवा नाम की नदी के पास दंडकवन सुनते हैं, जहाँ भूमिगोचरियों का आना-जाना नहीं और भरत की आज्ञा का प्रवेश नहीं, वहाँ समुद्र के तट पर कोई स्थान बनाकर रहेंगे, और लक्ष्मण ने विनती की कि हे नाथ! जो आप आज्ञा करेंगे वही होगा।
दोनों धीर वीर इंद्र समान भोग भोगते हुए सीता सहित वंशगिरि से चले; वंशस्थलपुर का स्वामी राजा शूरप्रभ बहुत दूर तक साथ गया और राम-लक्ष्मण ने बड़ी कठिनाई से उसे विदा किया, तब वह महाशोक सहित अपने नगर लौटा, क्योंकि श्रीराम का वियोग सभी के शोक का कारण था। गौतम स्वामी राजा श्रेणिक से कहते हैं कि अनेक धातुओं से भरे उस बड़े पर्वत को रामचंद्र ने भव्य जीवों के सम्यग्दर्शन की प्राप्ति में कारण रूप जिनमंदिरों की पंक्तियों से शोभायमान किया, इसलिए वंशगिरि पर्वत रामगिरि कहलाया और पृथ्वी पर प्रसिद्ध हुआ।