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पर्व 41

जटायु पक्षी का व्याख्यान

पूर्वभव में मुनियों की हत्या करने वाला राजा दंडक, जो अब गिद्ध था, दो चारण मुनियों के चरणों में रूपांतरित होकर व्रतधारी जटायु बना।

कथा खंड वनवास

सारांश

दक्षिण की ओर चलते हुए नर्मदा नदी पर पहुँचकर राम और सीता चारण मुनि गुप्ति और सुगुप्ति को आहार देते हैं और पंचाश्चर्य होते हैं। वृक्ष पर बैठा एक गिद्ध यह देखकर अपने पूर्वभव याद करता है और मुनियों के चरणों के गंधोदक में गिरकर रत्नों जैसी कांति पाता है, और सुगुप्ति मुनि बताते हैं कि वह पूर्वभव में राजा दंडक था, जिसके मुनियों को घानी में पेलने से उत्पन्न क्रोधाग्नि ने उसके देश को दंडकवन बना दिया। अपने और अपने भाई के वैराग्य की कथा सुनाकर मुनि पक्षी को श्रावक के व्रत देते हैं और उसकी रक्षा सीता को सौंपते हैं, और राम उसका नाम जटायु रखते हैं।

क्या हुआ

11 बिंदु

  1. राजा अनरण्य के पोते, दशरथ के पुत्र राम लक्ष्मण और सीता सहित दक्षिण दिशा के समुद्र की ओर चले और ऐसे महाभयंकर वन में प्रवेश किया जहाँ भील भी नहीं विचर सकते थे, मार्ग नहीं दिखता था, पर्वतों की अंधकारमय गुफाएँ थीं और गंभीर ध्वनि से झरने बहते थे; जानकी के साथ रोज़ एक-एक कोस चलते हुए वे नर्मदा नदी पहुँचे। वहाँ फल-फूलों से लदे सघन छायादार वृक्षों के नीचे बैठकर उन्होंने जलक्रीड़ा की, और सीता ने तुरंत बनाए मिट्टी और बाँस के बर्तनों में पके फलों और वन के अनाज से महास्वादिष्ट, सुगंधित आहार तैयार किया।

  2. भोजन के समय दोनों वीर मुनि को आहार देने की इच्छा से पड़गाहन के लिए खड़े हुए, उसी समय मति, श्रुत और अवधि तीन ज्ञान के धारी, एक महीने के उपवासी गुप्ति और सुगुप्ति नाम के दो चारण मुनि आकाशमार्ग से आहार के लिए आए; सीता ने उन्हें दूर से देखकर हर्ष से कहा, ‘ये आए, ये आए!’ राम ने सीता सहित सामने जाकर नमस्कार किया और नवधा भक्ति से वन की भैंसों और गायों का दूध, दाख, छुहारे, गिरी, बादाम, वन के अनाज, सुगंधित घी और मिष्ठान से विधिपूर्वक पारणा कराया, और मुनियों के निरंतराय आहार लेने पर पंचाश्चर्य हुए: रत्नवृष्टि, पुष्पवृष्टि, शीतल मंद सुगंध पवन, दुंदुभि बाजे और जय-जयकार की ध्वनि।

  3. उस समय वन में वृक्ष पर बैठे एक गृध्र पक्षी (गिद्ध) ने मुनियों को देखकर निर्मल परिणामों से अपने पूर्वभव देखे, अर्थात् जातिस्मरण हुआ कि मैं कई भव पहले मनुष्य था, कहने को मित्र पर वास्तव में महाशत्रु पापी जीवों के बहकावे से मैंने धर्म रूपी रत्न छोड़ दिए, गुरु के वचनों का उल्लंघन कर पाप किए और जन्म व्यर्थ गँवाया। पहले शोक और फिर साधु के दर्शन से हर्षित होकर वह पंख हिलाता, आँसू भरे नेत्रों से वृक्ष से पृथ्वी पर गिरा, जिसकी आवाज़ से हाथी, सिंह आदि भाग गए और सीता व्याकुल होकर कटु शब्दों से उसे हटाने लगीं, पर वह मुनियों के चरणों के गंधोदक में आ गिरा और उसके प्रभाव से क्षणमात्र में उसका शरीर रत्नों की राशि जैसा तेजस्वी हो गया, पंजे स्वर्ण जैसे, पैर वैडूर्यमणि जैसे, शरीर अनेक रत्नों की ज्योति जैसा और चोंच मूँगे जैसी; तब वह हर्ष से नाचने लगा और फिर पंख समेटकर मुनियों के चरणों में प्रणाम कर बैठ गया।

  4. श्रीराम ने मुनियों को नमस्कार कर पूछा कि यह महाकुरूप, मांसभक्षी, दुष्ट गिद्ध क्षणमात्र में स्वर्ण-रत्न की ज्योति जैसा कैसे हो गया और आपके चरणों के निकट इतना शांत क्यों है, तब सुगुप्ति मुनि ने कहा कि पहले यहाँ दंडक नाम का सुंदर महादेश था, जिसमें बाड़ से युक्त गाँव, कोट-खाई-द्वारों से युक्त नगर, रत्नों की खानों वाले पट्टन, पर्वत पर बसे संवाहन, पाँच सौ गाँवों वाले मटंब, गायों और ग्वालों के निवास घोष, आगे नदी वाले खेट, पीछे पर्वत वाले कर्वट और समुद्र के समीप द्रोणमुख थे। उस देश के कर्णकुंडल नगर में इस पक्षी का जीव दंडक नाम का महाप्रतापी, महामानी राजा था, जिसकी रानी दंडी साधुओं की भक्त थी, और रानी के वश होकर राजा ने भी मिथ्याशास्त्रों का सेवन कर परिव्राजकों का मार्ग अपनाया।

  5. एक दिन नगर के बाहर इस निर्दयी, पाषाण-हृदय राजा ने वन में कायोत्सर्ग से ध्यान करते महामुनि के गले में मरा हुआ सर्प डाल दिया, और मुनि ने प्रतिज्ञा की कि जब तक कोई मेरे कंठ से सर्प नहीं हटाएगा तब तक मैं हलन-चलन नहीं करूँगा; कुछ दिनों बाद राजा उसी मार्ग से गया तो एक सज्जन ने बताया कि किसी नरकगामी ने यह सर्प डाला था, मैंने अभी उसे निकाला है, और मुनि को कोई दुःख नहीं, तब राजा मुनि को शांत, कषाय रहित जानकर प्रणाम कर लौटा और उस दिन से मुनियों का भक्त हो गया। यह सुनकर पापिनी रानी ने क्रोध से अपने गुरु को निर्ग्रंथ मुनि का रूप बनाकर महल में आकर विकारी क्रिया करने को कहा, उन दंडियों ने ऐसा ही किया, और यह जानकर क्रोधित राजा ने मिथ्यादृष्टि मंत्रियों के भड़काने पर आचार्य सहित सब मुनियों को घानी (कोल्हू) में पेलने की आज्ञा दी।

  6. एक साधु शौच के लिए बाहर गए थे, लौटते समय किसी दयावान पुरुष ने कहा कि पापी राजा ने अनेक मुनियों को यंत्र में डालकर मार दिया है, आप यहाँ से चले जाइए, आपका शरीर धर्म का साधन है; संघ के मरण के शोक से वे एक क्षण स्तंभ समान निश्चल खड़े रहे, फिर उनकी समता रूपी गुफा से क्रोध रूपी केसरी सिंह निकला, नेत्र लाल हो गए, और उनके बाएँ कंधे से कालाग्नि समान प्रज्वलित तैजस पुतला निकला, जिससे धरती और आकाश अग्निमय हो गए और बाँस के वन की तरह सारा देश जल गया, न राजा, न अंतःपुर, न गाँव, नगर, पर्वत, नदी, वन और न कोई प्राणी बचा, और बहुत दिनों में उपार्जित समता रूपी धन क्रोध रूपी शत्रु ने तत्काल हर लिया। दंडक देश का राजा दंडक पाप के कारण प्रलय को प्राप्त हुआ, इसलिए यह दंडकवन कहलाता है, जहाँ कई वर्षों तक तृण भी नहीं उगा, फिर बहुत काल बाद मुनियों के विहार के प्रभाव से वृक्ष उगे, और यह वन देवों को भी भयकारी है; मुनियों को मारकर राजा दंडक नरक और तिर्यंच गतियों में बहुत काल भ्रमण कर यह गिद्ध हुआ, अब इसके पापकर्म कुछ कम हुए हैं, इसलिए हमें देखकर इसे पूर्वभव का स्मरण हुआ।

  7. कंपित पक्षी पर दयालु होकर मुनि ने कहा, हे भव्य! अब भय मत कर, होनहार को कोई मेट नहीं सकता, पश्चाताप छोड़; देख, कहाँ यह वन, कहाँ सीता सहित श्रीराम का आना, कहाँ हमारा वनचर्या का नियम कि वन में श्रावक के यहाँ आहार मिलेगा तो लेंगे, और कहाँ हमें देख तेरा जातिस्मरण होना, कर्मों की गति विचित्र है; फिर श्रीराम का अभिप्राय जानकर सुगुप्ति मुनि ने अपने और गुप्ति मुनि के वैराग्य का कारण कहा। वाराणसी नगरी के राजा अचल और उनकी रानी गिरिदेवी ने एक दिन त्रिगुप्ति नाम के मुनिराज को आहार दिया, आहार निरंतराय होने पर रानी ने पूछा कि मेरे पुत्र होगा या नहीं, तो वचनगुप्ति के धारी मुनि ने कहा कि तुम्हारे दो विवेकी पुत्र होंगे, और त्रिगुप्ति मुनि के आशीर्वाद से उत्पन्न दोनों पुत्रों के नाम माता-पिता ने सुगुप्ति और गुप्ति रखे, जो सब कलाओं में पारंगत, लोगों के प्यारे राजकुमार होकर घर में रहे।

  8. गंधवती नगरी के राजा के पुरोहित सोम के दो पुत्र सुकेतु और अग्निकेतु थे, जिनमें परस्पर अति प्रेम था; सुकेतु का विवाह हुआ तो चिंता हुई कि कहीं इस स्त्री के कारण हम दोनों भाइयों को अलग न होना पड़े, फिर शुभ कर्म के योग से सुकेतु को वैराग्य हुआ और वे अनंतवीर्य स्वामी के समीप मुनि बन गए, और भाई के वियोग से दुखी अग्निकेतु वाराणसी में तापस हो गया। जब सुकेतु मुनि ने भाई को समझाने जाने की आज्ञा माँगी तो गुरु ने कहा कि विवाद के समय दिन के पिछले पहर में गौरवर्ण, अनेक रंग के वस्त्र पहने एक कन्या तीन स्त्रियों सहित गंगा के किनारे आएगी, उससे पहचानकर भाई से कहना कि यह इस नगर के धनवान प्रवर सेठ की रुचिरा नाम की पुत्री है, जो आज से तीसरे दिन मरकर कंबर गाँव में अपने पिता के मामा विलास के यहाँ बकरी होगी, उसे सियार मारेगा, फिर वह गेंडा, फिर भैंस होगी, और फिर उसी विलास के यहाँ विधूरा नाम की पुत्री होगी।

  9. जैसा गुरु ने कहा था वैसा ही हुआ; जब प्रवर सेठ विलास की पुत्री विधूरा से विवाह करने लगा, तब अग्निकेतु ने कहा कि यह तेरी रुचिरा नाम की पुत्री है जो मरकर अनेक पशु योनियों में जन्म लेकर अब तेरे मामा की पुत्री हुई है, तुझे इससे विवाह करना उचित नहीं, और विलास को भी कन्या के पूर्वभव कहे; यह सुनकर कन्या को जातिस्मरण हुआ और उसने कुटुंब से मोह छोड़कर सभा से कहा कि यह प्रवर मेरा पूर्वभव का पिता है, फिर वह आर्यिका बनी और अग्निकेतु तापस मुनि बन गया। यह वृत्तांत सुनकर हम दोनों भाइयों को वैराग्य हुआ और हमने अनंतवीर्य स्वामी के निकट मुनिव्रत धारण किए, क्योंकि मोह के उदय से जीवों में अनेक अनाचार होते हैं जो सद्गुरु के प्रभाव से ही दूर होते हैं।

  10. संसार असार है, माता-पिता, मित्र, स्त्री, संतान सब नाशवान हैं, यह सुनकर जटायु पक्षी संसार के दुःखों से डरकर धर्म ग्रहण की इच्छा से बार-बार शब्द करने लगा, तब गुरु ने कहा, हे भव्य! श्रावक के व्रत ग्रहण कर, किसी जीव को दुःख मत दे, अहिंसा व्रत धारण कर, झूठ छोड़कर सत्य व्रत धारण कर, चोरी मत कर, परस्त्री का त्याग और सर्वथा ब्रह्मचर्य का पालन कर, तृष्णा छोड़ संतोष धारण कर, रात्रिभोजन और अभक्ष्य आहार का त्याग कर, त्रिकाल सामायिक में जिनेंद्र प्रभु का ध्यान कर, उपवास आदि तप और नियम पाल, इंद्रियों को जीत, साधु की भक्ति कर और अरहंत देव, निर्ग्रंथ गुरु तथा दयामय धर्म का श्रद्धान कर। पक्षी ने बारंबार नमस्कार कर मुनि के चरणों में श्रावक के व्रत धारण किए, सीता ने उसे उत्तम श्रावक जानकर हर्ष से अपने हाथों से बहुत प्यार किया, मुनियों ने कहा कि गहन वन में अनेक क्रूर जीव हैं, इस सम्यग्दृष्टि पक्षी की सदा रक्षा करना, और जैसे गरुड़ की माता गरुड़ को पाले वैसे जनक की राजपुत्री उसे पालने लगी, तब दोनों चारण मुनि आकाशमार्ग से विहार कर गए।

  11. एक मदोन्मत्त हाथी वन में उपद्रव करने लगा तो लक्ष्मण उसे वश कर उस पर्वत समान गजराज पर बैठकर राम के पास आए, जिसे देख राम प्रसन्न हुए; वह ज्ञानी जटायु पक्षी मुनि की आज्ञा के अनुसार अणुव्रतों का पालन करता, शुद्ध फल, शुद्ध अनाज और छना जल ग्रहण करता, राम-लक्ष्मण-सीता के साथ पृथ्वी पर विहार करता और राम के अनुग्रह से अनेक धर्मचर्चाएँ सुनकर दृढ़ श्रद्धानी बन गया। उसके शरीर पर रत्न-स्वर्ण की किरणों जैसे बाल (जटाएँ) हुए, इसलिए राम ने उसका नाम जटायु रखा; वह व्रती श्रावक तीनों काल सीता के साथ भक्ति से अरहंत, सिद्ध और साधुओं की वंदना करता, और जब सीता ताल बजातीं और दोनों भाई तान लगाते, तब सूर्य जैसी ज्योति वाला जटायु ताल और तान के अनुसार नृत्य करता; गौतम स्वामी श्रेणिक से कहते हैं कि धर्म का माहात्म्य देखो कि मांसभक्षी, दुर्गंधित, निंद्य पक्षी भी इसी जन्म में अद्भुत रूप वाला और सुगंधमय सुंदर शरीर वाला हो गया।