पर्व 42
श्रीराम का दंडकवन में निवास
हाथियों से जुते रथ में दंडकवन में विहार करते हुए राम वहाँ नगर बसाने का विचार करते हैं, पर वर्षाऋतु आ जाने से वन में ही वर्षाकाल बिताते हैं।
कथा खंड वनवाससारांश
मुनियों को आहार देने के पुण्य से समृद्ध राम, लक्ष्मण, सीता और जटायु चार हाथियों से जुते एक भव्य रथ में दंडकवन के मध्य भाग में प्रवेश करते हैं। राम जैनधर्म की उपमाओं से सीता को वन के वृक्ष, पशु, दंडक पर्वत और क्रौंचरवा नदी दिखाते हैं, सीता उत्तर देती हैं कि इनमें से कुछ भी आपके समान नहीं, और वे नदी में जलक्रीड़ा करते हैं। राम वहाँ नगर बसाकर माताओं को लाने का विचार करते हैं, पर वर्षाऋतु आ जाती है और वे वन में ही सुख से वर्षाकाल बिताते हैं।
क्या हुआ
5 बिंदु
पात्रदान के प्रभाव से राम, लक्ष्मण और सीता इस लोक में रत्न-स्वर्ण आदि संपदा से पूर्ण हुए, और उनके लिए विमान समान एक अद्भुत रथ बना, जो सुवर्णमय, रत्नजड़ित, मनोहर स्तंभों, रमणीक वेदिका, बीच में बैठने के गर्भगृह, मोतियों की मालाओं, झालरों, तोरण युक्त बड़े झरोखों, चंदन-कपूर की सुगंध और सेज, आसन तथा वस्त्रों से पूर्ण था और जिसमें चार हाथी जुते थे। उस रथ में जटायु सहित बैठकर, बिना किसी भय और बिना किसी जीव का घात किए, वे मनोहर वन में इच्छानुसार कहीं एक दिन, कहीं पंद्रह दिन, कहीं एक मास क्रीड़ा करते, नए शिष्य की तरह अनेक स्थानों पर ठहरने की इच्छा करते हुए, सिंह समान निर्भय होकर दंडकवन के मध्य भाग में प्रवेश कर गए।
कायरों को भयकारी उस स्थान पर विचित्र शिखरों वाले पर्वत, निर्मल झरने और नदियाँ थीं, और बड़, पीपल, बहेड़ा, इमली, केला, अखरोट, देवदारु, कदंब, अशोक, जामुन, आम, कनेर, चंपा, प्रियंगु, सप्तपर्ण, नागकेसर, आँवला, अर्जुन, केवड़ा, खजूर, अनार, नारियल, सुपारी, दालचीनी, इलायची, लौंग, जायफल, चंदन आदि अनेक जाति के वृक्षों, स्वयं उत्पन्न अनाज और गन्ने आदि से वह नंदनवन समान था, जहाँ पवन से हिलती कोंपलें, गुंजारते भौंरे और कलरव करते पक्षी मानो राम का स्वागत कर रहे थे। राम ने सीता को जैनधर्म की उपमाओं से वन दिखाया कि मौलश्री से लगी प्रियंगु की बेल ऐसी सुंदर है जैसे जीवदया से जैनधर्म शोभता है, मोर को देखकर बिल में भाग जाने वाला सर्प ऐसा है जैसे विवेक से काम-भोग भाग जाते हैं, रथ का नाद सुनकर गुफा के द्वार पर आया सिंह ऐसा है जैसे गुरु के उपदेश से ज्ञान रूपी सिंह प्रमाद छोड़कर चारित्र की साधना को निकलता है, आकाश से लगे दंडक नाम के ऊँचे पर्वत के कारण यह दंडकवन कहलाता है, और इससे क्रौंचरवा नदी ऐसे निकली है जैसे जिनराज के मुख से जिनवाणी।
राम ने नदी के मीठे जल की तुलना सीता की मधुर वाणी से, उसकी गहराई की उसके मन की गंभीरता से और अनेक धाराओं से समुद्र की ओर बहने की तुलना विवाह कर पति के साथ जाने वाली उत्तम शीलवती राजकन्याओं से की, तब हर्ष से भरी पतिव्रता सीता ने कहा, हे करुणानिधे! इस नदी का जल निर्मल है पर आपके मन जैसा निर्मल नहीं, वन आप जैसा सघन और सुगंधित नहीं, पर्वत आप जैसे उच्च और स्थिर नहीं, और जिनका मन आप में अनुरागी हुआ है उनका मन और कहीं नहीं जाएगा, जिसे सुनकर दोनों भाई अति प्रसन्न होकर सीता की प्रशंसा करने लगे। नदी के किनारे मनोहर स्थान देख हाथियों के रथ से उतरकर लक्ष्मण अनेक स्वादिष्ट फल लाए, फिर दोनों भाइयों ने इंद्र, नागेंद्र और चक्रवर्ती जैसी जलक्रीड़ा की, सीता संगीत गातीं, राम ताल देते और लक्ष्मण राम के चारों ओर घूमते, वन के तिर्यंच एकाग्र होकर उन्हें देखते रहे; फिर मीठे फलों का भोजन कर वे लताओं के मंडप में बैठे, जहाँ सीता का हाथ जटायु के मस्तक पर था।
तब राम ने लक्ष्मण से कहा, हे भाई! यहाँ अनेक वृक्ष, स्वादिष्ट फल, निर्मल जल से भरी नदी, लताओं के मंडप और अनेक रत्नों से भरा दंडक नाम का पर्वत है, क्रीड़ा के अनेक स्थान हैं और अन्य लोगों का आना-जाना नहीं, यहाँ का निवास हर्ष का कारण है, इसलिए इस पर्वत के निकट एक सुंदर नगर बसाएँगे; यहाँ स्थान बनाकर तुम अत्यंत शोकाकुल दोनों माताओं को शीघ्र लेने जाना, अथवा तुम सीता और जटायु के साथ यहाँ रहो और मैं माताओं को लेने जाऊँगा। लक्ष्मण ने हाथ जोड़ नमस्कार कर कहा, हे देव! जो आपकी आज्ञा होगी वही होगा।
फिर राम ने कहा कि ग्रीष्मऋतु गई और अतिभयंकर वर्षाऋतु आई, जिसमें समुद्र समान बादल गरजते हुए चारों ओर छा जाते हैं, अंजनगिरि जैसी दसों दिशाएँ श्याम हो जाती हैं और बिजली चमकाती भयंकर वर्षा ऐसी होती है जैसे भगवान के जन्मकल्याणक में देव रत्नधारा बरसाते हैं; उन्होंने कहा कि हे भाई! यह श्याम घटा तेरे रंग जैसी सुंदर है और ऐसे जल बरसाती है जैसे तू दान की धारा बरसाता है, और खेतों को छोड़ पर्वत पर बरसने वाले मेघ उस धनवान जैसे हैं जो पात्रदान और करुणादान छोड़कर वेश्या आदि कुमार्ग में धन लगाता है। इस ऋतु में नदियाँ अति प्रवाह से बहती हैं, धरती पर कीचड़ होता है, प्रचंड हवा चलती है और त्रस जीव विशेष रूप से उत्पन्न होते हैं, इसलिए महापुरुषों का विहार नहीं होता; सुमित्रा के पुत्र लक्ष्मण ने कहा कि जो आप आज्ञा करेंगे वही करूँगा, और दोनों वीरों ने उस रमणीक स्थान में सुखपूर्वक वर्षाकाल पूरा किया, पुण्य के योग से जंगल में भी मंगल होता रहा।