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पर्व 43

रावण के भानजे शंबूक की सूर्यहास खड्ग साधना और लक्ष्मण के हाथ से मरण

रावण के भानजे शंबूक ने बारह वर्ष की साधना से जो सूर्यहास खड्ग सिद्ध किया था, उसे लक्ष्मण ने ले लिया और उसकी धार परखते हुए अनजाने में शंबूक को मार डाला।

कथा खंड वनवास

सारांश

शरद ऋतु में एक दिव्य सुगंध से खिंचकर लक्ष्मण सूर्यहास खड्ग तक पहुँचते हैं, जिसे खरदूषण और रावण की बहन चंद्रनखा के पुत्र शंबूक ने क्रौंचरवा नदी के किनारे बाँस के बीड़े में बारह वर्ष की साधना से सिद्ध किया था। खड्ग की धार परखने के लिए बीड़े पर वार करते ही लक्ष्मण अनजाने में शंबूक का सिर काट देते हैं। गौतम स्वामी श्रेणिक को बताते हैं कि राक्षसवंशी विद्याधर मनुष्य हैं, राक्षस नहीं, और उन्हें लंका तथा पाताल लंका कैसे मिली; चंद्रनखा पुत्र का कटा सिर देखकर विलाप करती है, पर राम-लक्ष्मण को देखकर कामासक्त हो जाती है और ठुकराए जाने पर क्रोध से अपने पति के पास चली जाती है।

क्या हुआ

6 बिंदु

  1. वर्षाऋतु समाप्त होकर शरद ऋतु आई तो लक्ष्मण बड़े भाई की आज्ञा लेकर अकेले वन देखने निकले और एक अद्भुत सुगंध आई, जो न वृक्षों की थी न उनके अपने शरीर की, शायद सीता या राम की हो या कोई देव आया हो; यह सुनकर राजा श्रेणिक ने पूछा कि वह सुगंध किसकी थी, तब गौतम गणधर ने पहले उसका प्रसंग बताया। दूसरे तीर्थंकर अजितनाथ भगवान के समवसरण में भयभीत मेघवाहन विद्याधर प्रभु की शरण में आया, तब राक्षसों के इंद्र महाभीम ने कृपा कर त्रिकूटाचल पर्वत के पास राक्षस द्वीप में लंका नाम की नगरी उसे दी और रहस्य बताया कि भरतक्षेत्र के दक्षिण और लवण समुद्र के उत्तर में पृथ्वी के नीचे नाना रत्नों का खज़ाना अलंकारोदय नाम का नगर है, जहाँ भूमिगोचरियों का आना-जाना नहीं, जो विद्याधरों को भी अति दुर्लभ और शत्रुओं के लिए अगम्य है, उसे पाताल लंका कहते हैं, कभी तुम्हें या तुम्हारी संतान को परचक्र का भय हो तो वहाँ निर्भय होकर रहना।

  2. गौतम स्वामी ने समझाया कि महाभीम ने रावण के पूर्वजों को लंका, पाताल लंका और राक्षस द्वीप दिए; राक्षस द्वीप में रहने से ये लंका के विद्याधर राक्षस कहलाते हैं, पर ये क्षत्रियवंशी मनुष्य विद्याधर हैं, न देव हैं न राक्षस, और देवों तथा विद्याधरों में तिलक और पर्वत, कीचड़ और चंदन, पाषाण और रत्न जैसा बड़ा भेद है, क्योंकि विद्याधर गर्भ के दुःख भोगते हैं और विद्याओं की साधना से केवल ढाई द्वीप तक आकाश में विचरते हैं, जबकि देव गर्भ से उत्पन्न नहीं होते, उनकी आँखें नहीं झपकतीं, बुढ़ापा और रोग नहीं होते, वे स्वभाव से अवधिज्ञानी होते हैं और इच्छानुसार रूप धारण करते हैं। इस वंश में लंका नगरी में अजितनाथ के समय से मुनिसुव्रतनाथ के समय तक अनेक हज़ार प्रशंसनीय राजा हुए, कोई सिद्ध हुए, कोई सर्वार्थसिद्धि गए, कोई स्वर्ग में देव हुए और कोई पापी नरक गए, और अब इस वंश में तीन खंड का अधिपति रावण राज्य करता है।

  3. उस रावण की रूप में अनुपम बहन चंद्रनखा से खरदूषण ने विवाह किया, जो चौदह हज़ार राजाओं का शिरोमणि और रावण की सेना में मुख्य था और दिक्पाल समान अलंकारपुर अर्थात् पाताल लंका में रहता था; उसके शंबूक और सुंद ये दो पुत्र रावण के भानजे के रूप में पृथ्वी पर प्रसिद्ध हुए। माता-पिता के बहुत मना करने पर भी काल के वश होकर शंबूक सूर्यहास खड्ग की साधना के लिए महाभयानक वन में गया और एक ही अन्न का भोजन करता, ब्रह्मचारी, जितेंद्रिय होकर दंडकवन में क्रौंचरवा नदी के उत्तर किनारे पर बाँस के बीड़े में यह कहकर बैठा कि जब मेरी साधना पूर्ण होगी तभी बाहर आऊँगा, उससे पहले कोई बीड़े में आया और मैंने देख लिया तो उसे मारूँगा; बारह वर्ष की साधना के बाद सूर्यहास खड्ग प्रकट हुआ, जिसे सात दिन में न लेने पर वह दूसरे के हाथ में चला जाता है और साधक स्वयं मारा जाता है।

  4. चंद्रनखा प्रतिदिन पुत्र के पास भोजन लाती थी; उसने खड्ग देखकर प्रसन्न होकर पति से कहा कि शंबूक को सूर्यहास खड्ग सिद्ध हुआ है, अब मेरा राजपुत्र मेरु की प्रदक्षिणा कर तीन दिन में आएगा। उधर वन में भ्रमण करते लक्ष्मण को हज़ारों देवों से रक्षित, दिव्य गंध से लिप्त, कल्पवृक्ष के फूलों की मालाओं से युक्त उस देवोपनीत खड्ग की सुगंध आई, और वे आश्चर्य से सब काम छोड़ सिंह समान निर्भय होकर बाँस के बीड़ों की ओर गए, जहाँ ऊँचे पहाड़ों के बीच समतल सुंदर भूमि, श्री विचित्ररथ मुनि का निर्वाण स्थल, सुवर्ण कमलों से भरा था और उसके बीच बाँस के बीड़े के ऊपर सूर्यहास खड्ग अपनी किरणों से उसे प्रकाशित करता लटक रहा था; लक्ष्मण ने निःशंक होकर खड्ग ले लिया और उसकी तीक्ष्णता जानने के लिए बाँस के बीड़े पर मारा, तो शंबूक सहित बीड़ा कट गया, और खड्ग के रक्षक हज़ारों देव लक्ष्मण को अपना स्वामी कहकर पूजने लगे।

  5. लक्ष्मण को बहुत देर लगी जानकर राम ने जटायु से कहा कि उड़कर देख, लक्ष्मण आ रहा है या नहीं, तब सीता ने देखा कि केसर से चर्चित शरीर, अनेक मालाएँ और सुंदर वस्त्र पहने, हाथ में अद्भुत खड्ग लिए लक्ष्मण ऐसे आ रहे हैं जैसे केसरी सिंह से युक्त पर्वत; राम ने उठकर उन्हें हृदय से लगाया और सब वृत्तांत सुना। उधर शंबूक की माता चंद्रनखा भोजन लेकर आई और बाँस का बीड़ा कटा देखकर पहले सोचा कि पुत्र ने अच्छा नहीं किया, फिर अस्त होते सूर्यमंडल समान कुंडलों सहित शंबूक का कटा सिर पड़ा देखकर मूर्छित हो गई, और होश आने पर विलाप करने लगी कि हाय पुत्र! बारह वर्ष और चार दिन यहाँ बीते, तीन दिन और क्यों नहीं निकले, तू जीवित रहता और सूर्यहास सिद्ध होता तो जैसे चंद्रहास के धारी मेरे भाई रावण के आगे कोई शत्रु नहीं टिकता वैसे तेरे सामने भी कोई न टिकता; पुत्र का मस्तक गोद में लेकर चूमती हुई वह मूँगे जैसे लाल नेत्र कर शोक छोड़ क्रोध से शत्रु को मारने दौड़ी।

  6. वह दौड़ती हुई वहाँ आई जहाँ राम-लक्ष्मण विराजमान थे, और उन महारूपवान भाइयों को देखते ही उसका प्रबल क्रोध तत्काल समाप्त होकर मन में राग उत्पन्न हुआ कि इन दोनों में जो मुझे ग्रहण करे उसे पति बनाऊँ; वह पुन्नाग वृक्ष के नीचे बैठकर अति दीन शब्दों से रोने लगी, तब अति दयालु सीता ने उसके पास जाकर हाथ पकड़ा, धैर्य बँधाया और उसे राम के पास ले आईं, और राम के पूछने पर उसने कहा कि मेरी माता मेरे बचपन में मर गई और माता के शोक से पिता भी मर गए, कुटुंब रहित होकर मरने की इच्छा से मैं इस भयानक दंडकवन में आई पर किसी हिंसक जीव ने मुझे नहीं खाया, अब मेरे प्राण निकलने से पहले कृपा करके मुझे ग्रहण करो। उसके लज्जा रहित वचन सुनकर शास्त्रों के ज्ञान रूपी जल से धुले मन वाले दोनों भाई एक-दूसरे को देखकर मौन रहे, तब उसने निःश्वास लेकर पूछा कि मैं जाऊँ, उन्होंने कहा जो तेरी इच्छा हो सो कर, और वह क्रोधित होकर शीघ्र अपने पति के पास चली गई, जबकि लक्ष्मण सोचते रहे कि यह किसकी पुत्री होगी; गौतम स्वामी कहते हैं कि प्रवीण बुद्धि वाले ज्ञान रूपी सूर्य के प्रकाश से योग्य-अयोग्य जानकर अयोग्य को छोड़ योग्य क्रिया में प्रवृत्त होते हैं।