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पर्व 37

अतिवीर्य का भरत के साथ युद्ध-आरंभ और राम-लक्ष्मण से पराजित होकर दीक्षा ग्रहण करना

नर्तकियों का वेश धरकर राम-लक्ष्मण ने भरत पर चढ़ाई करने वाले अतिवीर्य को पकड़ लिया; पराजित अतिवीर्य राज्य त्यागकर मुनि बन गया।

कथा खंड वनवास

सारांश

नंद्यावर्तपुर के स्वामी अतिवीर्य का पत्र पृथ्वीधर को भरत के विरुद्ध एक विशाल सैन्य-संघ में शामिल होने बुलाता है, क्योंकि भरत के भाई शत्रुघ्न ने अतिवीर्य के दूत का अपमान किया था, और जनक, कनक तथा सिंहोदर के साथ भरत भी युद्ध को निकल पड़ता है। राम पृथ्वीधर को वहीं छोड़कर लक्ष्मण, सीता और पृथ्वीधर के पुत्र के साथ नंद्यावर्तपुर जाते हैं और सीता की सलाह पर निश्चय करते हैं कि भरत को विनाशकारी युद्ध से बचाने के लिए अतिवीर्य को गुप्त रूप से वश में किया जाए। नर्तकियों का वेश धरकर दोनों भाई तीर्थंकरों के गुणगान से अतिवीर्य की सभा को मोहित करते हैं, फिर उसे फटकारकर पकड़ लेते हैं; सीता के कहने पर छोड़े जाने पर अतिवीर्य किसी का सेवक बनकर राज्य करना अस्वीकार कर श्रुतधर मुनि से दिगंबर दीक्षा ले लेता है।

क्या हुआ

8 बिंदु

  1. एक दिन श्रीराम सुख से विराजमान थे और राजा पृथ्वीधर पास बैठे थे, तभी दूर से आए एक पुरुष ने पत्र दिया जिसे लेखक ने पढ़ा: नंद्यावर्तनगर का स्वामी, सुमेरु समान अचल, राजाओं का राजा अतिवीर्य, जिसकी आज्ञा आर्यखंड और म्लेच्छखंड के राजा सिर पर धारते हैं, विजयनगर के राजा पृथ्वीधर को आज्ञा देता है कि पृथ्वी के सब सामंत भंडार और सेना सहित मेरे पास आ चुके हैं, तुम भी पत्र पहुँचते ही शीघ्र आओ। उसमें लिखा था कि अंजनगिरि जैसे आठ सौ हाथियों और पवन-वेगी तीन हज़ार घोड़ों के साथ राजा विजयशार्दूल, पाँच-पाँच हज़ार घोड़ों और छह-छह सौ हाथियों के साथ अंगदेश का राजा मृगध्वज और कलमकेशरी, एक हज़ार हाथियों और सात हज़ार घोड़ों के साथ न्यायशास्त्र में प्रवीण पांचाल-नरेश प्रौढ, आठ हज़ार हाथियों के साथ मगधराज, म्लेच्छों का अधिपति समुद्र और मुनिभद्र, साधुभद्र, नंदन आदि राजा, दुष्कर पराक्रमी सिंहवीर्य, अतिवीर्य के दोनों मामा वंग और सिंहरथ, और वत्सदेश का राजा मारुदत्त, सुवीर तथा प्रोष्ठल दस अक्षौहिणी दल सहित आए हैं, और इन सबके साथ वह अयोध्या के राजा भरत पर चढ़ाई कर रहा है।

  2. पृथ्वीधर कुछ कहें, उससे पहले ही लक्ष्मण ने दूत से भरत और अतिवीर्य के विरोध का कारण पूछा; वायुगत दूत ने बताया कि राजा अतिवीर्य ने श्रुतबुद्धि नाम के दूत को भरत के पास भेजकर कहलाया कि शीघ्र आकर मेरी सेवा करो या अयोध्या छोड़कर समुद्र के पार चले जाओ। यह सुन शत्रुघ्न दावानल की तरह भड़क उठा और बोला कि तेरा स्वामी गधा होकर मत्त हाथी की तरह गरज रहा है, उसकी मृत्यु निकट है, राजा दशरथ दीक्षा लेकर वन गए हैं यह जानकर वह दुष्ट ऐसी बातें करता है, पिता की क्रोधाग्नि मुक्ति की अभिलाषा से शांत हुई है पर हम उसी अग्नि की चिनगारियाँ हैं जो अतिवीर्य रूपी काठ को भस्म करने में समर्थ हैं; फिर उसने सेवकों से दूत को अपमानित कर निकलवा दिया, और वह कुत्ते की तरह तिरस्कृत होकर धूल से लथपथ अपने स्वामी के पास पहुँचा।

  3. समुद्र समान गंभीर भरत भी ये दुर्वचन सुनकर कुछ क्रोधित हुआ और शत्रुघ्न सहित सेना लेकर युद्ध को निकला; मिथिला के राजा जनक अपने भाई कनक सहित और सिंहोदर आदि अनेक राजा बड़ी सेनाओं के साथ आ मिले, और भरत प्रजा की पिता समान रक्षा करता हुआ नंद्यावर्तपुर के स्वामी अतिवीर्य पर चढ़ा, जबकि अतिवीर्य भी सब सामंतों सहित उस पर चढ़ाई को उद्यत हुआ। यह सुनकर दूज के चंद्रमा की तरह भौंहें टेढ़ी किए राम ने पृथ्वीधर से बात की, तो पृथ्वीधर ने कहा कि वह दुष्ट है, हम उसे प्रबल जानकर उसकी सेवा करते हैं, और मंत्रणा कर अतिवीर्य को उत्तर लिख भेजा कि मैं शीघ्र आ रहा हूँ; पर राम ने कहा कि आप यहीं रहें, मैं आपके पुत्र और आपके जमाई लक्ष्मण को लेकर अतिवीर्य के पास जाऊँगा।

  4. राम रथ पर बैठकर बड़ी सेना, सीता, लक्ष्मण और पृथ्वीधर के पुत्र के साथ नंद्यावर्तपुर गए और नगरी के पास पहुँचकर स्नान-भोजन के बाद मंत्रणा की, जिसमें जानकी ने कहा कि मुझे कहने का अधिकार नहीं, फिर भी जैसे बाँस के झुरमुट से मोती लिया जाता है वैसे मेरी हित की बात लीजिए, यह क्रूर, महासेना का स्वामी अतिवीर्य भरत से कैसे जीता जाएगा, इसे जीतने का उपाय कीजिए। लक्ष्मण ने कहा कि सूर्यास्त से पहले ही अतिवीर्य को मेरे हाथ मरा जानो, और पृथ्वीधर का पुत्र भी गरजने लगा, पर राम ने आँख के संकेत से उसे रोककर लक्ष्मण से कहा कि जानकी ठीक कहती है, भरत अतिवीर्य के दसवें भाग के भी बराबर नहीं, बिना प्रयोजन युद्ध में दोनों पक्षों के योद्धा मरेंगे और रघुवंश को कष्ट होगा, संधि भी संभव नहीं, क्योंकि अतिमानी बालक शत्रुघ्न ने अंधेरी रात में रौद्रभूत के साथ अतिवीर्य के कटक में घुसकर अनेक योद्धा मारे और पवन-वेगी हज़ारों घोड़े और अंजनगिरि जैसे सात सौ हाथी छीन लिए हैं।

  5. अतः राम ने निश्चय किया कि तू अतिवीर्य को वश कर और पास ही ठहरे भरत को भी हमारे आने का पता न चले, क्योंकि जो मित्र को जताए बिना उपकार करे वह रात्रि के मेघ के समान अतिशय प्रशंसनीय है। प्रातः दोनों वीरों ने एक जिनमंदिर में भगवान के दर्शन किए, वहाँ विराजमान आर्यिकाओं के समूह और उनकी गुरु, महाशास्त्रों की ज्ञाता वरधर्मा आर्यिका की वंदना कर सीता को उनके पास छोड़ा, फिर नर्तकियों का वेश धरकर राजमहल गए, जहाँ आश्चर्यचकित नगरवासी उनके साथ चले; उन्होंने राजा के सामने ऋषभदेव आदि चौबीस तीर्थंकरों के गुण और पुराण-पुरुषों के रहस्य गाए, अंग-मोड़, कटाक्ष, मंद मुस्कान, पैरों की गति और स्वरों के आरोह-अवरोह से नृत्य कर और वीणा बजाकर सारी सभा को मोहित कर लिया, और गौतम स्वामी श्रेणिक से कहते हैं कि जहाँ राम-लक्ष्मण नाचते-गाते हों वहाँ देवों के मन भी हरे जाते हैं, मनुष्यों की क्या बात।

  6. राजा को संगीत से मोहित देख वे शृंगार रस से वीर रस में आए और भौंहें टेढ़ी कर अतिवीर्य से बोले कि तुझे भरत से विरोध करने का यह मंत्र किसने दिया, जीना चाहता है तो महाविनय से भरत का दास बनकर उसे प्रसन्न कर, नहीं तो बड़े वंश की पुत्री तेरी रानी विधवा होकर आभूषण उतार देगी, राजा अनरण्य के पोते और दशरथ के पुत्रों के रहते तू अयोध्या का राज्य कैसे चाहता है, भरत गरुड़ है और तू सर्प। यह सुन सभा सहित अतिवीर्य क्रोध से लाल हो गया, सामंत उठ खड़े हुए और राजा ने तलवार उठाई, तभी एक नर्तकी ने उछलकर उसके हाथ से तलवार छीन ली, केश पकड़कर उसे बाँध लिया और उसके पक्ष के राजाओं से कहा कि जीना चाहो तो भरत की आज्ञा स्वीकार करो; लोग जय-जयकार करने लगे कि दशरथ के वंश रूपी आकाश के चंद्रमा राजा भरत जयवंत हों, और अतिवीर्य के मित्र राजा यह सोचकर कि जिनकी नर्तकी ही ऐसे राजा को पकड़ ले उन भरत की शक्ति का क्या कहना, उनके चरणों में जाकर कृपा माँगने का विचार करने लगे।

  7. राम अतिवीर्य को पकड़कर हाथी पर बैठ जिनमंदिर गए, भगवान की पूजा कर वरधर्मा आर्यिका की वंदना की और अतिवीर्य को लक्ष्मण को सौंपा, जिन्होंने उसके केश कसकर बाँध दिए; तब सीता ने कहा कि इनके केश ढीले करो, पीड़ा मत दो, कर्मों के उदय से मनुष्य की बुद्धि हीन हो जाती है, यह हज़ार राजाओं का शिरोमणि है, शत्रु को पकड़कर छोड़ देना राजाओं की अनादि मर्यादा है। लक्ष्मण ने हाथ जोड़कर कहा कि हे महासती! आपकी आज्ञा से छोड़ने की क्या बात, ऐसा करूँगा कि देव भी इसकी सेवा करें, और उनका क्रोध शांत हुआ; अतिवीर्य प्रतिबोध पाकर राम से बोला कि आपने बहुत अच्छा किया, ऐसी निर्मल बुद्धि मुझे पहले कभी नहीं हुई थी।

  8. अतिवीर्य को हार-मुकुट रहित देख राम ने संतोष के वचन कहे कि हे मित्र! चिंता छोड़ो, पहले जैसा धैर्य रखो, भरत के आज्ञाकारी होकर इस नंद्यावर्तनगर का राज्य करो; पर अतिवीर्य ने कहा कि अब मुझे राज्य की इच्छा नहीं, समुद्र पर्यंत पृथ्वी को वश करने वाला महामानी मैं पराया सेवक होकर कैसे राज्य करूँ, छह खंड का राज्य करने वाले भी तृप्त नहीं हुए तो पाँच गाँव का राजा मैं इस अल्प विभूति से क्या तृप्त होऊँगा, देवों को भी दुर्लभ यह मनुष्य देह मैंने व्यर्थ गँवाई, अब वह क्रिया करूँगा जिससे मुक्ति मिले। राम-लक्ष्मण से क्षमा माँगकर सिंह समान पराक्रमी अतिवीर्य श्रुतधर मुनि के पास गया और दिगंबर दीक्षा माँगी, आचार्य की अनुमति से वस्त्राभूषण त्यागकर केशलोंच किया, महाव्रत धारण कर दसों दिशाओं को ही वस्त्र बनाया और सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र रूपी आभूषणों से शोभित होकर सिंहादि क्रूर जीवों से भरे गहन वनों और गिरि-गुफाओं में निर्भय विहार करने लगा; ग्रंथ कहता है कि अतिवीर्य मुनि का चरित्र पढ़ने-सुनने वाला गुणों की वृद्धि और रोगों तथा सांसारिक कष्टों से मुक्ति पाता है।