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पर्व 36

लक्ष्मण को वनमाला की प्राप्ति

लक्ष्मण के प्रेम में फाँसी लगाने जा रही विजयपुर की राजकुमारी वनमाला को लक्ष्मण ने बचाया, और उसके पिता पृथ्वीधर ने हर्ष से तीनों का स्वागत किया।

कथा खंड वनवास

सारांश

शरद ऋतु आने पर यक्षाधिपति दिव्य उपहार देकर राम से विदा लेता है और रामपुरी को समेट लेता है। विजयपुर के पास राजकुमारी वनमाला, जो बचपन से लक्ष्मण पर अनुरक्त है पर जिसका संबंध पिता ने दूसरे राजकुमार से तय कर दिया है, रात में फाँसी लगाने वन में आती है, और छिपकर देख रहे लक्ष्मण उसके हाथ से फाँसी लेकर अपना परिचय देते हैं। समाचार पाकर हर्षित राजा पृथ्वीधर पूरे परिवार सहित राम, लक्ष्मण और सीता का स्वागत करने आता है, और वे उत्सव के साथ नगर में प्रवेश कर सुख से रहते हैं।

क्या हुआ

6 बिंदु

  1. वर्षा ऋतु पूर्ण होकर शरद ऋतु आई और दसों दिशाएँ उज्ज्वल हुईं, तब राम को चलने को तत्पर देख यक्षाधिपति ने सेवा में हुई किसी चूक के लिए क्षमा माँगी और राम ने भी कहा कि तुमने पराधीन होकर हमारी सेवा की, क्षमा करना; इससे हर्षित यक्ष ने राम को स्वयंप्रभ नाम का हार, लक्ष्मण को चाँद-सूरज जैसे अद्भुत मणियों के कुंडल, और सीता को कल्याण नाम की महादैदीप्यमान चूड़ामणि तथा इच्छा से ही मधुर ध्वनि करने वाली देवोपनीत वीणा भेंट की। फिर यक्षराज ने वह नगरी समेट ली और उनके जाने का बहुत शोक किया, और राम, लक्ष्मण तथा सीता सिंहों और हाथियों से भरे वन पार करते हुए सूर्यास्त के समय विजयपुर पहुँचे और नगर से उत्तर दिशा में न बहुत पास, न बहुत दूर एक भयानक उद्यान में ठहरे।

  2. विजयपुर के राजा पृथ्वीधर की संपूर्ण गुणों से मंडित रानी इंद्राणी की पुत्री वनमाला महासुंदरी थी, जो बचपन से लक्ष्मण के गुण सुनकर उन पर आसक्त थी; पर यह सुनकर कि दशरथ ने दीक्षा ली, कैकेयी के वचन से भरत को राज्य मिला और राम-लक्ष्मण परदेश चले गए, राजा पृथ्वीधर ने वनमाला का संबंध इंद्रनगर के राजा के पुत्र बालिमित्र से करना तय किया। यह सुन वनमाला ने निश्चय किया कि लक्ष्मण को छोड़ अन्य पुरुष से संबंध होने से फाँसी लगाकर मरना अच्छा है; उपवास रखकर उसने सूर्य से जल्दी अस्त होने को कहा और संध्या समय माता-पिता की आज्ञा लेकर वनयात्रा के बहाने श्रेष्ठ रथ पर चढ़कर रात में उसी वन में आई जहाँ राम-लक्ष्मण ठहरे थे।

  3. उसने उसी वन में जागरण किया और सबके सो जाने पर वन की हिरणी की तरह धीरे-धीरे अपने डेरे से निकली, उसके शरीर की सुगंध से वन सुगंधित हो गया; लक्ष्मण ने समझा कि ज्योति की मूर्ति जैसी यह राजकुमारी शोक से अपघात करना चाहती है, और छिपकर उसकी चेष्टा देखने के लिए बड़ के वृक्ष के नीचे बैठ गए। उसी वटवृक्ष के नीचे आकर वनमाला ने वस्त्र को जल से गीला कर फाँसी बनाई और कहा, हे इस वृक्ष के निवासी देवता! यदि कभी लक्ष्मण इस वन में आएँ तो उनसे कहना कि आपके वियोग से दुखी वनमाला आपके गुणों में मन लगाकर यहाँ फाँसी लगाकर मर गई और कह गई है कि इस भव में तो आप नहीं मिले, परभव में आप ही मेरे पति होना; जैसे ही वह फाँसी लगाने लगी, लक्ष्मण बोले, हे मुग्धे! मेरी भुजाओं से आलिंगन योग्य कंठ में फाँसी क्यों डालती हो, मैं लक्ष्मण हूँ, और उसके हाथ से फाँसी ले ली।

  4. लज्जा और प्रेम से लक्ष्मण को देखकर वनमाला परम आश्चर्य में पड़ी और सोचा कि किसी देव ने मेरी दशा देख दया कर मुझ पर उपकार किया है, जैसा सुना था वैसे ही पति भाग्य से मिल गए। उधर सुगंधित कोमल पत्तों की शय्या पर सोए राम ने जागकर लक्ष्मण को न देखा तो जानकी से पूछा और उनके कहने पर ऊँचे स्वर से पुकारा, हे भाई! हे लक्ष्मण! हे बालक! कहाँ गए, शीघ्र आओ, तब लक्ष्मण ‘आया, देव’ कहते हुए वनमाला सहित आए; आधी रात को चंद्रमा उदय हुआ, वनमाला ने लज्जा से सिर झुकाकर राम और सीता को नमस्कार किया, और सीता ने हँसकर कहा कि राजकुमार ने तो चंद्रमा की बराबरी की है, क्योंकि जिस समय कला सहित चंद्रमा उगा उसी समय कन्या सहित लक्ष्मण आए, जिसे सुनकर राम अति प्रसन्न हुए।

  5. उधर वनमाला की सखी ने जागकर सेज सूनी देखी तो भय से रोने लगी, जिससे सब योद्धा जागकर आयुध ले घोड़ों पर और पैदल दसों दिशाओं में दौड़े; कुछ ने राजकुमारी को वन में राम, लक्ष्मण और सीता के पास बैठे देखा और राजा पृथ्वीधर को बधाई दी कि जिन्हें पाने के लिए आपने बहुत यत्न किए वे स्वयं आ गए हैं, आपके जमाई लक्ष्मण ने वनमाला को प्राण-त्याग से बचाया है और आपके परम हितैषी राम सीता सहित ऐसे विराजे हैं जैसे शची सहित इंद्र। यह सुन राजा एक क्षण हर्ष से मूर्छित हो गए, फिर सेवकों को बहुत धन दिया और सोचा कि धन-प्राप्ति और इष्ट-समागम पुण्य से ही होते हैं, पुण्यहीन के हाथ आई वस्तु भी चली जाती है, और उन्होंने रानी को सब बताया तो वह बार-बार पूछने लगी कि यह सच है या स्वप्न।

  6. सूर्योदय होने पर राजा प्रेम से भरे सारे परिवार सहित हाथी पर चढ़कर राम से मिलने आए और वनमाला की माता आठ पुत्रियों के साथ पालकी पर आई; राजा ने हाथी से उतरकर राम-लक्ष्मण से भेंट की, रानी ने सीता के चरण छूकर कुशल पूछी, वीणा, बाँसुरी, मृदंग बजे, बंदीजन विरद गाने लगे, नृत्य हुआ, लोगों को बहुत दान दिया गया और राम, लक्ष्मण, सीता को स्नान कराकर भोजन कराया गया। फिर हाथी, घोड़ों, रथों पर चढ़े सामंतों और हिरणों की तरह उछलते पयादों सहित, अमूल्य वस्त्राभूषण पहने राम, लक्ष्मण और सीता ने हाथी पर बैठकर सजाए गए नगर में प्रवेश किया और सौधर्म-ऐशान इंद्रों के समान राजमहल में सुख भोगते हुए भी धर्म का अनुभव करते रहे।