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पर्व 35

कपिल ब्राह्मण का कथानक

कपिल ब्राह्मण ने वनवासियों को अपनी कुटिया से निकाला, फिर यक्ष द्वारा बसाई रामपुरी में उनके दर्शन किए, जैनधर्म अपनाया और अंत में मुनि बना।

कथा खंड वनवास

सारांश

तापती नदी वाले देश के अरुणग्राम में प्यासी सीता और दोनों भाइयों को अग्निहोत्री कपिल ब्राह्मण कटु वचन कहकर घर से निकाल देता है, और राम लक्ष्मण को उसे दंड देने से रोकते हैं। वर्षा ऋतु में एक यक्षाधिपति उन्हें बलभद्र और नारायण जानकर उनके आश्रय वाले वटवृक्ष के स्थान पर रामपुरी नगरी बसा देता है; एक यक्षिणी से यह जानकर कि उसमें जिनभक्त ही प्रवेश पा सकते हैं, कपिल लोभवश मुनि के पास जाता है, पर पत्नी सुशर्मा सहित सचमुच जैनधर्मी हो जाता है और क्षमा माँगने राम के पास आता है। राम उसे क्षमा कर बहुत धन देते हैं, पर ऐसे अतिथियों को निकालने का पश्चाताप उसे सब कुछ त्यागकर आनंदमति स्वामी का शिष्य दिगंबर मुनि बना देता है।

क्या हुआ

9 बिंदु

  1. देवों के समान वनों में विहार करते हुए वे एक मनोज्ञ देश में आए जिसके बीच तापती नदी बहती है; वहाँ निर्जन वन में प्यास से व्याकुल सीता बोली कि जैसे भव-भ्रमण से दुखी भव्य जीव सम्यग्दर्शन चाहता है वैसे मैं शीतल जल चाहती हूँ, तब राम उसे धनवान किसानों के अरुणग्राम में प्रसिद्ध अग्निहोत्री ब्राह्मण कपिल के घर ले गए, जहाँ वे अग्निहोत्र-शाला में बैठे और कपिल की स्त्री ने जल लाकर दिया। तभी कपिल वन से बेल, छाल और लकड़ी लेकर लौटा, उल्लू जैसा मुख, हाथ में कमंडलु, चोटी में गाँठ, लंबी दाढ़ी और यज्ञोपवीत धारण किए, खेत कटने के बाद बचे दाने बीनकर जीविका चलाने वाला, दावानल जैसा क्रोधी और कालकूट विष जैसे वचन बोलने वाला।

  2. उन्हें बैठे देख कपिल ने मुँह टेढ़ा कर ब्राह्मणी से कहा, हे पापिनी! इन्हें घर में क्यों घुसाया, आज तुझे गायों के खूँटे से बाँधूँगा, देख इन धूल से भरे निर्लज्ज, ढीठ पुरुषों ने मेरा अग्निहोत्र का स्थान अपवित्र कर दिया; सीता ने राम से कहा कि इस क्रोधी के घर नहीं रहना, वन में चलें जहाँ वृक्ष, फूल-फल, निर्मल सरोवर और स्वतंत्र हिरण हैं, यहाँ के लोग, विशेषकर गाँव वाले, बड़े कठोर हैं। आस-पास के लोग आए और दोनों भाइयों का देव-समान रूप देख मोहित होकर ब्राह्मण को एकांत में समझाने लगे कि एक रात रहने से तेरा क्या बिगड़ता है, पर कपिल उनसे भी लड़ पड़ा और जैसे कुत्ता हाथी पर झपटे वैसे इन पर क्रोध कर बोला, हे अपवित्रो, मेरे घर से निकलो।

  3. ये कटु वचन सुन लक्ष्मण ने क्रोध से उस दुर्जन ब्राह्मण के पैर ऊँचे कर उसे उल्टा कर घुमाया, पर परम दयालु राम ने रोका कि ऐसे दीन को मारने से बड़ा अपयश होगा, जिनशासन में शूरवीर यति, ब्राह्मण, गाय, पशु, स्त्री, बालक और वृद्ध को दोषी होने पर भी नहीं मारते। कुटिया से निकलकर राम ने जानकी से कहा कि नीच पुरुषों की संगति को धिक्कार है, महाभयानक वन में वृक्षों के नीचे रहना, यहाँ तक कि भोजन-पानी बिना प्राण जाना भी अच्छा है, पर दुर्जनों के घर एक क्षण भी नहीं रहना, हम नदियों के तट और पर्वतों की गुफाओं में रहेंगे।

  4. फिर वर्षा ऋतु आई, काले मेघों से आकाश ढक गया, गर्जना से पर्वत की गुफाएँ गूँज उठीं और बिजली चमकने लगी; तीनों एक बहुत बड़े वटवृक्ष की घर जैसी बड़ी कोटर में ठहरे, जहाँ इभकर्ण नाम का यक्ष रहता था, जिसने उनके तेज से अपने स्थान से दूर होकर अपने स्वामी से कहा कि स्वर्ग से कोई आकर मेरे स्थान पर ठहरा है। यक्षाधिपति अपने देवों सहित आया, अवधिज्ञान से जाना कि ये बलभद्र और नारायण शलाकापुरुष हैं, और वात्सल्य से क्षण भर में एक मनोहर नगरी रच दी, जहाँ वे प्रातः मधुर गीतों की ध्वनि से रत्नजड़ित शय्याओं पर बहुमंजिले महल में जागे, पर महानुभाव राम को आश्चर्य नहीं हुआ, क्योंकि थोड़ी-सी वस्तु देखकर चकित होना क्षुद्र पुरुषों की चेष्टा है; राम के लिए रची होने से वह नगरी पृथ्वी पर रामपुरी नाम से प्रसिद्ध हुई और उसके सुभट, मंत्री, द्वारपाल और नागरिक अयोध्या के समान थे।

  5. श्रेणिक के ब्राह्मण के विषय में पूछने पर गौतम स्वामी ने बताया कि दूसरे दिन कपिल दराँती लेकर लकड़ी काटने वन में गया और अचानक आँखें उठाकर देखा कि जहाँ हिरण फिरते थे वहाँ ध्वजाओं से सजे भवनों, कैलाश पर्वत के बालक जैसे उज्ज्वल राजमहल, कमल-सरोवरों, उपवनों, चैत्यालयों और हाथी-घोड़े-गायों से भरा नगर बसा है, और सोचने लगा कि यह स्वर्ग से आया है या पाताल से निकला है, देवमाया है, गंधर्व-नगर है, मैं पित्त से व्याकुल हूँ, या यह मेरी मृत्यु का चिह्न है। आभूषणों से सजी एक स्त्री, सुमाया नाम की यक्षिणी, ने बताया कि यह राम की नगरी है जहाँ राजा श्रीराम, उनके भाई लक्ष्मण और रानी सीता रहते हैं, जिन्होंने मनचाहा दान देकर सब दरिद्रों को राजा समान कर दिया है; जब वह लकड़ी का बोझा डालकर उसके चरणों में गिरा तो उसने कहा कि इस नगरी के तीन द्वारों पर सिंह, गज और व्याघ्र जैसे मुख वाले रक्षक हैं, पूर्व द्वार के पास के जिनमंदिरों में जो भाव से णमोकार मंत्र पढ़ते हैं वही भीतर जा सकते हैं, और अणुव्रतधारी, शीलवान पुरुष को राम परम प्रीति से देखते हैं।

  6. धन-प्राप्ति का उपाय जानकर कपिल लोभवश चारित्रशूर मुनि के पास गया, हाथ जोड़कर श्रावक की क्रियाओं के भेद पूछे और मुनिराज से श्रावक धर्म और चारों अनुयोगों का रहस्य सुनकर ऐसा बदला कि उनकी स्तुति करने लगा कि जैसे प्यासे को शीतल जल, धूप से तपे को छाया, भूखे को भोजन, रोगी को औषधि और डूबते को जहाज मिले, वैसे आपका उपदेश मिला है, तीनों लोकों में आपके समान मेरा कोई मित्र नहीं। घर आकर उसने अपनी स्त्री सुशर्मा को वह अद्भुत जैनधर्म और रामपुरी का वृत्तांत सुनाया, जिसे सुनकर वह भी जैनधर्म में रुचि वाली हुई और बोली कि आपने आँगन में आए महापुरुषों का निरादर किया, बिना तिथि और निमंत्रण आने वाले दिगंबर मुनि रूपी अतिथियों को कभी आहार नहीं दिया और अरहंत को छोड़ व्यंतर-ज्योतिषी देवों को प्रणाम किया; तब कपिल उसे उसी गुरु के पास ले गया और उसने भी श्राविका के व्रत लिए।

  7. कपिल को जैनधर्म का अनुरागी देख अनेक ब्राह्मण समताधारी हुए, मुनिसुव्रतनाथ का धर्म पाकर अनेक लोग श्रावक-श्राविका बने और कई उत्तम ब्राह्मण सब परिग्रह त्यागकर मुनि हुए; कपिल महाक्रियावान श्रावक बना और सुशर्मा सहित भेंट लेकर, सुकुमार बालक को कंधे पर बैठाकर रामपुरी की ओर चला। मार्ग में भयानक नागकुमारियाँ और विकराल मुख वाले, अट्टहास करते व्यंतर दिखे, पर दोनों निडर होकर जिनेंद्र की स्तुति करते रहे, तो उन्हें जिनभक्त जानकर यक्ष शांत हो गए, और जिनालय में उन्होंने प्रदक्षिणा देकर भूत, वर्तमान और भविष्य के चौबीस-चौबीस तीर्थंकरों, पाँच भरत, पाँच ऐरावत और पाँच विदेह इन पंद्रह कर्मभूमियों के सब तीर्थंकरों और श्री मुनिसुव्रतनाथ को नमस्कार कर अष्टांग दंडवत् किया।

  8. राजभवन पहुँचकर कपिल ने दूर से लक्ष्मण को देखा तो व्याकुल हो सोचने लगा कि मैंने अपनी पापी जीभ से इन्हें कटु वचन कहे थे, धरती फटे तो उसमें समा जाऊँ, यदि जानता कि ये ही यहाँ नगरी बसाकर रहते हैं तो देश छोड़कर उत्तर दिशा को चला जाता, और ब्राह्मणी को छोड़कर भाग गया; लक्ष्मण ने हँसकर राम को बताया, तो राम ने सेवकों को भेजकर उसे विश्वास दिलाकर बुलवाया और वह काँपता हुआ आकर भेंट रखकर ‘स्वस्ति’ कहकर स्तुति करने लगा। राम ने पूछा कि तुमने हमें अपमानित कर घर से निकाला था, अब क्यों पूजते हो, तो उसने कहा कि आप प्रच्छन्न महेश्वर हैं, जैसे राख से दबी अग्नि नहीं पहचानी जाती, लोग धन को पूजते हैं पुरुष को नहीं; तब राम बोले कि जिसके पास धन है उसी के मित्र और भाई होते हैं, पर धन वही है जो धर्म से युक्त हो, धर्म वही जो दया से युक्त हो और दया वही जिसमें मांस-भोजन का त्याग हो, मांस-त्याग के बिना अन्य त्याग की शोभा नहीं।

  9. कपिल ने कहा कि पूर्व में सनत्कुमार चक्रवर्ती ऐसे रूपवान थे कि देव उनका रूप देखने आए, वे मुनि होकर आहार के लिए नगरों में गए पर बहुत समय तक निरंतराय आहार नहीं मिला, फिर विजयपुर नगर में एक निर्धन मनुष्य ने आहार दिया और उसके घर पंचाश्चर्य हुए; मुझ मंदभाग्य ने आप जैसे महापुरुषों का आदर नहीं किया, यह कहकर वह रोने लगा, तब राम ने उसे संतोष दिया, जानकी ने सुशर्मा को मीठे वचनों से संतुष्ट किया और राम की आज्ञा से दोनों को स्वर्ण-कलशों से स्नान कराकर आदर से भोजन कराया गया तथा अनेक वस्त्र, आभूषण और बहुत धन दिया गया। घर लौटकर अनेक खंडों के महलों और गाय-भैंसों से भरे वैभव में भी कपिल का मन नहीं लगा, उसे यह शल्य सालता रहा कि प्यासी सीता सहित चंद्रमा जैसे दोनों भाइयों को मैंने घर से निकाला था, और रोते हुए परिवार से यह कहकर कि परिवार के मोह से अज्ञानी जीव संसार की अग्नि में जलता है, उसने अठारह हज़ार गायें और रत्नों से भरा घर स्त्री-बच्चों को सौंप दिया और जगत-प्रसिद्ध तपोनिधि आनंदमति स्वामी का शिष्य बनकर दिगंबर मुनि हो महातप करने लगा।