पर्व 34
बालिखिल्य का कथानक
राजकुमार के वेश में नलकूवर पर राज्य करती कल्याणमाला ने अपना भेद खोला, और राम-लक्ष्मण ने म्लेच्छों के स्वामी रौद्रभूत से उसके पिता बालिखिल्य को छुड़ाया।
कथा खंड वनवाससारांश
नलकूवर में सरोवर पर लक्ष्मण से मिलने वाला एक युवा ‘राजकुमार’ वास्तव में राजकुमारी कल्याणमाला निकलती है, जो जन्म से पुरुष-वेश में राज्य कर रही है, क्योंकि उसके गर्भ में रहते ही उसके पिता बालिखिल्य को म्लेच्छों ने बंदी बना लिया था और सिंहोदर ने आज्ञा दी थी कि बालिखिल्य के पुत्र होगा तो वही राज्य करेगा। उसके पिता को छुड़ाने का वचन देकर वनवासी विंध्य वन में जाते हैं, काकोनद म्लेच्छों की सेनाओं को भगाते हैं और उनका स्वामी रौद्रभूत, जो एक ब्राह्मण का पुत्र होकर चोरी के कारण देश छोड़ म्लेच्छों का स्वामी बना था, उनकी शरण में आता है। राम की आज्ञा से रौद्रभूत बालिखिल्य को छोड़कर उसका आज्ञाकारी मंत्री बनता है, बालिखिल्य के नगर लौटने पर महा उत्सव होता है, और सिंहोदर भी उसका सम्मान करने लगता है।
क्या हुआ
7 बिंदु
नलकूवर नगर के सुंदर वन के पास सरोवर पर लक्ष्मण जल लेने गए, जहाँ नगर का राज्य करने वाला एक रूपवान ‘राजकुमार’ उत्तम हाथी पर चढ़कर पयादों सहित क्रीड़ा करने आया था; वह लक्ष्मण पर मोहित हुआ, सेवक भेजकर उन्हें बुलवाया, हाथी से उतरकर उनका हाथ पकड़ा, वस्त्रों के डेरे में ले जाकर एक ही आसन पर बैठाया और परिचय पूछा। लक्ष्मण ने कहा कि मेरे बड़े भाई मेरे बिना एक क्षण नहीं रहते, पहले उनके भोजन-पानी की व्यवस्था करूँगा, तब राजकुमार ने दाल, भात, ताज़े घी और कपूर से सुगंधित अनेक व्यंजन, दूध, दही, पेय, मिश्री के लड्डू, पूड़ी आदि और वस्त्र, आभूषण, मालाएँ तैयार कराकर अपने द्वारपाल को सीता सहित राम को ठंडी छाया वाले वस्त्र-भवन में बुलाने भेजा।
राम सीता सहित ऐसे पधारे जैसे चाँदनी सहित चंद्रमा; नगर के राजा ने दूर से उठकर सामने आकर उन्हें सिंहासन पर बैठाया, आरती उतारकर अर्घ चढ़ाया और स्नान-भोजन कराकर सबको यह कहकर विदा किया कि ये मेरे पिता के पास से एकांत के समाचार लाए हैं, जो यहाँ आएगा उसे मैं मारूँगा, और बड़े-बड़े सामंत द्वार पर खड़े कर दिए। एकांत में राम, लक्ष्मण और सीता के सामने उसने लाज छोड़ राजकुमार का वेश त्यागकर अपना राजकुमारी रूप प्रकट किया, जिसकी ज्योति से वस्त्र-भवन प्रकाशित हो गया मानो स्वर्ग की देवांगना या नागकुमारी हो; वह सीता के चरणों में नमन कर पास बैठ गई और उसका रूप देखकर लक्ष्मण मोहित हो गए।
राम के पूछने पर उसने बताया कि इस नगर का राजा बालिखिल्य बुद्धिमान, श्रावक-व्रतधारी, महादयालु और जैनधर्मियों पर वात्सल्य रखने वाला है और सिंहोदर का सेवक है; जब रानी पृथ्वी के गर्भ में मैं थी, तब म्लेच्छों के स्वामी से महायुद्ध में मेरे पिता पकड़े गए, सिंहोदर ने आज्ञा दी कि बालिखिल्य के पुत्र होगा तो वही राज्य करेगा, इसलिए पुत्री होने पर सुबुद्धि मंत्री ने मुझे पुत्र घोषित किया, मेरा नाम कल्याणमाला रखा और जन्म का बड़ा उत्सव किया, और केवल मेरी माता और मंत्री जानते हैं कि मैं कन्या हूँ। मेरे पिता अब भी म्लेच्छों के बंदी हैं, राज्य का सारा द्रव्य म्लेच्छ ले जाते हैं, सिंहोदर भी उन्हें छुड़ाने में समर्थ नहीं और मेरी माता वियोग की अग्नि में जल रही है; यह कहकर वह रोने लगी तो सीता ने उसे गोद में लेकर मुख धोया और लक्ष्मण ने कहा कि तुम पुरुष-वेश में राज्य करती रहो, थोड़े ही दिनों में म्लेच्छ को पकड़ा और अपने पिता को छूटा हुआ देखोगी।
तीन दिन देवों की तरह आदर पाकर रहने के बाद राम, लक्ष्मण और सीता रात में चुपचाप चले गए; प्रातः राजपुत्री ने उन्हें न पाकर विलाप किया कि वे महापुरुष मेरा मन हरकर ले गए और मुझ पापिनी को नींद आ गई, फिर मन को रोककर पुरुष-वेश में ही हाथी पर चढ़कर नगर लौटी। कल्याणमाला की विनय से प्रसन्न राम-लक्ष्मण मेकला नदी पार कर अनेक देशों को लाँघते हुए विंध्याटवी में आए, जहाँ ग्वालों के मना करने पर भी वे दावानल से जलते, लताओं और वृक्षों से भरे उस भयानक वन में आगे बढ़े।
सीता ने शकुन विचारकर कहा कि बाईं ओर काँटेदार वृक्ष पर बैठा कौआ कलह की और क्षीरवृक्ष पर बैठा दूसरा कौआ जीत की सूचना दे रहा है, एक मुहूर्त ठहरो, युद्ध के बाद विजय होगी; कुछ देर बाद आगे बढ़ते ही म्लेच्छों की सेना मिली, जो दोनों भाइयों के निर्भय होकर धनुष-बाण लिए सामने आते ही दसों दिशाओं में भाग गई, कवचधारी म्लेच्छ लौटे तो क्रीड़ामात्र में हारे, और जब राजाओं से भी अजेय, मांसभक्षी काकोनद जाति के म्लेच्छ काली घटा की तरह उमड़े तो लक्ष्मण का चढ़ा हुआ धनुष देखकर ही डर से काँपते हुए अंधों की तरह वन में भटक गए। तब उनका महाभयंकर स्वामी रथ से उतरकर चरणों में गिरा और बोला कि मैं कौशांबी नगरी के अग्निहोत्री ब्राह्मण विश्वानल और उसकी स्त्री प्रतिसंख्या का पुत्र रौद्रभूत हूँ, बचपन से द्यूत में प्रवीण और क्रूरकर्मी था, चोरी में पकड़े जाने पर शूली चढ़ने वाला था कि एक दयालु पुरुष ने छुड़ाया, तब देश छोड़कर यहाँ आया और कर्मयोग से व्रत-क्रिया रहित म्लेच्छों का स्वामी बना, बड़ी-बड़ी सेनाओं वाले राजा भी मेरे सामने नहीं टिकते थे पर आपके दर्शनमात्र से मैं आपके वश हो गया हूँ, धन से भरे इस रमणीक विंध्याचल में आप राज्य करें, मैं आपका दास हूँ।
राम ने दया से कहा, उठ, डर मत, बालिखिल्य को छोड़कर तुरंत यहाँ बुला, उसका आज्ञाकारी मंत्री बनकर रह, म्लेच्छों की क्रिया और पापकर्म छोड़कर देश की रक्षा कर; तब रौद्रभूत ने महारथ के पुत्र बालिखिल्य को छोड़ा, तेल-मालिश, स्नान, भोजन कराकर आभूषण पहनाए और रथ में बैठाया, और बालिखिल्य यह सोचकर डरता रहा कि आज ये मुझे किसी की भेंट चढ़ाएँगे, पर राम-लक्ष्मण को देखकर परम हर्षित हुआ और रथ से उतरकर नमस्कार किया। राम की आज्ञा से वह रौद्रभूत सहित अपने नगर गया, कल्याणमाला महाविभूति से उसकी अगवानी को आई, राजा ने ‘राजकुमार’ को हृदय से लगाया, रानी का शरीर फिर पहले जैसा सुंदर हो गया, सिंहोदर सहित सब हितैषी प्रसन्न हुए और सबको आश्चर्य हुआ कि राजपुत्री ने इतने दिन पुरुष-वेश में राज्य किया।
गौतम स्वामी राजा श्रेणिक से कहते हैं कि अनेक देशों का काँटा रौद्रभूत श्रीराम के प्रभाव से बालिखिल्य का आज्ञाकारी सेवक हुआ, और म्लेच्छों की भूमि पर भी बालिखिल्य का राज्य होने से सिंहोदर भी शंकित होकर उसका स्नेह से सम्मान करने लगा। बालिखिल्य शरद ऋतु के सूर्य की तरह प्रकाशित होता हुआ रानी सहित देवों के समान भोग भोगता रहा और जानता रहा कि पुण्य और महापुरुषों के सान्निध्य से ही वह शत्रुओं से छूटकर फिर राज्य पा सका।