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पर्व 33

वज्रकर्ण व्रत कथानक

जिनेंद्रदेव, निर्ग्रंथ मुनि और जिनवाणी के सिवा किसी को नमस्कार न करने का व्रत लेने वाले वज्रकर्ण को लक्ष्मण ने अकेले राजा सिंहोदर को हराकर बचाया।

कथा खंड वनवास

सारांश

एक तापस-आश्रम और चित्रकूट के भयानक वनों से होकर वनवासी मालवा देश पहुँचते हैं और उसे उजड़ा पाते हैं; एक दरिद्र किसान बताता है कि दशांगपुर के राजा वज्रकर्ण ने शिकार के समय प्रीतिवर्धन मुनि से प्रतिबोध पाकर जिनेंद्र, निर्ग्रंथ मुनि और जिनवाणी के सिवा किसी को नमस्कार न करने का व्रत लिया है, और एक शत्रु से यह जानकर उसके स्वामी उज्जयिनी के राजा सिंहोदर ने उसे घेर लिया है और देश उजाड़ दिया है। राम लक्ष्मण को संधि कराने भेजते हैं; भरत का दूत बनकर गए लक्ष्मण की बात सिंहोदर नहीं मानता, तो लक्ष्मण अकेले उसकी सेना को भगाकर उसे बाँधकर राम के पास ले आते हैं। वज्रकर्ण की ही विनती पर सिंहोदर छोड़ा जाता है, दोनों में मित्रता होती है और वज्रकर्ण को आधा राज्य मिलता है; राजा लक्ष्मण से अनेक कन्याओं की सगाई करते हैं, पर लक्ष्मण राज्य-स्थान जमाने तक विवाह टाल देते हैं, और तीनों आगे नलकूवर नगर पहुँचते हैं।

क्या हुआ

17 बिंदु

  1. राम, लक्ष्मण और सीता तापसों के आश्रम में गए, जहाँ जटाधारी तापस वृक्षों के वल्कल पहनते थे, मठ पत्तों और घास से छाए थे, आँगनों में बिना बोए उपजा धान सूख रहा था, हिरण निर्भय बैठे थे और तापस-कन्याएँ मीठे जल के कलश लिए थीं; तापसों ने मीठे फल, सुगंधित फूल और जल से सत्कार कर कुटिया और कोमल पत्तों की सेज दी। प्रातः वृद्ध तापसों ने उन्हें वहीं रहने को कहा और सावधान किया कि नदी, वन और नारी विश्वास योग्य नहीं, और कई तापसनियाँ फल-फूल लाने के बहाने साथ चलकर बताने लगीं कि यहाँ से तीन कोस आगे सिंह-व्याघ्रों से भरा भयानक वन और अति ऊँचा, दुर्लंघ्य चित्रकूट पर्वत है, तब राम ने बड़ी कठिनाई से उन्हें लौटाया।

  2. उन्होंने महागहन अटवी में प्रवेश किया, जहाँ सिंहों ने हाथियों को मारकर धरती रक्त से लाल कर दी थी, सिंहनी की गर्जना से हिरण भागते थे, सोते अजगरों की श्वास से गुफाएँ गूँजती थीं, शूकर तालाबों को कीचड़ करते और बंदरों के कूदने से डालियाँ काँपती थीं; चित्रकूट पर्वत के मनोहर झरनों में क्रीड़ा करते, फूलों के आभूषण बनाते और लतामंडपों में विश्राम करते हुए वे नंदनवन में देवों की तरह विचरे। साढ़े चार मास में वे अनेक धान्यों से शोभित मालवा देश में आए, पर बहुत दूर तक जाने पर भी कोई बस्ती नहीं दिखी।

  3. बड़ के वृक्ष की छाया में रत्नकंबल बिछाकर बैठे राम ने कहा कि धान्य, फल-फूल, गन्ने के खेतों और कमल-सरोवरों से भरा यह देश मनुष्यों के बिना ऐसा शोभाहीन है जैसे वीतराग भाव बिना संयम, और लक्ष्मण को वृक्ष पर चढ़कर देखने को कहा; लक्ष्मण ने विजयार्ध पर्वत जैसे ऊँचे जिनमंदिर, शरद के बादलों जैसे शिखर, ध्वजाएँ, घर, कुएँ, बावड़ियाँ और सरोवर देखे, जो विद्याधरों के नगर जैसा था, पर कोई मनुष्य नहीं, केवल रूखे केश, फटे कपड़े और लंबी दाढ़ी वाला, पसीने से भीगा एक दरिद्र पुरुष मृग की तरह दौड़ता आ रहा था। लक्ष्मण को देखकर वह सोचने लगा कि यह इंद्र है, वरुण है, नागेंद्र है या कुबेर, और डर से मूर्छित हो गया, पर लक्ष्मण उसे दिलासा देकर राम के पास लाए, जहाँ राम और जानकी के दर्शन से वह सब दुख भूल गया और बोला कि मैं कुटुंबी (किसान) हूँ, मेरा नाम सिरगुप्त है।

  4. सिरगुप्त ने बताया कि उज्जयिनी नगरी का राजा सिंहोदर अपने प्रताप से बड़े-बड़े राजाओं को झुका चुका है, और दशांगपुर का स्वामी वज्रकर्ण उसका अत्यंत प्रिय सुभट-सेवक है, जिसने निर्ग्रंथ मुनि का धर्मोपदेश सुनकर प्रतिज्ञा की कि सच्चे देव, शास्त्र और गुरु के सिवा किसी को नमस्कार नहीं करूँगा। लक्ष्मण के पूछने पर उसने बताया कि जन्म से हिंसक, कामी, क्रोधी, लोभी वज्रकर्ण एक बार ग्रीष्म में दशारण्य वन में शिकार करने गया, जहाँ उसने तपती शिला पर चार महीने से सूर्य का आताप सहने वाले, पक्षी समान निराश्रय और सिंह समान निर्भय एक महामुनि को देखा और हँसकर पूछा कि तप से रूप-लावण्य खोकर, वस्त्र, आभूषण, सहायक, स्नान और सुगंध के बिना, दूसरों के घर भोजन कर जीने वाले तुम क्या आत्महित करते हो।

  5. दयावान मुनि ने उसे सात नरकों का वर्णन सुनाया, जहाँ नारकियों को घानी में पेला जाता है, छुरी से तिल-तिल काटा जाता है, और महाशीत, महाताप, तलवार की धार जैसे पत्तों वाले शाल्मली वृक्ष और दुर्गंधमय वैतरणी नदी का दुख है; उन्होंने इंद्रिय-विषयों को विषफल कहा और पूछा कि तुम जैसा सज्जन तृण-जल पर जीने वाले, निरपराध, गूँगे मृगों को कैसे मारता है, मन-वचन-काय से हिंसा छोड़ो। प्रतिबोध पाकर वज्रकर्ण फलों से लदे वृक्ष की तरह मुनि के चरणों में झुक गया और मुनिधर्म को अति कठिन जानकर उन प्रीतिवर्धन मुनि से श्रावक के अणुव्रत और उपवास का नियम लिया, तथा प्रतिज्ञा की कि जिनेंद्रदेव, निर्ग्रंथ मुनि और जिनवाणी के सिवा किसी को नमस्कार नहीं करूँगा।

  6. मुनिराज ने विस्तार से धर्म समझाया कि एक श्रावक का धर्म है जो गृहस्थ के आरंभ सहित है और दूसरा यति का धर्म जो निरारंभ है, दोनों का मूल सम्यक्त्व है, और प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग तथा द्रव्यानुयोग का स्वरूप बताया; वज्रकर्ण ने उस दिन उपवास किया और दूसरे दिन पारणा कर अपने स्थान गया। सिंहोदर का सेवक होने से उसकी विनय किए बिना राज्य कैसे करूँ, यह सोचकर उसने एक अँगूठी बनवाई जिसमें मुनिसुव्रतनाथ की प्रतिमा थी, उसे दाहिने हाथ के अँगूठे में पहना और सिंहोदर के सामने जाते समय मुद्रिका की प्रतिमा को नमस्कार करता।

  7. उसके एक शत्रु ने सिंहोदर से कहा कि वज्रकर्ण आपको नहीं, जिनप्रतिमा को नमस्कार करता है; यह सुन संपदा से उन्मत्त सिंहोदर ने क्रोधित होकर कपट से वज्रकर्ण को दशांगनगर से बुलवाया ताकि उसे मार डाले। सरल-चित्त वज्रकर्ण हाथी पर चढ़कर उज्जयिनी चलने को तैयार हुआ, तभी हाथ में डंडा लिए एक युवक ने आकर बताया कि सिंहोदर तुम्हें मारना चाहता है, और अंजनगिरि जैसे मदमस्त हाथियों पर बैठे योद्धा और कवचधारी घुड़सवार सामंत राजाज्ञा से मार्ग रोके खड़े हैं।

  8. वह युवक कुंदनगर के महाधनवान सेठ समुद्रसंगम और उसकी स्त्री यमुना का पुत्र विद्युदंग था, जिसका नाम वर्षा में बिजली चमकते समय जन्म लेने से पड़ा था; व्यापार करने उज्जयिनी जाकर वह कामलता वेश्या पर मोहित हुआ और पिता का बरसों का कमाया धन छह महीनों में गँवा बैठा, और जब वेश्या ने रानी श्रीधरा के कुंडलों की प्रशंसा की तो वह रात में उन्हें चुराने राजभवन में घुसा। वहाँ उसने नींद न आने से व्याकुल सिंहोदर को रानी से कहते सुना कि मैंने वज्रकर्ण को छोटे से बड़ा किया और अब वह मुझे सिर नहीं झुकाता, जब तक उसे मार न दूँ मुझे नींद नहीं आएगी; यह सुन मानो उसके हृदय पर वज्र गिरा, उसने चोरी का विचार छोड़ा और जिनधर्मी वज्रकर्ण को सावधान करने आया, और आती हुई सेना की उड़ती धूल दिखाई।

  9. वज्रकर्ण ने विद्युदंग को मित्र जानकर साथ लिया और अपने गढ़ में बैठ गया; सिंहोदर ने सेना सहित आकर गढ़ को कठिन और अपने लोगों के मारे जाने का भय देख तत्काल आक्रमण नहीं किया, पास में डेरा डालकर दूत भेजा, जिसने कठोर वचन कहे कि तू मेरा दिया देश खाता है और माथा अरिहंत को झुकाता है, शीघ्र आकर प्रणाम कर, नहीं तो मारा जाएगा। वज्रकर्ण ने उत्तर दिया कि देश, नगर, भंडार, हाथी-घोड़े सब आपके हैं, ले लो, मुझे स्त्री सहित धर्म-द्वार से निकल जाने दो, पर मैंने जिनेंद्रदेव, मुनि और जिनवाणी के सिवा किसी को नमस्कार न करने की प्रतिज्ञा ली है, आप मेरे द्रव्य के स्वामी हो, आत्मा के नहीं; यह सुन सिंहोदर ने क्रोध से नगर को चारों ओर से घेर लिया और देश उजाड़ दिया।

  10. सिरगुप्त ने कहा कि पास ही मेरा गाँव था जिसे सिंहोदर के सेवकों ने जला दिया, मेरी तिनकों-लकड़ी की कुटिया भी भस्म हो गई, घर में एक छाज, मिट्टी का एक घड़ा और एक हाँडी थी, और मेरी कर्कशा स्त्री ने वही लाने और सूने गाँव के घरों से उपकरण बटोर लाने भेजा है। उसे दुखी देख महादयालु राम ने अपने गले से अमूल्य रत्नों का हार उतारकर दे दिया और वह पथिक धन से राजा के समान होकर घर गया।

  11. जेठ की कड़ी धूप चढ़ने से पहले और प्यासी सीता के लिए जल-भोजन की व्यवस्था हेतु वे दशांगनगर के समीप श्री चंद्रप्रभ भगवान के उत्तम चैत्यालय में आए; लक्ष्मण भोजन लेने गए, सिंहोदर के कटक के रक्षकों ने रोका तो उन्हें नीच जानकर उनसे विवाद किए बिना नगर-द्वार पर पहुँचे, जहाँ द्वार के ऊपर सावधान बैठे वज्रकर्ण ने उनका रूप देख आश्चर्य से उन्हें भीतर बुलाकर भोजन का आग्रह किया। लक्ष्मण ने कहा कि मेरे बड़े भाई और भावज चैत्यालय में बैठे हैं, पहले उन्हें भोजन कराऊँगा, तो वज्रकर्ण ने सेवकों के हाथ अनेक व्यंजन, चाँदनी-सा उज्ज्वल दूध, घी और दही भेजा, और राम ने कहा कि ऐसा भोजन कोई अपने जमाई को भी नहीं कराता, ऐसा धर्मात्मा, व्रती श्रावक हमारे रहते शत्रु से दुखी रहे तो हमारा बल किस काम का, सिंहोदर के उपद्रव से उसे भरत भी नहीं बचा सकेगा, इसलिए हे लक्ष्मण! शीघ्र उसकी सहायता करो।

  12. भरत का दूत बताकर लक्ष्मण कटक में गए और सिंहोदर से कहा कि अयोध्या के अधिपति भरत की आज्ञा है कि वज्रकर्ण से व्यर्थ विरोध छोड़ मित्रता करो; सिंहोदर ने वज्रकर्ण को दुरात्मा, मायाचारी, कृतघ्न और विनयरहित बताकर कहा कि उसे मारूँगा या राज्यरहित करूँगा, और लक्ष्मण का उपहास किया कि जैसे पकते चावलों में से एक दाना देखकर सबकी परख होती है वैसे तुझे देखकर भरत के सब लोगों की बात जान ली। लक्ष्मण ने क्रोध से कहा कि मैं तुझे नमस्कार करने नहीं, मित्रता कराने आया हूँ, संधि कर ले नहीं तो मारा जाएगा, तब सभासद छुरी, कटार, भाले और तलवारें लेकर उन पर टूट पड़े, पर लक्ष्मण ने पैरों, घुटनों, कोहनियों और मुक्कों से उन्हें उड़ा दिया, किसी को केश पकड़कर पछाड़ा और किसी के सिर आपस में भिड़ा दिए।

  13. जब कवचधारी सामंत हाथी-घोड़ों पर चढ़कर और फिर स्वयं सिंहोदर बलवान हाथी पर अनेक सुभटों सहित उन्हें घेरने आया, तो लक्ष्मण ने हाथी बाँधने का खंभा उखाड़कर, जैसे सिंह सियारों को भगाता है वैसे सेना को भगाया, ध्वजा, रथ और चक्र तोड़ डाले, और भागते सुभट कहने लगे कि कवच उतारो, हाथी-घोड़े छोड़ो, गदा गड्ढे में डालो, ज़ोर से मत बोलो, नहीं तो यह भयानक पुरुष आकर मारेगा। योद्धाओं की स्त्रियाँ और दशांगनगर की नारियाँ आश्चर्य से उसका बल सराहने लगीं और वज्रकर्ण ने अपने सुभटों से कहा कि संकट में धर्म ही रक्षा करता है, इधर लक्ष्मण सिंहोदर को हाथी से उतार, गले में कपड़ा डालकर बैल की तरह बाँधकर ले चले।

  14. सिंहोदर की पटरानी बालकों और वृद्धों सहित रोती हुई लक्ष्मण के चरणों में गिरी और पति की भिक्षा माँगी; लक्ष्मण ने पहले कहा कि आगे बड़े वृक्ष पर इसे बाँधकर लटकाऊँगा, फिर दया कर उसे चैत्यालय ले आए, जहाँ काँपता हुआ सिंहोदर राम के चरणों में गिरा और बोला कि यह राज्य आपका है, जिसे चाहें दें, मैं आपकी सेवा करूँगा, और रानियों ने सीता के चरणों में नमन कर रक्षा माँगी। तब राम ने मेघ-गर्जना जैसी वाणी में कहा कि हे सिंहोदर! वज्रकर्ण जो कहे वही कर, इसी में तेरा जीवन है।

  15. वज्रकर्ण परिवार सहित चैत्यालय आया, तीन प्रदक्षिणा देकर चंद्रप्रभ भगवान की स्तुति की, दोनों भाइयों का आरोग्य और सीता की कुशल पूछी, और तभी सुंदर वेश में विद्युदंग भी आया, जिसे सारी सभा ने वज्रकर्ण का परम मित्र कहकर सराहा। राम ने वज्रकर्ण की श्रद्धा की प्रशंसा की कि पवन के झोंकों से सुमेरु की चूलिका की तरह कुबुद्धियों के उपद्रव से भी तेरी बुद्धि नहीं डिगी, मुझे देखकर भी तेरा मस्तक नहीं झुका, तू निकट भव्य है; और जब उससे इच्छा पूछी गई तो उसने कहा कि मैं जिनधर्मी हूँ, किसी जीव को पीड़ा देना नहीं चाहता, यह सिंहोदर मेरा स्वामी है, इसे छोड़ दीजिए, जिस पर सबके मुख से धन्य-धन्य की ध्वनि हुई।

  16. लक्ष्मण ने सिंहोदर को छोड़ दिया और वज्रकर्ण तथा सिंहोदर के हाथ मिलाकर उन्हें परम मित्र बनाया; वज्रकर्ण को सिंहोदर का आधा राज्य, अर्थात देश, धन और सेना का आधा भाग मिला, लूटा हुआ माल लौटाया गया और वज्रकर्ण की कृपा से विद्युदंग सेनापति बना। वज्रकर्ण ने अपनी आठ राजकुमारियों की और सिंहोदर आदि राजाओं ने तीन सौ कन्याओं की लक्ष्मण से सगाई की, पर लक्ष्मण ने कहा कि अपनी भुजाओं से राज्य-स्थान जमाने पर ही विवाह करूँगा, और राम ने कहा कि चंदनगिरि के समीप या दक्षिण समुद्र के पास स्थान बनाकर जब हम दोनों माताओं को ले आएँगे तब लक्ष्मण आपकी पुत्रियों से विवाह करेगा; यह सुन पाले से मुरझाए कमल-वन की तरह व्याकुल राजकन्याएँ वियोग की अग्नि में जलती हुई पिताओं के साथ घर लौटीं।

  17. विद्युदंग ने अपने माता-पिता को कुटुंब सहित बड़े वैभव से बुलाकर मिलन-उत्सव किया, और वज्रकर्ण तथा सिंहोदर में परस्पर अति प्रेम बढ़ा। राम, लक्ष्मण और सीता आधी रात को चैत्यालय से निकलकर चले गए, प्रातः आए लोग उन्हें न पाकर बहुत पछताए, और वे धीरे-धीरे रमणीक वनों में विश्राम करते, मीठे फलों का रस पीते हुए रत्नों के ऊँचे भवनों और सुंदर जिनमंदिरों से शोभित नलकूवर नगर पहुँचे।