मुख्य सामग्री पर जाएँ

पर्व 32

राम-लक्ष्मण का वन-गमन और भरत का राज्याभिषेक

राम, लक्ष्मण और सीता आधी रात को नगर से निकल गए; दशरथ मुनि बने और वन में स्वयं राम ने भरत का राज्याभिषेक किया।

कथा खंड वनवास

सारांश

आधी रात को नगर-द्वार की खिड़की से निकलकर राम, लक्ष्मण और सीता सीता की मंद चाल के अनुसार दक्षिण की ओर चलते हैं; साथ आए सामंतों और राजाओं को राम परियात्रा अटवी की एक भयंकर नदी पार कर पीछे छोड़ देते हैं, और उनमें से अनेक संसार की असारता देखकर सत्यकेतु आचार्य से मुनिदीक्षा लेते हैं। दशरथ भरत का राज्याभिषेक कर सर्वभूतहित स्वामी से जिनदीक्षा लेते हैं और एकलविहारी मुनि होकर बारह भावनाओं के चिंतन से पुत्र-शोक को जीतते हैं। पश्चाताप से भरी कैकेयी के कहने पर भरत राम को लौटाने जाता है, पर राम पिता के वचन की रक्षा कर वन में ही भरत का राज्याभिषेक करते हैं; अयोध्या लौटकर भरत अनासक्त भाव से राज्य करता है, द्युति भट्टारक मुनि के पास राम के दर्शन होते ही मुनिव्रत लेने का नियम लेता है और श्रावक के व्रत धारण करता है।

क्या हुआ

13 बिंदु

  1. अल्प निद्रा लेकर आधी रात को, जब सब लोग सो रहे थे, राम-लक्ष्मण ने भगवान को नमस्कार कर कवच पहने, धनुष-बाण लिए और सीता को बीच में रखकर नगर के द्वार की खिड़की से निकलकर दक्षिण दिशा का मार्ग लिया। रात्रि के अंत में सामंत दौड़कर आ मिले और दूर से ही सवारी छोड़ विनय से पैदल आए; उन्होंने सीता की बहुत प्रशंसा की कि पवन-वेग वाले ये दोनों भाई सीता की चाल के अनुसार प्रतिदिन केवल दो कोस चलते हैं, इसी कारण हम उन्हें पा सके।

  2. हरे-भरे खेतों, कमलों से भरे सरोवरों, गाँवों और नगरों में लोग उन्हें नमस्कार कर भोजनादि से सत्कार करते, और बड़े-बड़े राजा अपनी सेनाओं सहित ऐसे आ मिलते जैसे वर्षा में गंगा-यमुना में अनेक नदियाँ मिलती हैं; कोई मार्ग के खेद से या राम का निश्चय जानकर लौट गया, तो कोई लज्जा, भय या भक्ति से साथ चलता रहा। वे सिंहों और हाथियों से भरी, घने वृक्षों से रात जैसी अंधेरी, भीलों के निवास वाली परियात्रा अटवी में पहुँचे, जहाँ राम ने अनेक राजाओं को विदा किया, फिर भी कई लौटने को तैयार नहीं हुए।

  3. अटवी के मध्य पर्वत से निकली, नीले जल और प्रचंड लहरों वाली एक भयानक नदी थी; भयभीत सामंत विनती करने लगे कि हमें भी पार उतारो, हे माता जानकी! लक्ष्मण से कहो कि हमें भी नदी पार कराएँ, और कई राजा नदी में गिरने लगे। राम ने कहा कि अब लौट जाओ, पिता ने भरत को सबका स्वामी बनाया है, भक्ति से उसकी सेवा करो, और जब उन्होंने कहा कि आपके बिना हम निराश्रय हैं और स्वर्ग का सुख भी व्यर्थ है, तो राम ने केवल इतना कहा, जाओ, यही उत्तर है, सुख से रहो।

  4. राम सीता का हाथ पकड़कर उसे सुख से नदी में ले गए, जैसे हाथी कमलिनी को ले जाए, और दोनों भाइयों के प्रभाव से वह भयानक प्रवाह नाभि-प्रमाण रह गया; जल-क्रीड़ा में प्रवीण दोनों भाई धर्मचर्चा करते हुए क्षण में पार होकर वृक्षों की ओट में लोगों की दृष्टि से ओझल हो गए। कोई सामंत रोते हुए घर लौटा, कोई एकटक देखता रहा, कोई मूर्छित होकर गिर पड़ा, और कोई यह कहते हुए कि ऐसे शूरवीरों की यह दशा है तो इस असार संसार और क्षणभंगुर भोगों को धिक्कार है, जिनदीक्षा लेने चल पड़ा।

  5. उन राजाओं ने एक पहाड़ की तलहटी के सुंदर वन में ध्यानमग्न महातपस्वी साधु के दर्शन किए, फिर जिनमंदिर में वंदना कर मुनियों के गुरु सत्यकेतु आचार्य के पास गए, जिन्होंने उन्हें भव से पार करने वाली जिनदीक्षा अंगीकार करने को कहा; तब राजा विदग्धविजय, मेरुक्रूर, संग्रामलोलुप, नागदमन, धीर, शत्रुदमन, विनोदकंटक, सत्यकठोर, प्रियवर्धन आदि निर्ग्रंथ मुनि बने। सेवक उनके रथ, हाथी, घोड़े आदि उनके पुत्रों के पास ले गए, जो रोकर स्वयं भी नियम लेने लगे; राम-लक्ष्मण का वृत्तांत सुनकर बहुत लोग मुनि और श्रावक बने, अनेक रानियाँ आर्यिका और श्राविका हुईं, और कुछ सुभटों ने जाकर यह समाचार दशरथ और भरत को सुनाया, जिससे वे कुछ खेदखिन्न हुए।

  6. दशरथ ने भरत का राज्याभिषेक कर उसके सिर पर राजमुकुट बाँधा, विलाप करते अंतःपुर को समझाया और नगर से वन को चले, जहाँ सर्वभूतहित स्वामी को नमस्कार कर अनेक राजाओं सहित जिनदीक्षा धारण की और एकलविहारी जिनकल्पी मुनि हुए। परम शुक्लध्यान की अभिलाषा होते हुए भी कभी-कभी पुत्र-शोक से उनके मन में कुछ कलुषता उठती थी।

  7. तब मुनि दशरथ ने विचारा कि संसार के दुख का मूल यह स्नेह है; अनंत जन्मों में मेरे अनेक माता-पिता, भाई, पुत्र हुए, मैंने देवों के भोग भी भोगे और नरकों में कुल्हाड़ी से कटना, पिघला सीसा पीना, कूटशाल्मली वृक्ष के काँटों और तपी लोहे की पुतलियों का स्पर्श भी सहा, ऐसा कोई शरीर नहीं जो मैंने धारण न किया हो, और ये पुत्र भी कई बार मेरे पिता, माता, शत्रु और मित्र हुए हैं। अनित्य, अशरण, संसार, एकत्व, अन्यत्व, अशुचि, आस्रव, संवर, निर्जरा, लोक, बोधिदुर्लभ और धर्म, इन बारह भावनाओं का चिंतन कर वे निर्मोह हुए और जिन देशों में पहले हाथी पर चढ़कर, चँवर-छत्र सहित शत्रुओं को जीतते फिरते थे, वहीं निर्ग्रंथ होकर बाईस परीषह जीतते हुए शांत भाव से विहार करने लगे।

  8. कौशल्या और सुमित्रा पति के वैराग्य और पुत्रों के विदेश-गमन से निरंतर रोती रहतीं, जिसे देख भरत राज्य-विभूति को विष समान मानने लगा; तब कैकेयी ने करुणा से पुत्र से कहा कि राम-लक्ष्मण के बिना इस राज्य की शोभा नहीं, वे दोनों राजकुमार और राजपुत्री सीता कंकड़-पत्थर और काँटों भरे मार्ग में बिना वाहन कैसे चलेंगे, दोनों माताएँ रोते-रोते कहीं प्राण न त्याग दें, इसलिए शीघ्रगामी घोड़े पर जाकर उन्हें ले आ, मैं भी तेरे पीछे आती हूँ। अति प्रसन्न होकर भरत हजार घोड़ों और राम के पास से लौटे लोगों को साथ लेकर चला, उफनती नदी पर वृक्षों की लकड़ियों से पुल बनाकर सेना सहित पार हुआ और मार्ग में पूछते-पूछते छह दिन में ही वहाँ पहुँच गया जहाँ तक वे बहुत दिनों में आए थे, और घने वन में एक सरोवर के किनारे धनुष-बाण पास रखे सीता सहित बैठे दोनों भाइयों को देखा।

  9. भरत घोड़े से उतरकर पैदल गया और राम के चरणों में गिरकर मूर्छित हो गया; राम ने उसे सचेत किया तो वह हाथ जोड़कर विनती करने लगा कि मुझे राज्य देकर आपने मेरी यह कैसी विडंबना की, उठिए, नगर चलकर राज्य कीजिए, मैं आपके सिर पर छत्र लिए खड़ा रहूँगा, शत्रुघ्न चँवर ढुलाएगा और लक्ष्मण मंत्री-पद संभालेगा, मेरी माता पश्चाताप की अग्नि में जल रही है और आपकी तथा लक्ष्मण की माता महाशोक से रो रही हैं। उसी समय रथ पर चढ़कर अनेक सामंतों सहित शोक से भरी कैकेयी आई, राम-लक्ष्मण को हृदय से लगाकर बहुत रोई और बोली कि अयोध्या चलकर राज्य करो, तुम्हारे बिना अयोध्या वन समान है, हम स्त्रियाँ नष्टबुद्धि होती हैं, मेरा अपराध क्षमा करो।

  10. राम ने कहा, हे माता! आप तो सब बातों में प्रवीण हैं, क्षत्रियों का यही धर्म है कि कहा हुआ वचन न छोड़ें, पिता ने जो वचन कहा उसे हमें और आपको निभाना है, इसमें भरत की अपकीर्ति नहीं होगी। फिर भरत को निःशंक करके राम ने वन में ही सब राजाओं के समीप उसका राज्याभिषेक किया, कैकेयी को प्रणाम कर बहुत स्तुति की, भरत को हृदय से लगाकर दिलासा दिया और मीठे वचनों से दोनों को विदा किया।

  11. भरत श्रीराम की आज्ञा के अनुसार प्रजा का पिता समान पालन करता रहा, राज्य में कोई अनाचार नहीं था, फिर भी उसे राज्य से क्षणमात्र भी राग नहीं था और वह तीनों काल अरनाथ भगवान की वंदना करता, और अनेक मुनियों के गुरु द्युति भट्टारक के निकट उसने नियम लिया कि राम के दर्शन होते ही मैं मुनिव्रत धारण करूँगा। मुनिराज ने कहा कि जब तक राम न आएँ, गृहस्थ धर्म पालो, क्योंकि निर्ग्रंथ मुनि का आचरण अति कठिन है, और व्रतों का फल बताया: अहिंसा से सुर-नर के सुख और मोक्ष, सत्य से अखंड आज्ञा और कीर्ति, अचौर्य से नौ निधि और चौदह रत्नों का स्वामित्व, परनारी-त्याग से मोक्षलक्ष्मी का पतित्व, परिग्रह-परिमाण से अनंत महिमा, आहार, अभय, ज्ञान और औषध दान से क्रमशः महासुख, निर्भयता, केवलज्ञान और आरोग्य, और रात्रिभोजन-त्याग से वर्ष में छह महीने के उपवास का फल मिलता है।

  12. फिर पूजा का फल बताया: सुगंधित फूलों से पूजा करने वाला पुष्पक विमान, धूप खेने वाला सुगंधित शरीर और दीप जलाने वाला तेजस्वी शरीर पाता है; जल से अभिषेक करने वाला चक्रवर्ती होता है, दूध से अभिषेक करने वाला क्षीरसागर समान उज्ज्वल विमानों का देव होकर फिर मनुष्य बन मोक्ष जाता है, दही से दही समान उज्ज्वल यश, घी से महाऋद्धिधारी देवपद और इक्षुरस से इंद्रपद पाकर फिर मुनि बन अविनश्वर पद मिलता है; मोरपंख से मंदिर की सफाई, जिनमंदिर, शिखर और कलश बनवाना, जीर्णोद्धार कराना, और सब शुभ कार्यों से बढ़कर जिनप्रतिमा विराजमान कराना परम फल देते हैं। चैत्यालय जाने का विचार करने से एक उपवास का, जाने का आरंभ करने से तीन का, आधी दूर जाने से पक्षोपवास का और चैत्यालय के दर्शन से एक मास के उपवास का फल मिलता है, और जिनागम लिखवाने, पढ़ने-पढ़ाने वाला ग्यारह अंग और चौदह पूर्व का ज्ञाता होकर केवलज्ञान पाता है।

  13. मुनिराज के वचन सुनकर भरत ने नमस्कार कर श्रावक के व्रत अंगीकार किए और चतुर्विध संघ की भक्ति, दुखी जीवों पर दया कर दान और हृदय में सम्यग्दर्शन रूपी रत्न धारण करता हुआ न्याय से राज्य करने लगा; उसकी देवांगना समान डेढ़ सौ रानियाँ थीं, फिर भी वह जल में कमल की तरह उनसे अलिप्त रहा। उसके मन में निरंतर यही विचार रहता कि कब मुनिव्रत धारण कर निर्ग्रंथ होकर पृथ्वी पर विहार करूँ, वह राज्य के हिंसादि आरंभ से मिलने वाले नरक और तिर्यंच गति के दुखों से डरता और रात-दिन जैन पुराणों तथा साधुओं की कथाओं में लीन रहता।