पर्व 31
राजा दशरथ का पूर्वभव सुनकर संसार से विरक्त होना
मुनि सर्वभूतहित से अपने पूर्वभव सुनकर दशरथ ने दीक्षा का निश्चय किया; कैकेयी ने वर माँगकर भरत के लिए राज्य पाया और राम घर छोड़कर चल पड़े।
कथा खंड वनवाससारांश
श्रेणिक के पूछने पर गौतम स्वामी बताते हैं कि दशरथ ने मुनि सर्वभूतहित से अपने पूर्वभव पूछे और हस्तिनापुर के उपास्ति से लेकर स्वयं तक के जन्मों की वह शृंखला सुनी, जो उन्हें जनक और कनक बने जीवों से भी जोड़ती है। मुनि बनने का निश्चय कर वे मंत्रियों को बुलाते हैं और भरत भी विरक्त होना चाहता है; पति और पुत्र दोनों को रोकने के लिए कैकेयी धरोहर रखा हुआ वर माँगकर भरत के लिए राज्य माँगती है। दशरथ वचन निभाते हैं, राम पिता के वचन की रक्षा के लिए सीता और लक्ष्मण सहित निकल पड़ते हैं, और रोती माताओं तथा पुरजनों से विदा लेकर तीनों रात अरनाथ भगवान के चैत्यालय के समीप बिताते हैं।
क्या हुआ
18 बिंदु
राजा श्रेणिक ने गौतम गणधर से पूछा कि जगत के हितकारी राजा अनरण्य के पुत्र दशरथ ने आगे क्या किया। गौतम स्वामी बताते हैं कि दशरथ मुनियों के दर्शन को गए और सर्वभूतहित स्वामी को नमस्कार कर बोले कि मैंने अनंत जन्म धारण किए हैं, उनमें से कुछ भवों का वृत्तांत सुनकर और संसार को असार जानकर मैं इसे छोड़ना चाहता हूँ।
मुनिराज ने पहले उपदेश दिया कि सभी संसारी जीव अनादि काल से कर्मों के कारण अनंत जन्म-मरण का दुख भोगते आए हैं, कर्मों की स्थिति उत्कृष्ट, मध्यम और जघन्य तीन प्रकार की है; पंचम गति मोक्ष किसी विरले को ही मिलता है, अभव्य को कभी नहीं, और सिद्ध भगवान लोक के शिखर पर विराजमान हैं। जहाँ तक जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल हैं वह लोकाकाश है, उसके आगे केवल अलोकाकाश है, संसारी जीव पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, वनस्पति और त्रस, इन छह कायों में बार-बार शरीर धारण करते हैं, और जिनमार्ग के सिवा मोक्ष का कोई मार्ग नहीं है।
हस्तिनापुर में उपास्ति नाम का पुरुष था, उसकी स्त्री दीपनी मिथ्याभिमानी, श्रद्धाहीन, महाक्रोधी और कृपण थी; वह साधुओं की निंदा करती, कोई व्रत-नियम नहीं लेती, न स्वयं किसी को भोजन देती और न दूसरों को देने देती, इसलिए अनंत काल तक संसार में भटकती रही। उपास्ति दान के अनुराग से चंद्रपुर नगर में भद्र और धारिणी का पुत्र धारण हुआ, जिसकी स्त्री नयनसुंदरी थी; उसने शुभ भाव से मुनियों को आहारदान दिया और मरकर धातकीखंड द्वीप की उत्तरकुरु भोगभूमि में तीन पल्य तक सुख भोगकर देव हुआ।
फिर वह पृथुलावती नगरी में राजा नंदिघोष और रानी वसुधा का पुत्र नंदिवर्धन हुआ। यशोधर मुनि का धर्मोपदेश सुनकर नंदिघोष नंदिवर्धन को राज्य देकर मुनि हो गए और महातप से स्वर्ग गए; नंदिवर्धन ने श्रावक के व्रत धारण किए, णमोकार मंत्र के स्मरण में तत्पर रहकर कोटि पूर्व तक राज्य किया और अंत में समाधिमरण कर पाँचवें स्वर्ग में देव हुआ।
वहाँ से चयकर वह पश्चिम विदेह के विजयार्ध पर्वत पर शशिपुर नगर के विद्याधर राजा रत्नमाली और रानी विद्युल्लता का पुत्र सूर्यजय हुआ। एक दिन रत्नमाली होंठ डसता हुआ, कवच पहनकर दिव्य रथ, हाथी, घोड़े और पयादों की सेना लेकर सिंहपुर के महाबली राजा वज्रलोचन का नगर जलाने चला, तभी एक देव ने तत्काल आकर उसे क्रोध छोड़ने को कहा और उसका पूर्वभव सुनाया।
देव ने कहा कि भरतक्षेत्र की गांधारी नगरी में राजा भूति और उसका पुरोहित उपमन्यु दोनों पापी और मांसभक्षी थे; राजा ने केवलगर्भ स्वामी का उपदेश सुनकर पाप-कार्य न करने का व्रत लिया, पर उपमन्यु ने उसे छुड़वा दिया, और शत्रु-सेना के आक्रमण में दोनों मारे गए। पुरोहित का जीव हाथी हुआ, जो युद्ध में घायल होकर अंत समय णमोकार मंत्र सुनने से गांधारी नगरी में राजा भूति की रानी योजनगंधा का पुत्र अरिसूदन हुआ; केवलगर्भ मुनि के दर्शन से उसे जातिस्मरण हुआ, वह मुनि बना और समाधिमरण कर ग्यारहवें स्वर्ग में देव हुआ।
देव ने कहा, ‘मैं वही उपमन्यु का जीव हूँ, और तुम राजा भूति का जीव मरकर मंदारण्य में मृग हुए, दावानल में जलकर मरे, फिर कलिंजामा नाम के नीच पुरुष हुए और पाप से दूसरे नरक गए, जहाँ मैंने स्नेहवश तुम्हें संबोधा; आयु पूर्ण कर तुम रत्नमाली विद्याधर हुए हो और अब नरक के दुख भूल गए हो।’ यह सुनकर रत्नमाली पुत्र सूर्यजय सहित परम वैराग्य को प्राप्त हुआ और तिलकसुंदर स्वामी की शरण लेकर पिता-पुत्र दोनों मुनि बने; सूर्यजय तप कर दसवें स्वर्ग गया और वहाँ से चयकर राजा अनरण्य का पुत्र दशरथ हुआ।
सर्वभूतहित मुनि ने कहा कि थोड़े से पुण्य से भी उपास्ति का जीव कुछ ही भवों में बड़ के बीज की तरह बढ़कर तुम राजा दशरथ हुआ है। नंदिवर्धन के भव में तुम्हारे पिता राजा नंदिघोष मुनि होकर ग्रैवेयक गए और वहाँ से चयकर मैं सर्वभूतहित हुआ हूँ; राजा भूति का जीव रत्नमाली स्वर्ग से आकर जनक हुआ और रत्नमाली को संबोधने वाला उपमन्यु पुरोहित का जीव जनक का भाई कनक हुआ, क्योंकि इस संसार में न कोई अपना है न पराया, जीव अपने शुभ-अशुभ कर्मों से ही जन्म-मरण करते हैं।
विरक्त होकर दशरथ गुरु के चरणों में नमस्कार कर नगर लौटे और विचार किया कि यह महामंडलेश्वर पद का राज्य महाबुद्धिमान, धर्मात्मा राम को दूँ, जो समुद्र पर्यंत पृथ्वी का पालन करने में समर्थ हैं और जिनके भाई आज्ञाकारी हैं। तभी शरद ऋतु बीतकर शीत ऋतु आई; ग्रंथ एक ओर फटे हाथ-पैर लिए कुटियों में ठिठुरते और लकड़ी के लिए वन-वन भटकते दरिद्रों का और दूसरी ओर महलों में उत्तम भोजन, वस्त्र, गीत-नृत्य और पतिव्रता रानियों का सुख भोगते पुण्यवानों का वर्णन करता है कि सब अपने-अपने कर्म का फल भोगते हैं, और मुनिराज के ऐसे ही वचन सुनकर राजा संसार से विरक्त हुए थे।
दशरथ ने द्वारपाल से मंत्री, पुरोहित, सेनापति और सामंतों को बुलवाया और कहा कि मैं संसार त्यागकर निश्चय ही संयम धारण करूँगा; यह सारा जगत सूखे तिनकों की तरह मृत्यु रूपी अग्नि में जल रहा है, मुनि के मुख से जिनशासन सुनकर मुझे जातिस्मरण हुआ है, इसलिए अब भव रूपी नदी पार करने को पुत्र का राज्याभिषेक कर तपोवन में प्रवेश करूँगा। यह सुन मंत्रियों के सिर झुक गए, आँखों में आँसू भर आए, और प्राणनाथ का निर्ग्रंथ व्रत का निश्चय सुनकर सारा रनिवास विलाप करने लगा।
पिता का वैराग्य सुनकर भरत ने भी दीक्षा लेने का निश्चय किया और सोचा कि यह शरीर व्याधियों का घर है और सब जीव अपने-अपने कर्मफल भोगते हैं। सब कलाओं में निपुण कैकेयी पति और पुत्र दोनों के मुनि बनने की बात से व्याकुल हुई; उसे वह वर याद आया जो राजा ने सब रानियों के सामने दिया था, और राजा के आधे सिंहासन पर बैठकर उसने पहले कठिन जिनदीक्षा न लेने की विनती की, फिर राजा के अडिग रहने पर नीचा मुख कर कहा, हे नाथ! मेरे पुत्र को राज्य दो।
दशरथ ने तुरंत स्वीकार किया और कहा कि तुमने मुझे ऋणरहित किया, फिर राम-लक्ष्मण को बुलाकर बताया कि कैकेयी ने महाघोर संग्राम में मेरा सारथी बनकर मुझे विजय दिलाई थी और तब दिया वर धरोहर रखा था, जिसे अब उसने माँग लिया है; राज्य न दूँ तो भरत संसार त्याग देगा, उसकी माता पुत्र-शोक से प्राण तज देगी और मेरे वचन झूठे होने की अपकीर्ति फैलेगी, पर बड़े पुत्र को छोड़ छोटे को राज्य देना मर्यादा के विरुद्ध है, और तब तुम दोनों कहाँ जाओगे? राम ने पिता के चरणों में दृष्टि रखकर कहा, हे तात! आप अपना वचन निभाइए, हमारी चिंता छोड़िए; सुपुत्र वही है जो माता-पिता को लेशमात्र भी शोक न होने दे, और आपकी अपकीर्ति के बदले इंद्र की संपदा भी मिले तो किस काम की।
उसी समय भरत मुनिव्रत धारण करने का निश्चय कर महल से उतरा तो लोगों में हाहाकार मच गया; दशरथ ने उसे गोद में बैठाकर छाती से लगाया और समझाया कि अभी तेरी युवावस्था है, तप वृद्धावस्था में करना, गृहस्थाश्रम में भी धर्म होता है, और सब मुनि भी उसी भव से मोक्ष नहीं जाते। भरत ने उत्तर दिया कि मृत्यु बालक, युवा, वृद्ध नहीं देखती, गृहस्थ साक्षात मोक्ष कभी नहीं जाते, परंपरा से ही जाते हैं, कामाग्नि में भोग रूपी ईंधन डालने से वह और भड़कती है, और यदि घर में ही कल्याण होता तो आप घर छोड़कर मुनि क्यों बनते।
हर्ष से रोमांचित दशरथ ने भरत को धन्य और भव्यों में मुख्य कहा, फिर भी समझाया कि तुमने कभी मेरी आज्ञा भंग नहीं की, अब यह निष्कंटक राज्य करो, जिससे मेरी प्रतिज्ञा भंग की अपकीर्ति न हो और तेरी माता तेरे शोक में प्राण न त्यागे। तब राम ने भरत का हाथ पकड़कर प्रेम से कहा कि अभी तुम्हारी आयु तप के योग्य नहीं, कुछ दिन राज्य कर इक्ष्वाकु वंश को वैसे ही शोभित करो जैसे चंद्रमा ग्रह-नक्षत्रों को, और मैं किसी पर्वत या वन में ऐसी जगह रहूँगा जहाँ कोई न जाने; फिर पिता के चरणों में नमस्कार कर वे वन के लिए निकल पड़े और पिता मूर्छित होकर काठ के खंभे के समान हो गए।
तरकश बाँधकर, धनुष हाथ में लेकर राम ने माता अपराजिता (कौशल्या) को नमस्कार किया; माता मूर्छित हुई और फिर साथ चलने की विनती करने लगी, क्योंकि पिता का मरण हो चुका, पति दीक्षा लेने को तत्पर हैं और अब पुत्र ही सहारा है। राम ने समझाया कि मार्ग में कंकड़-पत्थर बहुत हैं, मैं दक्षिण दिशा में विंध्याचल या मलयाचल के वन में अथवा समुद्र के पास स्थान बनाकर सवारी भेजूँगा और आपके चरणों की सौगंध, स्वयं आपको लेने आऊँगा, क्योंकि मैं सूर्य के समान यहाँ रहूँ तो चंद्रमा के समान भरत का प्रताप नहीं फैलेगा; फिर पिता को प्रणाम कर सुमित्रा, कैकेयी, सुप्रभा और कौशल्या, सब माताओं से विदा ली, भाई-बंधुओं के आँसू पोंछे और सामंतों द्वारा भेंट में लाए हाथी-घोड़े भी नहीं रखे।
सीता सास-ससुर को प्रणाम कर पति के साथ ऐसे चली जैसे शची इंद्र के साथ चलती है, और लक्ष्मण को पहले क्रोध आया कि पिता ने स्त्री के कहने से बड़े पुत्र राम को छोड़ भरत को राज्य देकर अन्याय किया है, मैं चाहूँ तो भरत को राज्यलक्ष्मी से रहित कर उसे श्रीराम के चरणों में ला सकता हूँ, पर उन्होंने सोचा कि क्रोध जीवों को अंधा करता है, पिता जिनदीक्षा लेने को तत्पर हैं, उचित-अनुचित पिता या बड़े भाई जानें, और मौन धारण कर धनुष-बाण ले साधु समान भाव वाले बड़े भाई के साथ चल पड़े। देवालय से निकलते देवों की तरह दोनों भाई राजमहल से निकले तो माता-पिता, भरत, शत्रुघ्न सहित सारा परिवार रो पड़ा और नगर में हाहाकार मच गया; स्त्रियों ने सीता को महापतिव्रता और लक्ष्मण की भक्ति, प्रेम और विनय को धन्य कहा, लोग कहने लगे कि जैसा कर्म का उदय है और भगवान ने ज्ञान में जो देखा है वही होगा, मना करने पर भी पुरजन साथ चलते रहे, और मानो राम का विदेश-गमन न देख सकने से सूर्य अस्त हो गया तथा जैसे सीता राम के पीछे चली वैसे संध्या सूर्य के पीछे चली।
भीड़ से छूटने के लिए राम ने श्री अरनाथ भगवान के चैत्यालय में रहने का विचार किया, जो तीन द्वारों, ऊँचे तोरणों और अष्ट मंगल द्रव्यों से सुशोभित था; दो द्वारों तक लोग साथ आए, पर तीसरे द्वार पर द्वारपाल ने उन्हें ऐसे रोका जैसे मोहनीय कर्म मिथ्यादृष्टि को शिवपुर जाने से रोकता है। धनुष-बाण और कवच बाहर रखकर राम-लक्ष्मण ने रत्नों के सिंहासन पर कायोत्सर्ग मुद्रा में विराजमान, वक्षस्थल पर श्रीवत्स चिह्न से शोभित अरनाथ भगवान के बिंब के भावसहित दर्शन किए और रात चैत्यालय के समीप बिताई, जहाँ कौशल्या आदि माताएँ आँसू बहाती आईं, पुत्रों को हृदय से लगाया और सीता पर वात्सल्य बरसाया।
गौतम स्वामी श्रेणिक से कहते हैं कि सब शुद्धियों में मन की शुद्धि सबसे प्रशंसनीय है, क्योंकि स्त्री पुत्र को भी हृदय से लगाती है और पति को भी, पर दोनों में भाव भिन्न होते हैं। फिर दशरथ की चारों रानियों ने राजा से विनती की कि कुल रूपी जहाज शोक-समुद्र में डूब रहा है, राम-लक्ष्मण को वापस बुलाइए; राजा ने कहा कि यह जगत मेरे अधीन नहीं, तुम पुत्रों की माताएँ हो, स्वयं जाकर उन्हें ले आओ और उनका राज्य-वैभव देखकर शांति पाओ, मैंने राज्य का अधिकार छोड़ दिया है, भव-भ्रमण से भयभीत हूँ और अब मुनिव्रत धारण कर अंतिम सुख प्राप्त करूँगा।