मुख्य सामग्री पर जाएँ

पर्व 77

विभीषण और रानियों का रावण के लिए विलाप

विभीषण और रावण की अठारह हजार रानियाँ उसके शरीर पर विलाप करती हैं, जब तक राम और भामंडल राजा अरिदमन की कथा सुनाकर उन्हें सांत्वना नहीं देते।

कथा खंड विजय और अयोध्या वापसी

सारांश

चक्र से मारे गए रावण को भूमि पर पड़ा देख विभीषण आत्मघात करने को उद्यत होता है और बार-बार मूर्च्छित होता है, तब राम उसे हृदय से लगाते हैं। मंदोदरी आदि लंका की रानियाँ रणभूमि में आकर अपने स्वामी के लिए विलाप करती हैं। राम, लक्ष्मण, भामंडल और सुग्रीव विभीषण को समझाते हैं, और भामंडल राजा अरिदमन की कथा सुनाते हैं, जो मरकर कीड़ा बना और उसी जीवन से चिपटा रहा, जिससे सिद्ध होता है कि हर जीव अपने कर्म का फल स्वयं भोगता है। विभीषण का शोक बादलों से निकले सूर्य की तरह दूर हो जाता है।

क्या हुआ

8 बिंदु

  1. बड़े भाई को पृथ्वी पर गिरा देख विभीषण महादुख से अपने मरण के लिए छुरी पर हाथ रखता है और मूर्च्छित हो जाता है। सचेत होने पर वह फिर मरने को तैयार होता है, तब श्रीराम रथ से उतरकर उसका हाथ पकड़ते हैं, हृदय से लगाते हैं और धैर्य तथा संतोष देते हैं।

  2. शस्त्र और कवच भूमि पर डालकर विभीषण रोता है कि उसने रावण को हित के वचन कहे थे, जो उसने नहीं माने। वह उसे विद्याधरों का महेश्वर और लंकेश्वर कहकर पूछता है कि उत्तम भोगों का भोक्ता पृथ्वी पर क्यों सोया है, और विनती करता है कि उठकर शोक-सागर में डूबते अपने छोटे भाई को शिक्षा दे।

  3. रणवास में समाचार पहुँचते ही मंदोदरी, रंभा, चन्द्रमंडला, महादेवी, रूपिणी, रुक्मिणी, शीला, रत्नमाला, मृगावती, श्रीमाला, मानवी, लक्ष्मी, अनंगसुंदरी, वसुंधरा, पद्मा, सुखादेवी, कांति, प्रीति, मनोवेगा, मनोवती आदि अठारह हजार रानियाँ अपने परिवार सहित गिरती-पड़ती रणभूमि में आती हैं। कोई मूर्च्छित होती है, कोई पति के अंगों से लिपटती है, कोई छाती पीटती है और कोई उनका हाथ और मुख गोद में लेकर व्याकुल हो जाती है।

  4. रानियाँ पुकारती हैं कि वे इन्द्र के समान भरतक्षेत्र के राजाओं के राजा थे, और पूछती हैं कि उनका क्या अपराध है जो वे बोलते नहीं। वे याद करती हैं कि स्वर्ग से आए इन्द्रजीत और मेघनाद ने उनके यहाँ स्वर्ग जैसे भोग भोगे और अब कुंभकर्ण सहित बंधन में हैं, और विनती करती हैं कि उठकर श्रीराम से प्रीति करें और पुत्र तथा भाई को छुड़ा लाएँ।

  5. राम, लक्ष्मण, भामंडल, सुग्रीव आदि राजा आँसू बहाते हुए विभीषण को हृदय से लगाते हैं। राम कहते हैं कि अधिक रोने से गया हुआ लौटता नहीं; तुम्हारा भाई बुद्धिमान, प्राणियों के हित में सावधान, राजकाज में दक्ष और सब शास्त्रों तथा शस्त्रों का ज्ञाता था, फिर भी महाबलवान मोह के कारण दुख और मरण को प्राप्त हुआ, क्योंकि विनाश के समय बुद्धि अज्ञानरूप हो जाती है।

  6. भामंडल कहते हैं कि रावण रण में वीर-मरण से परलोक गया और उसका कुछ नहीं गया, क्योंकि वीर-मरण करने वालों का नाम नहीं जाता। फिर वे अक्षयपुर के राजा अरिदमन की कथा सुनाते हैं, जो अचानक घर लौटा तो रानी को श्रृंगार सहित पाया। रानी ने बताया कि मनःपर्यय ज्ञान के धारी कीर्तिधर मुनि आहार को आए थे और उन्होंने राजा के अचानक आने की बात कही थी।

  7. ईर्ष्या से अरिदमन मुनि की परीक्षा लेने गया, तो मुनि ने उसके मन का प्रश्न और उसका उत्तर बता दिया कि वह सातवें दिन बिजली गिरने से मरेगा और विष्टा में कीड़ा बनेगा। राजा ने पुत्र प्रीतिकर से उस कीड़े को मार देने को कहा, पर समय आने पर कीड़ा मरने के डर से बार-बार मल में घुस जाता था। मुनि ने समझाया कि जीव जिस गति में जाता है वहीं रम जाता है और हर जीव अपने कर्म का फल स्वयं भोगता है, और संसार का स्वरूप जानकर प्रीतिकर मुनि बन गया।

  8. प्रीतिकर की कथा सुनकर विभीषणरूपी सूर्य शोकरूपी मेघों से बाहर निकल आता है। पर्व का उपदेश है कि दुख, शोक और आक्रंदन से असाता वेदनीय कर्म का बंध होता है, संसार में रहने तक जन्म-मरण, इष्टवियोग और अनिष्टसंयोग साथ लगे रहते हैं, और सुख-दुख में समता भाव रखना ही मानव जीवन का श्रृंगार है।