पर्व 78
इन्द्रजीत, मेघनाद और मंदोदरी की दीक्षा
राम सम्मान के साथ रावण का दाह संस्कार कर बंदी राजकुमारों को मुक्त करते हैं, और लंका में अनंतवीर्य मुनि को केवलज्ञान होने पर रावण का परिवार संसार त्याग देता है।
कथा खंड विजय और अयोध्या वापसीसारांश
यह कहकर कि शत्रुता मरण तक ही रहती है, राम पद्म सरोवर के किनारे रावण का दाह संस्कार कराते हैं और कुंभकर्ण, इन्द्रजीत, मेघनाद आदि बंदियों को छोड़ने की आज्ञा देते हैं, क्योंकि सच्चा क्षत्रिय बंधे या हारे हुए पर प्रहार नहीं करता। वैराग्य का संकल्प कर चुके बंदी राम द्वारा दिया राज्य अस्वीकार करते हैं। उसी रात कुसुमायुध वन में अनंतवीर्य मुनि को केवलज्ञान होता है, वे इन्द्रजीत और मेघनाद के पूर्वभव बताते हैं, और वे, कुंभकर्ण, मारीच तथा राजा मय मुनि बनते हैं, जबकि मंदोदरी, चन्द्रनखा और अड़तालीस हजार स्त्रियाँ आर्यिका बनती हैं।
क्या हुआ
10 बिंदु
राम भामंडल, सुग्रीव और हनुमान से कहते हैं कि महापुरुषों की शत्रुता शत्रु के मरण तक ही रहती है; रावण महापुरुष था और उसका उत्तम शरीर अग्नि संस्कार के योग्य है। विभीषण के साथ राम-लक्ष्मण विलाप करती अठारह हजार रानियों के पास जाते हैं, जो उन्हें देखकर चूड़ियाँ और आभूषण तोड़ देती हैं, और दयालु राम अनेक शुभ वचनों से उन्हें सांत्वना देते हैं।
पद्म सरोवर के किनारे कपूर, घी, मलयागिरि चंदन आदि सुगंधित द्रव्यों से प्रतिनारायण रावण का दाह संस्कार होता है। फिर राम कुंभकर्ण, इन्द्रजीत, मेघनाद आदि सब बंदी सामंतों को सेना सहित छोड़ने की आज्ञा देते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि ऐसे क्रोधी शत्रु बंधन में ही मरें, तो राम उत्तर देते हैं कि सोए हुए, बंधे हुए, डरे हुए, शरणागत, भागते हुए, भोजन करते हुए, बालक, वृद्ध और स्त्री को न मारना क्षत्रियों का प्रसिद्ध धर्म है।
कुंभकर्ण, इन्द्रजीत, मेघनाद, मारीच और राजा मय को कड़े बंधनों में लाया जाता है, और वानरवंशी योद्धा डरते हैं कि रावण की चिता देखकर वे क्रोध करेंगे। भामंडल उन्हें बंधे हुए ही लाने को कहते हैं, क्योंकि अभी विभीषण का भी पूरा विश्वास नहीं है। पर बंदी शांत मुद्रा से भूमि देखते हुए आते हैं और प्रतिज्ञा करते हैं कि आज बंधन छूटे तो दिगंबर भेष धारण कर पाणिपात्र में आहार करेंगे।
बंदी राम-लक्ष्मण के परम धैर्य, गंभीरता और विवेक की प्रशंसा करते हैं, जिनके सामने देवों से भी न जीता जाने वाला रावण मृत्यु को प्राप्त हुआ। राम कुंभकर्ण से कहते हैं कि पहले की तरह अपने वैभव और भोग भोगो, पर इन्द्रजीत आदि उत्तर देते हैं कि भोग विष के समान हैं, महामोह के कारण हैं और नरक-निगोद में ले जाते हैं। राम उनके बंधन खोलकर उनके साथ पद्म सरोवर में स्नान करते हैं, और वानरवंशी तथा राक्षसवंशी राजा अपने-अपने स्थान को जाते हैं।
पूरी लंका शोक में डूब जाती है, बाल-वृद्ध सब ऐसे रोते हैं मानो वर्षाऋतु आ गई हो। लोग रावण के गर्व, राम के गुण, लक्ष्मण की शक्ति और पुण्य की महिमा की चर्चा करते हैं; कोई मौन होकर भूमि पर पड़ा रहता है, कोई शस्त्र या आभूषण फेंक देता है और कोई दीक्षा के लिए तैयार होता है। सबके मुख पर यही बात है कि तीन खंड के अधिपति ने अल्प विषय-सुख के लिए जीवन नष्ट किया, इसलिए जितना मिले उसी में संतोष करना चाहिए।
संध्या समय अनंतवीर्य मुनि छप्पन हजार मुनियों के साथ लंका के कुसुमायुध वन में आते हैं और ताराओं के बीच चन्द्रमा की तरह शोभित होते हैं। यदि वे रावण के जीवित रहते आते तो रावण का मरण न होता और लक्ष्मण से उसकी प्रीति हो जाती, क्योंकि जहाँ केवली विराजते हैं वहाँ सौ योजन तक की पृथ्वी उपद्रव रहित हो जाती है। उसी रात एक शिला पर शुक्लध्यान में स्थित अनंतवीर्य को केवलज्ञान प्राप्त होता है।
धातकीखंड में तीर्थंकर के जन्म पर सुमेरु पर्वत पर अभिषेक का उत्सव मनाकर चारों प्रकार के देव उनकी पूजा करने आते हैं। राम-लक्ष्मण हाथी पर चढ़कर वानरवंशियों, राक्षसवंशियों, इन्द्रजीत, मेघनाद और कुंभकर्ण के साथ दर्शन को जाते हैं। दिव्यध्वनि में उपदेश होता है कि आठ कर्मों से बंधे जीव चारों गतियों में भटकते हैं, रत्नप्रभा से महातमप्रभा तक सात नरकों का वर्णन होता है, और व्रत, संयम तथा तप का मार्ग स्वर्ग से होते हुए मोक्ष तक ले जाता है।
पूर्वभव पूछने पर केवली इन्द्रजीत और मेघनाद को बताते हैं कि वे पहले कौशाम्बी के दो दरिद्र भाई प्रथम और पश्चिम थे, जो भवदत्त मुनि से उपदेश सुनकर क्षुल्लक बने। राजा इन्द्र द्वारा जिनभक्त नन्दि सेठ का आदर देखकर छोटे भाई ने उसका पुत्र बनने का निदान किया, और वह नन्दि की पत्नी इन्दुमुखी के गर्भ से रतिवर्धन के रूप में जन्मा, जिसका राजा जन्म से ही आदर करते थे।
बड़ा भाई देव होकर उसे संबोधने क्षुल्लक के भेष में आया, पर मान के मद में अंधे रतिवर्धन ने उसे द्वार पर ही रोक दिया। देव ने अपना रूप प्रकट कर उसका नगर उजाड़ दिया और पूरा वृत्तांत सुनाया, तब रतिवर्धन को सम्यक्त्व हुआ और वह नन्दि सेठ तथा अनेक राजाओं के साथ मुनि बना। फिर राजा नरेन्द्र और रानी विजया के पुत्र उर्व और उर्वस होकर और पुनः देव होकर वे दोनों इन्द्रजीत और मेघनाद हुए, और इन्दुमुखी अनेक जन्मों के बाद उनकी माता मंदोदरी बनी, इसीलिए उसका उन पर इतना स्नेह है।
यह सुनकर इन्द्रजीत और मेघनाद जिनेश्वरी दीक्षा लेते हैं, और कुंभकर्ण, मारीच, राजा मय तथा अनेक बड़े राजा भी मुनि बनकर मुनिसुव्रतनाथ के तीर्थ में अनेक ऋद्धियों के साथ विहार करते हैं। पति, पुत्र और पिता से रहित मंदोदरी मूर्च्छित होकर विलाप करती है, तब शशिकांता आर्यिका समझाती हैं कि अनंत भवों में उसके अनगिनत पिता, पुत्र और पति हुए हैं। मंदोदरी एक श्वेत साड़ी धारण कर आर्यिका बनती है, और उसी दिन रावण की बहन चन्द्रनखा तथा अड़तालीस हजार स्त्रियाँ भी आर्यिका बनती हैं।