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पर्व 79

राम और सीता का मिलन

राम-लक्ष्मण वैभव के साथ लंका में प्रवेश करते हैं, और पुष्पप्रकीर्णक पर्वत के उद्यान में राम का सीता से मिलन होता है, जबकि देव उसके शील की प्रशंसा करते हैं।

कथा खंड विजय और अयोध्या वापसी

सारांश

राम-लक्ष्मण विद्याधरों, राजाओं और देवों के साथ लंका में प्रवेश करते हैं, और नगर की स्त्रियाँ झरोखों से एक-एक वीर को पहचानकर दिखाती हैं। यह जानकर कि सीता पुष्पप्रकीर्णक पर्वत के उद्यान में हैं, राम वहाँ जाते हैं, और लंबे वियोग के बाद दोनों का मिलन होता है जबकि देव पुष्पवर्षा कर सीता के अटल शील की प्रशंसा करते हैं। सीता लक्ष्मण से मिलकर मुनि की भविष्यवाणी याद करती हैं कि वे वासुदेव होंगे, और भामंडल, सुग्रीव, हनुमान, विभीषण आदि उनके चरणों में भेंट रखते हैं।

क्या हुआ

8 बिंदु

  1. गौतम स्वामी श्रेणिक से कहते हैं कि राम-लक्ष्मण विमान, हाथी, घोड़े, रथ, विद्याधरों के समूह, बड़े राजाओं और हजारों देवों के साथ, देवों के समान तेजस्वी होकर लंका में प्रवेश करते हैं। लंका के लोग पूर्व पुण्य का फल प्रत्यक्ष देखकर प्रसन्न होते हैं, और स्त्रियाँ झरोखों, खिड़कियों और द्वारों से देखती हुई आपस में चर्चा करती हैं।

  2. स्त्रियाँ दशरथ के पुत्र राम को दिखाती हैं, जिनका मुख पूर्णिमा के चन्द्रमा सा और नेत्र कमल से हैं, और जनक की पुत्री सीता की प्रशंसा करती हैं, जिसने बड़े पुण्य से ऐसा पति पाया और जो राम के लिए वैसी ही है जैसे इन्द्र के लिए शची। वे चक्रधारी वासुदेव लक्ष्मण को सराहती हैं जिन्होंने रावण को मारा: नीलकमल से श्याम लक्ष्मण और स्वर्ण से गौर बलदेव राम ऐसे लगते हैं जैसे प्रयाग में गंगा-यमुना का संगम।

  3. वे राजा चन्द्रोदर के पुत्र विराधित का नाम लेती हैं, जिसने लक्ष्मण से मिलकर महाविभूति पाई; सीता के भाई भामंडल का, जिनका पालन विद्याधर राजा चन्द्रगति ने किया; सुग्रीव के पुत्र अंगद का, जिसने बहुरूपिणी विद्या सिद्ध करते रावण पर उपसर्ग किया था; और अंजना के दुलारे रूपवान हनुमान का, जो वानर चिह्न वाली ध्वजा के साथ हाथियों के रथ पर बैठे हैं और जिन्होंने लंका में बहुत उपद्रव किया था।

  4. राजमार्ग पर जगह-जगह पुष्प और स्वर्ण की मालाओं से सम्मानित होते हुए राम एक चँवर ढोरने वाली स्त्री से पूछते हैं कि वियोग से तप्त भामंडल की बहन कहाँ हैं। रत्नों की चूड़ियों से चमकते हाथ से इशारा कर वह पुष्पप्रकीर्णक पर्वत दिखाती है, जो झरनों से मानो हँस रहा है, जहाँ नंदनवन जैसे उद्यान में जनक की दुलारी अपने परिवार के साथ विराजमान हैं।

  5. सीता की प्रिय सखी उर्मिका कहती है कि उनके पति पुरुषोत्तम राम पधार रहे हैं, जो वियोग के दुख से दिग्गज की तरह भारी मन से आ रहे हैं। सीता पहले इसे स्वप्न समझती हैं। जैसे बादलों से चन्द्रमा निकले, वैसे विद्याधरों के बीच हाथी से उतरकर राम आते हैं, और धूल से सनी, बिखरे केशों वाली, लंबे दुख से मुरझाई सीता हर्ष से उठकर उनके सामने जाती हैं और नेत्रों की ज्योति से मानो उन्हें स्नान कराती हैं।

  6. लंबे वियोग से खिन्न राम प्रेम के आँसुओं के साथ प्राणप्रिया को भुजाओं में भर लेते हैं और मानो फिर बिछड़ने के डर से उन्हें हृदय से अलग नहीं कर पाते, जबकि सीता अपनी भुजाओं की माला उनके कंठ में डालती हैं, जैसे कल्पवृक्ष से कल्पलता लिपटी हो। देव आकाश से पुष्प और सुगंधित जल की वर्षा कर कहते हैं कि सतियों में श्रेष्ठ सीता ने स्वप्न में भी राम के सिवा किसी पुरुष की इच्छा नहीं की और न किसी को राग भरी दृष्टि से देखा।

  7. लक्ष्मण विनय से सीता के चरणों में प्रणाम करते हैं, और सीता रोते हुए उन्हें हृदय से लगाकर याद करती हैं कि महाज्ञानी मुनि ने कहा था कि वे वासुदेव होंगे; अब उन्हें अर्धचक्री का राज्य मिला, क्योंकि निर्ग्रंथ मुनि के वचन असत्य नहीं होते, और उनके बड़े भाई बलदेव ने उन्हें वियोग की अग्नि से निकाला है। फिर विद्याधरों के स्वामी, रण में पराक्रमी भाई भामंडल उनसे मिलते हैं।

  8. सुग्रीव, हनुमान, विभीषण, नल, नील, अंगद, अंग, विराधित, चन्द्र, सुषेण, जाम्बूनद आदि बड़े विद्याधर अपने नाम बताकर वंदना करते हैं और स्वर्णपात्रों में वस्त्र, आभूषण और रत्नों की मालाएँ उनके चरणों के पास भेंट रखते हैं, यह कहते हुए कि वे तीनों लोकों में प्रसिद्ध और देवों द्वारा स्तुति योग्य हैं। पर्व का फल बताया गया है कि इसे पढ़ने-सुनने वाले का अपने प्रिय से मिलन होता है, चाहे वह परदेश गया हो या उसका अपहरण हुआ हो।