पर्व 76
राम-लक्ष्मण के साथ रावण का महायुद्ध और रावण का वध
लक्ष्मण का अंतिम संधि-प्रस्ताव ठुकराने पर लक्ष्मण द्वारा चलाया गया चक्र रावण का वक्षस्थल चीर देता है और रावण मरकर भूमि पर गिर पड़ता है।
कथा खंड लंका का युद्धसारांश
राम के सहयोगी हर्षित होते हैं कि अनंतवीर्य केवली की भविष्यवाणी पूरी हुई: लक्ष्मण आठवें वासुदेव और राम आठवें बलदेव हैं। रावण राजलक्ष्मी की चंचलता पर कड़वाहट से विचार करता है, फिर भी जब लक्ष्मण सीता लौटाने पर उसे छोड़ देने का प्रस्ताव रखते हैं, तो उसका अभिमान अपमानजनक उत्तर देता है। लक्ष्मण चक्र चलाते हैं, जो रावण के बाणों, शस्त्रों और चंद्रहास खड्ग को भी विफल कर उसका वक्षस्थल चीर देता है; रावण स्वर्ग से गिरे देव की तरह भूमि पर गिरता है, उसकी सेना भयभीत होकर भागती है, और राम के सेनापति भागते सैनिकों को अभय देते हैं।
क्या हुआ
7 बिंदु
लक्ष्मण के हाथ में महासुंदर चक्ररत्न देखकर सुग्रीव, भामंडल, विराधित आदि विद्याधरों के अधिपति अति हर्षित होकर कहते हैं कि भगवान अनंतवीर्य केवली ने पहले ही कहा था कि लक्ष्मण आठवें वासुदेव और राम आठवें बलदेव हैं। महाज्योति के धारी लक्ष्मण अर्धचक्री हुए, और सिंहों से चलने वाले रथ के स्वामी बलदेव राम, जिन्होंने राजा मय को पकड़ा, हाथों में हल-मूसल महारत्नों से सुशोभित हैं; ये बलभद्र-नारायण दोनों भाई पुरुषोत्तम प्रकट हुए हैं।
लक्ष्मण के हाथ में सुदर्शन चक्र देख राक्षसों का अधिपति रावण सोचता है कि भगवान अनंतवीर्य केवली ने जो कहा था वही हुआ; जिसके छत्र को देख विद्याधर डरते थे और हिमाचल से विंध्याचल तक की पृथ्वी दासी समान आज्ञाकारिणी थी, उस रावण को भूमिगोचरियों ने रण में जीत लिया। यह राजलक्ष्मी कुलटा स्त्री समान है और इन्द्रियों के भोग नाशवान हैं; धन्य हैं भरत चक्रवर्ती आदि जिन्होंने छह खंड का राज्य कर फिर उसे विष मिले भोजन के समान जानकर छोड़ा और जिनव्रत धारण कर रत्नत्रय की आराधना से परमपद पाया, जबकि मुझ विषयाभिलाषी रंक को बलवान मोह ने जीत लिया, धिक्कार है मुझे।
महातेजस्वी लक्ष्मण विभीषण की ओर देखकर रावण से कहते हैं, ‘हे विद्याधर! अभी भी कुछ नहीं गया, जानकी को लाकर श्री रामदेव को सौंप दे और कह कि मैं राम के प्रसाद से जीवित हूँ; हमें तेरा कुछ नहीं चाहिए, तेरी राजलक्ष्मी तेरे ही पास रहे।’ रावण हँसकर कहता है, ‘हे रंक! तुझे व्यर्थ गर्व हुआ है, मैं पृथ्वीपति विद्याधर रावण और तू भूमिगोचरी रंक,’ और जब लक्ष्मण कहते हैं कि बहुत कहने से क्या, तुझे मारने वाला नारायण मैं उत्पन्न हुआ हूँ, तो रावण कहता है कि इच्छा मात्र से कोई नारायण नहीं होता।
रावण कहता है कि तू कुपुत्र है, तेरे पिता ने तुझे देश और नगर से निकाल दिया, तू महादुखी, दरिद्री, वन-वन भटकने वाला भिखारी है, मैंने तेरी वासुदेव पदवी जान ली; इस तुच्छ चक्र को पाकर तू खली का टुकड़ा पाकर उत्सव मनाने वाले रंक की तरह घमंडी हो रहा है, मैं तुझे इन पापी विद्याधरों, वाहन और चक्र सहित पाताल पहुँचाऊँगा। यह सुनकर लक्ष्मण क्रोध से चक्र घुमाकर रावण पर चलाते हैं, जो वज्रपात समान भयंकर शब्द करता, प्रलयकाल के सूर्य समान तेज धारण किए रावण पर आता है।
रावण बाणों, आयुधों और अनेक उपायों से, तथा शीघ्रगामी प्रचंड दंड से चक्र को रोकने का पुरुषार्थ करता है, पर उसका पुण्य क्षीण हो चुका है और चक्र नहीं रुकता; तब वह चंद्रहास खड्ग लेकर चक्र पर प्रहार करता है, जिससे अग्नि के कणों से आकाश प्रज्वलित हो उठता है, पर खड्ग का जोर नहीं चलता। सामने खड़े महाशूरवीर राक्षसेन्द्र रावण का वक्षस्थल चक्र चीर देता है, और पुण्य के क्षय से रावण अंजनगिरि समान भूमि पर गिरता है, मानो स्वर्ग से देव गिरा हो या रति का पति कामदेव पृथ्वी पर गिरा हो, मानो वीररस का ही स्वरूप हो, भौंहें चढ़ी और होंठ डसे हुए।
स्वामी को गिरा देख समुद्र समान सेना भाग खड़ी होती है, स्वामी के बिना ध्वजा-छत्र उड़ते फिरते हैं, सब राजलोक और सैनिक व्याकुल होकर रोते हुए कहते हैं, ‘रथ हटाओ, मार्ग दो, पीछे हाथी आ रहा है, विमान एक ओर करो, पृथ्वी का पति गिरा, महाभयंकर अनर्थ हुआ,’ और भय से काँपते हुए एक-दूसरे पर गिरते-पड़ते भागते हैं। सबको दुखी और शरणरहित देख राम की आज्ञा से भामंडल, सुग्रीव और हनुमान कहते हैं, ‘भय मत करो, धैर्य रखो,’ और अभय का संकेत करते हुए वस्त्र फेरते हैं, जिससे सेना को विश्वास होता है।
गौतम गणधर राजा श्रेणिक से कहते हैं कि रावण ऐसी महाविभूति भोगकर और समुद्र पर्यंत पृथ्वी का राज्य करके भी पुण्य क्षय होने पर अंतदशा को प्राप्त हुआ; धिक्कार है ऐसी लक्ष्मी को, यह राजलक्ष्मी महाचंचल और पाप की खान है। ऐसा जानकर बुद्धिमान तप सहित मुनिपद धारण करते हैं, क्योंकि पापकर्म का तीव्र उदय और आयु का क्षय होने पर राजलक्ष्मी चक्रवर्ती को भी मरण से नहीं बचा सकती।