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पर्व 18

पवनंजय का युद्ध से प्रत्यागमन और अंजना का अन्वेषण

युद्ध से विजयी लौटे पवनंजय अंजना को घर से निकाली गई पाकर उसके बिना प्राण त्यागने का निश्चय करते हैं, और अंत में अंजना तथा पुत्र हनुमान से मिलते हैं।

कथा खंड अंजना और हनुमान का जन्म

सारांश

रावण के लिए वरुण को बाँधकर और खरदूषण को छुड़ाकर पवनंजय अंजना के स्नेह से शीघ्र घर लौटते हैं, पर उसे न आदित्यपुर में पाते हैं, न उसके पिता के नगर महेन्द्रनगर में। शोक से व्याकुल वे अंबरगोचर हाथी पर पृथ्वी पर भटकते हैं और भूतरव वन में मरने का निश्चय कर लेते हैं, उधर पछताती माता केतुमती विलाप करती है और राजा प्रह्लाद दोनों श्रेणियों के विद्याधरों को लेकर उन्हें खोजते हैं। प्रतिसूर्य उन्हें मौन धारण कर मरण का निश्चय किए बैठे पाते हैं, गुफा में हनुमान के जन्म और पर्वत पर गिरने के चमत्कार का वृत्तांत सुनाते हैं और उन्हें हनुरुह द्वीप ले जाते हैं, जहाँ परिवार का आनंदमय मिलन होता है।

क्या हुआ

8 बिंदु

  1. गौतम स्वामी राजा श्रेणिक से कहते हैं कि हनुमान के जन्म का वृत्तांत कहा, अब उनके पिता पवनंजय का वृत्तांत सुनो: पवनंजय पवन के समान शीघ्र रावण के पास पहुँचे और उसकी आज्ञा से बहुत समय तक अनेक शस्त्रों से वरुण से युद्ध कर उसे बाँध लिया, तथा वरुण द्वारा पकड़े गए खरदूषण को छुड़ाया। वे वरुण को रावण के पास लाए, वरुण ने रावण की आज्ञा स्वीकार की, और पवनंजय से अति प्रसन्न रावण से विदा लेकर वे अंजना के स्नेह से शीघ्र घर लौटे।

  2. राजा प्रह्लाद ने ध्वजा, तोरण और मालाओं से आदित्यपुर सजाया और सारा नगर विजयी कुमार की प्रशंसा करते हुए अगवानी को आया, पर माता-पिता को प्रणाम कर पवनंजय मित्र प्रहस्त के साथ अंजना के महल पहुँचे तो वह उसके बिना जीव रहित शरीर की तरह सूना लगा; प्रहस्त ने भीतर के लोगों से पूछकर सारा वृत्तांत कहा, तो गहरी ठेस खाए पवनंजय माता-पिता से पूछे बिना ही मित्र सहित राजा महेन्द्र के नगर चल दिए। महेन्द्र ने भी नगर सजवाया और अर्घ्य लेकर जमाई की अगवानी की; पवनंजय एक मुहूर्त ससुर के पास बैठे, सास से मिले और प्रिया के महल पहुँचे, जहाँ एक बालिका ने कहा, ‘हे देव, आपकी प्रिया यहाँ नहीं है,’ और यह सुनते ही उनका हृदय मानो वज्र से चूर हो गया।

  3. पवनंजय ने प्रहस्त को आदित्यपुर भेजकर पिता को सारा वृत्तांत कहलाया कि प्रिया न मिली तो मैं जीवित नहीं रहूँगा, और स्वयं अंबरगोचर हाथी पर चढ़कर पृथ्वी पर अंजना को खोजने लगे; वे सोचते कि गर्भवती, कोमल अंजना कहीं प्यास से मर न गई हो, कुएँ में न गिर गई हो, हिंसक पशुओं का ग्रास न बन गई हो, गंगा में न बह गई हो, या जिनधर्म की ज्ञाता होने से विरक्त होकर आर्यिका न बन गई हो। विवेक खोकर वे वृक्षों, पर्वतों और कंकड़ों से अंजना का पता पूछते हुए भूतरव वन में आए, जहाँ हथियार और कवच उतारकर हाथी से कहा कि अब नदी तट के सल्लकी वन में हथिनियों के साथ स्वच्छंद विचरो, और प्रिया न मिली तो यहीं प्राण त्यागने का निश्चय किया; पर कृतज्ञ हाथी पास ही खड़ा रहा, और जैसे मुनि आत्मा का ध्यान करते हैं वैसे प्रिया का ध्यान करते हुए उन्होंने चार पहर की रात चार वर्ष के समान बिताई।

  4. प्रहस्त से समाचार सुनकर राजा प्रह्लाद परम शोक में डूब गए और माता केतुमती रोती हुई बोली कि तू मेरे पुत्र को अकेला छोड़ आया, यह अच्छा नहीं किया; प्रहस्त ने कहा कि जहाँ अंजना होगी वहीं पवनंजय होंगे, अंजना कहाँ है यह मैं नहीं जानता, बिना विचारे काम करने वालों को अवश्य पछताना पड़ता है, और आपके पुत्र ने नियम लिया है कि प्रिया को न देखा तो प्राण त्याग देंगे। केतुमती छाती और सिर पीटकर विलाप करने लगी कि हाय, मुझ क्रूर पापिनी ने महासती को कलंक लगाया जिससे मेरे पुत्र का जीवन भी संशय में पड़ गया, जिसने रावण से भी असाध्य वरुण को क्षण भर में बाँध लिया था; उसके बिना यह नगर, कुल, विजयार्ध पर्वत और रावण का कटक शोभा नहीं देते, और सारा परिवार उसके साथ रो पड़ा।

  5. प्रह्लाद पूरे परिवार और प्रहस्त के साथ पुत्र को खोजने निकले और दोनों श्रेणियों के सब विद्याधरों को प्रेम से बुलाया, जो आकाश मार्ग से पृथ्वी, वनों, लताओं और पर्वतों में खोजने लगे; प्रह्लाद का दूत राजा प्रतिसूर्य के पास भी पहुँचा, और यह सुनकर अंजना पहले से भी अधिक दुखी होकर विलाप करने लगी कि हे नाथ, क्या अब भी मुझ पर से क्रोध नहीं छोड़ा, इतने दिन मेरे प्राण आपके दर्शन की आशा में ही टिके थे। वसंतमाला ने कहा कि ऐसे अशुभ वचन मत कहो, पति से तुम्हारा मिलन अवश्य होगा, और मामा प्रतिसूर्य ने भी आश्वासन दिया कि हम तुम्हारे पति को अवश्य लाएँगे, फिर वे मन से भी तेज चलने वाले विमान में बैठकर खोज को निकल पड़े।

  6. दोनों श्रेणियों के विद्याधर और लंका के लोग खोजते-खोजते भूतरव अटवी में पहुँचे और अंजनगिरि जैसे अंबरगोचर हाथी को देखकर प्रसन्न हुए कि यहीं पवनंजय होंगे, पर बिना अंकुश का हाथी स्वामी की रक्षा में सूँड़ में तलवार लिए भयंकर गर्जना करता जिस दिशा में दौड़ता, विद्याधर उधर से भाग जाते, अंत में उन्होंने हथिनियों के समूह से उसे वश में किया। पवनंजय काठ के पुतले की तरह मौन बैठे थे और ध्यानस्थ मुनि की तरह किसी से नहीं बोलते थे; रोते हुए माता-पिता ने उनका मस्तक चूमकर छाती से लगाया, फिर भी वे एक शब्द न बोले, क्योंकि मौनव्रत सहित मरण का निश्चय कर बैठे थे।

  7. तब अंजना के मामा राजा प्रतिसूर्य ने उन्हें छाती से लगाकर सारा वृत्तांत सुनाया कि महारमणीक संध्याभ्र पर्वत पर अनंगवीचि मुनिराज को केवलज्ञान हुआ था, उनकी वंदना कर लौटते हुए एक पर्वत की गुफा से वीणा जैसी स्त्री के रोने की ध्वनि सुनकर मैं वहाँ गया और राजकुमारी अंजना को देखा; उसी गुफा में उसके पुत्र का जन्म हुआ, जिसके शरीर की ज्योति से गुफा मानो स्वर्णमयी हो गई। हनुरुह द्वीप ले जाते समय बालक माता की गोद से उछलकर पर्वत पर गिरा, यह सुनते ही पवनंजय ‘हाय-हाय’ कर उठे, तब प्रतिसूर्य ने बताया कि पर्वत के टुकड़े-टुकड़े हो गए थे और बालक एक शिला पर सुख से सोया था, उसकी ज्योति से दसों दिशाएँ प्रकाशित थीं; उसका नाम श्रीशैल रखा गया, और हनुरुह द्वीप में जन्मोत्सव मनाने से उसका दूसरा नाम हनुमान हुआ।

  8. अत्यंत हर्षित पवनंजय तुरंत अंजना को देखने सब विद्याधरों सहित हनुरुह द्वीप गए, जहाँ प्रतिसूर्य ने दो महीने तक सबको बड़े आदर से रखा, फिर सब अपने-अपने स्थान गए; बहुत दिनों बाद पत्नी का संयोग पाकर पवनंजय वहीं पुत्र की बाल-क्रीड़ाओं से आनंदित होकर देवों के समान रहे, और पूर्वभव में स्वर्ग के सुख भोग चुके हनुमान नवयौवन को प्राप्त हुए। गौतम स्वामी कहते हैं कि हनुमान के जन्म और पवनंजय-अंजना के मिलन की अनेक रसों से भरी यह कथा जो भाव से पढ़ता, पढ़ाता, सुनता या सुनाता है, उसकी अशुभ कर्म में प्रवृत्ति नहीं होती, और वह परभव में शुभ गति, दीर्घायु, निरोग सुंदर शरीर, महापराक्रम, चंद्रमा जैसी निर्मल कीर्ति और स्वर्ग-मोक्ष के सुख पाता है।