पर्व 19
हनुमान का युद्ध में जाकर विजय प्राप्त कर अनेक कन्याओं से विवाह करना
युवा हनुमान वरुण के सौ पुत्रों को बाँधकर रावण को वरुण पर विजय दिलाते हैं, फिर राज्य पाते हैं और हजार राजकन्याओं से विवाह करते हैं।
कथा खंड अंजना और हनुमान का जन्मसारांश
वरुण के फिर आज्ञा न मानने पर रावण सब राजाओं को बुलाता है, और हनुमान पिता पवनंजय और प्रतिसूर्य के स्थान पर स्वयं युद्ध में जाने का आग्रह करते हैं। वरुण के नगर के युद्ध में वे वरुण के सौ पुत्रों को बाँध लेते हैं, जिससे रावण वरुण को पकड़ लेता है; रावण वरुण को क्षमा कर उसकी पुत्री सत्यवती से विवाह करता है और हनुमान को अपनी भानजी अनंगकुसुमा तथा कर्णकुंडलपुर का राज्य देता है। हनुमान एक हजार राजकन्याओं से और फिर सुग्रीव की पुत्री पद्मरागा से विवाह करते हैं, और सुदर्शन चक्र का स्वामी रावण अर्धचक्री पद पर अभिषिक्त होकर आठवें प्रतिवासुदेव के रूप में लंका में राज्य करता है।
क्या हुआ
9 बिंदु
वरुण ने फिर आज्ञा नहीं मानी तो रावण क्रोध से पुनः युद्ध को चला और किष्किंधपुर, अलकापुर, रथनूपुर और चक्रवालपुर के स्वामियों, वैताढ्य (विजयार्ध) की दोनों श्रेणियों के विद्याधरों और भूमिगोचरियों को आज्ञापत्र भेजकर बुलाया; हनुरुह द्वीप में प्रतिसूर्य और पवनंजय के नाम आज्ञापत्र आया तो दोनों जाने को तैयार हुए और उनके पीछे द्वीप की रक्षा के लिए हनुमान के राज्याभिषेक के बाजे बजने लगे। हनुमान ने विनय से कहा कि मेरे रहते आप गुरुजनों का जाना उचित नहीं, और यह सुनकर कि तुम अभी बालक हो, तुमने रण नहीं देखा, उत्तर दिया कि जैसे अनादि से चारों गतियों में भ्रमण करता जीव अज्ञान रहते पंचम गति (मोक्ष) नहीं पाता, फिर भी भव्य जीव उसे अवश्य पाता है, वैसे ही मैंने अब तक युद्ध नहीं किया पर वरुण को अवश्य जीतूँगा।
परिवार के बहुत रोकने पर भी वे न माने, तब स्नान कर मंगल द्रव्यों से भगवान की पूजा की, अरहंत, सिद्ध आदि परमेष्ठियों को नमस्कार कर माता, पिता और मामा की आज्ञा ली और शस्त्रधारी सामंतों के साथ विमान में लंका की ओर चले; जलवीचि पर्वत पर सूर्यास्त होने पर समुद्र की शीतल लहरों की हवा में रात बिताई, और रावण के कटक में पहुँचे तो बड़े-बड़े राक्षस विद्याधर आश्चर्य से कहने लगे कि यही महाबली श्रीशैल हनुमान है जिसने बचपन में पर्वत चूर कर दिया था। रावण ने सिंहासन से उठकर उन्हें हृदय से लगाया और पास बिठाया, दोनों पुण्यशाली ऐसे मिले मानो सौधर्म और ईशान के इन्द्र हों, और रावण ने कहा कि पवनकुमार ने ऐसा गुणसागर पुत्र भेजकर हमसे बड़ा स्नेह बढ़ाया है, इसे पाकर मेरे सब मनोरथ सिद्ध होंगे; अपनी प्रशंसा सुनकर हनुमान महापुरुषों की रीति के अनुसार नीचे देखते रहे।
प्रातःकाल रावण सेना लेकर युद्ध को चला और हनुमान विद्या के बल से समुद्र को भेदकर वरुण के नगर पहुँचे, मानो सुभौम चक्रवर्ती परशुराम पर चढ़ा हो। पाताल के पुंडरीकपुर के योद्धाओं में कोलाहल मच गया, चमरेन्द्र समान शूरवीर वरुण और उसके सौ अभिमानी पुत्र युद्ध को निकले और रावण के कटक को ऐसा व्याकुल किया कि राक्षसों के हाथों से चक्र, वज्र, धनुष, सेल और बरछी गिर पड़े, और सौ पुत्रों से अकेले लड़ते रावण का शरीर बाणों से छिन्न-भिन्न होने लगा।
रावण को बाणों से बिंधा और लहूलुहान देखकर हनुमान रथ में चढ़कर वरुण के पुत्रों से लड़ने आए, किसी को विद्यामय लांगूलपाश से बाँधा और किसी को मुद्गरों के प्रहार से घायल किया, जिससे वरुण का कटक ऐसे हारा जैसे जिनमार्ग के अनेकांत नय से मिथ्यादृष्टि हारते हैं। वरुण क्रोधित होकर हनुमान पर झपटा तो रावण ने उसे ऐसे रोका जैसे पर्वत नदी के प्रवाह को रोकता है; उसी समय हनुमान ने सौ पुत्रों को बाँध लिया, यह सुनकर वरुण शोक से विह्वल हो विद्या भूल गया और रावण ने उसे पकड़कर कुंभकर्ण को सौंप दिया, तब वरुण की सेना भागकर पुंडरीकपुर में घुस गई।
कुंभकर्ण ने क्रोध से वरुण का नगर लूटना चाहा तो रावण ने रोका कि यह राजाओं का धर्म नहीं, अपराध वरुण का था, प्रजा का नहीं, और निर्बल को दुख देना महा अन्याय तथा दुर्गति का कारण है; फिर उसने वरुण को बुलाकर कहा कि योद्धाओं की दो ही रीति हैं, पकड़े जाएँ या मारे जाएँ, रण से भागना कायरों का काम है, इसलिए हम परस्पर क्षमा करें और तुम मित्र-परिवार सहित सुख से अपना राज्य करो। वरुण ने हाथ जोड़कर कहा कि आपने देवाधिष्ठित रत्नों के बिना सामान्य शस्त्रों से मुझे जीता, यह पृथ्वी किसी की कुल-परंपरा से नहीं आती, शूरवीर ही इसके भोक्ता हैं, और अपनी पुत्री सत्यवती का विवाह रावण से कर दिया, फिर पुत्री के वियोग से चिंतित मन से अपनी राजधानी लौटा।
रावण ने हनुमान का अति सम्मान कर अपनी बहन चन्द्रनखा की पुत्री अनंगकुसुमा का विवाह उनसे कराया और महासंपदा युक्त कर्णकुंडलपुर का राज्य देकर उनका अभिषेक कराया, जहाँ हनुमान स्वर्ग में इन्द्र की तरह सुख से रहने लगे। किष्कुपुर के राजा नल की, रूप में लक्ष्मी को जीतने वाली पुत्री हरिमालिनी और किन्नरगीत नगर के किन्नर जाति के विद्याधरों की सौ पुत्रियों से भी उनका विवाह हुआ, इस प्रकार अनेक राजाओं की एक हजार राजकुमारियों से उन्होंने विवाह किया; पर्वत की गुफा में जन्म लेने और पर्वत पर गिरने से उनका श्रीशैल नाम पृथ्वी पर प्रसिद्ध हुआ, और जिस पर्वत पर गिरने से वह चूर-चूर हुआ था उसे देखने जाकर वे अति प्रसन्न हुए, वह पर्वत भी पृथ्वी पर प्रसिद्ध हुआ।
किष्किंधपुर में राजा सुग्रीव और रानी सुतारा अपनी गुणवती पुत्री पद्मरागा के योग्य वर की चिंता में रातों को सो नहीं पाते थे; रावण के पुत्र इन्द्रजीत आदि अनेक राजकुमारों के चित्र देखकर उसने दृष्टि फेर ली, पर हनुमान का चित्र देखते ही वह कामदेव के शोषण, संतापन, उच्चाटन, मोहन और वशीकरण, इन पाँचों बाणों से बिंध गई, और सखियों के गुणगान करने पर लज्जा से मुख नीचा कर हाथ का क्रीड़ा-कमल चित्र पर मार दिया। सुग्रीव ने पुत्री का चित्र हनुमान को दिखाया तो पवनपुत्र के लिए कामदेव के पाँच बाण सौ हो गए; उन्होंने सोचा कि खरदूषण की पुत्री, रावण की भानजी सहित मेरी हजार रानियाँ हैं, फिर भी पद्मरागा से विवाह न हो तो विवाह हुआ ही नहीं, और क्षण भर में किष्किंधपुर पहुँचकर बड़ी विभूति से उससे विवाह किया; पुत्री के वियोग से सुग्रीव और सुतारा कुछ दिन शोकमग्न रहे, और ऐसे प्रसिद्ध पुत्र को देखकर पवनंजय और अंजना महासुखी हुए।
तीन खंड का स्वामी, हनुमान जैसे सुभटों से सेवित रावण लंका में अठारह हजार पतिव्रता, आज्ञाकारिणी रानियों के साथ सुख से रहा; सब विद्याधर और भूमिगोचरी राजाओं ने अर्धचक्री पद पर उसका अभिषेक कर उसे अपना स्वामी माना, और उसकी आयुधशाला में सब कार्य सिद्ध करने वाला, आज्ञा न मानने वाले उद्धत राजाओं का विध्वंसक, देवाधिष्ठित सुदर्शन चक्र तथा बिजली के समूह जैसा तेजस्वी दंडरत्न प्रकाशित थे। वह आठवाँ प्रतिवासुदेव था, पुण्य से कुल-परंपरा से प्राप्त लंका में संसार के अद्भुत सुख भोगता था, और श्री मुनिसुव्रतनाथ के मोक्ष जाने के बाद तथा नमिनाथ से पहले हुआ।
गौतम स्वामी ने कहा कि मुनिसुव्रतनाथ का समय बीते बहुत वर्ष हो गए, इसलिए तत्त्वज्ञान रहित अज्ञानी लोगों ने रावण का वर्णन अन्यथा किया और उसे मांसभक्षी बताया, पर वह मांसाहारी नहीं, अन्न का आहार करने वाला था; उसने केवल सीता-हरण का अपराध किया, इसी से मारा गया और परलोक में कष्ट पाया। उन्होंने श्रेणिक से कहा कि इन्द्र-चक्रवर्ती आदि से वंदनीय जिनेन्द्र-कथित शास्त्र को धारण करो, जिससे मिथ्यात्व रूपी कीचड़ धुलता है; रावण के चक्ररत्न और राज्याभिषेक के वर्णन वाले इस पर्व के साथ विद्याधर वंशों के वर्णन का प्रथम कांड समाप्त होता है।