पर्व 20
त्रेसठ शलाका पुरुषों के पूर्वभव आदि का वर्णन
गौतम स्वामी इस युग के त्रेसठ शलाका पुरुषों का वर्णन करते हैं, जिनमें राम आठवें बलभद्र, लक्ष्मण आठवें नारायण और रावण आठवें प्रतिनारायण हैं।
कथा खंड रघुकुल: जन्म और विवाहसारांश
विद्याधरों का वृत्तांत सुनकर राजा श्रेणिक तीर्थंकरों के चरित्र और आठवें बलभद्र राम के वंश के विषय में पूछते हैं, और गौतम गणधर इस अवसर्पिणी के शलाका पुरुषों का विस्तृत वर्णन करते हैं: चौबीस तीर्थंकरों के पूर्वभव, स्वर्ग, माता-पिता, जन्मनगरी और मोक्षस्थान, काल का परिमाण और तीर्थंकरों के बीच का अंतराल, तथा उनकी ऊँचाई और आयु। फिर वे बारह चक्रवर्तियों के पूर्वभव और गति, तथा नौ नारायणों (वासुदेवों), नौ बलभद्रों और नौ प्रतिनारायणों का वर्णन करते हुए बताते हैं कि आठवें बलभद्र राम, नारायण लक्ष्मण और प्रतिनारायण रावण मुनिसुव्रतनाथ के मोक्ष के बाद और नमिनाथ से पहले हुए। अंत में वे उपदेश देते हैं कि ये सब पद धर्म के फल हैं और त्रेसठों शलाका पुरुष कालक्रम में मोक्ष पाएँगे।
क्या हुआ
16 बिंदु
आठवें प्रतिनारायण रावण की उत्पत्ति का सम्पूर्ण वृत्तांत और राक्षसवंशी तथा वानरवंशी विद्याधरों के कुलों का भेद सुनकर राजा श्रेणिक ने गौतम गणधर को नमस्कार कर तीर्थंकरों के पूर्वभव सहित चरित्र और उनके माता-पिता के नाम सुनने की इच्छा प्रकट की, और पूछा कि पृथ्वी पर प्रसिद्ध आठवें बलभद्र श्री रामचन्द्र किस वंश में उत्पन्न हुए। हर्षित होकर गौतम स्वामी ने पहले चौबीस तीर्थंकरों के नाम कहे: ऋषभ, अजित, संभव, अभिनंदन, सुमति, पद्मप्रभ, सुपार्श्व, चन्द्रप्रभ, पुष्पदंत (सुविधिनाथ), शीतल, श्रेयांस, वासुपूज्य, विमल, अनंत, धर्म, शांति, कुंथु, अर, मल्लि, मुनिसुव्रत, नमि, नेमि, पार्श्व और महावीर, जिनका शासन अभी चल रहा है।
फिर उन्होंने अंतिम देवभव से पहले के मनुष्यभव की राजधानियाँ बताईं (ऋषभदेव से वासुपूज्य तक तीन-तीन तीर्थंकरों की क्रम से पुंडरीकिणी, सुसीमा, क्षेमा और रत्नसंचयपुर, फिर महानगर, अरिष्टपुर, सुभद्रिका, पुंडरीकिणी, सुसीमा, क्षेमा, वीतशोका, चंपा, कौशांबी, हस्तिनापुर, साकेता और छत्राकार), उस भव के नाम (ऋषभदेव के वज्रनाभि से महावीर के सुनंद तक), उस भव के पिताओं के नाम (वज्रसेन से प्रोष्ठिल तक), और वे स्वर्ग जहाँ से वे अवतरे (ऋषभदेव के सर्वार्थसिद्धि से महावीर के पुष्पोत्तर तक)। बीसवें तीर्थंकर मुनिसुव्रतनाथ उस पूर्वभव में चंपा नगरी में संवर के पुत्र श्रीधर्मा थे और अपराजित विमान से अवतरे।
फिर गौतम स्वामी ने हर तीर्थंकर की जन्मनगरी, पिता, माता, जन्मनक्षत्र, वैराग्य का वृक्ष और मोक्षस्थान बताते हुए श्रेणिक को आशीर्वाद दिए: ऋषभदेव अयोध्या में नाभिराजा और मरुदेवी से उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में जन्मे, वटवृक्ष के नीचे विरक्त हुए और कैलाश पर्वत से मोक्ष गए, और अजितनाथ अयोध्या में जितशत्रु और विजया के पुत्र थे। मुनिसुव्रतनाथ कुशाग्रनगर में राजा सुमित्र और रानी पद्मावती से श्रवण नक्षत्र में जन्मे, चंपक वृक्ष के नीचे विरक्त हुए और सम्मेदशिखर से मोक्ष गए, तथा महावीर कुंडलपुर में सिद्धार्थ और प्रियकारिणी से जन्मे और पावापुर से मोक्ष गए।
ऋषभदेव का निर्वाणक्षेत्र कैलाश पर्वत, वासुपूज्य का चंपापुर, नेमिनाथ का गिरनार और महावीर का पावापुर है, शेष सबका सम्मेदशिखर; शांति, कुंथु और अर तीर्थंकर होने के साथ चक्रवर्ती और कामदेव भी हुए, वासुपूज्य, मल्लिनाथ, नेमिनाथ, पार्श्वनाथ और महावीर कुमार अवस्था में ही विरक्त हुए, राज्य नहीं किया और बाल ब्रह्मचारी रहे, तथा शेष तीर्थंकर महामंडलीक राजा होकर फिर विरक्त हुए। चन्द्रप्रभ और पुष्पदंत श्वेत वर्ण के, सुपार्श्व और पार्श्व हरित वर्ण के, पद्मप्रभ कमल जैसे लाल, वासुपूज्य टेसू के फूल जैसे लाल, मुनिसुव्रतनाथ अंजनगिरि जैसे श्याम, नेमिनाथ मोर के कंठ जैसे नील और शेष सोलह तीर्थंकर तपे सोने के वर्ण के थे; सबका जन्माभिषेक सुमेरु पर्वत की पांडुशिला पर हुआ और सबके पंचकल्याणक हुए।
छहों कालों का प्रमाण और यह पूछने पर कि श्री रामचन्द्र किस तीर्थंकर के अंतराल में हुए, गौतम स्वामी ने बताया कि छह द्रव्यों में कालद्रव्य अनादि-अनंत है और पल्य-सागर से गिना जाता है: एक महायोजन लंबे, चौड़े, गहरे गोल गड्ढे को उत्कृष्ट भोगभूमि के तत्काल जन्मे भेड़ के बच्चे के बालों के अविभाज्य अग्रभागों से भरकर सौ-सौ वर्ष में एक-एक बाल निकालने पर जब वह खाली हो, वह व्यवहार पल्य है, उससे असंख्यात गुणा उद्धार पल्य और उससे असंख्यात गुणा अद्धा पल्य; दस कोड़ाकोड़ी पल्य का एक सागर, दस कोड़ाकोड़ी सागर का एक अवसर्पिणी काल और उतना ही उत्सर्पिणी काल, और दोनों मिलकर बीस कोड़ाकोड़ी सागर का एक कल्पकाल होता है, जैसे एक महीने में शुक्ल और कृष्ण पक्ष। अवसर्पिणी के छह काल हैं: सुखमा-सुखमा चार कोड़ाकोड़ी सागर, सुखमा तीन, सुखमा-दुखमा दो, दुखमा-सुखमा बयालीस हजार वर्ष कम एक कोड़ाकोड़ी सागर, और दुखमा तथा दुखमा-दुखमा इक्कीस-इक्कीस हजार वर्ष; इनमें आयु, बल, शरीर और ज्ञान क्रमशः घटते हैं और उत्सर्पिणी में उलटे क्रम से बढ़ते हैं।
तीसरे काल में पल्य का आठवाँ भाग शेष रहने पर चौदह कुलकर हुए, जिनमें चौदहवें नाभिराजा के पुत्र आदि तीर्थंकर ऋषभदेव हुए; उनके मोक्ष के पचास लाख करोड़ सागर बाद अजितनाथ हुए, और इसी प्रकार क्रम से मल्लिनाथ के चौवन लाख वर्ष बाद मुनिसुव्रतनाथ, उनके छह लाख वर्ष बाद नमिनाथ, फिर पाँच लाख वर्ष बाद नेमिनाथ, पौने चौरासी हजार वर्ष बाद पार्श्वनाथ और ढाई सौ वर्ष बाद वर्धमान हुए। तीसरे काल के तीन वर्ष साढ़े आठ महीने शेष थे तब ऋषभदेव मोक्ष गए, और चौथे काल के इतने ही शेष रहने पर वर्धमान स्वामी मोक्ष जाएँगे, जिसके बाद पंचम काल आरंभ होगा।
गौतम स्वामी ने बताया कि पंचम काल में देवों का आगमन नहीं होगा, ऋद्धिधारी मुनि नहीं होंगे, केवलज्ञान की उत्पत्ति नहीं होगी, चक्रवर्ती, बलभद्र और नारायण नहीं होंगे और तुम्हारे समान न्यायवान राजा नहीं होगा; अनीतिकारी राजा, दूसरों का धन हरने वाली दुष्ट प्रजा, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, टिड्डी, तोते, चूहे और अपनी-पराई सेना के उपद्रवों का भय सदा रहेगा, और हिंसा रूपी कुशास्त्र जीव रूपी वृक्ष को कुल्हाड़ी की तरह काटेंगे। पंचम काल के आरंभ में मनुष्यों का शरीर सात हाथ ऊँचा और उत्कृष्ट आयु एक सौ बीस वर्ष होगी, अंत में दो हाथ और बीस वर्ष, और छठे काल के अंत में एक हाथ और सोलह वर्ष, जब मनुष्य कुरूप, मांसाहारी, महादुखी और तिर्यंचों जैसे अज्ञानी होंगे, न कोई संबंध, न राजा, न प्रजा, न धन, न घर रहेगा।
तीर्थंकरों के शरीर की ऊँचाई ऋषभदेव के पाँच सौ धनुष से साढ़े चार सौ, चार सौ आदि क्रम से घटती हुई मुनिसुव्रतनाथ की बीस धनुष, नमिनाथ की पंद्रह और नेमिनाथ की दस धनुष, फिर पार्श्वनाथ की नौ हाथ और महावीर की सात हाथ थी; आयु ऋषभदेव की चौरासी लाख पूर्व, फिर बहत्तर, साठ, पचास, चालीस, तीस, बीस, दस, दो और एक लाख पूर्व, फिर चौरासी, बहत्तर, साठ, तीस, दस और एक लाख वर्ष, फिर पचानवे हजार, चौरासी हजार और पचपन हजार वर्ष, मुनिसुव्रतनाथ की तीस हजार वर्ष, और फिर दस हजार, एक हजार, सौ और महावीर की बहत्तर वर्ष थी। चौदह कुलकरों का शरीर पहले के अठारह सौ धनुष से चौदहवें के सवा पाँच सौ धनुष तक, और आयु पहले की पल्य के दसवें भाग से चौदहवें नाभिराजा की एक करोड़ पूर्व तक थी।
बारह चक्रवर्तियों में पहले भरत ऋषभदेव और रानी नंदा के पुत्र थे; पूर्वभव में वे पुंडरीकिणी नगरी के राजकुमार पीठ थे, जो कुशसेन स्वामी के शिष्य मुनि होकर सर्वार्थसिद्धि गए, और भरत चक्रवर्ती होकर छह खंड का राज्य कर मुनि बने, अंतर्मुहूर्त में केवलज्ञान पाकर निर्वाण को प्राप्त हुए। दूसरे सगर पूर्वभव में पृथ्वीपुर के राजा विजयतेज थे, जो यशोधर मुनि से दीक्षा लेकर विजय अनुत्तर विमान में जन्मे, फिर अयोध्या के राजा विजय और रानी सुमंगला के पुत्र हुए, पुत्रों के शोक से राज्य छोड़कर अजितनाथ के समवसरण में मुनि बने और सिद्ध हुए; तीसरे मघवा पूर्वभव में पुंडरीकिणी के राजा शशिप्रभ थे, जो विमल स्वामी के शिष्य होकर ग्रैवेयक गए, फिर श्रावस्ती के राजा सुमित्र और रानी भद्रवती के पुत्र हुए और धर्मनाथ के बाद, शांतिनाथ के जन्म से पहले, समताधारी जिनमुद्रा धारण कर सौधर्म स्वर्ग गए।
चौथे चक्रवर्ती सनत्कुमार, जो मघवा के बाद और शांतिनाथ से पहले हुए, के पूर्वभव बताते हुए गौतम स्वामी ने कहा कि गोवर्धन ग्राम में धर्मात्मा श्रावक जिनदत्त श्रावक के व्रत पालकर उत्तम गति गया, उसकी पतिव्रता श्राविका विनयवती ने घर में चैत्यालय बनवाकर सारा धन उसमें लगाया और आर्यिका बनकर स्वर्ग गई, और उसी ग्राम का आस्तिक गृहस्थ हेमबाहु उस चैत्यालय में भक्ति करके जय नाम का देव हुआ; कई बार देव और मनुष्य होकर वह महापुरी के राजा सुप्रभ और रानी तिलकसुंदरी का पुत्र धर्मरुचि हुआ, जिसने राज्य छोड़कर मुनि बने अपने पिता सुप्रभ से दीक्षा ली और समाधिमरण कर चौथे स्वर्ग गया, फिर नागपुर के राजा विनय और रानी सहदेवी का पुत्र सनत्कुमार हुआ। सौधर्म इन्द्र द्वारा उसके रूप की अति प्रशंसा सुनकर देव गुप्त रूप से आए और कुश्ती के अभ्यास के बाद मिट्टी लगे शरीर पर केवल धोती पहने स्नान को बैठे चक्रवर्ती को देखकर चकित हुए, पर जब वह वस्त्राभूषणों से सजकर सिंहासन पर बैठा तो सिर हिलाकर बोले कि क्षण भर पहले जैसा रूप अब नहीं रहा; यह सुनकर रूप और लक्ष्मी को बिजली की चमक जैसा क्षणभंगुर जान सनत्कुमार महामुनि बने, महाऋद्धियाँ प्राप्त हुईं, कर्म-निर्जरा के लिए महारोग का परीषह सहा और समाधिमरण कर तीसरे स्वर्ग में देव हुए।
शांतिनाथ पूर्वभव में पुंडरीकिणी के राजा मेघरथ थे, जो अपने पिता घनरथ तीर्थंकर के शिष्य मुनि होकर सर्वार्थसिद्धि गए, फिर हस्तिनापुर के राजा विश्वसेन और रानी ऐरा देवी के पुत्र होकर सोलहवें तीर्थंकर और पाँचवें चक्रवर्ती हुए; कुंथुनाथ छठे और अरनाथ सातवें चक्रवर्ती तथा सत्रहवें और अठारहवें तीर्थंकर थे, और तीनों राज्य छोड़कर मुनि बने और निर्वाण पधारे। आठवें सुभौम पूर्वभव में धान्यपुर के राजा कनकप्रभ थे, जो विचित्रगुप्त स्वामी के शिष्य होकर स्वर्ग गए, फिर अरनाथ के मोक्ष के बाद अयोध्या के राजा कृतवीर्य और रानी तारादेवी के पुत्र हुए; उनके पिता को मारने वाले, सात बार पृथ्वी को क्षत्रियरहित करने और क्षत्रियों के सिर खंभों में चिनवाने वाले परशुराम ने निमित्तज्ञानी के कहने से अतिथि वेश में भोजन को आए सुभौम को क्षत्रियों के दाँतों का पात्र दिखाया, तो दाँत खीर बन गए और भोजन का पात्र चक्र बन गया, जिससे सुभौम ने परशुराम को मारा; फिर उसने ब्राह्मणों से द्वेष कर इक्कीस बार पृथ्वी को ब्राह्मणरहित किया, और अति भोगासक्त, निर्दयी, अव्रती रहकर मरा और सातवें नरक गया।
नौवें महापद्म पूर्वभव में वीतशोका नगरी के राजा थे, जो सुप्रभ स्वामी के शिष्य मुनि होकर ब्रह्म स्वर्ग गए, फिर सुभौम के बाद, अरनाथ और मल्लिनाथ के बीच, हस्तिनापुर के राजा पद्मनाथ और रानी मयूरी के पुत्र हुए; विवाह न चाहने वाली उनकी आठ महारूपवती, स्वाभिमानी पुत्रियों को विद्याधर हर ले गए तो चक्रवर्ती ने उन्हें छुड़ाया, पर आठों कन्याओं ने आर्यिका के व्रत लेकर समाधिमरण से देवपद पाया और उन्हें हरने वाले विद्याधर भी मुनि बन गए, यह देखकर महापद्म ने पद्म नामक पुत्र को राज्य देकर विष्णु नामक पुत्र के साथ दीक्षा ली और केवलज्ञान पाकर मोक्ष गए। दसवें हरिषेण पूर्वभव में विजय नगरी के राजा महेन्द्रदत्त थे, जो अभिनंदन मुनि के शिष्य होकर महेन्द्र स्वर्ग गए, फिर कंपिलनगर के राजा हरिकेतु और रानी विप्रा के पुत्र हुए, जिन्होंने भरतक्षेत्र में अनेक चैत्यालय बनवाए और मुनिसुव्रतनाथ के तीर्थ में मुनि बनकर सिद्धपद पाया।
ग्यारहवें जयसेन पूर्वभव में राजपुर के राजा असिकांत थे, जो सुधर्मसागर के शिष्य मुनि होकर ब्रह्म स्वर्ग गए, फिर राजा विजय और रानी यशोवती के पुत्र हुए, जिन्होंने राज्य छोड़ दिगंबरी दीक्षा लेकर रत्नत्रय की आराधना से सिद्धपद पाया; वे मुनिसुव्रतनाथ और नमिनाथ के अंतराल में हुए। बारहवें ब्रह्मदत्त पूर्वभव में काशीपुरी के राजा संभूत थे, जो स्वतंत्रलिंग स्वामी के शिष्य मुनि होकर स्वर्ग में देव हुए, फिर नेमिनाथ के मोक्ष के बाद, पार्श्वनाथ से पहले, कंपिलनगर के राजा ब्रह्मरथ और रानी चूला के पुत्र हुए, और छह खंड का राज्य कर मुनिव्रत के बिना रौद्रध्यान से मरकर सातवें नरक गए; गौतम स्वामी ने शिक्षा दी कि सुंदर महल, हाथी, रथ और स्वर्ण-रजत पात्रों में अमृत समान भोजन पुण्य के फल हैं और टूटी कुटिया, फटे मैले वस्त्र तथा नंगे पैर चलना पाप के फल, और इन्द्र, चक्रवर्ती, बलभद्र, नारायण, प्रतिनारायण के पद भव्य जीव ही धर्म और दया रूपी वृक्ष के फल के रूप में पाते हैं।
इस अवसर्पिणी के भरतक्षेत्र में नौ वासुदेव (नारायण) हैं: त्रिपृष्ठ, द्विपृष्ठ, स्वयंभू, पुरुषोत्तम, पुरुषसिंह, पुंडरीक, दत्त, लक्ष्मण और कृष्ण; पूर्वभव में ये सब कुरूप, दुर्भागी या राज्यभ्रष्ट होकर मुनि बने और महातप किया, पर तप के फल में भोगों की अभिलाषा रूप निदान करने से स्वर्ग में देव होकर फिर बलभद्रों के छोटे भाई वासुदेव हुए, इसलिए ज्ञानियों के लिए निदान वर्जित है, वह महाभयानक दुख देने वाला है। आठवें नारायण लक्ष्मण पूर्वभव में कौशांबी नगरी के पुनर्वसु थे, महाशुक्र स्वर्ग से आकर अयोध्या में दशरथ और सुमित्रा के पुत्र हुए और उनकी पटरानी का नाम प्रभावती बताया गया है, तथा नौवें कृष्ण मथुरा में वसुदेव और देवकी के पुत्र हुए, जिनकी पटरानी रुक्मिणी है।
नौ बलभद्र, जिनके पिता वही होते हैं जो नारायणों के, ये हैं: अचल, विजय, भद्र, सुप्रभ, सुदर्शन, नंदिमित्र (आनंद), नंदिषेण (नंदन), रामचन्द्र और नौवें पद्म; इनमें तीन अनुत्तर विमानों से, तीन सहस्रार स्वर्ग से, दो ब्रह्म स्वर्ग से और एक महाशुक्र स्वर्ग से आए। आठवें बलभद्र रामचन्द्र पूर्वभव में क्षेमा नगरी के श्रीचन्द्र थे, उनकी माता कौशल्या (अपराजिता) हैं और उन्होंने सुव्रत मुनि से दीक्षा ली; आठ बलभद्र महातप से आठों कर्मों का नाश कर मोक्ष गए, और पद्म नाम के बलभद्र ब्रह्म स्वर्ग में महाऋद्धिधारी देव हुए।
नौ बलभद्र-नारायणों में से पाँच श्रेयांसनाथ से धर्मनाथ के समय तक हुए, छठे और सातवें अरनाथ और मल्लिनाथ के बीच, आठवें मुनिसुव्रतनाथ के मोक्ष जाने के बाद और नमिनाथ से पहले, और नौवें श्री नेमिनाथ भगवान के चाचा के पुत्र थे। उनके शत्रु नौ प्रतिनारायण हैं: अश्वग्रीव, तारक, मेरक, मधुकैटभ, निशुंभ, बलि, प्रह्लाद, रावण और जरासंध, जिनकी राजधानियाँ क्रम से अलका, विजयपुर, नंदनपुर, पृथ्वीपुर, हरिपुर, सूर्यपुर, सिंहपुर, लंका और राजगृही थीं; त्रेसठ शलाका पुरुषों में कोई तप कर मोक्ष गए, कोई स्वर्ग गए और फिर आकर मोक्ष जाएँगे, और जिन चक्री, हरि, प्रतिहरि ने वैराग्य नहीं धारा वे कुछ भवों के बाद तप कर मोक्ष पाएँगे।