मुख्य सामग्री पर जाएँ

पर्व 21

श्रीरामचन्द्र के वंश का वर्णन

गौतम स्वामी हरि से मुनिसुव्रतनाथ होते हुए जनक तक हरिवंश का, और वज्रबाहु तथा कीर्तिधर से शिशु सुकौशल तक इक्ष्वाकुवंश का वर्णन करते हैं।

कथा खंड रघुकुल: जन्म और विवाह

सारांश

आठवें बलभद्र राम की कथा आरंभ करते हुए गौतम स्वामी पहले हरिवंश की उत्पत्ति बताते हैं, जिसमें बीसवें तीर्थंकर मुनिसुव्रतनाथ कुशाग्रनगर में जन्मे, और उनके गर्भ, जन्म, दीक्षा, केवलज्ञान और मोक्ष का वर्णन करते हैं; मुनिसुव्रतनाथ के वंशजों में आगे मिथिला के राजा वासवकेतु हुए, जिनके पुत्र जनक हैं। फिर वे अयोध्या के इक्ष्वाकुवंश का वर्णन करते हैं: साले की हँसी को निमित्त बनाकर राजकुमार वज्रबाहु ससुराल जाते हुए मार्ग में ही मुनि बन जाते हैं, उनके दादा विजय भी दीक्षा लेते हैं, और वज्रबाहु के भाई पुरंदर तथा फिर उनके पुत्र कीर्तिधर राज्य करते हैं। कीर्तिधर नियम लेते हैं कि पुत्र-जन्म का समाचार सुनते ही मुनि बनेंगे, और रानी सहदेवी के छिपाने पर भी बात खुल जाने पर वे पंद्रह दिन के सुकौशल को राज्य देकर वन चले जाते हैं।

क्या हुआ

11 बिंदु

  1. आठवें बलभद्र की कथा के लिए गौतम स्वामी राजवंशों की उत्पत्ति बताते हैं: दसवें तीर्थंकर शीतलनाथ के मोक्ष के बाद कौशांबी के राजा सुमुख ने अज्ञानवश वीरक सेठ की पत्नी वनमाला को अपने घर रख लिया, फिर विवेक पाकर मुनियों को दान दिया और मरकर विद्याधर हुआ, वनमाला विद्याधरी हुई और विद्याधर ने उससे विवाह किया। एक दिन दोनों हरिक्षेत्र में क्रीड़ा कर रहे थे, तब वियोग की अग्नि में जलकर तप से स्वर्ग में देव हुए वीरक ने अवधिज्ञान से अपने शत्रु सुमुख के जीव को देखा और क्रोध से उसे पत्नी सहित उठा ले गया; इसी से वह हरि नाम से प्रसिद्ध हुआ और उसका वंश हरिवंश कहलाया।

  2. हरि के पुत्र महागिरि हुए, उनके हिमगिरि, उनके वसुगिरि, फिर इन्द्रगिरि, उनके रत्नमाला, उनके संभू, फिर भूतदेव आदि सैकड़ों राजा हरिवंश में हुए, और इसी हरिवंश में कुशाग्रनगर के जगत्प्रसिद्ध राजा सुमित्र और उनकी रानी पद्मावती हुए, जो इन्द्र के समान भोग भोगते थे। एक रात महारानी ने पिछले पहर में सोलह स्वप्न देखे, गजराज, वृषभ, सिंह, स्नान करती लक्ष्मी, दो पुष्पमालाएँ, चन्द्रमा, सूर्य, जल में क्रीड़ा करती दो मछलियाँ, जल से भरे कलश, कमलों सहित सरोवर, समुद्र, रत्नजड़ित सिंहासन, स्वर्ग का विमान, धरणेन्द्र का भवन, रत्नों की राशि और धुआँरहित अग्नि, और प्रातः विनय से पति के पास आकर उनका फल पूछा, तब राजा सुमित्र ने यथायोग्य फल कहा।

  3. आकाश से रत्नों की वर्षा हुई, एक बार में साढ़े तीन करोड़ रत्न, दिन में तीन बार, पंद्रह महीने तक माता-पिता के आँगन में बरसते रहे, आठ कुमारिका देवियाँ परिवार सहित माता की सेवा करती थीं, और जन्म होते ही इन्द्र ने लोकपालों सहित सुमेरु पर्वत पर क्षीरसागर के जल से भगवान का जन्माभिषेक किया और पूजा-स्तुति कर उन्हें माता की गोद में विराजमान किया। जब से भगवान गर्भ में आए तब से लोगों ने अणुव्रत-महाव्रत धारण किए और माता ने भी व्रत लिए, इसलिए वे मुनिसुव्रत नाम से प्रसिद्ध हुए; अंजनगिरि जैसे श्याम वर्ण होकर भी वे तेज से सूर्य और कांति से चन्द्रमा को जीतते थे, देव स्वर्ग से भोग-सामग्री लाते, गंधर्व देव भक्ति करते, किन्नरियाँ और अप्सराएँ नृत्य करतीं और इन्द्र सदा सेवा में तत्पर रहता।

  4. मुनिसुव्रतनाथ ने यौवन में विवाह कर कुछ वर्ष राज्य किया, फिर एक दिन बादलों को विलीन होते देख विरक्त हुए; लौकांतिक देवों ने आकर स्तुति की, और वे सुव्रत नामक पुत्र को राज्य देकर देवों की पवित्र पालकी में विपुल नामक उद्यान गए और अनेक राजाओं के साथ जिनदीक्षा ली, दो उपवास के बाद पारणा का नियम लिया, और राजगृह नगर में वृषभदत्त ने श्रेष्ठ अन्न से उनका पारणा कराकर स्वयं को कृतार्थ माना। कुछ महीने तप कर चंपक वृक्ष के नीचे शुक्लध्यान से घातिया कर्मों का नाश कर उन्होंने केवलज्ञान पाया, दिव्यध्वनि में मुनिधर्म और श्रावकधर्म का उपदेश दिया जिससे कोई मुनि, कोई श्रावक बना, तिर्यंचों ने भी श्रावक के व्रत लिए और अनेक देवों ने सम्यक्त्व पाया, फिर अनेक साधुओं सहित विहार कर सम्मेदशिखर के निर्जरकूट से मोक्ष पाया।

  5. मुनिसुव्रतनाथ के पुत्र राजा सुव्रत ने बहुत काल राज्य कर पुत्र दक्ष को राज्य दिया और जिनदीक्षा लेकर सिद्ध हुए; दक्ष के पुत्र ऐलावर्धन हुए, और उनके बाद क्रम से श्रीवर्धन, श्रीवृक्ष, संजयंत, कुणिम, महारथ, पुलोम आदि अनेक राजा हरिवंश में हुए, जिनमें कोई मोक्ष गए, कोई स्वर्ग गए। इसी कुल में मिथिला नगरी के स्वामी राजा वासवकेतु और उनकी पटरानी विपुला के पुत्र जनक हुए, जो सब नयों में प्रवीण थे और जैसे पिता पुत्र को पालता है वैसे प्रजा का पालन करते थे; गौतम स्वामी कहते हैं कि जनक हरिवंशी हैं।

  6. दशरथ के वंश की उत्पत्ति का वर्णन आरंभ करते हुए गौतम स्वामी कहते हैं कि इक्ष्वाकुवंश में श्री ऋषभदेव भगवान मोक्ष पधारे और उनके पुत्र भरत भी निर्वाण गए, और ऋषभदेव से मुनिसुव्रतनाथ तक के लंबे काल में इस वंश के असंख्य राजा हुए, जिनमें कोई दुर्धर तप कर निर्वाण गए, कोई अहमिन्द्र, कोई इन्द्र, कोई सामान्य देव हुए और थोड़े ही पाप के उदय से नरक गए। वे समझाते हैं कि अज्ञानी जीव चक्र के समान संसार में भ्रमण करते हैं, जहाँ दुख सुमेरु के समान और सुख राई के समान है, और जो दान, तप, जिनेन्द्र की पूजा-स्तुति-वंदना, शास्त्र-चर्चा, ज्ञानियों का विनय और सब जीवों से मैत्री करते हैं वही उत्तम पद पाते हैं।

  7. श्री मल्लिनाथ के मोक्ष के बाद, मुनिसुव्रतनाथ के अंतराल में, भरतक्षेत्र की अयोध्या नगरी में महाशूरवीर, प्रजापालन में प्रवीण राजा विजय हुए, उनकी पटरानी हेमचूलिनी से सुरेन्द्रमन्यु पुत्र हुआ, और सुरेन्द्रमन्यु की रानी कीर्तिसमा से दो पुत्र हुए, वज्रबाहु और पुरंदर, जो दो सूर्यों के समान पृथ्वी पर सुख से रहते थे। हस्तिनापुर के राजा इन्द्रवाहन और रानी चूड़ामणि की रूपवती पुत्री मनोदया का विवाह वज्रबाहु से हुआ, और जब मनोदया का भाई उदयसुंदर बहन को लेने आया, तो पत्नी के प्रति विशेष अनुराग के कारण वज्रबाहु भी उसके साथ ससुराल चल पड़े।

  8. मार्ग में वसंतगिरि पर्वत की सुगंधित शोभा देखते हुए वज्रबाहु की दृष्टि कायोत्सर्ग में खड़े एक मुनिराज पर पड़ी, जो इतने निश्चल थे कि मृग उन्हें ठूँठ समझकर उनके शरीर से खाज खुजाते थे, सूर्य के सम्मुख भुजाएँ लटकाए, नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि जमाए, तप से क्षीण पर कांति से पुष्ट। उन्होंने सोचा कि इन्होंने मनुष्य जन्म का फल पा लिया, और मैं सर्पों से लिपटे चंदन वृक्ष की तरह कर्मों से बँधा, भोग रूपी पर्वत की चोटी पर सो रहा हूँ और नीचे ही गिरूँगा, इसलिए मुनि बनूँ तो जन्म सफल हो; ऐसा सोचते हुए उनकी दृष्टि मुनि पर ऐसी जम गई मानो खंभे से बँधी हो।

  9. साले उदयसुंदर ने उनकी निश्चल दृष्टि देखकर हँसी में कहा, ‘क्या आप भी दिगंबरी दीक्षा लेंगे?’ वज्रबाहु ने कहा कि तुमने मेरा ही भाव प्रकट किया है, तब उसने हँसी में कहा कि आप दीक्षा लेंगे तो मैं भी लूँगा, पर आप इससे बहुत उदास होंगे; वज्रबाहु ने कहा, ‘ऐसा ही सही,’ और विवाह के आभूषण उतार फेंके और हाथी से उतर पड़े। रोती हुई मनोदया और आँसू बहाते उदयसुंदर से उन्होंने मधुर वचनों में कहा कि जन्म-मरण रहट की घड़ी के समान है, जीवन बिजली की चमक जैसा चंचल है, और हँसी में पी गई औषधि भी रोग मिटाती है, इसलिए तुम्हारे समान कोई हितकारी मित्र नहीं; फिर उन्होंने गुणसागर मुनि से दीक्षा ली और अपने हाथों केशलोंच किया, उदयसुंदर सहित छब्बीस राजकुमारों ने भी जिनदीक्षा ली, और मनोदया ने सब आभूषण त्यागकर एक सफेद साड़ी पहनकर आर्यिका के व्रत लिए।

  10. यह समाचार सुनकर दादा राजा विजय ने सभा में शोक से कहा कि मेरा पोता बाल्यावस्था में ही विषयों को विष समान जानकर मुनि हो गया, और मैं मूर्ख वृद्धावस्था में भी, इन्द्रनील मणि जैसे काले केश कफ जैसे सफेद हो जाने पर भी, भोग नहीं छोड़ सका; फिर सबसे क्षमा माँगकर उन्होंने छोटे पोते पुरंदर को राज्य दिया और पुत्र सुरेन्द्रमन्यु सहित निर्वाणघोष स्वामी से जिनदीक्षा ली। राजा पुरंदर और रानी पृथ्वीमती के पुत्र कीर्तिधर हुए, जो गुणों के सागर और विनयवान थे, और पुरंदर ने उनका विवाह राजा कौशल की पुत्री से कराकर उन्हें राज्य दिया और क्षेमंकर मुनि से मुनिव्रत धारण किए।

  11. एक दिन सिंहासन पर बैठे कीर्तिधर ने सूर्यग्रहण में ज्योति के स्वामी सूर्य को राहु के विमान से श्याम होते देखकर संसार को अनित्य जाना और मंत्रियों से मुनि बनने का निश्चय कहा, तब मंत्रियों ने कोयलों के ढेर के बीच वैडूर्य मणि रखकर दिखाया कि मणि रहते कोयले चमकते हैं और हटाते ही शोभाहीन हो जाते हैं, वैसे ही आपके बिना हम हैं, और विनती की कि अपने पिता की तरह पुत्र को राज्य देकर दीक्षा लें; तब राजा ने नियम लिया कि जिस दिन पुत्र-जन्म सुनूँगा उसी दिन मुनिव्रत धारण करूँगा। रानी सहदेवी ने पुत्र होने पर पति के वैराग्य के भय से जन्म छिपाया, पर एक दरिद्र ने धन के लोभ से राजा को बता दिया, तब राजा ने उसे मुकुट सहित सब आभूषण और सौ गाँवों सहित धन-संपन्न घोषशाखा नगर दे दिया, माता की गोद में पंद्रह दिन के पुत्र का राजतिलक किया, अयोध्या का दूसरा नाम कौशल होने से उसका नाम सुकौशल प्रसिद्ध हुआ, और वे घर रूपी बंदीगृह से निकलकर वन में मुनि बन गए।