पर्व 22
सुकौशल का दीक्षा लेना और भयंकर उपसर्ग सहकर इष्ट की प्राप्ति करना
सुकौशल अपने पिता कीर्तिधर मुनि से दीक्षा लेते हैं और पूर्वजन्म की माता, सिंहनी द्वारा शरीर विदारे जाने पर केवलज्ञान पाकर मोक्ष जाते हैं।
कथा खंड रघुकुल: जन्म और विवाहसारांश
पुत्र भी पिता की तरह मुनि न बन जाए, इस भय से रानी सहदेवी कीर्तिधर मुनि को अयोध्या से निकलवा देती है और नगर में मुनियों का आना बंद कर देती है, पर धाय वसंतलता के आँसुओं से सच जानकर सुकौशल नंगे पैर पिता के पास दौड़ते हैं, दीक्षा लेते हैं और गर्भस्थ पुत्र को राज्य दे देते हैं। सहदेवी आर्तध्यान से मरकर सिंहनी होती है और चातुर्मास के बाद सुकौशल पर झपटती है; उसी उपसर्ग में सुकौशल केवलज्ञान पाकर मोक्ष जाते हैं, कीर्तिधर के उपदेश से सिंहनी व्रत लेकर स्वर्ग जाती है और कीर्तिधर को भी केवलज्ञान होता है। फिर यह पर्व हिरण्यगर्भ, नघोष और उसकी शीलवती रानी सिंहिका, नरभक्षी सौदास और उसके बाद रघु, अनरण्य और दशरथ तक के इक्ष्वाकु राजाओं का वर्णन करता है, जहाँ दशरथ कौशल्या, सुमित्रा और सुप्रभा से विवाह करते हैं।
क्या हुआ
13 बिंदु
कई वर्ष बाद पृथ्वी समान क्षमाशील, चार हाथ भूमि देखकर जीवदया पूर्वक चलने वाले कीर्तिधर मुनि बहुत दिनों के उपवास के बाद पारणा के लिए अयोध्या आए, तो उनकी पूर्व रानी सहदेवी ने सोचा कि इन्हें देखकर मेरा पुत्र भी वैरागी न हो जाए, और क्रोध से लाल मुख कर द्वारपालों से कहा कि ये नग्न, मलिन, घर का नाश करने वाले यति हैं, इन्हें नगर से निकालो, मेरे भोले, कोमल चित्त पुत्र सुकौशल को मुनि के दर्शन न होने दो, कोई मुनि नगर में न आए, भूल हुई तो दंड दूँगी। उसने कहा कि जब से यह दयारहित होकर बालक को छोड़ मुनि हुआ तब से इस दिगंबर भेष का मेरे मन में आदर नहीं, और क्रूर द्वारपालों ने बेंत की छड़ियाँ लेकर कटु वचन कहते हुए मुनि को और आहार को आए अन्य साधुओं को भी नगर से निकाल दिया; पुत्र कहीं धर्म न सुन ले, इस भय से नगर में मुनियों का आना बंद कर दिया गया।
कीर्तिधर मुनि का यह अविनय देखकर सुकौशल की धाय वसंतलता शोक से रोने लगी; सुकौशल ने कहा कि माता, मेरी माता ने तो केवल गर्भ में धारण किया, तेरे दूध से मेरा शरीर बढ़ा है, इसलिए तू मेरी माता से भी अधिक है, जो मरना चाहे वही तुझे दुख दे सकता है, और यदि मेरी माता ने भी तेरा अपमान किया हो तो मैं उसका भी अनादर करूँगा। वसंतलता ने बताया कि तुम्हारे पिता तुम्हें बचपन में राज्य देकर मुनि हो गए थे, आज वे आहार को आए तो तुम्हारी माता ने द्वारपालों से उन्हें निकलवा दिया, तुम्हें वैराग्य न हो इसलिए मुनियों का नगर-प्रवेश रोक दिया, जबकि तुम्हारे गोत्र में परंपरा है कि पिता पुत्र को राज्य देकर वैरागी होते हैं और तुम्हारे घर से कोई साधु बिना आहार के नहीं लौटा।
यह वृत्तांत सुनकर राजा सुकौशल महल से उतरे और छत्र, चमर, वाहन आदि सब राजचिह्न छोड़कर कमल से भी कोमल नंगे पैरों से मुनि के दर्शन को दौड़ पड़े, लोगों से पूछते जाते कि क्या आपने मुनि को देखा, और छत्र-चमर वाले सेवक उनके पीछे दौड़ते आए; वन में शिला पर विराजमान पिता कीर्तिधर मुनि के पास पहुँचकर, द्वारपालों के कृत्य से लज्जित, आँसू भरे नेत्रों से हाथ जोड़कर बोले कि जैसे आग लगे घर में सोए पुरुष को कोई ऊँचे शब्दों से जगाता है, वैसे जन्म-मरण रूपी अग्नि से जलते संसार रूपी घर में मोह की नींद में सोए मुझे आपने जगाया है, अब कृपा कर मुझे दिगंबरी दीक्षा दीजिए।
उसी समय सब सामंत और गर्भवती रानी विचित्रमाला प्रजा सहित दुखी होकर आए, तब सुकौशल ने कहा कि रानी विचित्रमाला के गर्भ में जो पुत्र है उसे मैंने राज्य दिया, और आशा रूपी फाँसी तथा स्नेह रूपी पिंजरे को तोड़कर, बाह्य-अभ्यंतर परिग्रह छोड़कर, केशलोंच कर पिता कीर्तिधर मुनि से जिनदीक्षा ली और पाँच महाव्रत, पाँच समिति और तीन गुप्ति अंगीकार कीं। उनकी माता सहदेवी आर्तध्यान से मरकर तिर्यंच योनि में सिंहनी हुई, और पिता-पुत्र दोनों महाविरक्त मुनि एक स्थान पर न रहते हुए साथ विहार करने लगे।
वर्षाकाल में, जब साधु विहार नहीं करते, दोनों मुनियों ने श्मशान में एक वृक्ष के नीचे चार महीने के उपवास कर कभी पद्मासन, कभी कायोत्सर्ग, कभी वीरासन आदि आसनों से चातुर्मास पूर्ण किया, जहाँ घना अंधकार, सिंह, व्याघ्र, रीछ, सियार, सर्प, गिद्ध, अधजले मुर्दे, कपालों से सफेद हुई भूमि और भटकते भूत-पिशाच थे। कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा के बाद दोनों ने तीर्थ-वंदना के लिए विहार किया और ईर्या समिति से पारणा के लिए नगर की ओर आए, तभी सहदेवी का जीव वह सिंहनी, खून से लाल केसर, विकराल मुख, तीखी दाढ़ें, सिर पर उठी पूँछ और लपलपाती लाल जीभ वाली, सुकौशल स्वामी को देखकर बड़े वेग से उछलकर आई।
दोनों मुनि बिना किसी अवलंबन के कायोत्सर्ग ध्यान में खड़े रहे और उस पापिनी सिंहनी ने सुकौशल स्वामी का शरीर नखों से विदार डाला; गौतम स्वामी कहते हैं, संसार का चरित्र देखो, जहाँ माता ही पुत्र के शरीर का भक्षण करती है, फिर भी सुमेरु से अधिक स्थिर सुकौशल मुनि शुक्लध्यान से केवलज्ञान पाकर अंतकृत केवली हुए और इन्द्रादि देवों ने आकर ज्ञान और मोक्ष कल्याणक की क्रिया की। तब कीर्तिधर मुनि ने सिंहनी को संबोधा कि हे पापिनी, तू सुकौशल की माता सहदेवी थी, पुत्र से तेरा अधिक स्नेह था, और तूने उसी का शरीर नखों से विदारा; जातिस्मरण से पूर्वभव याद कर वह दुखी हुई, श्रावक के व्रत लेकर संन्यास धारण किया और मरकर स्वर्ग गई, और कीर्तिधर मुनि को भी केवलज्ञान हुआ, जिसकी पूजा को सब देव आए।
सुकौशल की रानी विचित्रमाला के शुभ लक्षणों वाला पुत्र हुआ, जिसके गर्भ में आने से माता के शरीर की ज्योति स्वर्ण समान हो गई, इसलिए उसका नाम हिरण्यगर्भ प्रसिद्ध हुआ; राजा बनकर उसने अपने गुणों से मानो ऋषभदेव का समय फिर प्रकट किया और राजा हरि की पुत्री अमृतवती से विवाह किया। एक दिन दर्पण में एक सफेद बाल देखकर उसे काल का दूत मानकर उसने रानी अमृतवती के पुत्र नघोष को राज्य दिया और विमल मुनि से दिगंबर दीक्षा ली; नघोष जब से गर्भ में आया तब से कोई पाप का वचन नहीं बोला गया, इसलिए वह नघोष नाम से प्रसिद्ध हुआ।
नघोष रानी सिंहिका को अयोध्या की रक्षा सौंपकर उत्तर दिशा के राजाओं को जीतने गए, तब दक्षिण के राजा अयोध्या लेने आए, और शस्त्र तथा शास्त्र विद्या में निपुण सिंहिका ने बड़ी सेना लेकर उन्हें हराया, फिर दक्षिण दिशा के सामंतों को भी जीतकर जय-जयकार के बीच अयोध्या लौटी; पर उत्तर जीतकर लौटे नघोष ने सोचा कि अखंड शील पालने वाली कुलवती स्त्रियों में ऐसी कठोरता नहीं होती, और उस पवित्र पतिव्रता को पटरानी पद से हटा दिया, जिससे वह दरिद्र हो गई। कुछ समय बाद राजा को ऐसा दाहज्वर हुआ जिस पर कोई औषधि काम न आई, तब सिंहिका ने पुरोहित, मंत्री और सामंतों को बुलाकर अपने हाथ का जल पुरोहित को दिया और कहा कि यदि मैं मन, वचन, काय से पतिव्रता हूँ तो इस जल के सींचने से राजा का ज्वर मिट जाए; छींटे लगते ही ज्वर मिट गया, राजा ने स्वयं उसे महाशीलवती कहा, ‘धन्य-धन्य’ की आकाशवाणी हुई, पुष्पवृष्टि हुई, और नघोष ने उसे फिर पटरानी बनाया तथा बहुत समय निष्कंटक राज्य कर कुल-परंपरा के अनुसार सिंहिका के पुत्र सौदास को राज्य देकर मुनिव्रत धारण किए।
राजा सौदास पापी मांसाहारी हुआ, जबकि उसके वंश में किसी ने अभक्ष्य आहार नहीं किया था; अष्टाह्निका पर्व में भी मांस की इच्छा होने पर रसोइए के समझाने के बावजूद उसने हठ किया, तब रसोइया नगर के बाहर से उसी दिन मरे एक बालक को कपड़े में लपेट लाया और स्वादिष्ट पकाकर राजा को खिलाया; प्रसन्न राजा के एकांत में पूछने पर रसोइए ने अभयदान माँगकर सच बता दिया और राजा ने ऐसा ही मांस नित्य लाने की आज्ञा दी, सो रसोइया बालकों को लड्डू बाँटता और जो बालक पीछे रह जाता उसे पकड़कर मारकर राजा को खिलाता। नगर में बालक घटने लगे तो लोगों ने भेद जानकर रसोइए सहित राजा को देश से निकाल दिया और रानी कनकप्रभा के पुत्र सिंहरथ को राज्य दिया।
सब जगह ठुकराया गया पापी सौदास महादुखी होकर पृथ्वी पर भटकता रहा और श्मशान में डाले गए मृत बालकों को ऐसे खाता जैसे सिंह मनुष्यों को खाता है, इसलिए सिंह सौदास नाम से प्रसिद्ध हुआ; फिर दक्षिण दिशा में मुनि के दर्शन और धर्मश्रवण कर उसने श्रावक के व्रत लिए। महापुर नगर का राजा निःसंतान मर गया तो लोगों ने निश्चय किया कि पाटहाथी जिसे पीठ पर बिठाकर लाएगा वही राजा होगा, और हाथी सिंह सौदास को ले आया; वह न्याय से राज्य करने लगा, और जब पुत्र सिंहरथ ने उत्तर दिया कि तू महापापी, निंद्य है, मैं तुझे नमस्कार नहीं करूँगा, तो वह पुत्र से लड़ने चला, नगर के लोग यह सोचकर भागे कि यह मनुष्यों को खाएगा, और युद्ध में पुत्र को जीतकर उसने दोनों राज्य उसी को दे दिए और वन में जाकर मुनि बन गया।
सिंहरथ के बाद इक्ष्वाकुवंश में क्रम से ब्रह्मरथ, चतुर्मुख, हेमरथ, सत्यरथ, पृथुरथ, पयोरथ, दृढ़रथ, सूर्यरथ, मांधाता, वीरसेन, पृथ्वीमन्यु, कमलबंधु, रविमन्यु, वसंततिलक, कुबेरदत्त, कीर्तिधारी कुंथुभक्त, शतरथ, वीररथ, द्विरदरथ, सिंहदमन, हिरण्यकशिपु, पुंजस्थल और ककुस्थल हुए, और ककुस्थल के पुत्र रघु हुए; ये सभी महापराक्रमी राजा अपने पुत्रों को राज्य देकर वैरागी हुए। गौतम स्वामी श्रेणिक से कहते हैं कि ऋषभदेव से चले आ रहे इस वंश में श्री रामचन्द्र तक अनेक बड़े राजा मुनिव्रत धारण कर मोक्ष गए, कोई अहमिन्द्र, कोई स्वर्ग में देव हुए, और पापी कोई विरले ही हुए।
अयोध्या में राजा रघु के पुत्र अनरण्य हुए, जिनके प्रताप से जंगलों में भी नगर बस गए; उनकी गुणवती, रूपवती, पतिव्रता रानी पृथ्वीमती से दो शुभलक्षण पुत्र हुए, अनंतरथ और दशरथ। माहिष्मती के स्वामी राजा सहस्ररश्मि और अनरण्य में सौधर्म-ईशान इन्द्रों जैसी परम मित्रता थी और दोनों का वचन था कि जो पहले वैराग्य धारे वह दूसरे को बताए; रावण से युद्ध में हारकर सहस्ररश्मि मुनि हुए और अनरण्य को सूचना दी, तब अनरण्य ने दशरथ को राज्य देकर पुत्र अनंतरथ सहित अभयसेन मुनि से जिनदीक्षा ली और महातप से कर्मों का नाश कर मुक्ति पाई, तथा परिग्रह रहित विहार करते, बाईस परीषह सहते हुए भी कभी उद्वेग न पाने वाले अनंतरथ मुनि पृथ्वी पर अनंतवीर्य नाम से प्रसिद्ध हुए।
दर्भस्थल नगर के प्रशंसनीय राजा कौशल और रानी अमृतप्रभा की पुत्री कौशल्या, जिसे अपराजिता भी कहते हैं, रति के समान अनुपम सुंदरी, का विवाह राजा दशरथ से हुआ; कमलसंकुल नामक बड़े नगर के राजा सुबंधुतिलक और रानी मित्रा की सर्वगुणसंपन्न पुत्री सुमित्रा से तथा महाराज नामक राजा की रूपवती पुत्री सुप्रभा से भी दशरथ ने विवाह किया। सम्यग्दर्शन को रत्न के समान और राज्य को तृण के समान नाशवान मानने वाले दशरथ ने भरत चक्रवर्ती द्वारा बनवाए गए जीर्ण जिनमंदिरों का ऐसा जीर्णोद्धार कराया मानो वे नए हों, और तीर्थंकरों के कल्याणक क्षेत्रों की रत्नों से पूजा की; गौतम स्वामी कहते हैं कि दशरथ का जीव पूर्वभव में महापुण्य कर स्वर्ग की लक्ष्मी भोगकर इस लोक में नरेन्द्र हुआ।