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पर्व 23

रावण को दशरथ के पुत्र और जनक की पुत्री से मरण की शंका और उसका निराकरण

नारद से विभीषण के षड्यंत्र की सूचना पाकर दशरथ और जनक वेश बदलकर निकल जाते हैं, और विभीषण उनके सजीव जैसे पुतलों का सिर कटवा देता है।

कथा खंड रघुकुल: जन्म और विवाह

सारांश

विदेहक्षेत्र और सुमेरु से लौटे नारद एकांत में दशरथ को बताते हैं कि निमित्तज्ञानी ने रावण से कहा है कि दशरथ के पुत्र और जनक की पुत्री के निमित्त से उसकी मृत्यु होगी, और विभीषण ने उनकी संतान होने से पहले ही दोनों राजाओं को मारने का निश्चय किया है। मंत्री समुद्रहृदय की सलाह पर दशरथ वेश बदलकर राज्य से निकल जाते हैं और उनके स्थान पर उनका सजीव जैसा पुतला बिठाया जाता है, और जनक भी ऐसा ही करते हैं। विभीषण का भेजा विद्याधर पुतले का सिर काट लेता है और विभीषण सिरों को समुद्र में डालकर रावण को निश्चिंत करता है, पर बाद में अपने बिना विचारे कार्य पर पछताता है, जबकि दोनों राजा दरिद्रों की तरह पृथ्वी पर भ्रमण करते हैं।

क्या हुआ

6 बिंदु

  1. एक दिन जिनेन्द्र की कथा में आसक्त मन वाले, सुरेन्द्र समान वैभव वाले राजा दशरथ सभा में बैठे थे, तभी अपने शरीर के तेज से आकाश को प्रकाशित करते नारद आए; राजा ने उठकर सामने जा उन्हें आदर से सुंदर सिंहासन पर बिठाया, नारद ने कहा जिनेन्द्रदेव के प्रसाद से सब कुशल है और राजा ने कहा देव-धर्म-गुरु के प्रसाद से सब कुशल है। राजा के पूछने पर नारद ने बताया कि मैं उत्तम जीवों से भरे विदेहक्षेत्र गया था, जहाँ जगह-जगह जिनमंदिर और महामुनि हैं और तीर्थंकर, चक्रवर्ती, बलदेव, वासुदेव, प्रतिवासुदेव निरंतर उत्पन्न होते रहते हैं, वहाँ पुंडरीकिणी नगरी में सीमंधर स्वामी का तप कल्याणक प्रत्यक्ष देखा और सुमेरु पर उनके जन्माभिषेक का वर्णन सुना, फिर सुमेरु की प्रदक्षिणा कर नंदनवन के, देवारण्य वन के और कुलाचलों के शिखरों के अकृत्रिम चैत्यालयों की वंदना की; यह सुनकर दशरथ ने हाथ जोड़ सिर नवाकर ‘देवेभ्यो नमः’ कहा।

  2. नारद के संकेत पर राजा ने सभा विसर्जित की, और एकांत में नारद ने कहा, ‘हे सुकौशल देश के अधिपति, मैं लंका गया था जहाँ श्री शांतिनाथ भगवान के चैत्यालय की वंदना की, वहाँ विभीषण आदि के मुख से सुना कि रावण ने बुद्धिसार निमित्तज्ञानी से पूछा था कि मेरी मृत्यु किसके निमित्त से होगी, तो उसने कहा कि राजा दशरथ के पुत्र और राजा जनक की पुत्री के निमित्त से।’ रावण को चिंतित देख विभीषण ने कहा था कि दोनों के पुत्र-पुत्री होने से पहले ही मैं उन्हें मार डालूँगा, उसने तुम्हारा नगर और महल देखने सेवक भी भेजे थे जो देखकर लौट गए, और मुझ पर विश्वास कर पूछा था कि क्या तुम दशरथ और जनक का रूप अच्छी तरह जानते हो, जिससे मैंने उसका खोटा अभिप्राय जान लिया।

  3. नारद ने कहा कि विभीषण उपाय करे उससे पहले कहीं छिप जाओ, सम्यग्दृष्टि जिनधर्मियों से, विशेषकर तुम जैसे धर्मात्माओं से मुझे बहुत प्रेम है, और अब मैं यह वृत्तांत राजा जनक को कहने जाता हूँ; राजा ने उठकर नारद का सत्कार किया और नारद आकाश मार्ग से मिथिलापुर जाकर जनक को भी सब बताकर देशांतर चले गए, और दोनों राजाओं को मरण की शंका हुई। दशरथ ने एकांत में मंत्री समुद्रहृदय को नारद की बात बताई, तो उसने कहा कि तीन लोक का राज्य मिले और जीवन जाए तो किस काम का, इसलिए जब तक मैं शत्रुओं का उपाय करूँ तब तक आप रूप छिपाकर, वेश बदलकर पृथ्वी पर विचरें; तब राजा देश, भंडार और नगर उसे सौंपकर नगर से बाहर निकल गए।

  4. मंत्री ने दशरथ के रूप का ऐसा पुतला बनवाया जिसमें केवल चेतना नहीं थी, बाकी सब राजचिह्न थे, लाख के रस से उसमें रुधिर भरा और जीवित शरीर जैसी कोमलता बनाई, उसे महल के सातवें खंड में सिंहासन पर बिठाया जहाँ नीचे से सब दर्शन कर सकें पर ऊपर कोई न जा सके, और प्रचार किया कि राजा के शरीर में महारोग है; यह भेद केवल मंत्री और पुतला बनाने वाला जानते थे, और उन्हें भी देखकर यही शंका होती कि यह राजा ही है। राजा जनक के यहाँ भी ऐसा ही किया गया, और सुंदर राजमहलों में रहने वाले, देवांगनाओं जैसी रानियों वाले वे दोनों महाराजा दरिद्रों की तरह अकेले पैदल भ्रमण करने लगे; संसार के स्वरूप को धिक्कार है, और जो प्राणी सब जीवों को अभयदान देता है वह कभी भयभीत नहीं होता, अभयदान के समान कोई दान नहीं।

  5. विभीषण ने दशरथ और जनक को मारने के लिए सुभट भेजे, जो हाथों में शस्त्र लिए रात-दिन नगरी में छिपे-छिपे फिरते रहे पर ऊँचे महल में प्रवेश न कर सके; बहुत दिन बीतने पर विभीषण स्वयं आया, महल में गीत-नृत्य की ध्वनि सुनकर भीतर गया, अंतःपुर के बीच राजा दशरथ को सोते देखा, और स्वयं दूर खड़े रहकर विद्युद्विलसित नामक विद्याधर को दशरथ का मस्तक काट लाने भेजा, जिसने मस्तक काटकर विभीषण को दिखाया और सारे राजलोग रोने लगे। विभीषण दशरथ और जनक के सिर समुद्र में डालकर रावण के पास गया और उसे हर्षित किया; दोनों राजाओं की रानियाँ विलाप करती रहीं, फिर पता चला कि वह कृत्रिम पुतला था तो सबने संतोष किया।

  6. लंका जाकर विभीषण ने अशुभ कर्म की शांति के लिए दान, पूजा आदि शुभ क्रियाएँ कीं और बार-बार पछताया कि किस पाप कर्म का उदय आया कि भाई के मोह से बिना कारण, बिना विचारे भूमिगोचरियों को मारा; क्या आशीविष सर्प गरुड़ पर प्रहार कर सकता है, कहाँ वे अल्प ऐश्वर्य वाले भूमिगोचरी और कहाँ इन्द्र समान शूरवीर रावण, कहाँ चूहा और कहाँ सिंह। उसने सोचा कि जिसे जहाँ जितना सुख-दुख होना है वह कर्म के वश अवश्य होगा, निमित्तज्ञानी सचमुच दूसरों की मृत्यु जानता तो अपनी मृत्यु से पहले अपना आत्मकल्याण क्यों नहीं करता, और पाताल तक गहरे समुद्र के बीच बसी लंका में जहाँ देव भी नहीं पहुँच सकते वहाँ बेचारे भूमिगोचरी कैसे आते; ऐसा विचार कर उसने निश्चय किया कि फिर ऐसा अयोग्य कार्य कभी नहीं करूँगा।