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पर्व 24

दशरथ और कैकेयी का विवाह

स्वयंवर में कैकेयी द्वारा वरे गए, भ्रमण करते दशरथ उसे सारथी बनाकर विरोधी राजाओं को परास्त करते हैं और उसे एक वर देते हैं।

कथा खंड रघुकुल: जन्म और विवाह

सारांश

छिपकर भ्रमण करते दशरथ जनक के साथ कौतुकमंगल नगर के राजा शुभमति की सर्वकला-निपुण पुत्री कैकेयी के स्वयंवर में पहुँचते हैं, और राजसी वैभव न होने पर भी कैकेयी उन्हें वरमाला पहनाती है। हेमप्रभ के नेतृत्व में क्रुद्ध राजा आक्रमण करते हैं तो कैकेयी रथ चलाती है और दशरथ अकेले उन्हें हरा देते हैं, फिर कैकेयी से विवाह कर अयोध्या लौटते हैं और जनक मिथिला लौटते हैं। प्रसन्न दशरथ कैकेयी को वर माँगने को कहते हैं, और वह उसे धरोहर के रूप में रखने को कहती है, जिसे वह अपनी इच्छा के समय माँगेगी।

क्या हुआ

6 बिंदु

  1. गौतम स्वामी श्रेणिक से कहते हैं कि अनरण्य के पुत्र दशरथ ने पृथ्वी पर भ्रमण करते हुए कैकेयी से विवाह किया, वह कथा आश्चर्य से भरी है: उत्तर दिशा के कौतुकमंगल नगर में राजा शुभमति और गुणों से भूषित रानी पृथुश्री राज्य करते थे, जिनकी पुत्री कैकेयी और पुत्र द्रोणमेघ की कीर्ति दसों दिशाओं में फैली थी। अति सुंदर कैकेयी सम्यग्दर्शन सहित श्राविका के व्रत पालने वाली, जिनशासन की ज्ञाता और महाश्रद्धावान थी, और सांख्य, पातंजल, वैशेषिक, वेदांत, न्याय, मीमांसा, चार्वाक आदि परशास्त्रों तथा लौकिक शास्त्रों की भी ज्ञाता थी।

  2. संगीत और नृत्य में वह अद्वितीय थी: उर, कंठ और सिर से निकलने वाले षड्ज, ऋषभ, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद, इन सात स्वरों, शीघ्र, मध्यम और विलंबित तीन लयों, स्थायी, संचारी, आरोहक और अवरोहक चार प्रकार के तालों और उनके तेरह अलंकारों, संस्कृत, प्राकृत और शौरसेनी तीन भाषाओं, तत, आनद्ध, सुषिर और घन चार प्रकार के वाद्यों और शृंगार, हास्य, करुण, वीर, अद्भुत, भयानक, रौद्र, बीभत्स और शांत नौ रसों को कैकेयी जैसा कोई नहीं जानता था। वह अक्षर, मात्रा, गणित, गद्य-पद्य, व्याकरण, छंद, अलंकार, नाममाला, लक्षणशास्त्र, तर्क, इतिहास और चित्रकला में, रत्न, नर, शस्त्र, गज, वृक्ष, वस्त्र और सुगंध की परीक्षा में, ज्योतिष विद्या में, बालक, वृद्ध, तरुण, मनुष्य, घोड़े और हाथी के उपचार में, मंत्र-औषधि में और युद्धकला में भी अति प्रवीण थी, कला, गुण और रूप में ऐसी दूसरी कन्या नहीं थी।

  3. ऐसी गुणवान कन्या के योग्य वर कौन हो, यह सोचकर राजा शुभमति ने स्वयंवर मंडप रचा और हरिवाहन आदि अनेक राजाओं को बुलाया, जो विभूति सहित आए, और भ्रमण करते हुए राजा दशरथ भी जनक के साथ वहाँ आए, जिनके पास राज्य का वैभव नहीं था फिर भी वे रूप और गुण में सब राजाओं से अधिक थे। दासियों ने सब राजाओं के नाम, देश और गुण बताए, पर मनुष्यों के लक्षण जानने वाली विवेकिनी कैकेयी ने पहले दशरथ पर नेत्र रूपी नीलकमलों की माला डाली और फिर बगुलों के बीच बैठे राजहंस की ओर जाती राजहंसिनी की तरह उनके पास जाकर लोकाचार के लिए रत्नों की माला उनके गले में पहना दी।

  4. न्यायप्रिय राजाओं ने प्रसन्न होकर कहा कि जैसी कन्या वैसा ही योग्य वर मिला, पर कुछ ढीठ राजा क्रोध से कहने लगे कि बड़े वंशों के ऋद्धिधारी राजाओं को छोड़कर इस कन्या ने अनजाने कुल-शील वाले विदेशी को वरा है, इस विदेशी को निकालकर कन्या को केश पकड़कर हर लो, और युद्ध को तैयार हुए; व्याकुल शुभमति ने दशरथ से कहा कि मैं इन दुष्टों को रोकता हूँ, आप कन्या को रथ में लेकर कहीं और चले जाइए, पर दशरथ ने हँसकर कहा कि निश्चिंत रहिए, मैं इन्हें दसों दिशाओं में भगा दूँगा। वे कैकेयी सहित रथ पर चढ़े, कैकेयी ने घोड़ों की लगाम सँभालकर पूछा, ‘नाथ, जिसकी मृत्यु निकट हो उसकी ओर रथ चलाऊँ?’ तब राजा ने कहा कि गरीबों को मारने से क्या, इस सेना के अधिपति हेमप्रभ की ओर चलो, जिसके सिर पर चन्द्रमा जैसा सफेद छत्र फिर रहा है।

  5. दशरथ ने जो बाण चलाए वे किसी की दृष्टि में न आए और अनेक राजा क्षण भर में घायल होकर भाग गए; तब लज्जित हेमप्रभ हाथी, घोड़े, रथ और पैदलों सहित आया और अकेले दशरथ पर तोमर, बाण, चक्र आदि शस्त्र बरसाए, पर एक रथ के स्वामी दशरथ युद्ध में मानो असंख्य रथ हो गए, अपने बाणों से शत्रुओं के बाण काट डाले, और क्षण भर में हेमप्रभ की ध्वजा छेदी, छत्र उड़ाया, घोड़े घायल किए, रथ तोड़कर उसे नीचे गिरा दिया, तो वह भय से काँपता दूसरे रथ पर चढ़कर अपना यश कलंकित कर भाग गया। एक दशरथ ने अनंतरथ जैसा काम किया, ससुर और शत्रु दोनों की सेनाओं में ‘धन्य इस पुरुष की शक्ति!’ का शब्द हुआ और बंदीजनों ने यशोगान किया; फिर दशरथ ने कौतुकमंगल नगर में महामंगलाचार के साथ कैकेयी का पाणिग्रहण किया और अयोध्या आए, जनक भी मिथिलापुरी गए, और दोनों का जन्मोत्सव और राज्याभिषेक बड़ी विभूति से हुआ, फिर वे निर्भय होकर इन्द्र समान रहने लगे।

  6. सब रानियों के बीच राजा दशरथ ने कैकेयी से कहा, ‘हे चन्द्रवदनी, जो इच्छा हो वह माँग, मैं तुझसे अति प्रसन्न हूँ; यदि तू युद्ध में रथ न चलाती तो एक साथ आए इतने शत्रुओं को मैं कैसे जीतता, जैसे अरुण समान सारथी न हो तो सूर्य रात्रि के अंधकार को कैसे जीते’; पतिव्रता कैकेयी लज्जा से नीचे देखती रही, और फिर कहने पर विनती की, ‘नाथ, मेरा वर आपके पास धरोहर रहे, जब मेरी इच्छा होगी तब लूँगी।’ प्रसन्न राजा ने कहा कि तेरी बुद्धि अद्भुत है, तेरा वर मैंने धरोहर रखा, तू जब जो माँगेगी वही दूँगा, और सब राजलोग हर्षित होकर सोचने लगे कि यह अद्भुत बुद्धि की खान कोई अपूर्व वस्तु माँगेगी, अल्प वस्तु क्या माँगेगी; अंत में गौतम स्वामी इक्ष्वाकुवंश को प्रकाशित करने वाले, महान्यायवान, महाशूरवीर श्री रामचन्द्र की उत्पत्ति सुनाने का उपक्रम करते हैं।